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Monday, 25 July 2016

शब्द संभारे बोलिए, शब्द के हाथ न पाँव

धरती पर मनुष्य ही एकमात्र प्राणी है, जिसके पास विचार शक्ति है और उसकी अभिव्यक्ति के लिए जुबान है। मानव सभ्यता की विकास यात्रा में विचार और शब्द शक्ति का अप्रितम योगदान रहा है। इस बात की तस्दीक यह है कि आदिम काल से पशु-पक्षी, जानवर और अन्यान प्राणी उसी अवस्था में बने हुए हैं, तो मनुष्य की स्थितियों में आमूल-चूल बदलाव देख्ो जा सकते हैं।
...तो शब्द, विचार के बाद आने वाली अवस्था है। यानि शब्द बेहतर हों, शालीन हों, ऊर्जा से ओतप्रोत हों, इसके लिए जरूरी है कि मनुष्य की विचार/चिंतन क्षमता उत्कृष्ट होनी चाहिए। लेकिन सभ्यता और विकास के समांतर हमारा चिंतन जितना दूषित इनदिनों हुआ है, उतना तो दुनिया का पर्यावरण भी दूषित नहीं हुआ है। खासकर भारत में राजनीति और समाज में जिस तरह से शब्दों के नेपथ्य से व्यभिचार हो रहा है, उससे समझा जा सकता है कि क्या ऐसे ही भारत से यह उम्मीद बांधी जा रही है, जो आने वाले वक्त में दुनिया को मार्ग दिखा सकेगा? और विश्व गुरू जैसे काल्पनिक ओहदे पर बैठ सकेगा?
सांस्कृतिक सम्पन्नता थाती लिए जब स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो की धर्म संसद में अपने उद्बोधन की शुरुआत में कहा था कि डियर सिस्टर एंड ब्रदर्स। तब पहली बार सभा में मौजूद लोगों ने जाना कि 'सिस्टर’ शब्द से संबोधित कर स्त्री को कैसे सम्मानित किया जा सकता है। यह वही समाज है जिसमें यह सदवाक्य सदियों से दोहराया जाता रहा है कि- 'यत्र नार्यास्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता।’ जिसे इनदिनों तेजी से खारिज किया जा रहा है। बदजुबानी में हम दुनिया में सबसे आगे जाने को आतुर-व्याकुल नजर आते हैं।
इस सिलसिले में उत्तरप्रदेश भाजपा के पूर्व उपाध्यक्ष दया शंकर सिंह की मायावती को लेकर की गई टिप्पणी नि:संदेह घटिया थी और उन्हें तत्काल पार्टी से पदच्युत कर दंड दे दिया। शायद ही भारतीय राजनीति इतना शीघ्र दंड किसी दल द्बारा अपने नेता को दिया गया हो। इतना ही नहीं केन्द्र सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सदन में निजी तौर पर और सरकार ओर से माफी मांग कर बड़प्पन का संकेत दिया। हालांकि बाद में दया शंकर सिंह ने भी ख्ोद जाहिर किया, लेकिन बसपा प्रमुख मायावती और उनके सिपहसालार नसीमउद्दीन सिद्दकी ने तो दया शंकर सिंह की मां, बहन, बेटी को भी नहीं बख्शा। क्या बदजुबानी का जबाव देश में बदजुबानी ही हो सकता है? अगर हां तो फिर दयाशंकर और मायावती में फर्क क्या रहा? यदि भाजपा ने दया शंकर पर दया न दिखाते हुए उनकी छुट्टी कर दी तो क्या मायावती भी अपनी जुबान पर अफसोस व्यक्त करेंगी और नसीमउद्दीन सिद्दकी को दल से बाहर करने का रास्ता दिखाने की हिम्मत दिखाएंगी? मगर फिलहाल तो वे मौन हैं।
दरअसल, कई बार शब्दों को कहने के ढंग में और उनके निहितार्थ अपनी सुविधा से निकालने पर भी सवाल और बवाल खड़े हो जाते हैं। दुर्भाग्यपूणã तो यह है कि मीडिया ऐसे मौकों पर किसी समाधान की बजाय उसे मिर्च मसाला लगाकर परोसने में तल्लीन दिखता है। व्यंग्यकार सम्पत सरल की टिप्पणी बरबस याद हो आती है कि- 'मीडिया दिखता तो दिए के साथ है, मगर होता हवा के साथ।’
अब दया शंकर सिंह के बयान को बारीकी से देख्ों तो जो शब्द वेश्या उन्होंने इस्तेमाल किया है वह सर्वथा अनुचित तो था ही, लेकिन जिस तुलना में इस्तेमाल किया उस पर एक बार भी विचार नहीं किया गया। आरोप यह था कि 'मायावती बिना पैसा लिए चुनाव टिकटों का बंटवारा नहीं करती’ यानि 'पैसे दो, टिकिट लो।’ यही काम या पेशा वेश्या का होता है कि 'पैसे दो, देह लो।’ यानि कोई गलत काम स्त्री पैसों के लिए करे उसकी तुलना वेश्या से कर दी गई। जबकि यहां मायावती को नहीं उनके काम के तरीके को वेश्या की संज्ञा दी गई थी। और फिर कौन सा दल है जिसमें पैसे के बदले टिकिट न बांटे जाते हों? अगर यह वेश्यावृत्ति तो सभी दल कमोबेश इस वृत्ति के वृत्त में आते रहे हैं, यह बात दीगर है कि ऐसे आरोप प्रमाणित नहीं हो सके हैं, क्योंकि इस लेन-देन में आपसी समझ की चुप्पी होती है।
सवाल है कि मायावती अपनी वेश्या से तुलना पर जिस तरह तिलमिलाईं और प्रतिक्रिया दी है, उससे वेश्या के पेश्ो में संलि’ स्त्रियों की मानसिक स्थिति क्या होगी। यदि वेश्यावृत्ति इतना घृणित कार्य है, तो उन्होंने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में केन्द्र सरकार से मिलकर उत्तर प्रदेश के समस्त वेश्यालयों को क्यों नहीं सील करा दिया? यह सच्चाई है कि कोई भी स्त्री वेश्यालय या तवायफ के अंध कंुए में खुद-ब-खुद आने का रास्ता नहीं चुनती। मजबूरी या धोके से उन्हें इस पेश्ो में झोंका जाता रहा है, एक बार इसमें धंस जाने के बाद समाज के वे ही लोग उन्हें स्वीकार नहीं करते जो अपनी कई रातें समाज की आंखों में पSी बांधकर इन चकलाघरों में बिता कर दिन में कॉलर ऊंची किए घूमते हैं। लेकिन वेश्यावृत्ति को निकृष्ट कार्य स्त्रियों के बरक्स सिद्ध कर दिया गया, जबकि पुरुष इसमें कहीं जिम्मेदार है। दरअसल, वेश्या ऐसी संज्ञा है जिसके साथ किसी तरह का विश्ोषण नहीं लगाया जाता। जबकि सियासत के अंदरखाने में हर तरह के लेन-देन (वेश्यावृत्ति) बखूबी जारी है और जारी रहेगी। शायद इसीलिए डॉ. शिवओम अंबर कहते हैं कि-
ये सियासत की तवायफ का दुपट्टा है,
ये किसी के आंसुओं से तर नहीं होता।
बहरहाल, मायावती और दया शंकर व उनका परिवार जिस तरह से इसे राजनीतिक रंग देने पर उतारू हैं उसे देश की आवाम भी समझ रही है, कि किसी मुद्दे का कैसे राजनीतिक लाभ उठाया जा सकता है। यही यहां केन्द्रीय विषय है न कि दोनों ओर से की गई टिप्पणी। क्योंकि दया शंकर के कहने से न तो मायावती वेश्या हो सकती हैं और मायावती और उनके दल द्बारा कह देने पर दया शंकर के परिवार का चरित्र गिर सकता है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में शब्दों का इस्तेमाल मर्यादित होना चाहिए। मायावती के खिलाफ जिस नकारात्मक अलंकारिक शब्द का प्रयोग हुआ वह शर्मनाक है तो, दया के परिवार के लिए बसपा द्बारा शब्दों का प्रयोग निंदनीय है। विडम्बना है कि दोनों ओर स्त्रियां ही इसकी जद में है, लेकिन हाय ये सियासत! कबीरदास जी ने शब्दों की मार्यादा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा है कि-
शब्द संभारे बोलिए, शब्द के हाथ न पांव,
एक शब्द औषध करे, एक शब्द करे घाव।
द्रौपदी के शब्दों ने महाभारत, तो कैकई के वचनों ने रामायण जैसी घटनाओं को अंजाम दिया। शब्दों को शालीनता से प्रयुक्त करने वाले देश में आज शब्दों का व्यभिचार बढ़ा है। जितनी गालियां स्त्रियों को लेकर हमने गढ़ ली हैं और नित्य प्रयोग करते हैं क्या वे उन्हें अपमानित नहीं करती। सवाल इस विवाद से कहीं बड़ा है वह है स्त्रियों के प्रति पुरुष के नजरिए का। और स्त्रियों के प्रति सर्वाधिक अत्याचार, शब्दों से होता देख कबीर की सीख का प्रासंगिक होना स्वाभाविक है

