Friday, 31 August 2012

लोकतंत्र का विटामिन है 'लूट'


बड्डे सुबह-सुबह समाचार पत्र लिए गुस्से में तमतमाए यहां-वहां ताक ही रहे थे कि इतने हम दिखे तो, देश में हो रही ‘लूट’ का दुखड़ा रोने लगे और बोल पड़े- ‘बड़े भाई भ्रष्टाचार की तो अब हद हो गई। पहले यही लूट पैसा-रुपिया में थी, सीमित थी, तब ‘लूट’ में भी एक लिहाज था, हया थी कि ज्यादा में लोग क्या कहेंगे। पर अब है कि हजार, लाख, करोड़ से बात बढ़कर लाख-करोड़ तक चली गई...और आगे कहां तक जाएगी इसकी भविष्यवाणी कोई खांटी का ज्योतिषी भी नहीं कर सकता।’ हमने बड्डे की नब्ज पकड़कर कहा इस ‘लूट’ की चिंता में खून जलाने का भी भला कोई फायदा है? ऐसे में तो दो चार बीमारी और पाल लोगे और उखड़ना कुछ नहीं है। बाबा, अन्ना जैसे तो पानी मांग गए.....केजरीवाल का कचूमर निकलता दिख ही रहा है, बडेÞ-बडेÞ आंदोलन कब्र में लीन हैं, तो तुम्हारी-हमारी क्या बिसात!
    क्योंकि भ्रष्टाचार अब चर्चा-परिचर्चा, बहस-बाजी, लिखने-पढ़ने का विषय नहीं रहा। तुम ही देख लो कित्ता विरोध तुमने किया जिस पर हमने बड़े-बड़े लेख लिखे, टीवी में बहसें करार्इं पर क्या हुआ सिवाए बाल सफेद करने के। हमने भी थोड़ा ‘लूट’ का विटामिन लिया होता तो आज हमारे बाल नहीं कपड़े फक्क सफेद होते। इसलिए अब ‘लूट’ बहस बाजी का नहीं सिर्फ करने और करने का चीज है, जिसको जहां जैसा बन पड़े लूटते रहो। जिसकी सरकार वह लूटे और जो विपक्ष में वह चिल्लाए, धरना दे, बहिष्कार करे, सड़क में लोटे और जब चुनाव में यही पांसा पलट जाए तो फिर  सिलसिला दूसरी ओर से रिवर्स हो जाए।
   भारत में लोकतंत्र का यही अर्थ है,यही इसका असली चरित्र है। इसलिए जो भी आचरण नेताओं की जमात ने अख्तियार कर रखा है वे लोकतंत्र के विटामिन ‘लूट’ का का ही तो रस ले रहे हैं और जिसके पास विटामिन नहीं वह बेचारा है। समझने वाली बात है बड्डे कि आखिर यह अंगे्रजों का ही दिया तंत्र-मंत्र है। उन्होंने ने भी अपनी क्षमता भर देश लूटा-खसूटा और जाते-जाते ‘लूट’ करने में कैसे हमें आसानी हो उसका कानून भी बना-पढ़ा गए। लेकिन बड्डे आज तो अंग्रेज भी सोच रहे होंगे कि हम तो कुछ भी लूट ही नहीं पाए... बल्कि जित्ता दो सौ साल में लूटकर जहाजों में बड़ी मेहनत मशक्कत से ढ़ो-ढ़ो के लाए उत्ता तो सरकार के कारिंदे एक-एक सौदे में फटकारे दे रहे हैं।
 बड्डे हमारे देश के देशी अंग्रेज तो और बडेÞ वाले निकले...जैसे वे परदेशी अंग्रेजों को बता देना चाहते हैं कि तुम लूटने में कितने कच्चे और बच्चे थे, जबकि तुम्हारा तो एकाधिकार था, वो भी 4 या 5 बरस नहीं पूरे दो सौ बरस तक। फिर भी क्या लूट पाए! जित्ता इंग्लैण्ड था उत्ता ही रह गया। ग़र इतना मौका हमारी बिरादरी को मिला होता तो, वे यहां की बूंद-बूंद निचोड़ लेते।
 सोचो बड्डे! यदि हमारे देशी अंग्रेजों ने पूरे विश्व में इंग्लैण्ड के अंग्रेजों की तरह शासन किया होता तो,  कसम से अब तक तो हमारे हर नेता का खुद का एक देश होता जहां न बार-बार चुनाव होते, न ही नासपीटी जनता के हाथ-पैर जोड़ने पड़ते। दरअसल अंग्रेज लोकतंत्र के विटामिन लूट को ठीक पहचान नहीं पाए, इसीलिए आज भी उसी टापू में कुलबुला रहे हैं। लेकिन हमारे वाले अंग्रेजों को देखो, जनता की सेवा में मिल रहे ‘लूट’ नामक विटामिन से उनके चेहरे बिना फेशियल के कैसे चमक-दमक रहे हैं और  अपनी शक्ल देख लो। जनता क्या एक परिवार की सेवा में भरी जवानी मुरझाए जा रहे हैं। सो बड्डे अभी भी मौका है लोकतंत्र में ‘लूट’ के विटामिन को पहचानो वरना! ये विटामिन कोयला, स्पेक्ट्रम, खेल, खनिज, रेत, जमीनों आदि में विभिन्न रूपों मौजूद है।
  