Sunday, 5 July 2015

तहजीब बदन की






सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक निर्णय में महिलाओं की सुरक्षा और उनके प्रति हो रहे अपराध के विरुद्ध सर्वथा नया निर्णय सुनाया है कि- 'यदि कोई महिला जिसके साथ किसी भी तरह का दुष्कर्म किया जाता है, तो उसका निदान समझौते के आइने में नहीं देखा जाना चाहिए, न ही इसे उस महिला को दी जाने वाली प्रतिपूर्ति माना जा सकता है।’ इसके पीछे कोर्ट की दलील है कि मानसिक आघातों से उसका जीवन घुटन भरा हो जाता है और आजीवन वह इससे मुक्त नहीं हो पाती। निश्चित तौर पर किसी स्त्री का शील ही उसका सर्वोत्तम आभूषण है, उसकी मार्यादा की पराकाष्ठा है और इसको भंग करने के किसी भी प्रयास को कानून से कुचलने के कड़े प्रयास होने चाहिए। लेकिन बड़ा महीन सवाल है कि गर स्त्री का शरीर मंदिर है तो क्या पुरुष का शरीर कसाई घर है। पुरुष की देह देवालय क्यों नहीं हो सकती? माननीय न्यायधीश भी भौतिक जगत के कार्यकलापों को कानून की नजर में सही गलत ठहराने के हिसाब से ईश्वर कहे जाते हैं और वे न्याय के जिस भवन में विराजते हैं उन्हें न्याय का मंदिर कहा जाता है। लेकिन कितनी बार ये न्याय के मंदिर में बैठे हुए देवता अपमानित हुए और कठघरे में खड़े हुए कहने की जरूरत नहीं।
अपराध मनुष्य ही करता है, पशु नहीं। मनुष्य की संज्ञा में दोनों स्त्री-पुरुष समाहित हैं। इसीलिए जब कोई स्त्री किसी तरह का अपराध करती है तो क्या उसे में मंदिर में घटा हुआ अपराध माना जाएगा? तब हमें एक और विभाजन करना होगा कि जिस स्त्री का अपराध प्रमाणित हुआ उसका शरीर मंदिर की संज्ञा से बेदखल किया जाता है। दरअसल, जब हम कहते हैं कि आत्मा 'परमात्मा’ का अंश है और परमात्मा मंदिरों में विराजते हैं तो स्वयंमेव 'आत्मा’ भी उन मंदिरों की सांकेतिक प्रतिकृति बन जाते हैं। इस लिहाज शरीर चाहे किसी का हो वह होता मूलत: मंदिर ही है।
इसलिए जब तक जीवन के रसायन को उनके स्वाभाविक स्वरूप में समझा और व्यवहार में नहीं लाया जाएगा तब तक कानून कितने बन जाएं, निर्णय और व्याख्याएं कितनी क्यों न कर दी जाएं, मगर समाधान की बजाय उलझाव ही देखने को मिलेंगे और मिल रहे हैं। मानवीय रिश्तों को, उसकी भावनाओं, आवेगों, संवेगों का समाधान कानून में अलगाव और दंड के रूप में हो सकता है। जेल या फांसी अपराधी को समाज से मुक्त कर सकती है, लेकिन क्या गांरटी है कि फिर कोई नया अपराधी तैयार नहीं होगा? दुनिया भर की अदालतों में महिला विरुद्ध अपराधों को रोकने कानूनों का आम्बार लगा है, मगर समस्याएं और अपराध इन कानूनों का बौना साबित कर देते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि फिर क्या किया जाए ताकि स्त्री-पुरुष दोनों को ऐसे कंलकों से मुक्ति मिल सके।
मनुष्य के मन-मस्तिष्क के इस विज्ञान को समझने और इस पर अनुसंधान करने की जरूरत है कि इनको किसी बाहरी ताकत से अवरुद्ध नहीं किया जा सकता। ये मात्र स्वनियंत्रित हो सकते हैं। क्या दिमाग या मन में कोई ऐसा स्विच या बटन सम्भव है जिसे ऑन या ऑफ करने से वह विश्ोष मोड में आकर कार्य करने लगे, नहीं। मनुष्य के संवेग अच्छे या बुरे एक ही मस्तिष्क से संचालित हैं। यानि सत्कर्म और दुष्कर्म एक व्यक्ति की दो वैचारिक अवस्थाएं हैं। डाकू अंगुलिमाल से संत बाल्मीकी बनने की प्रक्रिया इसी परिवर्तन का श्रेष्ठ उदाहरण है। इसके लिए किसी कानून नहीं बल्कि उनकी पत्नी के वचनों ने ही उनमें व्यापक परिवर्तन ला दिया था।
व्यक्ति में आचरण का अवतरण परिवारिक वातावरण पर बहुत हद तक निर्भर है। मनुष्य एकाकी जीवन के लिए है नहीं, उसकी समाजिक जरूरतें हैं और उसी को प्रवाह में बनाए रखने के लिए वह है। इसी प्रवाह में जब-जब समाजिक संरचना टूटती है, उसकी पकड़ ढीली पड़ती है अपराधों का जन्म होता है। इसलिए कानून की भूमिका भयात्मक हो सकती है मगर नियंत्रक नहीं, क्योंकि शरीर की इंद्रियां कानून से नहीं उसके वैचारिक मनोदशा से संचालित होती हैं। फिर कानून मनुष्य ने बनाए हैं, कानून ने मनुष्यों को नहीं।
 शरीर का मंदिर इंद्रियों के स्तम्भों पर खड़ा है। जब तक इंद्रियां संयमित रहती हैं, मंदिर की मजबूती और मर्यादा बरकरार रहती है। इन्हें नियंत्रित करने के लिए जानवरों से जुदा विवेक हमें मिला है। फिर वह मनुष्य ही क्या जो इंद्रियों के वशीभूत शरीर में रचे बसे देवत्व की नींव हिला बैठे। यह तो कालिदास जैसी उस मूर्खता की द्योतक है जो जिस डाल पर बैठे उसी को काटने में जुट जाएं। अलबत्ता, भले यह कहावत है पर जर, जमीन, जोरू को लेकर विवाद सदियों से हैं और बने रहेंगे। इन पर अधिकार की वृत्ति मनुष्य की संरचना में है। चाहे रामायण हो या महाभारत इन्हीं तीनों को लेकर घटित हुए और आज भी इन्हीं पर अनैतिक अधिकार के बरक्स घट रहे हैं। विवाह संस्था में प्रवेश के बाद इन तीनों पर अधिकार का वार शुरु होता है, लेकिन स्त्री को लेकर अंतहीन हवस, किसी समझ से परे है। सुप्रीम कोर्ट ने महिला की देह को मंदिर बता कर कोई नयी व्याख्या नहीं की बल्कि इस परिभाषा से पुरुषों को बाहर रखकर इसे एकांगी कर दिया है। दुनिया की हर स्त्री को पुरुषों का साथ चाहिए और पुरुषों का स्त्रियों का। और जब तक दोनों की देह में मंदिर के तत्व हैं तब तक वे एक छत के नीचे रह सकते हैं। फिर स्त्री ही संसार की जननी है, इसलिए उसमे वात्सल्य है, वह कोमल है, भावुक है। लेकिन अपने ही जनक (स्त्री) के विरुद्ध मनुष्य का आचरण अक्षम्य है। हो सकता इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने स्त्री विरुद्ध हुए दैहिक अपराध को क्षतिपूर्ति से परे रखने की बात कही है। सुषमा स्वराज ने भी कहा था कि बलात्कार की पीड़िता जिदा लाश होती है?
आज जरूरत कानून की भाषा से इतर कथित पुरुषों को यह समझने की है कि जिसके साथ वे दुष्कर्म करने जा रहे हैं वह भी किसी न किसी की बहन, बेटी, पत्नि है। देह के मंदिर को इंद्रियों के क्षणिक आवेग में ध्वस्त करने पर सौ बार विचार करें वर्ना बकौल जांनिसार अख्तर-
" सोचो तो बड़ी चीज है तहजीब बदन की,
  वर्ना तो बदन आग बुझाने के लिए है।"

Friday, 26 June 2015

कमल में कीचड

कहते हैं कि 'इरादा(वादा)करो तो पूरा करो, कोई काम न अधूरा करो’, लेकिन लोकतंत्र में 'उसी से ठंडा, उसी गरम’ जैसी भ्रमपूर्ण बातें और व्यवहार पग-पग पर नमूदार होेतीं हैं। इस तंत्र में बात-व्यवहार में सतयुग जैसी व्यवस्था न कभी रही है और न रह सकती है। केजरीवाल जो सतयुग (सच)की राजनीति के प्रण्ोता बनकर उभरे थ्ो उनके कानून मंत्री ही गैर-कानूनी काम करके सत्ता में उनके साथी बन बैठे थ्ो। राजनीति की तासीर ही ऐसी है जिसमें दोगलापन न हो वह 'सरवाइव’ नहीं कर सकती। इसलिए राजनीति की इस मजबूरी को उसके दोगलेपन के साथ या तो हम स्वीकार कर लें अथवा उससे दो-दो हाथ आजीवन करते-करते एक दिन मर खप जाएं। लेकिन इसका बाल बांका न कर पाएंगे। लोकतंत्र का बीता इतिहास इसी बात का साक्षी है और जो जनमानस इतिहास में दर्ज हजारों नजीरों से कुछ नहीं सीखता उसका कुछ हो नहीं सकता। आजादी के बाद से आज तक सक्रिय राजनीति में एक नाम ढूंढ़े नहीं मिलेगा जिस पर तोहमतें न लगीं हों, जिसकी लोक निदा न हुई हो। जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेन्द्र दामोदर दास मोदी तक कुछेक अपवादों(लाल बहादुर शास्त्री, अटल बिहारी और निजी तौर पर मनमोहन सिह)को छोड़ दें तो सबके दामन दागदार हुए हैं। 
बहरहाल, मोदी सरकार की पहली वर्षगांठ ठीक-ठाक बीती, लेकिन उसके बाद तो मानों मोदी के सिपहसालार कीचड़ में एक के बाद एक धंसते जा रहे हैं, ऊपर से मोदी का मौन तो मानो मनमोहन सिह रिकार्ड तोड़ने पर आतुर हो। मनमोहन सिह पर सोनिया का रिमोट होने का ठप्पा था, लेकिन मोदी तो अपने बूते प्रधानमंत्री हैं। आम बोल-चाल में, यहां तक की लिखने-पढ़ने में भी प्राय: 'मोदी सरकार’ कहने का रिवाज है, उन्होंने जो चाहा सो किया। अपनी पार्टी के बड़े-बड़े दिग्गजों को उम्र का वास्ता देकर इतने प्यार से किनारे लगाया. लेकिन अब उनके उस दंभ पर सवाल उठने लगे हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि 'न खाउंगा, न खाने दूंगा’। इस सद्वाक्य के दूसरे हिस्से (न खाने दूंगा)को मानो लकवा मार गया हो। वे मौन हैं या ध्रतराष्ट्र बने रहना चाहते हैं अथवा शुतुर्गमुगã की भंति आफत आने पर अपना सर रेत में गड़ा लेने को विवश हैं। सुषमा, वसुंधरा और अब पंकजा जैसी तीन देवियों के अलावा अब चौथी देवी और उनकी चहेती शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी भी फर्जी डिग्री की होल्डर हैं? पर बवाल कट रहा है और आगे कौन-कौन होगा देखने वाली बात होगी।
इनदिनों तो सरकार की दो कैबिनेट मंत्री सुषमा स्वराज और स्मृति ईरानी, एक मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे एवं महाराष्ट्र सरकार में पार्टी की एक मंत्री पंकजा मुंडे पर कीचड़ उछला है। यह बात सच है कि 'कीचड़ में कमल’ खिलता है, पर जब 'कमल में कीचड़’ पड़ने लगे तो बात घृणास्पद हो जाती है। यही मौका है जब प्रधानमंत्री कड़े कदम उठाकर अपनी छवि को और चमका सकते हैं। साथ ही संदेश दे सकते हैं कि 'जो जैसा करेगा, सो वैसा भरेगा’। लेकिन पद पर चिपके रहने से 'चोर की दाढ़ी में तिनका’ और 'दाल में काला’ जैसी कहावतें जन की जबान पर चढ़कर सरकार की छीछालेदर करती नजर आती हैं। ऊपर से मोदी जी का मौन मानों इस उक्ति की गवाही हो कि 'मौनम स्वीकृतम लक्षणं।’ प्रधानमंत्री जिस कमल को अपने कोट में लगाकर 'सेल्फी’ खींचते नजर आते थ्ो, उसमें वे गर गौर से देख्ों तो अब चार देवियों के कीचड़ के छींटे नजर आएंगे। हालांकि सरकार ने ऐसे कई काम काज और योजनाएं अपने हाथ में ले रखी हैं जो गर बेहतरी से लागू हुईं तो इनके सकारात्मक परिणाम दिखाई देंगे। बहरहाल, चारों देवियों के कारनामे मोदी सरकार के लिए प्रारम्भिक चेतावनी हैं, क्योंकि बीते एक साल में सिर्फ बातें हुई हैं, योजनाएं बनी हैं, अब कामकाज को अमलीजामा पहनाने की बारी है। यही वह वक्त जब धांधली के हजार रास्ते खुलते हैं। इसलिए अभी ये कीचड़ के छींटे तो मात्र प्री मानसूनी चेतावनी हैं यही हाल रहा तो कहीं पूरा कमल ही कीचड़ की बारिश में न ढंक जाए। 
आखिर में प्रसंगवश एक रोचक तथ्य यह कि नरेन्द्र मोदी ने विवाह किया और पत्नी का त्याग किया। भारतीय संस्कृति में पत्नी का दर्जा लक्ष्मी का है और लक्ष्मी कमल में विराजती है। कहीं मोदी को त्याज्य पत्नी(लक्ष्मी)का अभिशाप इन चार देवियों के कीचड़ के रूप में तो उन्हें नहीं झेलना पड़ रहा है!

Tuesday, 2 June 2015

गाँव में बदलाव

उत्तर भारत में साधारणतया गर्मियों का मौसम उनपयन, विवाह आदि संस्कारों के लिए जाना जाता रहा है, क्योंकि इस समय विद्यालयों में छुटियाँ होती हैं, कृषि कार्य समाप्त  हो जाते और खाली समय पर्याप्त  होता था। इन्हीं महीनों में बेटियों के मायके आने से घर गुलजार रहते थे। लेकिन अब समय चक्र बदला है और दिनोंदिन तेजी से बदलता जा रहा है। मनुष्य उसके प्रवाह में चाहते हुए और न चाहते हुए भी बह रहा है। गांव सिमट गए और शहरों का क्षेत्रफल बढ़ गया है, मगर दिलों का दायरा सिकुड़ गये हैं। इस पलायन की प्रमुख वजह गांवों की अपेक्षाकृत शहरों में अधिक सुख सुविधाएं का होना है। संसार भोगमय है, यह तथ्य शास्त्रोक्त है, लेकिन इनदिनों जिस तरह के भोग का बोध हो चला है वह मनुष्य की गरिमा के विरुद्ध और मशीन के करीब है। मजा मारने के लिए आतुर समाज कुछ भी करने को तैयार है, जो सुविधा भोगी हैं वे हर कुछ अतिक्रमित करने को आतुर हैं। संवेदना, सहृदयता जैसे मूल मानवीय गुण लुप्त  होने के कगार पर हैं। यह पश्चिम का अंधानुकरण है अथवा संस्कारों का पतन है जिसमें मनुष्य अपने गुणों के विपरीत आचरण करने लगा है। चमड़ी के सुख प्रधान हो चुके हैं और इससे बाहर झांकने का दायरा अपने जन्मे बच्चों से आगे नहीं बढ़ पाता। क्या पहले लोग अपने परिवार से मोह नहीं रखते थे? या अब ज्यादा समझदार हो गए हैं? या इसके बरक्स अति करने लगे हैं? खैर इस पर तर्क और बहस को लेकर ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। लेकिन समाज से अर्जित(कानूनी और गैर-कानूनी) सम्पदा का दुरुपयोग यह मानकर करना कि वह उसका नैतिक हकदार है, गलत है। दरअसल, आज इस कथित नैतिकता ने अपने पांव तेजी से पसारे हैं। तो इन्हीं फुरसत के क्षणों में एक शादी समारोह में सतना नगर के पड़ोस के गांव कंचनपुर जाना हुआ। वहां एक पट्टीदार परिवार में बिटिया की शादी में जो प्रबंध किए गए थे, उसका स्तर किसी शहर में किए समारोह से कमतर नहीं था, बल्कि कहें तो कुछ मामले में शहरी संस्कृति से बेहतर और अत्याधुनिक था, जिसे देख कर मन चकित था। खूबसूरत मंच के बगल में सुसज्जित ऑर्केस्ट्रा और उसके सामने वर वधु के लिए दस फुट ऊंचा रिवालविंग मंच जिसमें एक पाइप के द्बारा पुष्प वर्षा के लिए मशीनीकृत प्रबंध था। यानि आशीर्वाद देने के लिए अब संबंधियों/शुभचिंतकों की जगह डीजल चलित एक पम्प ने ले रखी थी। खाने के टेबल पर पाउडर, लिपिस्टिक में लिपी-पुती लड़कियों, को देखकर एक बारगी लगा कि यह किसी मैं किसी गांव में नहीं अत्याधुनिक शहरी विवाह कार्यक्रम के दर्मिया खड़ा हूं। लेकिन स्वरूप में यह विवाह संस्कार न होकर साज-सज्जा इसमें किए किए गए खर्चा की चर्चा में लिप्त  था। हालांकि शहरों में भी विवाह कार्यक्रम पूरी नाटकीय हो चुके हैं। जहां मेहमान और मेजबान दोनों हद दर्जे की औपचारिकता को पार कर चुके हैं। परन्तु गांवों में ऐसा नजारा जरा यकीन करना मुश्किल था। टेलीवीजन की संस्कृति ने जिस गहराई से अपनी पैठ गांव में बनाई है वह शहरों को कहीं अधिक पीछे छोड़ती दिखती है। परन्तु साधनों और धन के एवज में संस्कार और सलीका तो खरीदा नहीं जा सकता इसलिए खाने के आहाते में जूूठी डिस्पोजेबल प्लेटों का बिखराव कुछ यों था जैसे पतझड़ के मौसम में पत्ते आस-पास की धरती को ढंक लेते हैं और उन पर चलने से कर्र-कुर्र, चर्र-मर्र की आवाज आती है। फिर बच्चे बूढ़े स्त्री पुरुष यहां तक गांव के लगुआ भी चाउमिन चाट के लिए जूझते दिखे। पाउच को मुट्ठी में लिए पानी चूसते देखकर सहसा याद हो जब गांव में बारातियों का स्वागत किस्म-किस्म के आम चूसने से होता था। अब सब ध्वस्त है न आम बचे और न सरल स्वभाव के आम लोग। यह सब देखकर लगता है कि शहरी संस्कृति की बराबरी और आधुनिकता की अंधी दौड़ में गांव अपनी तासीर गंवा के कहीं के नहीं रहे। न तो वे शहर बन सके और न ही गांव बने रह सके। चाहे अधूरा ज्ञान हो अथवा अधकचरा कल्चर, से समाज विशेष को कुछ हासिल नहीं होता। मौलिकता में संसार का सबसे अप्रतिम सौंदर्य है. मौलिकता, सरलता से बड़ा मनुष्य का आभूषण और कुछ नहीं हो सकता, लेकिन दिनोंदिन वस्तुपरक, प्रदर्शनपरक हो रहे समाज में मनुष्य कहां शेष है यह गम्भीरता से चिंतन का विषय है। क्योंकि मनुष्य न तो मशीन और न हो सकता है, लेकिन ऐसा बनने को वह चतुर्दिक लालायित दिखता है। शहर तो वैसे भी संबंधों की मिठास से रीते हुए हैं, लेकिन गांव को भी इसकी जद में आते देखकर पीड़ा होती है। लेकिन यह संक्रमण किसी बीमारी के संक्रमण तीव्र व तीक्ष्ण है। गाँव आये इस बेतरतीव बदलाव हमें कहाँ ले जायंगे और हमारी संस्क्रती थाती किस गर्त में गाड़ देंगे यही सोचते हुए पंडाल से बहार आया. 

Thursday, 16 January 2014

आदमी तो आदमी है, लेकिन उसको देखने का नजरिया समाज में सदियों से अलग रहा है। संसार के हर धर्म-दर्शन में आदमी को परमात्मा की प्रतिकृति माना गया है। इसका समर्थन संस्कृत की चर्चित सूक्ति भी करती है कि 'यथा पिण्डे तथा ब्रम्ह्मण्डे’ यानी जो मानव शरीर में है उसी का विस्तार समूचे ब्रह्मांड में है। लेकिन इस वृहद दर्शन के बावजूद मानवीय स्वभाव, समाज में स्वयं की श्रेष्ठता सिद्ध करने और अपना लोहा मनवाने का रहा है।

आदि मानव का जब से सामाजीकरण हुआ है, उसने अपने वर्चस्व के निमित्त संघर्ष शुरू कर रखे हैं। इतिहास साक्षी है कि दुनिया में विभिन्न संस्कृतियों और राष्ट्रों का उदय और पराभव इसी वर्चस्व की जद्दोजहद से हुआ है। कमोवेश आज भी यह संघर्ष विभिन्न स्वरूपों में जारी है। इसी का नतीजा है कि आदमी का विभाजन कई बार, कई रूपों हुआ है। पहले वह वर्ण-जाति के तौर विभाजित हुआ, फिर इन्ही में आदमी के बरक्स 'अमीर’ और 'गरीब’ दो वर्ग बने। कालांतर में इसके बीच का एक और 'मध्यम’ वर्ग का 'टर्म’ चल निकला। बाद में इस 'मिडिल’ के भी दो विभाजन हुए- 'लोअर मिडिल क्लास ’और 'अपर मिडिल क्लास’ जिसमें रखकर आदमी की हैसियत देखी जा रही है। आदमी के ऐसे 'क्लासिफिकेशन’ चिरंतन हैं। इतना ही नहीं इतिहास में झांके तो वहां भी बाकायदे 'दीवाने-ए-खास’ और 'दीवाने-ए-आम’ जैसी व्यवस्थाएं इस विभाजन को रेखांकित करती दिखाई देती हैं। लेकिन अब अरविद केजरीवाल ने आम आदमी को नए अर्थ देते हुए कहा है कि 'जो ईमानदारी के साथ हैं, वे सब आम आदमी हैं। चाहे वह झुग्गी में रहता हो या दिल्ली के पॉश इलाके ग्रेटर कैलाश में।’ यानी बात बड़ी साफ है कि यहां आदमी चाहे अमीर हो या गरीब गर वह ईमानदार है तो 'आम आदमी’ है, लेकिन जिस तरह से कथित लोग देश में अर्थिक दृष्टि से रातों-रात बड़े आदमी बने हैं, उनके लिए मानना पड़ता है कि यह रास्ता ईमानदारी की तंग गली से कम ही गुजरा है। फिर भी आज जिसे 'आम आदमी’ कहा जाता है वह सदियों से जूझता रहा है और जूझता रहेगा।