Monday, 20 August 2012

कांड का बहुवचन है कांडा

 बड्डे को बड़ी चिंता में उदास बैठे देखकर आखिर हमने ही पूछ लिया कि इस उदासी का सबब...क्या  है? वे  बोले बडेÞ भाई न ही पूछो तो ही ठीक है वरना  ‘बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी...।’ बड्डे बोले बडेÞ भाई अपने जीवन में ‘कांड’ तो हमने बहुत सुने हैं, जैसे रामायण में बालकांड से लेकर लंकाकांड तलक और  फिर हमारी संस्कृति में कर्मकांडों की जन्म से लेकर मृत्यु तक षोड़श कर्मकांडों की लम्बी श्रृखंला हिमालय की पर्वत श्रृंखला की तरह विस्तृत है। राजनीति में भी अक्सर ‘कांड’ षड़यंत्र के रूप नित घटते रहते हैं, समाज में भी लूट कांड, अग्नि कांड जानबूझकर कराये जाते हैं, लेकिन बड़े भाई ये कांडा क्या है। क्या ‘कांड’ का बहुवचन है ‘कांडा’? हमने कहा- अरे नहीं ये तो वहीं गोपाल कांडा है जिसने जूते पहनाने की दुकान से अपना कैरियर शुरू किया और एयर लाइंस से मंत्री तक का सफर विभिन्न काडों को अंजाम देते हुए पूरा किया।
   सम्पूर्ण वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य में खासकर भारत में सर्वाधिक ग्रोथ इसी  सेक्टर में देखने में आती है। देश कितनी भी मुश्किल में  हो, उसकी आवाम गश खा खाकर जीने को मजबूर हो, पर राजनीति का सेंसेक्स कभी नहीं गिरता वह तो ऊर्ध्वाधर रेखा में फर्श से अर्श का सफर धड़ल्ले से तय करता है। ऐसी नजीर भारतीय राजनीतिक व्यवस्था से बेहतर दुनिया के किसी और मुल्क में मिलना मुश्किल है।
 विभिन्न क्षेत्रों में कांडों को कैसे अजांम दिया जाता है इसका विश्वविद्याालय भारत भारत में खुलना चाहिए। जहां दुनिया के लोग ‘कांड’ कैसे किए जाते और कैसे उनसे बच निकला जाता है का एक वर्षीय डिप्लोमा हासिल करेंगे। कांडा इस विश्वविद्यालय के कुलपति होंगे तो, एनडी तिवारी जैसे लोग इसके सलाहकार मंडल में नियुक्त किए जाएंगे। क्योंकि वे अनुभवी हैं और दोबारा गलती न हो उनसे बेहतर और कौन जान सकता है। बड्डे बोले सेक्स कांड सीखने के लिए विश्वविद्यालय, वो भी भारत में? यूरोप अमेरिका तो हमसे भी अव्वल है इन कांडों में फिर...! हमने कहा अरे बड्डे याद करो जब बिल क्ंिलटन तो राष्टÑपति हो के खुद को बचा नहीं पाए और माफी मांगनी पड़ी थी, दुनिया सबसे बड़े आका को। तो ऐरे-गैरे (मंत्री-विधायक)कैसे खुद को महफूज रख सकते हैं। हमारे यहां सबसे अनुकूल महौल है कांडों को सीखने सिखाने का। कोई भी चुनाव हो पहले शराब फिर शबाब का जोर रहता है, वोट लेने से किसी भी समस्या का निदान पाने तक। क्योंकि यहां गरीब हैं गरीबी है...दोनों को धन चाहिए, नौकरी चाहिए और कभी-कभी तो शोहरत भी चाहिए। थोड़ी यादाश्त पर जोर डालें तो राजनीति में ऐसे कांडों की सीरीज मिल जाएगी.. नब्बे के दशक में लखनऊ में मंत्री अमरमणि-मधुमिता शुक्ला कांड, राजस्थान में भंवरीदेवी कांड, भोपाल का शेहला मसूद कांड भी कमोबेश इसी का नतीजा था, हालिया फिजा-चांद मोहम्मद कांड..और लेटेस्ट गीतिका कांड जिसके पीछे कांडा हैं। इन सभी में स्त्री ही शिकार हुई पहले जिस्म से फिर जान से। मजाल है कि एक भी पुरुष (मंत्री) ने जान गंवाई हो या सजा पाई हो। सजा क्या पकड़े जाने या आरोपित होने के बाद भी मजा ही मजा चाहे जेल में ही क्यों न हों। इसलिए देश की स्त्रियों को समझना होगा कि जब भी वे ऐसे कांडों में कांडाओं की सहयोगी बनेगी और सजा की बात आयेगी तो उन्हें ही जीवनमुक्ति की ओर उन्मुख होना होगा। आखिर कथित सम्पन्नता किसलिए हासिल की जाती है कांडाओं द्वारा। यह कांडों  के बहुवचन ‘कांडा’ से समझा जा सकता है।
- श्रीश पांडेय 