पाश्चात्य समाज मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो ने मानव की आवश्यकताओं के पांच सोपान बताए हैं। प्रथम- 'शारीरिक’ यानी भूख प्यास और जैविक जरूरतें। दूसरी- 'सुरक्षा’ यानी जो आज उपलब्ध है वह कल कैसे मिलेगा, की फिक्र। तीसरी- 'सामाजिक’ है, जो प्रथम दो आवश्यकताएं पूरी होने के बाद स्वत: रोशन हो आती है। इसके तहत रिश्ते-नाते, मित्र-यार और व्यक्ति का सामाजीकरण शामिल है। ये तीनों जरूरतें प्राय: हर शख्स अपने-अपने स्तर पर हासिल कर लेता है। लेकिन असल संघर्ष चौथी जरूरत के लिए शुरू होता है, वह है- 'पहचान’ यानी खुद की यश-कीर्ति अथवा लोहा मनवाने के लिए जद्दोजहद करना है। इसी की झगड़ा दुनियाभर में नजर आता है। पांचवीं जरूरत है- 'स्वसम्मान’ की। यह जरूरत सबसे जुदा है, क्योंकि इसमें व्यक्ति अपनी कार्य दक्षता में आडम्बर से परे लीन रहता है।
तो, इस चौथी जरूरत के बरक्स जब एक सामान्य व्यक्ति, आसामान्य या विशेष यानी 'आम से खास’ बनने की कोशिश करता है तब वह 'आम आदमी’ की पदवी से बेदखल हो जाता है। लेकिन हम यह भूलते हैं कि इनदिनों लोगबाग 'आप पार्टी’ ज्चाइन करने के लिए महज इसलिए उतावले नहीं है कि उनमें रातोंरात जनसेवा का गुबार उमड़ पड़ा है, बल्कि इसलिए कि इसके जरिए जो मानव आवश्यकताओं का चौथा पायदान 'पहचान’ है को हासिल करने का यह सुलभ मंच दिख रहा है। देश में कई राजनीतिक दल पहले से मौजूद हैं, सभी आम आदमी की चिता के लिए मोर्चा खोले बैठे हैं। लेकिन आज यही दल जनता को दलदल दिख रहे हैं, तो इनकी कारगुजारियों के चलते। 'दल’ एक अमूर्त संस्था है, जबकि इसको संचालित करने वाले मूर्त और चेतन नेता हैं। इसलिए 'आप-तुम-हम’ जैसी कितनी भी पार्टियां देश में बन जाएं, नीयत को दुरुस्त किए बगैर हालात बदलने वाले नहीं। लेकिन फौरी तौर पर बेशक 'आप’ ने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी है। ईमानदार होना और इसको सतत बनाए रखना किसी कठिन साधना से कम नहीं। राजनीति में मौजूद 'ग्लैमर’ से खुद को ओझल रख पाना आसान नहीं। गोस्वामी जी ने लिखा है कि- 'प्रभुता पाए काहि मद नाहि’। आचार्य चाणक्य ने कहा था कि 'सत्ता में अथवा राजकोष में बैठे व्यक्ति से यह उम्मीद करना कि वह उस धन का कुछ भाग निजी लाभ के लिए नहीं करेगा ठीक वैसा सोचना है जैसे जिह्वा में रखी शहद की बूंद का स्वाद न लेना।’
आप की सफलता से न सिर्फ दिल्ली में उम्मीदों का आसमान उजला हुआ है बल्कि देश भी इसी ओर देख रहा है। खासकर तब जब देश की आबादी का अधिकांश हिस्सा बेहद गरीब है, दबा है, मैला-कुचला है, शोषित-पीड़ित है। इसी अवधारणा के नेपथ्य में 'आम आदमी पार्टी’ का जन्म हुआ है। केजरीवाल ने फिलहाल अपने कार्यकलाप और सादा जीवन पद्धति के जरिए देश के तमाम पॉलिटीशियनों को संदेश दिया है कि आने वाले वक्त में राजनीति का परिदृश्य कैसा होने जा रहा है।
फिर भी, देश की मनोदशा बेहद भावुक है। कई ऐसे मौके आए हैं, जब एकाएक कोई देश की राजनीति में धूमकेतु की तरह उभरा, मगर समय के साथ यों लुप्त हुआ कि बाद में उसका कोई नामलेवा नहीं बचा। इस चर्चा में पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिह के जिक्र करने भर से बात समझी जा सकती है। तब उन्हें यह कह कर सर आंखों में बैठाया गया था कि- 'राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है।’ हालांकि आज केजरीवाल और वीपी सिह के दौर के हालातों में बड़ा फर्क है। देश भीतर ही भीतर कुव्यवस्थाओं के चलते सुलग रहा है। ऐसे में आम आदमी को केरीवाल एंड कम्पनी नई सोच, नया जोश, नई उड़ान के साथ नए अर्थ देने को आतुर हैं।

Monday, 30 December 2013

वक़्त के साथ

  समय का सांकेतिक अर्थ बदलाव भी है। समय एक बार फिर बदला है, क्योंकि आज हमने नए साल में कदम रख दिया है। बीते बरस हमने कम उपलब्धियां हासिल नहीं कीं, लेकिन महंगाई, घोटाले,भ्रष्टाचार, यौनाचार के कलंक के साथ-साथ संसदीय लोकतंत्र के मूल सरोकारों से खिलवाड़ की कालिख ने 2013 की तस्वीर को एक हद तक स्याह कर दिया था। सरकार और समाज दोनों के लिए गया साल कमोवेश ऐसा ही रहा है। जिसकी कुछ तस्वीरों को आप अपने अलबम में महफूज करना चाहेंगे तो, कई बातों को किसी दुस्वप्न की तरह भूलना पसंद करेंगे। इसलिए नव प्रभात के मुहाने पर खड़े होकर बीते वक्त को सोचना और आने वाले वक्त की ओर निहारना, दो ऐसे मिश्रित पल हैं, जो अकुलाहट और प्रसन्नता दोनों देते हैं। बीता वक्त जिसे आप ने जी भरकर जिया है, उस पर चिंतन-मनन के साथ भविष्य पर दृष्टि होना मानवीय स्वभाव है। ऐसे मौके पर गर आंखमूंद कर अंतरमन को टटोलें तो, जो बीता है, रीता है उसकी मीठी-नमकीन यादें, मन मस्तिष्क को उमड़-घुमड़ कर कोहरे की चादर की तरह ढंक लेती है। लेकिन दूसरी ओर दिन भर उत्साह से लबरेज शुभकामना भरे संदेशों की मोबाईल में  बजती ‘बीप-बीप’ की धुन जिन्दगी को आगे और आगे देखने को प्रेरित करती है।
दरअसल एक जनवरी ऐसी मनोवैज्ञानिक तारीख है जो समय के विभाजन को रेखांकित करती है। यह तिथि घरों के कैलेंडर बदल देती है, तो अखबारों की टाईम लाइन में नए वर्ष को दर्ज कर देती है। नए संकल्पों को जन्म देती है, तो बीते वर्ष को इतिहास के पन्नों में अंकित करके, नए इतिहास को गढ़ने के लिए आगे बढ़ जाती है। ‘वक्त’ की विवेचना को करते वक्त दो दशक पहले टेलीवीजन पर प्रसारित महाभारत धारावाहिक के उस घूमते चक्र के नेपथ्य से आती हरीश भिमानी की आवाज बरबस जेहन में रोशन हो उठती है कि- ‘मैं समय हूं..’ समय जो कभी ठहरता नहीं, बस साक्षी बनता है कई पलों का। आगे बढ़ते जाना उसका असल स्वभाव है। बीता वक्त गर अच्छा हो तो इसलिए सुहाना होता है कि उसको हम बार-बार कुरेद सकते हैं उसके बारे में खुद से और अपनों से बात कर सकते हैं। और गर बीता वक्त खराब रहा हो तो,  जो आज अच्छा है वह उसे और बेहतर अनुभूत करने का वह हमें मौका देता है। इसीलिए कहा जाता है कि समय के स्वभाव को जिसने वक्त रहते पहचाना और तालमेल बनाया, वह सफलता की सीढ़ियां चढ़ता गया। सफलता और असफलता  को लेकर ये जुमला भी बात-बात में वक्त के बरक्स बोला-कहा-सुना जाता है कि ‘सब वक्त-वक्त की बात है’। धनुर्धर अर्जुन की विवशता और भीलों द्वारा गोपियां लूटने की दुखांतिका के पीछे वक्त की ही बिसात है।  इस तरह दु:ख और सुख, समय और जीवन एक दूसरे के व्युत्क्रमानुपाती होते हैं। सच तो यह है कि हमारे जन्म लेते ही समय, जीवन की आयु कम करने लगता है। यानी सब कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाना ही समय की प्रकृति है। समय निष्ठुर है, निरपेक्ष है, वैज्ञानिक है। इसीलिए उसे घड़ी जैसी मशीन से नापा जाता है। क्योंकि मशीन संवदेना से मुक्त, निश्चित नियमों में कर्मरत होती है। संसार के समस्त नियम कायदे ‘समय’ के आगे बेबस हैं, उसके आधीन है। मानव ने दुनिया में कितनी भी ऊंचाईयां हासिल कर ली हों, लेकिन वह समय पर न तो नियंत्रण पा सका है और न पा सकता है। यह प्रक्रिया इतने आहिस्ते से घटती है कि कब हम बच्चे से बड़े और फिर बूढेÞ हो गए यकबयक महसूस नहीं होता। लेकिन हर दिन बीत रहे जीवन के बीच में ही संसार है। समय हर चीज का पैमाना है। वक्त, व्यक्ति ही नहीं वस्तुओं की आयु भी तय करता है। यानी चाहे निर्जीव हो या सजीव दोनों का सृजन और समापन उसके मातहत है। कहने को वक्त बड़ा निरंकुश है... लेकिन चाहे वह दवाओं की ‘एक्सपायरी’ तारीख को निश्चित करता हो या राजनीतिक सत्ता के निश्चित कार्यकाल को। समय की इस निरपेक्ष गति को देखकर कहना पड़ता है कि-
‘अब यही मुनासिब है आदमी के लिए
  वह वक्त के साथ-साथ  चलता रहे..’ 
बहरहाल नववर्ष हमें अतीत से सबक लेने और आसन्न चुनौतियों से निपटने का अवसर दे रहा है। पहले तो यही उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार और संसद में, संवाद और विश्वास की बाहाली हो। क्योंकि बिना संवाद के न तो हम अपने भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं, न ही किसी नीति या निर्णय को तार्किक ठहरा सकते हैं।अलबत्ता यह बात सरकार और विपक्ष दोनों को याद रखनी होगी कि किसी मुद्दे पर एक सहमति का वातावरण विकसित हो। मात्र छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति से बचना होगा, विरोध के लिए विरोध जैसी मानसिकता से बाहर निकलने का समय है। दुष्यंत कुमार की दो पंक्तियां रोशन हो आती है कि-
‘मत कहो आकाश में कोहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है’ 
नए साल का सूरज यदि इस उम्मीद से चमके कि शब्दों का संसार शालीन और मर्यादित बना रहेगा तो, यह एक सूकूनदेह अहसास होगा। वर्ष 2013 में वैश्विक मंदी के दबाव में अर्थव्यवस्था की जो चाल सुस्त पड़ गई थी, वह 2014 में फिर मजबूत होगी। नया वर्ष इस लिहाज से ऐतिहासिक हो सकता है कि हम प्रकृति और पर्यावरण के साथ दोस्ताना रिश्ते की अनिवार्य जरूरत को न सिर्फ समझें बल्कि इस बाबत सक्रिय बने। क्योंकि गर हम अब भी नहीं चेते तो सचमुच देर हो जाएगी। सदी के महान वैज्ञानिक स्टीफन हांकिन्स की कुछ   वर्षों पहले की गई टिप्पणी क्या काफी नहीं कि- ‘मानवजाति ने धरा के संसाधनों का पिछले 1000 वर्षों का दोहन, महज100 वर्षों में कर डाला है, अब दोहन की यही गति प्रति 10 वर्ष हो गई है और यह हाल रहा तो यह 1000 वर्षों का दोहन प्रति 1 वर्ष होने के करीब है। इस लिहाज से यदि मानव का अस्तित्व बरकरार रखना है तो आने वाले 200 वर्षों के बाद कोई दूसरा ग्रह रहने के लिए तलाश करना ही होगा।’
तो आज पूरी दुनिया में उत्सव का स्वरूप ले चुकी अंग्रेजी कलेंडर की तारीख ‘एक जनवरी’ दुनिया के सभी मुल्कों में तो नहीं पर कई देशों में नए वर्ष की तिथि घोषित है। कई सवाल भी खड़े किए जाते हैं कि इस मनोवैज्ञनिक तिथि से लोगों के दैनिक जीवन के रसायन में, उसके कार्यकलाप में क्या फर्क आता है। वही चंदा, वही सूरज, वही तारे और वही नजारे। फिर भी यह समय का मनोविज्ञान ही तो है जो जीवन प्रवाह में एक नया अध्याय जोड़ता चलता है। बहरहाल, शुभकामना की भारतीय परम्परा ‘स्व’ के बजाय ‘सर्व’ कल्याण की कामना करती है। लिहाजा हम उम्मीद करते हैं कि न सिर्फ व्यक्ति, परिवार, मित्र-यार, देश-प्रदेश बल्कि समस्त संसार की सम्पूर्ण मानवजाति के लिए वर्ष 2014 सुखद, शांतिमय और उन्नतिदायी-फलदायी हो। 

Sunday, 1 December 2013

साख का संकट

  इनदिनों टीवी में एक विज्ञापन प्रसारित हो रहा है कि ‘इज्जत (साख)बड़ी मेहनत और मुश्किल से आती है और एक बार चली गई तो फिर लौट के नहीं आती। यानी साख को बनाना जितना कठिन है उससे मुश्किल है उसको बरकरार रखना। अत: इनदिनों देश-दुनिया में महंगाई, असुरक्षा के साथ जो सबसे बड़ा संकट है वह है किसी व्यक्ति या संस्था की साख का संकट, जो चतुर्दिक दिखाई देता है। क्रेडिबिलटी यानी साख किसी के बारे में वह अवधारणा है जो उसके भरोसे को कायम रखता है। बाजार में व्यक्ति की साख अच्छी हो तो उसे धन लेने और देने में कोई महाजन/व्यापारी संकोच या डर का अनुभव नहीं करता। यह साख कई तरह की हो सकती है। जैसे बैंकों की साख, हुंडी की साख, मीडिया की साख, व्यक्ति स्तर पर समाज सेवियों, नेताओं और धर्म गुरुओं की साख आदि।
सभी स्तर पर साख का बना रहना हर लिहाज से व्यक्ति, किसी संस्था, देश-दुनिया के लिए बेहतर अवस्था है। लेकिन दुर्भाग्यवश सबसे अधिक क्षरण इसी प्रवृत्ति में देखने में आया है। इसका सबसे बड़ा नुक्सान जो उठाना पड़ रहा है वह यह कि सोसायटी में मानवीय स्वभाव के प्रतिकूल बेहद अविश्वास और निराशा का वातावरण निर्मित होने लगा है। यदि कहें दे कि ऐसा हो चुका है तो कदाचित किसी को कोईआपत्ति न हो। जो कि हमारे विकास का लक्ष्य कतई नहीं है। लेकिन विकास की इस यात्रा में जिस बात की सर्वाधिक बलि दी गई है वह मात्र ‘साख’ यानी विश्वास की है।
अभी बहुत दिन नहीं हुए जब माने-जाने बुजुर्ग संत आसाराम को छल से धर्म की आड़ में यौन शोषण और विश्वासघात करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। वर्षों की कमाई इज्जत और धर्म गुरू की उनकी साख को एक छुद्र हरकत ने उन्हें सलाखों के पीछे न सिर्फ ढकेल दिया बल्कि इतने सालों में जो नाम, इज्जत, शोहरत बटोरी थी, वह पल झपकते ही बर्बाद हो गई। अपनी यादाश्त को थोड़ा फ्लैश बैक करें तो नब्बे के दशक में उत्तरप्रदेश के एक मंत्री अमरमणि ने कवियत्री मधुमिता शुक्ल के मोह में सब गवां दिया था। हरियाणा के बहुचर्चित मंत्री कांडा जो जूता बेचने के व्यापार से लेकर सरकार के कारोबार में शामिल हो, समाज में एक बड़ा मुकाम हासिल किया था। वे एयर होस्टेज गीतिका के फेर में ऐसे उलझे कि सब कुछ मुट्ठी में बंधी रेत की तरह फिसल गया। एनडी तिवारी का डीएनए टेस्ट और उससे हुई बदनामी ने उनसे क्या कुछ नहीं छीन लिया है। इतना ही नहीं ऐसी घटनाओं को मसाला की तरह परोसने वाला जनप्रिय मीडिया हाऊस ‘तहलका’ के एक चर्चित स्तंभ तरुण तेजपाल अपने ही एक कमसिन मुलाजिम के जाल में ऐसे उलझे कि उनके प्रोडक्शन हाऊस ‘तहलका’ में वाकई तहलका मच गया। आपको याद होगा कि नब्बे के दशक में तरुण तेजपाल ने ‘तहलका’ के जरिए देश भर में जिस धमक के साथ अपनी धाक बनाई थी, उनकी साख भी यौन शोषण के एक प्रकरण के कारण तार-तार हो गई।
ये सही है कि स्त्री शोषण की प्रवृत्ति सदा से समाज में विद्यमान रही है और इतिहास देखकर यह लगने लगता है कि अनेक कानूनी उपायों के बावजूद यह कम ज्यादा तौर पर बनी रहेगी। दरअसल, इसे कानून और बंधन के बाहरी दबाबों से निषिद्ध नहीं किया जा सकता। यह सारा मसला नैतिकता का है जो स्वनियंत्रण के जरिए ही नियंत्रित हो सकता है। क्योंकि गर कानून से इसे रोका जा सकता होता तो ईरान जैसे देशों में जहां इस अपराध की बेहद कठोर और अमानवीय सजाएं मुकर्रर हैं वहां ऐसे क्राईम कदापि न होते पर ऐसा नहीं है। बावजूद  इस बहाने से कानून को लचर नहीं छोड़ा जा सकता। नि:संदेह कठोर कानून भय का वातावरण बनाता है, जिससे अपराधियों में डर और अपराधों में अपेक्षाकृत कमी देखने में आती है। एक अहम सवाल इन घटनाओं के नेपथ्य में है, जो अक्सर या तो उठाया नहीं जाता अथवा जब उठाया जाता है तो उसे स्त्री स्वंतत्रता के पर कतरने की नकारात्मक पोंगापंथी विचारधारा के तौर पर देखा जाता है। हमारा मानना है कि कई मामलों में गर स्त्री तय कर ले कि उसे ऐसे बहकावों में आना ही नहीं है, जो उसके शोषण का कारण बन सकते हैं, तो यकीन मानिये की समस्या का अस्सी फीसदी हल तो इसी संकल्प से निकल सकता है। लेकिन समस्या के मूल में निहारने की बजाए उसकी शाखाओं में लग रहे रोगों पर कानून और पहरों की तलवार चलाई जाती है। लेकिन इस छंटाई के बाद हर बार उस ग्रंथि का प्रस्फुटन हो आता है।
स्त्री-पुरुष संबंधों में आज जो अविश्वास यानी साख का संकट है वह कोई नवीन परिघटना नहीं है। हां अब इनके तरीकों में विश्वासघात और निरंकुशता का पुट अधिक दिखता है। स्वभाव या वृत्ति ऐसी अवस्था है जो सहज नहीं बदल सकती। और फिर अब न तो गरिमामय, नैतिकता पूर्ण नेतृत्व है, न ही ऐसा  न ही ऐसा समाज।

Saturday, 23 November 2013

'वोट ऑन सेल' आफर चालू है

बड्डे ने बनबारी से कहा कि आज शाम से खुलेआम चुनाव की चर्चा, काना-फूसी, तीर-तुक्का, जिताने-हराने के निवेदन, विश्लेषण सब 'साईलेंट' हो जाएंगे। और फिर शुरू होगा अंदरखाने में अल्टी-पल्टी का दौर। लक्ष्मीदेवी दीपावली में भले उतनी चंचल नजर न आईं हों, जितनी आगामी दो दिनों में होने जा रही हैं। बड्डे बोले- अरे बनबारी! इस दफा चुनाव आयोग के डंडे का डर चौतरफा पसरा है।पोस्टर, बैनर, मोटर-गाड़ी सब 'काउंट' में और 'लिमिट' में हैं। चुनाव आयोग की गोपनीय निगाहें, 'बिग बॉस शो' की 'थर्ड आई' की तरह एक-एक गतिविधि को 'वॉच' कर रही हैं। तभी तपाक से बनबारी ने कहा- नेता-जनता दोनों 'वेलनोन' हैं कि हाथ जोड़ने, मिन्नते करने, 'डोर टू डोर' खाली पर्चा लिए खीस निपोरने से कुछ हाथ नहीं आने वाला। आगामी पंचवर्षीय मलाई पेलने के पहले, पब्लिक को 'माल' की आयुव्रेदिक 'पुड़िया' दबे छुपे दिये बिना 'गेम' नहीं बनने वाला। क्योंकि इस पुड़िया में वो ताकत है जो प्रतिद्वन्द्वी के 'सॉलिड से सॉलिड' वोटों को गच्चा देकर अपने पाले में ला सकती है। इसलिए अभी असल काम बाकी है। कहते हैं न कि 'रात बाकी, बात बाकी।' खबर है कि फलां, ढिकां के समर्थन की मोटी मलाई लील रहा है। जनता का एक बड़ा वर्ग है जो दो दिन की मलाई के लिए पांच साल तक अपना तेल निकलवाने के लिए तैयार हो जाता है। बड्डे खीङो- यार बनवारी तुम्हारी सोच बौनी है, नकारात्मक है। जनता अब 'सेंसिबल' है और सब जानती है कि कौन फोकटिया, कौन काम का और कौन नक्शेबाज है और कौन सहज सुलभ? और फिर यह कोई पार्षद, मेयर या पंचायत का चुनाव नहीं जिसे व्यक्ति विशेष हांकेगा। यह तो प्रदेश की सरकार बनने िबगड़ने का मामला है, एक विचारधारा को बरकरार रखने या बदलने का मामला है। अपना प्रदेश कहां था, कहां आ गया है, इस मसले पर जनता को फुसलाया नहीं जा सकता। जो कथित नेता-नपाड़ी 'माल' के बदले 'वोट ऑन सेल' का अभियान छेडें़ हैं न बनबारी, उनकी दाल नहीं गलने वाली। बनबारी ने बड्डे को प्यार से समझया कि तुम 'थ्योरिटिकली' सही हो मगर 'प्रैक्टिकली' गलत। क्योंकि विकास या विनाश का सच या तो स्वीकार होता नहीं या होने नहीं दिया जाता। जनता जाति के नशे में बौराई सी बाग रही है। क्योंकि आलाकमानों ने टिकिटों की ऐसी गोटी फिट की है कि 'सेम कास्ट को सेम कास्ट' से लड़ाओ है। ताकि एक 'ग्रेट कनफ्यूजन क्रियेट' किया जा सके।इसलिए वोट का मूल्य काम-धाम से नहीं 'माल' से तौला जा रहा है। सो मौका है बड्डे भूत की लंगोटी ही ले लो वर्ना अगले पांच बरस सिर्फ चिल्लपों होगी..!