Saturday, 18 August 2012

कांसा भयो करोड़

 बड्डे को बड़ी चिंता में उदास बैठे देखकर आखिर हमने ही पूछ लिया कि इस उदासी का सबब...का है?  बोले बडेÞ भाई न ही पूछो तो ही ठीक है वरना  बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। ओलम्पिक खेलों में भारत के लोग खेलने ही क्यों जाते हंै। न जाते तो कम से कम यह तुर्रा तो रहता कि खेलने नहीं गए वरना दस-बीस गोल्ड, बीस-पच्चीस चांदी जीतना तो बाएं हाथ का खेल था और कांसा जीतना तो हमें पसंद ही नहीं। भला कांसा की भी कछु  कीमत है का। देश में सोने की वेल्यू है।
    एक बार तो चंद्रशेखर साहब को देश की साख बचाने के नाम पर सोना ब्रिटेन में गिरवी रखना पड़ा था। क्योंकि सोना से साख और धाक दोनों जमती है। अपने यहां तो फैशन भी है जो जितना सोना पहन के उसका प्रदर्शन कर सके बड़ा आदमी है, उसी की साख है और फिर बड़े भाई देखो न सोना कैसे सरसरा के ऊपर चढ़ा जा रहा है और  हम हैं कि दो चांदी और चार ठइया कांसा का पा गए उसी में अलमस्त नाच रहे हैं, जुलूस निकाल रहे हैं। अमेरिका और चीन तो पसेरी भर सोना जीत ले गए ...इनकी क्या कहें पिद्दी से देश भी छटांक भर सही, सोना तो पा ही गए न। और हम हैं कि कांसा पा के भैराये जा रहे हैं।
   बड्डे बोले बरसों से हमारे खिलाड़ी पहले से कटी नाक ले के ओलम्पिक में टूलने जाते हैं। जाने से पहले खेल मंत्रालय की ओर से सभी को एक नकली साबुत नाक दी जाती है ताकि कटी वाली को ढ़का जा सके। इतना क्या गुस्सा करना बड्डे...हमने कहा इस बार तो पदकों का छक्का लगाया है। जित्ते इस बार मिले उत्ते तो कभी नहीं मिले। बड्डे बिफर पड़े और बोले...भी इस बार 6 पदक क्या जीत लिए मंूछे ऐंठे, छाती फुलाय घूम रहे हैं कि अब तक के रिकॉर्ड पदक बटोर लाए हैं। उसमें सोना एक भी नहीं। कांसा ही कांसा है उसमें भी एकाध तो ऐसे भी मिल गओ कि सामने वाला घायल हो के मैदान छोड़ बैठो और हमने फटकार लओ पदक। बड्डे बोले बड़े भाई ओलम्पिक भारत के बस का नहीं है।
 हमने कहा...बड्डे जहां खाने के लाले हों और खेलने में शिफारिश हो, वहां इक्का-दुक्का पदक सूंघने को मिल जा रहे हैं, इतना भी ज्यादा है। मैरीकॉम ने तो बक ही दिया कि खाने को ठीक से मिलता नहीं और चाहिए सोना है। जितना पइसा खेलने के लिए सरकार देती है उसका 70 से 80 परसेंट खांटी के बुढऊ जो खेल समितियों के अध्यक्ष बनकर  पदों पर वर्षों से खूंटा गाड़े बैठे हैं, के बैंक खातों में सोना के रूप में धर दिया जाता है। जब सोना से ज्यादा कीमत का माल पहले ही अंदर है, तो बेफिजूल खून जलाने और पसीना बहाने की जरूरत क्या है।
 हमारे खिलाड़ी पदक जीतने नहीं ओलम्पियन बनने जाते हैं। हमारा अधिकतम लक्ष्य कांसा ही है, क्योंकि भले कहने को दो रुपईया का कांसा हो पर उसकी दम पर देश में नौकरी, धन-दौलत और मान-सम्मान इतना मिल जाता है कि पूरी उमर अपनी कीमत देता रहता  है। इसलिए उनके लिए पदक जीतने से अहम वहां खेलना है, जीवन भर ओलम्पियन कहे जाने का सुख लेना है, ताकि बुढ़ापा ठीक से बसर हो सके।
    अब तो कांसा में बड़े-बड़े गुण हैं। अमेरिका, चीन में भले कांसा जीतने वालों की तस्वीरें वहां के अखबारों में ठीक से जगह न पाती होे पर अपने यहां तो ब्रेकिंग न्यूज से लेकर अखबारों में एक-एक पेज के परिशिष्ट धड़ल्ले से आदम कद फोटू में छपे पाये जाते हैं। इसलिए अब बड्डे समझो...भारत में कांसे की सोने से भी ज्यादा वेल्यू है। भारत सोने की चिड़िया रह ही चुका है, और सोना जीत के हम क्या करेंगे। इसलिए अब सोना नहीं कांसा की कीमत है बड्डे!!!
श्रीश पांडेय