Monday, 7 October 2013

जेल से शुरू जेल में ख़तम

बड्डे और बनवारी लालू की सजा पर समोसा खाते हुए 'गॉसिप' में मशगूल थे कि 'जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू' का नारा अब इतिहास बन गया। सोचो बड्डे बिना आलू के समोसा कैसा होगा! और बिना लालू के बिहार! वो भी तकरीबन 11 बरस तक। बड्डे बोले अरे! बनबारी, याद करो जेपी आंदोलन में हीरो बनकर उभरे लालू का सियासी सफर जेल से शुरू हुआ था और अब जेल में ही समाप्त हो जाए तो क्या अफसोस! जहां की मिट्टी वहीं इस्तेमाल हो गई। और फिर लालू तो लालू है वे कहीं रहें, चाहे जेल में या रेल में उनकी सुर्खियां कम होने वाली नहीं। राजनीति में हास्य या हास्य की राजनीति करने वाले लालू अब जेल में यही 'रोल' निभायेंगे। उनके कैद में आने से कैदियों का मनोबल बढ़ेगा। एक कैदी दूसरे कैदी से फुसफुसाया कि 'जब ई ससुरा लालुआ का जेलिया होइ गवा है ता हम कउने बड़ा अपराध किए हैं।' दूसरा बोला "बाबू साहब ई ललुआ बहुतै करामाती है। कबहुं अपने पैतृक गंउआ 'फूलबगिया' में भैंस चरावैली, ओकरे सवारी गांठत-गांठते पटना मा सीएम की कुर्सी पर सवार हो गइल।" लेकिन कहते हैं न कि 'चोर चोरी से जाए हेरा फेरी से न जाए।' सो आदतें हैं बड्डे पड़ जाएं तो फिर उम्र भर साथ नहीं छोड़तीं। कभी भैंस को चारा चराते. चुराते उसका चारा चुग्गा ही लील गए। महोदय ने जिसकी पीठ पर बैठकर बचपन् बिताया उसी भैंस को बे-चारा कर दिया था। लेकिन सीबीआई ने लैंस लगा-लगा कर जांच की और नतीजा है कि जिनके पास चारा ही चारा था अब वही बे-चारा हैं, बे-सहारा हैं। नोट कबाड़ने के राजनीति में अनेक मार्ग हैं। जिसको देखो वही माल बनाकर लाल हो रहा है किसन् यह लाभ नहीं लूटा। मगर निरीह पशुओं का निवाला छीनने पर लगी हाय ने लालू को उनके झुंड के साथ् जेल में पेल दिया गया। बनबारी बोले- नहीं बड्डे यहां तो जो पकड़ा गया उसके बरक्स चोर-चोर का शोर है जो नहीं पकड़ा गया वह अब भी सवा शेर है। बहरहाल, राहुल गांधी ने जो गुल खिलाया है उससे कईयों की बत्ती गुल है। कई तो ऐसे हैं जिन्हें जेल की सलाखें सपने में डराने लगी हैं। चुनाव आसन्न हैं और बहुतों के सामने टिकिट का संकट खड़ा है। राहुल बाबा ने अध्यादेश को क्या फाड़ा अच्छे अच्छे फटेहाल, बेहाल, लहुलुहान होकर विक्षिप्त से 'विहेब' करने लगे हैं। उधर खबर है कि अपने जुर्माने  की रकम (25 लाख)को भरने के लिए लालू जेल में क्लास लेंगे और 25 रुपईया रोज कमाएंगे। उनकी पार्टी 'कॉनफिडेंस' में है कि लालू जेल से पार्टी को हांकेंगे और अपने बछुआ तेजस्वी को ताज तक पहुंचाने की आखिरी सांस तक जद्दोजहद करेंगे।

Sunday, 29 September 2013

राजनीति में नेता तीन तरह के

पिछले दिनों मध्य प्रदेश की दो बड़ी चुनावी सभाओं को बारीकी से तजबीजने और मथापच्ची करने के बाद बड्डे ने विश्लेषण दिया कि- देश की राजनीति में तीन तरह के नेता हैं। पहले वे जो पार्टी में वर्षो से जमे हैं, साठ के ऊपर हैं(कुछ खानदानी अपवादों को छोड़कर) आज भी पूजे जा रहे हैं,जो खांटी के हैं, जिनका एक गुट और आभामंडल है। ये वे नेता है जो पार्टी में परमानेंट हैं, जिनमें टिकट पाने, विधायक या मंत्री बनने की ललक नहीं, क्योंकि यह तो उनका, उनकी पार्टी में मौलिक अधिकार है। अब तो जो कुल कवायद है, वह केवल मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनने की लालच में निहित है। क्योंकि देश प्रदेश में राजनीतिक मोक्ष के दो ही साधन(पद) हैं- प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री। इसी मोक्ष के निमित्त वे हैलीकॉप्टर से इधर-उधर उड़ते, निरीह जनता को वादों के उपहार बांटते, वर्तमान सरकारों की धज्जियां उड़ाते, बखिया उधेड़ते नजर आते हैं। इनका काम इतना है कि वे शहर-शहर जाएं, फिल्मी हीरो के माफिक उड़नखटोले से वहां अवतरित हों, जहां पब्लिक उनके दर्शनों को उमड़े और वे मंच से हाथ हिलाएं, दिल मिले न मिले, लेकिन अपने साथियों के हाथ से हाथ जोड़कर, उन्हें हवा में लहराकर बनावटी यूनिटी का उद्घोष करें। ताकि संदेश दिया जा सके कि पार्टी के सिपहसालारों अब सत्ता हासिल करने के मिशन में पिल पड़ो, क्योंकि अब गुटबाजी का नहीं गांठ जोड़कर, हरकत करने का टाईम है। दूसरे वे नेता हैं जो 'लोकल' और 'वोकल' (बतोलेबाज) हैं। जिन पर इन बड़ी सभाओं में अपने-अपने दल बल के साथ 'पार्टीशिपेट' करने की जिम्मेदारी होती है। क्योंकि यही वह मौका और मंच हैं, अपने आकाओं के सम्मुख अपनी ताकत दिखाने का, कि वे टिकिट के असल दावेदार क्यों हैं? दरअसल, इनमें भी मंचासीन 'परमानेंट' नेताओं के 'सेप्परेट' समर्थक होते हैं, जिसके संकेत पोस्टरों, विज्ञापनों और सभा स्थल पर लगे नारों और पिटवाई गई तालियों से मिलते हैं। इनका 'ओनली टारगेट टिकट' होती है। तीसरे वे नेता हैं जो नई पौध कहलाती है। भले ये औसतन चालीस के आस-पास हैं, पर ऊर्जावान हैं। इनमें भी विधयक बनने की ललक है, मगर अनुशासन के नाम पर इनका शोषण पहले और दूसरे टाईप के नेता आजीवन करते हैं। इनका काम स्टेशनों में, हैलीपैड पर, सड़कों के किनारे, वंदन द्वार लगाकर, फूल-माला लिए, गगनचुम्बी नारों का उद्घोष मात्र है। इनके साथ फोकटिए टाईप के कुछ लड़कों की फौज फौरी तौर पर इकट्ठी होती और विलीन हो जाती है। आखिर बड्डे के इस विश्लेषण को गौर से सुनकर हमें तसल्ली हुई कि अब नेताओं की असलियत किसी से छिपी नहीं।

Friday, 20 September 2013

मोदी रे..अब देश हुआ बेगाना.


देश में मोदी विरोध के नए-नए तरीकों का इजाद हो रहा है। बड्डे बोले- सो तो है बड़े भाई। लोकतंत्र में सबको 'इक्वल राइट' है, 'इलेक्शन फाइट' करने का। 'इवन' उन्हें भी जो जेल में हैं।
आज की डेट में तो संसद में सौ से ऊपर की संख्या ऐसी है जिन पर किसी न किसी तरह के आरोप लगे हैं। मोदी पर भी गुजरात दंगों में राजधर्म न निभाने का आरोप है। तो क्या इसका अर्थ है कि वे चुनाव न लड़ें? 1984 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व में तो पूरे देश में दंगे हुए।
सरदारोंको ढ़ूंढ-ढ़ूंढ कर निपटाया और लूटा गया।
तब भी राजधर्म निभाया नहीं गया। लेकिन किसी ने चूं तक न की। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने यह कहकर चुप्प्प्प्प्पी साध ली थी कि जब बड़ा पेड़(इंदिरा की हत्या) गिरता है तो धरती हिलती है। लेकिन सब भुला दिया गया। तब से तीन सरकारें कांग्रेस की बनी। किसी ने देश नहीं छोड़ा। असम जहां की सीट से मनमोहन सिंह पीएम पद पर एपांइट हुए हैं, वहां दंगे हुए, समुदाय विशेष के लोग कत्लेआम किए गये, लेकिन खामोशी छाई रही। किसी ने देश नहीं छोड़ा, न ही राजधर्म न निबाहने की बात हुई। अब मुजफ्फरनगर के दंगों में कौन-कौन देश छोड़ता है देखना होगा। लेकिन मोदी को लेकर लोगों की निष्ठा हिल गई, उन्हें अछूत मानकर कथित दलों, जिन्होंने भाजपा के साथ सत्ता सुख भोगा, उन्हें वही दल अब रावण दिख रहा है, वह भी दस नहीं सौ सिरों वाला। अभी तो मोदी केंद्र में जीते नहीं, मात्र अभियान पर हैं तो कथितों का हाजमा खराब होने लगा है। गर जीत गए तो क्या लोग बाग देश छोड़ देंगे, क्योंकि मोदी तानाशाह हैं, मोदी निरंकुश हैं,मोदी जीत गए तो देश के नियम कायदे कानून उनके चरणों की दासी हो जाएंगे।
क्या मोदी संविधान को रौंद डालेंगे? सोचो बड्डे कितनी कमजोर आस्था के लोग इस देश में रह रहे हैं। गुजरात में तीन बार से लगातार जनता उन्हें चुन रही है तो वहां के किसी नागरिक ने देश नहीं छोड़ा, उल्टे सव्रे कहते हैं कि गुजरात का कुछेक कमियों के बावजूद विकास ही हुआ। यहां तक कि योजना आयोग ने मोदी के विकास कार्यो को 'एप्रिशिएट' किया है। फिर भी 'सरप्राईजिंगली' कन्नड़ साहित्यकार डॉ यू आर अनंतमूर्ति टाईप के लोग किस बात पर मोदी के नाम से देश छोड़ने चले हैं। हां उनको जरूर देश छोड़ना पड़ सकता जिनका माल विदेशों में जमा है। अलबत्ता मोदी की आड़ में समुदाय विशेष में भय उत्पन्न कर, उनका भयादोहन वोट की गोटी फिट करने के लिए हो रहा है। चुनाव में दांव सबको आजमाने का अवसर है। सबका फैसला जनता की उंगलियों में है। इसलिए उंगली करनी है तो वोटिंग पैड पर करें, देश के प्रति निष्ठा पर नहीं। जिसको देश ने सब दिया उनके द्वारा देश का तिरष्कार शर्मसार करता है।

Sunday, 15 September 2013

दामिनी के दमन का विमर्श

आखिरकार दामिनी के दोषियों को ‘फांसी की फरमाइश’ जो घटना के दिन से हो रही थी, पूरी हुई। निश्चित रूप  इस मामले में इससे कम दंड पर बात नहीं बनती। दामिनी की जान पहले जा चुकी थी और अब बचे हुए अपराधियों की चौकड़ी का जीवन भी कानून ले लेगा। यह फैसला (इस चौकड़ी और उनके परिजनों छोड़कर) समस्त समाज को संतोष देता है। दूसरी ओर ऐसे ही सुकून का अनुमान दामिनी की आत्मा के लिए भी किया जा सकता है...। 
टी वी चैनलों और अखबारों में बड़ी-बड़ी बहसें चलीं, छपीं और इतिहास बन गर्इं। फेसबुक और ट्विटर पर उपजा गुस्सा भी चंद दिनों में काफूर हो जाएगा। लेकिन सवाल जो बेहद अहम है कि क्या अब ऐसी हरकत दोबारा नहीं होगी? क्या फांसी की सजा से उत्पन्न भय अपराध निरोध का काम करेगा? क्या यह फांसी नजीर बनेगी जिससे कामुक मानसिकता के लोग किनारा काट लेंगे या उनकी इन्द्रियां भोगवृत्ति से भयवश उदासीन हो जाएंगी...? जवाब आसान है की ऐसा हरगिज नहीं होगा। भले कानून या समाज, सजा को अपराधियों में भय का आधार मानता हो, मगर यह आधार सदियों से गलत साबित हुआ है। सच्चाई यह है कि ऐसी वारदातों से इतिहास के पन्ने पटे पड़े हैं। स्त्री हिंसा समाज में नासूर की तरह सतत बनी हुई है। और फिर दिल्ली की घटना  के बाद से तो और तेजी से ऐसी खबरें देखने, सुनने, और पढ़ने को सतत मिलती रही हैं...संभव है की जब आप यह आलेख पढ़ रहे हों उसी दिन अखबार के अन्य पन्नों में कोई न कोई एक और हादसा घटा और छपा हो।
 ज्वलंत प्रश्न है कि अब आगे क्या? कितनी फांसी, कितनों को हम और देगें और कितनी ज्योतियां बुझेंगी? फांसी में समाधान खोजने वाले समाज को इसकी पड़ताल करनी होगी कि स्त्री के विरुद्ध यौन हिंसा इतनी आक्रामक क्यों हो गयी है?
 बर्बर समाज से सभ्य समाज की विकास यात्रा, मूल्यों के आधार पर हुई। यह तथ्य है कि मूल्यों(हर तरह की नैतिकता) के खंम्भों पर समाज का तानाबाना खड़ा है। जब मूल्यों का पतन होता है तो हम पुन: बर्बर युग की और खिसकते नजर आते हैं। लब्बोलुआब यह कि ‘मूल्य’ मानव जीवन और समाज का बीज हैं। मूल्य जितने मजबूत होंगे समाज की बुनियाद उतनी दृढ़ होगी। स्त्री यौन हिंसा में असल मसला इसी बात का है। लेकिन आधुनिकता की बयार में मूल्य गिरे तो समाज की संरचना ढीली पड़ी। इसलिए बिना मूल्यों की प्राणप्रतिष्ठा किए चाहे वह पुरुषों में हो या स्त्रियों में बात नहीं बनने वाली। यह ऐसा अनुशासन जिसकी शुरूआत पारिवारिक जीवन में शुरू होती है। जिसका निर्वहन हर शख्स को निजी जिम्मेवारी के तौर पर करना होता है। लेकिन समाज में स्त्री स्वतंत्रता, समानता और पुरुषों की कुत्सित मानसिकता पर भौंडी बहसें चल रही हैं। यह समस्या के जड़ पर कुल्हाड़ी चलाने के बजाय शाखाओं को नोचने जैसा काम है। कथित लोग स्त्रियों के पहनावे पर आपत्ति करते हैं तो आधुनिकता के पोषक ऐसों की कुत्सित मानसिकता पर सवाल खड़े करते हैं।  लेकिन कभी-कभी आधुनिकता के ध्वजवाहकों द्वारा सम्पूर्ण समाज की समझ को एक स्तर पर देखने की चूक हो जाती है। पहनावे की स्वतंत्रता के संदर्भ में कोई बंधन न हों यह मांग बार-बार उठती है। यह मांग तालीबानी न हो जरूरी है मगर लेकिन यह अव्यवहारिक न हो इतना ख्याल तो किया ही जाना चाहिए।  लेकिन जो लोग बच्चों के साथ घिनौनी हरकतें करते हैं उनके मूल्य पाताल में जा धंसे है। 
लेकिन इस सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि बगैर नियंत्रण की स्वच्छंदता, अपराधिक कृत्यों की समानुपाती होती है। आज नवयुवक से लेकर बुजुर्गों के पास मोबाईल, इंटरनेट के संसाधन हाथों में हैं, जिसमें एक क्लिक पर वह समस्त यौन सामग्री को प्ले कर सकता है, जिसे देखने के लिए पहले पाबंदी है।  इसके समर्थन में कथित लोग यौन शिक्षा का अंधा समर्थन करते हैं लेकिन यह भूल जाते हैं कि ऐसा खुला, समझदार समाजिक वातावरण हम निर्मित नहीं कर पाएं हैं। यौन शिक्षा वह भी कम उम्र में और विवाह अधिक उम्र में बात गले नहीं उतरती। हर शिक्षा की परीक्षा होती है। यही यौनिक विकृत की एक अहम वजह है। 
स्त्री स्वंतत्रता व समानता की बातें और उनको बढ़ावा हर स्तर पर हर हाल में दिया जाना चाहिए। रूढ़िवादी पुरुषों को यह समझना होगा कि स्त्री को लिंग भेद के आधार पर भेदभाव के भंवर में देर तक उलझाये नहीं रखा जा सकता। क्योंकि आधुनिक समय में स्त्री का चेहरा बदला है। आज वह मात्र सम्मान का नहीं, समानता का व्यवहार चाहती है। सदियों से समाज ने उसे पूज्य बनाकर उसकी देह को आभूषणों से लाद कर परंपरगत आदर्शों की घुट्टी पिलाकर उसके दिमाग को कुंद करने का काम किया है। इस दीवार को तोड़ने की उसकी हर कोशिश पर अब बवाल मचता है। 
सवाल है कि स्त्री करे क्या? भले यह बात अटपटी लगे मगर स्त्रियों को खुद से संवाद करना होगा। धोखे से बचने का यही कारगर उपाय है कि वह खुद को वहां की समाजिक स्थितियों के मुताबिक रखे। भावुक होना उसका स्वभाव है और इसी भावुकता का दोहन उसके शोषण का कारण बनता है। वैचारिक मजबूती के लिए स्वाध्याय पर खुद को केंद्रित करें। एक मजबूत कैरियर उन्हें वह खुशी दे सकता है जिसे वे किसी के अन्य तरीकों से हासिल नहीं कर सकतीं। ब्बॉय फ्रेंड की बजाय अध्ययन पर अधिक ध्यान जीवन में रंग भर सकता है।   और फिर स्कूल-कॉलेज का जीवन सिर्फ बेहतर अध्ययन और सुनहरे भविष्य के निर्माण का अवसर है, यह वक्त दोबारा नहीं आता। इस बात को वे अपने दिल दिमाग को जितना बेहतर समझा सकती हैं, तो खुशहाल जिंदगी की ओर एक कदम बढ़ा देंगी।
हर काम का एक निश्चित समय है,उसे समय के मुताबिक अंजाम दें तभी समाजिक स्थितियों में बदलाव लाए जा सकते हैं। तभी अबला को सबला में तब्दील किया जा सकता है, जहां तक सम्भव हो वह अपने जीवन की प्राथमिकताएं खुद तय करे, जिसमें स्वतंत्रता का बोध तो हो, मगर वह उच्छृखंलता से परे हो। कथित पुरुषों की मानसिकता को भले प्रत्यक्ष तौर न बदला जा सके, मगर इतना तय मानिए कि खुद को समय के साथ मजबूत करके ऐसी मन: स्थिति के समाज को सबक सिखाया जा सकता है। 
दिल्ली, मुम्बई की घटनाएं तो वे हैं जो मीडिया की सुर्खियां बनी लेकिन अनेक ऐसी वारदातें है जिनकी आवाज नक्कारखाने में तूती बनकर रह जाती है। स्त्री के विरुद्ध यौन हिंसा के बीज समाज में सदियों से विद्यमान रहे हैं, इन्हें कानून के भय से समाप्त तो नहीं किया जा सकता हां कम अवश्य किया जा सकता है। 
फिर भी पर्दे के पीछे से आगे तक के सफर में महिलाओं को कई पहाड़ लांघने पड़े हैं और अभी कई शेष हैं। कहते हैं कि शिक्षा के साथ संपन्नता और सभ्यता में भी इजाफा होता है। लेकिन फिर भी आदमी के दरिंदा होने की नजीरें हमारे समाज में बढ़ रही हैं। दामिनी के स्मृति में इस विषय पर गहन मनन करने का यही समय है।

हिंदी देश के माथे की बिंदी

ब ड्डे ने प्रात:काल ‘सुप्रभात’ के सम्बोधन के साथ सूचित किया कि आज चौदह सितम्बर है। इस तारीख को हिन्दी में ‘हिन्दी दिवस’ और अंग्रेजी में ‘हिन्डी डे’ कहते हैं। हां बड्डे! आज के दिन हिन्दी-हिन्दी के कीर्तन का उत्सव नुमा वातावरण चतुर्दिक नजर आयेगा है। अखबारों में हिन्दी की दयनीय दशा पर  बड़े-बड़े बल्लमों (जिनके बच्चे इंग्लिश मीडियम में पढ़ते हैं) के लेख छपेंगे, हिन्दी के पिछड़ेपन पर रुदन-क्रंदन भी भव्य समारोहों के जरिए जाहिर किया जाएगा, हिन्दी के संरक्षण, प्रयोग और विकास के बरक्स गगनचुम्बी संकल्प लिए जाएंगे। और तो और आज के दिन अंग्रेजी परस्त भी ‘इमोशल’ हो कह ही देते हैं कि ‘टुडे इज हिन्डी डे’। लेकिन शाम होते-होते हिन्दी प्रेम की खुमारी उतरने लगेगी। तब हिन्दी, हिन्दुस्तान के माथे की मात्र बिंदी बनकर रह जाएगी, जो साफ संकेत है कि देश की राष्टÑभाषा हिन्दी का महत्व शीर्ष पर है, लेकिन उसका स्थान बिन्दी जित्ता है। इस बिन्दी की आड़ में सरकार और समाज के समस्त काम-काज, पढ़ाई-लिखाई से लेकर रोजगार हासिल की अंतिम सत्ता अंग्रेजी के चरणों में गिरवी है। बड्डे बोले कि- भाषायी हालात तो जे हैं कि देश के नुमार्इंदे देश में ही अंग्रेजी पेलते हैं। वहां भी जहां हिन्दी से काम चलाया जा सकता है। सो इनसे भाषायी प्रेम की उम्मीद करना पाप है। बड़े-बड़े विद्वान, सिनेमा के सितारे हिन्दी बोलते वक्त जब अपनी बात कहते अटक जाते हैं तो ‘यू नो आई मीन टू से दैट’ से शुरू करते हुए, बिना अंग्रेजी अपनी बात ठीक से नहीं कह पाते। न्याय की भाषा अंग्रेजी में उनके लिए भी है जो अंग्रेजी की ‘ए,बी, सी, डी’ नहीं जानते। अब मोदी ने भी ‘ए, बी, सी, डी’ के संकेत शब्दों में सरकार पर इल्जाम लगाया है तो कांग्रेस के मनीष तिवारी ने ‘एफ’ के कोड में जबाव दिया है। बड्डे! हिन्दी प्रेम का आडम्बर तो आजादी के बाद से जारी है..लेकिन हकीकत में हिन्दी की वाट लग चुकी है। शासन का एक ठईया स्कूल अंग्रेजी माध्यम का नहीं है मगर अंग्रेजी में दीक्षित और दक्ष हुए बिना एकउ नौकरी हासिल नहीं की जा सकती। द्विवेदी युग में हिन्दी में कठिन शब्दों का प्रयोग बढ़ा तो भाषा की कठिनाईयों पर फिकरे भी कसे गए। बड्डे के छोटे भाई बनबारी ने, जो इंगलिश मीडियम में अध्ययनरत हैं, ने चंद उदाहरणों से इसकी खिल्ली कुछ यूं उड़ाई कि विद्युत के ‘स्विच’ को हिन्दी में- ‘विद्युत गमन आगमन नियंत्रक’। ‘हैलीकॉप्टर’ को ‘उदग्ररोही’ तो, ‘गॉगल’ को ‘कर्ण चिपकित नासिका स्थित पारदर्शक यंत्र’। इन फिकरों के बावजूद आज देश अपने माथे पर हिन्दी की बिन्दी लगाए अपनी राष्टÑभाषा के लिए, अपने ही देश में, अपने लोगों के बीच जिन्दा रहने के लिए संघर्षरत है।