Thursday, 9 August 2012

बाबा फिर से भाग न जाना

बड्डे’ अन्ना समूह के पंच तत्वों में विलीन होने के बाद से खबर सुर्ख है कि उसका प्रक्षेपण अब एक राजनैतिक दल के रूप में होने जा रहा है। ठीक ही तो है जब शरीर भी एक दिन पंच महाभूतों में वायूभूत हो जाता है, तो फिर आंदोलन को चलाने वालों के अधम शरीरों का भी इन्हीं ‘छिति, जल, पावक, गगन, समीरा’ के पंच अवयवों लुप्त हो जाने  पर, इतना सिरफुटव्वल क्यों। ‘जीवन नश्वर है’ के इस तथ्य युक्त सत्य का ज्ञान भारत के कथा-पुराणों में पटा पड़ा है। मगर हुआ क्या...सुना तो सब ने पर गुना किसी ने नहीं और जरूरत भी क्या है...ज्ञान होता ही इसीलिए है कि कहा-सुना जाए बड़ी श्रद्धा से  मगर अपनाएं दूसरे,हम नहीं। हर व्यक्ति दूसरे का मुंह ताकता है कि जब त्याग फलां नहीं कर रहा तो मैं ही क्यों? मैं ही बॉडीगार्ड क्यों बनूं।
   मगर बड्डे हो न हो अब इस ज्ञान दर्शन को सरकार ने बांच लिया लगता है। तभी तोे सरकार को चाहे भ्रष्ट कहो या उसके मुखिया को फिसड्डी अथवा किसी का गुड्डा, क्या फर्क पड़ता है। सरकार ने अपनी चमड़ी पर बेशर्मी को इतनी पर्तें चढ़ा ली हैं कि चाहे भूख से मरो या भूखे रहकर...आवाम की संवेदना उसकी परतों को गीला नहीं कर पाती।
    तो बड्डे अभी अन्ना टीम को पंचतत्वों में विलीन हुए दस दिन भी नहीं यानी उसका शुद्ध(दशगात्र) भी नहीं हुआ था कि बाबा रामदेव ने फिर से हुंकार भरी है कि काला धन तो सरकार को वापस लाना ही होगा...वर्ना मैं भूखे रह कर काल कलवित हो जाऊंगा। कुछ रोज पहले भूख से बिलखते केजरीवाल ने जल्दी समझ लिया कि थोड़े दिन और अन्न त्याग कर लिया तो कहीं उनकी देह उन्हें ही न त्याग दे। सरकार भी किसी कलाकार से कम नहीं, उसने अन्ना को अन्ना के अहिंसा अस्त्र से अस्तित्वहीन कर दिया। इस बार मीडिया ने अन्ना की बजाय सरकार से काले पर्दे के पीछे पंजे से पंजा मिला लिया... बस फिर क्या  जिस आत्ममुग्ध छवि में टीम अन्ना बाहें मोड़कर अनशन में बैठी थी, पहले दिन से ही उसके मुखडेÞ पर बारह बजते दिखे।  
  अरे बड्डे समझो भारत में जो दिखता है वही बिकता है। मीडिया ने नहीं दिखाया तो  लुट गई लाई टीम अन्ना की। इस बार सरकार के वे गुर्गे भी गुर्राये जो पिछली दफा अन्ना की मानमनौव्वल के लिए उनके धरना स्थल पर लोटते नजर आये थे। पर लगता बाबा की मेधा अभी भी जाग्रत नहीं हुई, क्योंकि जब सरकार ने अन्ना जैसे गांधीवादी, त्यागी, वीतरागी को कान न देकर ठिकाने लगा दिया तो फिर बाबा को तो पहले ही कूट-पीट चुकी..ये किस खेत की मूली है। मगर बाबा की ऐंठन है कि अभी नहीं गई...रस्सी जल गई पर बल नहीं गया।  बाबा का कहना है कि मैं देश में हो रही लूट से देश को बचा के रहूंगा...लेकिन ऐसा कहते वक्त 4 जून 2011 की काली रात का स्मरण कर कहीं न कहीं उनका दिलोदिमाग पुलिस के लठ्ठ की आवाजों और समर्थकों की चीत्कार से दहल तो जाता ही होगा। हे बाबा! इस बार भी तुम फिर से तो नहीं भागोगे और यदि भागे तो उम्मीद करनी चाहिए कि साड़ी या सलवार सूट साथ लेकर आए होगे।
बड्डे विडम्बना है कि आजादी की दूसरी लड़ाई कहे जा रहे जनता (अन्ना)के आंदोलन को जनता के द्वारा ही धता बता दिया गया। बाबा, अन्ना के छांव तले पनपे आंदोलन के तबूत में खुद जनता ने ही कील ठोंक दी। जब पीड़ित जनता भी इन सुधारों का माखौल उड़ाने लगी हो तो फिर सरकार का हीमोग्लोबिन कितना बढ़ा होगा समझा जा सकता है। अब ‘अन्ना दल’ बने या ‘बाबा दल’ दोनो राजनीति के दलदल में आये तो कहीं जनता इनको यहां भी पीठ न दिखा दे।
    

Monday, 30 July 2012

नैतिकता का पर्व रक्षाबंधन

नैतिकता का पर्व रक्षाबंधन

 भारतीय संस्कृति और परंपरा में अनेक ऐसे अवसर; पर्व-त्यौहार के रूप में समय-समय पर हमारे सम्मुख आते हैं, जो सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत संबंधों को दृढ़ करके, उनके महत्व को हमारे जीवन में रेखांकित करते हैं। फाल्गुन मास में होली के बाद अक्षय तृतीया और नागपंचमी को छोड़ दें तो सावन में रक्षाबंधन ही त्योहारों के क्रम में महीनों से आई रिक्तता को भरता है। प्रत्येक त्योहार एवं उत्सव का अपना एक दर्शन है। भाई बहन के रिश्तों को समर्पित यह श्रावण पूर्णिमा का पर्व यानी रक्षाबंधन हमारे जीवन में संबंधों की महत्ता को स्थापित करता है।
     आज के दिन चहुं ओर का नजारा देखें तो, स्त्रियां ससुराल से मायके की ओर, लड़कियां हॉस्टलों से अपने-अपने घरों का रुख करती बसों, ट्रेनों में दिख जाएंगी। धवल वस्त्रों में हाथों में सजी मेंहदी और उनमें रक्षा सूत्र(राखी) लिए भाइयों के प्रति उमड़ा प्यार, वातावरण को उत्सव का रूप दे देता है। भाई हैं तो अपने स्नेह को जताने के लिए यथासामर्थ उपहारों की सौगात लेकर जहां भी उनकी बहनें हैं, पहुंचने की भरपूर कोशिश करते हैं।  जो इस पर्व में गंतव्य तक नहीं पहुंच सकते उन्हें डाक द्वारा राखियां मिलने का इंतजार होता है अथवा आस-पड़ोस में मुहंबोली बहनों का इंतजार रहता है, जो उन्हें इस सम्मान से नवाजें। कमोबेश यही स्थिति बहनों की भी होती है। आज के दिन बहनें, भाइयों के हाथों में जो रक्षा सूत्र बांधती हैं वह किसी भी कलाई पर बांधा गया सर्वोत्तम हार होता है।
        रक्षाबंधन को फिल्मी दुनिया ने भी कुछ यूं गुनगुनाया है कि..‘बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है, प्यार के दो तार से संसार बांधा है..’   यह गीत इस त्यौहार का मानो आॅफीशियल गाना बन गया है। इस दिन हर सुबह रेडियो या टीवी पर बजता यह गीत इस त्यौहार में चार चांद लगा देता है। ये माना कि गाना बहुत पुराना नहीं है, पर भाई की कलाई पर राखी बांधने का सिलसिला बेहद प्राचीन है। सिन्धु सभ्यता में आर्यों के बीच इस त्यौहार के चलन में होने के प्रमाण हैं। यों तो इतिहास में कई ऐसे उदाहरण हैं, जो इसके प्रतीक रूप में अस्तित्व में होने के गवाह है। यथा-जब कृष्ण ने  शिशुपाल का वध किया था, तब युद्ध के दौरान कृष्ण के बाएं हाथ की उंगली से रक्त को बहते देखकर द्रोपदी ने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीरकर कृष्ण की उंगुली में बांधा था। तभी से कृष्ण ने द्रोपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था। और हस्तिनापुर में द्रोपदी के चीरहरण में चीर (वस्त्र) देकर उसकी अस्मिता रक्षा की थी। आधुनिक इतिहास में चित्तौड़ की विधवा रानी कर्णावती ने गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह से अपनी प्रजा की सुरक्षा के लिए हुमायंू को राखी भेजी थी, तब हुमायूं उनकी रक्षा की और उन्हें बहन मान लिया था।
          स्त्री पुरुष संबंधों में मां-बेटे के रिश्ते के बाद भाई-बहन का संबंध ही ऐसा है, जो नैसर्गिग रूप से अभिन्न,अमिट और अतुलनीय है। इसकी एक वजह उनका एक ही गर्भ से उत्पन्न होना है। वृक्ष की शाखाएं कितनी भी फैल जाएं पर जड़ें उनके अस्तित्व तक एक ही बनी रहती हैं और उनमें समान गुण-धर्म सदैव बने रहते हैं।  कई बार तो दोनो(लड़का-लड़की) की शक्ल देखकर ही अनुमान लगा पाना सहज होता है कि ये परस्पर भाई-बहन हैं। रक्षाबंधन का पर्व एक ही आंगन में पले-बढ़े, खेले-कूदे, लड़े-झगड़े, भाई-बहन के रिश्ते की प्रगाढ़ता को दर्शाता है । 
       भारतीय समाज की संरचना व इसके रीति रिवाज ही ऐसे हैं जहां रिश्तों का महत्व दुनिया के अन्य समाजों से बेहतर रहा है। भारतीय खासकर हिन्दू संस्कृति में स्त्रियां, पुरुष की आयु और सुरक्षा की कामना करती आई हैं। जब वह क्वांरी रहती है तो वह भाई के लिए यही भावना रक्षा सूत्र के माध्यम से अभिव्यक्त होती है, तो विवाहोपरांत करवा चौथ और तीज के कठिन व्रत के जरिए अपने पति के लिए। लेकिन भाई को रक्षा सूत्र बांधने का सिलसिला जीवंत बना रहता है।
          रक्षा बंधन का मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है, जो भाइयों को उनकी बहनों के प्रति जिम्मेदारी को व्यक्त करता है। यह जिम्मेदारी सिर्फ बहनों की रक्षा करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि शादी के बाद भी यही क्रम जारी रहता है। इसके अलावा भी कई अवसरों पर भाई अपनी बहन के प्रति अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करता है। रक्षा बंधन पर जब बच्चियों ने पूर्व राष्टÑपति ए पी जे अब्दुल कलाम की कलाई पर रेशम की डोर बांधी थी तो उनके कवि हृदय में भाव जाग उठे और उन्होंने कहा -
                                    बहनों का प्यार पूर्ण चन्द्रमा के चमकने जैसे है,
                                      भाइयों का प्यार उदय होते सूर्य के प्रकाश जैसा है।
                                       हमारे जीवन और हमारे   घरों को ये रोशन करते हैं,
                                         विचारों में सज्जनता के साथ आप दीर्घायु हों!

इस उत्सव को सदियों से हम समाज परिवार के बीच मनाते आ रहे  हैं। मगर अब प्राय: हमारे जीवन से प्यार, संवेदनाएं, भावनाएं नदारत हैं। त्यौहारों को हम बस एक कोरम पूरा करने के लिए अपनाते हैं। इसकी मर्यादा को घर की डेहरी के बाहर कदम रखते ही बिसरा देते हैं। गुवहाटी जैसी घटनाएं दर्शाती हैं कि समाज का नैतिक पतन किस हद तक हो चुका है। जिस लड़की के साथ के अनैतिक कृत्य हुआ, वह किसी भाई की बहन होगी और जिन्होंने दुष्कर्म किया वे भी किसी बहन के भाई होंगें।  किसी भी समाज की संरचना मूल्यों के चौपाए पर टिकी होती है। जब यही खोखले हो जाएंगे, तब जिस संरचना में हमारा जीवन पल्लवित, विकसित  हो रहा है, वही ध्वस्त-धराशायी हो जाएगा। रक्षाबंधन जैसे नैतिक त्यौहार हमें जताते हैं कि हम न सिर्फ घर में मौजूद बहन के प्रति संवेदनशील बने बल्कि समाज में अपनी इसी सोच के साथ आगे बढ़ें कि सारा विश्व हमारा एक परिवार है। 1896 में  विवेकानंद ने जब न्यूयार्क में धर्म संसद को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘लेडीज एडं जेन्टिलमैन’ की जगह सभागाार में मौजूद जनसमुदाय को ‘सिस्टर एडं ब्रदर्स’(बहनों और भाइयो)कहकर संबोधित किया तब दुनिया में भारत की संस्कृति और संरचना को नयी पहचान मिली थी।
        तो इस पवित्र उत्सव रक्षाबंधन का औचित्य तभी जब इसको मनाते वक्त भाई बहनों को वचन दें कि वे सुरक्षा के दायित्व को सिर्फ अपनी जैविक बहनों तक नहीं बल्कि इससे इतर भी निर्वहन करेगें। ऐसा ही संकल्प बहनें भी ग्रहण करें तो समाज में दिनोंदिन आ रही विकृति का एक सीमा तक उन्मूलन हो सकेगा। वर्ना त्यौहारों जिस श्रृंखला को हम वर्ष भर मनाते हैं वे सब के सब हमारी हिप्पोक्रेसी के प्रतीक बन कर रह जाएंगे। नैतिकता से लबरेज इस पर्व की आप सभी भाई-बहनों को शुभकामनाएं।

श्रीश पांडेय

Thursday, 28 June 2012

बचपन के जमाने फिर नहीं आते...

   
प्रकृति के परिवर्तन हमें बताते हैं कि कैसे वह वक्त और वातावरण के मुताबिक अपने विभिन्न रूपों में उपस्थित होकर हमारे जीवन में विविध रंग भरकर, हमारा लगाव और जिजीविषा, जिन्दगी के प्रति उत्पन्न करती है। प्रकृति के सदृश्य हमारे जीवन में भी समय के साथ निरंतर बदलाव- उम्र, समझ और संबंधों के स्तर पर होते रहते हैं। लेकिन प्रकृति और मानव के परिवर्तन में जो गाढ़ा अंतर है वह यह कि प्रकृति अपने मिजाज को हर वर्ष दोहराती है, तो वहीं मनुष्य के जीवन में उम्र के स्तर पर आये परिवर्तनों की पुनरावृत्ति नहीं होती। अब बारिश को ही ले लें तो, एक बार फिर हमें भिगोने को आतुर है। भीषण गर्मी से नीरस हो गए जीवन में वर्षा की फुहारें रस भरने को उमड़ रही हैं। बारिश जहां किसानों को कृषि कार्यों में उलझा देती है, तो प्रशासन, कर्मचारियों  को उसके प्रबंधन में, तो पत्रकारों की जमात मानसून के अनुमानों की खबरों पर कलम घिसती नजर आती है। लेकिन इस बारिश का असली आनंद  हमारा बचपन ही लूटता आया है, जो बार-बार नहीं आता।
 ‘बचपन’ शब्द ही विशिष्ट है मानव विकास में यह उम्र के विभिन्न चरणों के लिए प्रयुक्त हो सकता है। सरल शब्दों में बचपन को जन्म से आरंभ हुआ माना जाता है। अवधारणा के रूप में कुछ लोग बचपन को खेल और मासूमियत से जोड़ कर देखते हैं, जो किशोरावस्था में समाप्त होता है। दरअसल, शैशवावस्था के बाद का जीवन ही बचपन है और बच्चे के लड़खड़ाते हुए चलने के साथ शुरू होता है, जब बच्चा बोलना और स्वतंत्र रूप से कदम बढ़ाने लगता है। प्रारंभिक बचपन सात से आठ साल की उम्र तक चलता है। राष्टÑीय संगठन के अनुसार, प्रारंभिक बचपन की अवधि जन्म से आठ की उम्र तक होती है। बहरहाल, बचपन की सैद्धांतिक परिभाषाओं में इसकी पहचान इसे सीमित करती है। कई बार हम बड़े होकर भी अपने बचपन को जीते रहते हैं और कह उठते हैं कि क्या दिन थे वोभी आह....!
    ‘बचपन’ जीवन के व्यवस्थित नियमों से परे होता है। चिन्तामुक्त होकर खेल-कूद, मौज-मस्ती, में निमग्न रहना ही उसके अनिवार्य लक्षण हैं। उम्र का यही पड़ाव है जो  मानव जीवन  की सभी अवस्थाओं में सबसे नायाब है, अनमोल है, अद्भुत है। बपचन को याद करते समय सुभद्रा कुमारी चौहान की ‘बचपन’ शीर्षक से लिखी कविता की चंद पंक्तियां होठों पर तैर जाती है जिसके कुछ अंश यूं हैं कि .....
                                              बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी
                                             गया, ले गया तू जीवन की सब से मस्त खुशी मेरी।।
                                          चिन्ता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छन्द।
                                               कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनन्द?
                                                ऊंच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
                                                     बनी हुई थी वहां झोपड़ी और चीथड़ों में रानी।
                                                  रोना और मचल जाना भी क्या आनन्द दिखाते थे
                                                      बड़े-बड़े मोती-से आंसू जयमाला पहनाते थे।।

यह तथ्य निर्विविाद रूप से सर्वमान्य है कि बचपन चाहे किसी भी सामाजिक स्तर पर हो उसकी बेफिक्री ही उसे प्रकृति के करीब ला खड़ा कर देती है। बच्चों को बारिश के पानी में भीगते, बहते पानी में नाव चलाते और उसके प्रवाह के पीछे किलकारी मारते हुए भागते देखकर हर शख्स को उसका बचपन आंखों में कौंध जाता है। बच्चे तब यह नहीं जानते कि वे बड़े होकर अपनी इस अल्हड़ता को, जगजीत की गाई नज्म... ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो, वो बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी...को किसी रिकार्ड में  सुन कर इन सुनहरे पलों को याद करेंगे। बच्चों को बारिश में भीगने के बाद बीमार पड़ने जैसे ख्याल उनके पास फटकते ही नहीं....बड़े बुजुर्ग भले ही बारिश में न जाने और बीमार पड़ जाने के डर से बच्चों को चेताते व खुद चिंतित रहते हों, पर बचपन इन सुझावों को एक तरफा खारिज कर देता है। बच्चों का बरसते पानी में बेपरवाह मौज-मस्ती से राकने के लिए बड़ों के द्वारा लगाये गए बंधनों को वे कठोरतम महसूस करते हैं और हम बड़े भी बच्चों के साथ सहज नहीं रह पाते... कई तरह के एटिकेटस के नाम पर हम उन्हें पल-पल सिखाते हुए टोकते हैं कि यह नहीं करना ,वह नहीं करना...इस सिलसिले में दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्रध्यापिका ममता धवन कहतीं हैं कि जब कभी मेरा बेटा खेलते हुए कोई वस्तु बिखरा देता है तो मैं उसे डांटने या मना करने के बजाए दूसरी और वस्तुएं फैलाने के लिए दे देती हंू और उसके द्वारा इस बचपन में लिए जा आनंद से अभिभूत होती हूं। इसलिए बचपन को आवश्यकता से अधिक नहीं छेड़ा जाना चाहिए, क्योंकि हर बच्चा अपनी  नैसर्गिक गतिविधियों से बहुत कुछ सीखता है। बच्चों को उनका बचपन जीने के हक को,जीवन की   औपचारिकताओं से प्रथक रखें ताकि वह इस अनमोल जीवन को भरपूर जी सके। ‘बचपन’ के बरक्स एक शेर रोशन हो आता है कि...
                                                     उडने दो परिदों को अभी शोख हवाओं में,
                                                              फिर लौट के बचपन के जमाने नहीं आते।


           श्रीश पांडेय

Sunday, 24 June 2012

बात बचपन की

  तीन दशक पहले बात बचपन की है जब मैं तीसरी या चौथी दर्जे में पढ़ता था। उनदिनों कुछ ऐसा वातावरण था, जब स्कूल जाने का मतलब पढ़ाई से कहीं महत्वपूर्ण खेलकूद और मौज मस्ती था। न तो मासिक टेस्ट थे, न ही रोज का अनिवार्य होमवर्क। टिफिन में खाने के आइटम लगभग हफ्ते भर एक से- रोटी या पराठा के साथ सब्जी या कभी मां को समय न रहा तो अचार से दो चार होना पड़ता था। लेकिन अब बच्चों के टिफिन का जायका मैगी, नूडल्स, सैंडविच, पास्ता जैसे स्वादों में रूपांतरित हो गया है। ठंड हो या गर्मी सभी में यही अटरम-शटरम बच्चों की पसंद बन चुका है।
    बहरहाल, खाने के साथ-साथ पढ़ाई-लिखाई की पद्धति में जो बड़ी तब्दीली आयी है वह यह कि अब मां-बाप बच्चे के स्कूल जाते ही तय करने लगते हैं कि बच्चे को क्या बनना चाहिए। ‘दिल चाहता है’ फिल्म को सराहने वाले,उसके  दर्शन पर ताली पीटने अभिभावक भी अपने बच्चे को उसका नहीं बल्कि अपना ख्वाब पूरा करने का साधन मान बैठते हैं। दरअसल, बच्चा क्या बनना चाहता है ये बात गौण हो चली है, यहां तक कि उसके भविष्य की राहअभिभावकों द्वारा गर्भ से ही गढ़ी जाने लगी है। इसी का नतीजा है कि बच्चों पर नर्सरी कक्षा से ही स्कूल में अव्वल आने का दबाब झलकने लगता है। उधर किताबों के बोझ को देख कर मानना पड़ता है कि बच्चा भले ‘केजी वन’ में पढ़ता हो पर उसका बस्ता ‘टू केजी, थ्री केजी...फाइव केजी’ का होता है। आज कच्ची उम्र में किताबी अध्ययन करने और  उसमें पारंगत होने की ललक भले ही शुरुआती दिनों में मां-बाप की रहती हो, पर जल्दी ही यही आदत बच्चों में पड़ जाती है। पढ़ाई का यह दबाव साल-दर-साल उच्च कक्षाओं में प्रवेश करने के साथ अनुपातिक रूप से बढ़ता रहता है। ऐसे में बचपन खासकर शहरी इलाकों में किताबों के साथ किसी फिल्मी दृश्य की तरह पल झपकते ही कब जवान हो जाता है, समझ मुश्किल है।
      मैं जब अपने बचपन को सोचता हूं इतने वर्षों में आये फर्क को साफ महसूस करता हंू। क्योंकि हमारी जितनी जानकारी कक्षा 5 में होती थी, उतना आज के बच्चे कक्षा एक में जानते हैं। यानी आज के बच्चों का ज्ञान उम्र से पांच गुना आगे है। जहां तक शिक्षक-शिक्षार्थी के परस्पर की संबंध की बात है, तो वह बेहद मर्यादित और अनुशासित था। मैं पढ़ने में वैसे भी लापरवाह रहा हंू, इसलिये अपने अध्यापकों से प्राय: डांट ही नहीं,  मार भी पड़ जाना अचरज की बात नहीं थी, लेकिन उस मार या डांट में भी एक अपनापन, प्यार और अधिकार था।  तभी तो जब कभी घर में, स्कूल से शिकायत आ जाए, तो समझ लीजिये बजाय शिक्षकों से जबाव तलब के, यही मार और डांट बोनस की तरह दोगुनी हो जाती थी। बुजुर्गवार बताते हैं कि 50-60 के दशक में शिक्षकों का विद्यालय में अनुशासन इतना सख्त था कि किसी छात्र के विद्यालय मेें अनुपस्थित रहने पर उसको ढूंढने के लिए चार-पांच छात्र इसलिए भेजे जाते थे कि यदि गैर-हाजिरी का कोई उचित कारण न हो तो उसे पकड़वाकर विद्यालय बुला लिया जाता था। तब शिक्षक का समूचे विद्यालय के बच्चों पर पिता के समान अधिकार होता था। पर आज प्राय: शिक्षकों के सख्त अनुशासन को असंवेदनशील अमानवीय मानकर उनसे ही सवाल दाग दिए जाते हैं। इसीलिए भले उन दिनों की स्मृति आज की पीढ़ी के लिए स्वप्न और अविश्वसनीय हो, पर सब कुछ ऐसा चलता था मानो हमारा जीवन प्रकृति के कितने करीब है। कल का वही बालक यानी मैं आज पिता हूं और जब अपने बच्चे को स्कूल जाते और उसके वातावरण को देखता हूं, तो 30-35 सालों में आये फर्क को बेहतर समझ पा रहा हंू, कि क्यों हमारा जीवन कृत्रिमता की ओर निरंतर उन्मुख है। बच्चे बचपन से ही मशीनीकृत जिंदगी के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। रोज स्कूल की भागमभाग, वहां मिले गृहकार्य (होमवर्क) को पूरा करना, फिर एक-दो ट्यूशन और बचा हुआ समय टेलीवीजन पर कार्टून देखना ही उनकी दिनचर्या बन चुकी है। खुली हवा में सांस, मित्रों के साथ गप्पें अब जीवन से नदारत है। खेल के मैदान का मुंह तो महानगरों के बच्चे शायद ही कभी देख पाते हों। महानगर ही क्यों, अब तो यही हाल कमोबेश शहरों और कस्बों का होता जा रहा है।  दरअसल, पढ़ाई के बढ़ते उत्तरोत्तर बोझ ने बच्चों को किताबी कीड़ा बना कर रख दिया है। यह बात दीगर है कि इसकी वजह से वे भले इंजीनियर, डॉक्टर, प्रबंधक, प्रशासनिक अधिकारी बन रहे हों, पर इंसान बनने के मूलभूत गुणों से वंचित होते जा रहे हैं। क्योंकि इंसानी संगत का विकल्प टीवी, स्वचालित खिलौने और केवल किताबी ज्ञान ही नहीं हो सकता। छोटे  परिवार, स्वार्थमय जीवन, अपने पराये का भेद आज की पीढ़ी कच्ची उम्र में ही सीख जाती है।
   कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक ओर मानव सभ्यता विकास और उन्नति के शीर्ष पर अपने कदम रख रही है, तो दूसरी ओर हम और हमारी पीढ़ी संवेदनाशून्य, भावशून्य होकर मानवीय मूल्यों व उसकी गरिमा को रसातल में ले जाने पर उतारू हैं। इसकी वजह बहुत हद तक जीवन में विद्यमान प्रतियोगिता और कृत्रिमता है। साधनों/भौतिकता का विकास, साध्य(मानव) के लिए है, पर यह जानकर पीड़ा होती है कि साध्य ही साधनों के वशीभूत होता जा रहा है। विकास की जो गंगा बहाई जा रही है वह नि:संदेह आने वाले वक्त में अर्थर्हीन होकर रह जाएगी। क्योंकि संवेदनहीन होता आज का बचपन ही तो कल का भविष्य है।
ऐसे में  बचपन के बरक्स अनायास ही जगजीत की गुनगुनाई गजल बरबस जुबां पर आ जाती है कि...ये दौलत   भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो वो बचपन का सावन,वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी... इसका स्मरण और इसके बोल का आज भी दिल को नम कर जाना दर्शाता है कि बचपन से अनमोल कुछ भी नहीं। पर इस बहुमूल्य बचपन को पढ़ाई का बोझ और आज का मशीनीकृत शिक्षा पद्धति लीलती जा रही है। स्कूलों ने भी अपने परिणामों को बेहतर दिखाने के फिराक में बच्चों पर इकाई टेस्ट, मासिक टेस्ट, त्रैमासिक टेस्ट, छमाही टेस्ट और फिर वार्षिक परीक्षा के पूर्व एक और अभ्यास टेस्ट का भार डाल रखा है। तब कहीं जाकर वार्षिक परीक्षा का आयोजन होता है। यानी बचपन से शुरू हुआ पढ़ाई का ये सिलसिला अच्छी नौकरी/ रोजगार हासिल कर लेने तक अनवरत रहता है। सवाल बड़ा और बारीक है कि क्या हम इस दुनिया में इसीलिए जन्मते हैं कि एक मशीन की तरह रोटी के लिए और बेहतर रोटी के लिए संघर्ष करते अपना जीवन गुजार दें? क्या हम सिर्फ भोग के लिए? क्या हम अपनी पीढ़ी को सुखमय जीवन की शिक्षा हर कीमत पर देना चाहे हैं। हो न हो आज जितनी असंवेदनशीलता हमारे चंहु ओर पसर रही है उसके नेपथ्य में बचपन का असमय समाप्त होना, सामाजिक संरचना का शिथिल होना है। बचपन है तो भविष्य है... बाल मन की इस बोझिल पढाई उससे मुक्ति का प्रतिबिम्ब शकील जमाली के इस में शेर रोशन हो आता है कि-
सफर से लौट जाना चाहता है, परिंदा आशियाना चाहता है,
कोई स्कूल की घंटी बजा दे, ये बच्चा मुस्कराना चाहता है


श्रीश पांडेय