Saturday, 14 September 2013

हिंदी देश के माथे की बिंदी

बड्डे ने प्रात:काल ‘सुप्रभात’ के सम्बोधन के साथ सूचित किया कि आज चौदह सितम्बर है। इस तारीख को हिन्दी में ‘हिन्दी दिवस’ और अंग्रेजी में ‘हिन्डी डे’ कहते हैं। हां बड्डे! आज के दिन हिन्दी-हिन्दी के कीर्तन का उत्सव नुमा वातावरण चतुर्दिक नजर आयेगा है। अखबारों में हिन्दी की दयनीय दशा पर बड़े बड़े  बल्लमों (जिनके बच्चे इंग्लिश मीडियम में पढ़ते हैं) के लेख छपेंगे, हिन्दी के पिछड़ेपन पर रुदन-क्रंदन भी भव्य समारोहों के जरिए जाहिर किया जाएगा, हिन्दी के संरक्षण, प्रयोग और विकास के बरक्स गगनचुम्बी संकल्प लिए जाएंगे। और तो और आज के दिन अंग्रेजी परस्त भी ‘इमोशनल’ हो कह ही देते हैं कि ‘टुडे इज हिन्डी डे’। लेकिन शाम होते-होते हिन्दी प्रेम की खुमारी उतरने लगेगी। तब हिन्दी, हिन्दुस्तान के माथे की मात्र बिंदी बनकर रह जाएगी, जो साफ संकेत है कि देश की राष्टÑभाषा हिन्दी का महत्व शीर्ष पर है, लेकिन उसका स्थान बिन्दी जित्ता है। इस बिन्दी की आड़ में सरकार और समाज के समस्त काम-काज, पढ़ाई-लिखाई से लेकर रोजगार हासिल की अंतिम सत्ता अंग्रेजी के चरणों में गिरवी है। बड्डे बोले कि- भाषायी हालात तो जे हैं कि देश के नुमार्इंदे देश में ही अंग्रेजी पेलते हैं। वहां भी जहां हिन्दी से काम चलाया जा सकता है। सो इनसे भाषायी प्रेम की उम्मीद करना पाप है। बड़े-बड़े विद्वान, सिनेमा के सितारे हिन्दी बोलते वक्त जब अपनी बात कहते अटक जाते हैं तो ‘यू नो आई मीन टू से दैट’ से शुरू करते हुए, बिना अंग्रेजी अपनी बात ठीक से नहीं कह पाते। न्याय की भाषा अंग्रेजी उनके लिए भी है जो अंग्रेजी की ‘ए,बी, सी, डी’ नहीं जानते। अब मोदी ने भी ‘ए, बी, सी, डी’ के संकेत शब्दों में सरकार पर इल्जाम लगाया है तो कांग्रेस के मनीष तिवारी ने ‘एफ’ के कोड में जबाव दिया है। बड्डे हिन्दी प्रेम का आडम्बर तो आजादी के बाद से जारी है..लेकिन हकीकत में हिन्दी की वाट लग चुकी है। शासन का एक ठईया स्कूल अंग्रेजी माध्यम का नहीं है मगर अंग्रेजी में दीक्षित और दक्ष हुए बिना एकउ नौकरी हासिल नहीं की जा सकती। द्विवेदी युग में हिन्दी में कठिन शब्दों का प्रयोग बढ़ा तो भाषा की कठिनाईयों पर फिकरे भी कसे गए। बड्डे के छोटे भाई बनबारी ने, जो इंगलिश मीडियम में अध्ययनरत हैं, ने चंद उदाहरणों से इसकी खिल्ली कुछ यूं उड़ाई कि विद्युत के ‘स्विच’ को हिन्दी में- ‘विद्युत गमन आगमन नियंत्रक’। ‘हैलीकॉप्टर’ को ‘उदग्ररोही’ तो, ‘गॉगल’ को ‘कर्ण चिपकित नासिका स्थित पारदर्शक यंत्र’। इन फिकरों के बावजूद आज देश अपने माथे पर हिन्दी की बिन्दी लगाए अपनी राष्टÑभाषा के लिए, अपने ही देश में, अपने लोगों के बीच जिन्दा रहने के लिए संघर्षरत है।

Saturday, 7 September 2013

भटकल पर कमाल के भटकाव

बड्डे ने पहले टीवी पर कमाल फारूकी का कमाल का बयान सुना कि 'यदि आतंकवादी भटकल को इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि वह मुसलमान है, तो इस गिरफ्तारी की जांच करके यह सुनिश्चित किया जाए कि भटकल को मुस्लिम होने की सजा न मिले।' फिर हमें फोन मिलाया कि बड़े भाई देश में राजनीति का स्तर कितना गिर गया है।
सोचता हूं कि क्या रुपए की गिरावट और राजनीति परस्पर समानुपाती हैं? पहले रुपया मजबूत था तो इतनी गिरावट न थी जितना 68 रुपया तक गिर जाने के बाद है। 'इट मीन्स' रुपया मजबूत, तो देश मजबूत और देश तो राजनीति भी। लेकिन रुपया से लेकर हर स्तर पर गिरावट है चाहे बाबाओं को देख लो, या लुच्चे टाईप लड़कों को। अब जो बचा है वह ओनली 'टुच्ची राजनीति' है। चाहे सदन में देख लो, या फिर सड़क पर। जो कथित नेताओं के निजी टाईप के दलों के मार्फत गाहे बगाहे बिजली की तरह कड़कती और लुप्त हो जाती है। इस पर बड़े भाई ने एक शेर मारा-
 "देखो बड्डे बिजली कैसे चमक तुरत छिप जाती है,
 जैसे मुहब्बत लुच्चे की, पल भर में खमत हो जाती है।"
इत्ता तो मानना होगा बड़े भाई कि भले लोकतंत्र संस्था का अविष्कार यूरोप में हुआ हो पर उसका असल प्रयोगकर्ता देश भारत है। इसलिए लोकतंत्र की 'ओरिजनल' स्वतंत्रता केवल अपनी कंट्री में दिखती है कि कैसे 'लोक' स्वतंत्र रूप से 'तंत्र' को चलाने के लिए पहले नुमाईंदो को चुनता है, फिर ये नुमाईंदे इसी 'तंत्र' में बैठकर 'लोक' पर मनचाही सवारी गांठत् हैं कि जो जी में कहो, करो लेकिन पांच् साल 'सेफ' है। अब बड्डे की बारी थी टुच्चा टाईप शेर दागने की, कि-
 "यहां चाहे जो करो वाह! क्या शमा है,
 कुछ बको इस लोकतंत्र में सब क्षमा है।"
अब टुंडा की तरह भटकल भी भटकते-भटकत् किस्मत से गिरफ्त में आया तो देश के 'सो कॉल्ड सेक्युलर' नुमाईंदों को इनमें आंतकी कम 'मुस्लिम् फैक्टर' ज्यादा दिख रहा है। ऐसे में हमें अटल विहारी वाजपेयी का स्टेटमेंट याद हो आया कि- 'यह सच है कि हर मुसलमान आतंकी नहीं मगर अफसोस की बात है कि हर पकड़ा गया आतंकी मुसलमान निकलता है।' मगर इन कथितों को यह गवारा नहीं कि कोई आतंकी मुसलमान है, गर है तो यह मुसलमान् के सम्मान के खिलाफ है। इतनी चिंता इसलिए क्योंकि उनका मुसलिम वोट पर कॉपीराईट है। वर्षो से वे इसी वोट की रोटी और वोटी खा रहे हैं। ऐसों के लिए वोट प्राथमिक और देश द्वितीयक है। इसीलिए आतंकी नेता को नहीं, जनता को निपटाते हैं। यानी दोनों का टारगेट 'जनता' है, हां तरीके अलग-अलग हैं। सो बड़े भाई कमाल भल् भटकें भटकल पर मगर पब्लिक है कि सब जानती है।

Sunday, 1 September 2013

बाबाओं के जबड़े में समाज

     बाबाओं पर मचे बवाल को लेकर भगवती चरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ में तीन चरित्रों (बीजगुप्त, चित्रलेखा और कुमारगिरी)की स्मृति हो आती है। जिसमें बीजगुप्त और चित्रलेखा अपना सांसारिक जीवन समाज में स्पष्ट छवि के तौर पर जीते हैं। लेकिन कुमारगुप्त आध्यात्मिक संत की तरह आदर्श जीवन। कुमारगुप्त सभाओं ईश्वर की श्रेष्ठता और चारित्रिक निष्ठा की गाथा गाते हुए संसार को भटकाव की वजह मानते तिरिष्कृत करते। लेकिन जब उनकी इसी श्रेष्ठता से अभिभूत होकर चित्रलेखा उनके आश्रम में दीक्षा के लेने जातीं तो... बाबा कुमारगुप्त उन्हें हवस का शिकार बनाने के लिए उन पर टूट पड़ते। उनका संतत्व विलीन हो जाता। यह प्रसंग इसलिए कि देश आज भी कमोबेश ऐसे बाबाओं की यही दुर्दशा चहुं ओर दिखाई देती है।
बाबा या संत शब्द ऐसी उम्र के शख्सियत की तस्वीर सामने लाती है जो न सिर्फ उम्र में बड़ा हो बल्कि उसका ज्ञान, चरित्र और स्वभाव क्रमश: श्रेष्ठ, उज्जवल और विनम्र एवं अनुभव से युक्त हो। कुल मिलाकर एक विश्वसनीय चेहरा जिस पर हर तरह से ऐतबार किया जा सके। भारत में यह पदनाम इन्हीं गुणों के समुच्चय का प्रतीक रहा है। इसीलिए इन्हें समाज में अधिकतम आस्था और श्रद्धा के साथ देखा और स्वीकारा जाता है। लेकिन वक्त के साथ समाज के स्वरूप में आये परिवर्तन ने इन बाबाओं के प्रति कई तरह की भ्रांतियां तोड़ी और जोड़ी। संतों का जीवन  समाज के लिए समर्पित होता है, इसीलिए उनका सर्वोच्च सम्मान समाज में रहा है। लेकिन अब बाबाओं की गतिविधियां समाज कल्याण की कम, व्यवसायिक अधिक होती जा रही हैं। धन और भोग को मोह और पतन की वजह बताने वाले ये कथित संत खुद इसी माया के मोह-भोग में बुरी तरह लिप्त हैं। इनके आलीशान मठ और आडम्बरों की चकाचौंध से प्रभावित जनसमुदाय लौकिक(सांसारिक) लाभ को, अलौकिक कृपा से पाने लिए बाबाओं के चरणों में लोटता दिखता है।
इसी परंपरागत समाज की भावनात्मक आस्था का दोहन धर्म की आड़ में करके सयाने बाबाओं ने इस व्यवसाय को कुटीर उद्योग का रूप दे दिया। क्योंकि महिलाएं तुलनात्मक रूप से अधिक आस्था से इनके चरणों में वंदन करती हैं। इसलिए वे किसी भी पंडाल अथवा मठ में ताली पीटती सहज देखी जा सकती हैं। इसलिए बाबाओं के लिए महिलाएं अधिक ‘साफ्ट टारगेट’ होती हैं। यही वजह है कि वे आये दिन इनके झांसे में फंसती और पछताती हैं। आसाराम का हालिया झांसा भले उजागर हो गया हो पर ऐसे अनेक बाबाओं के प्रकरण होंगे, जिनका सच स्त्री संकोच और जांच के आभाव में दफ्न हो गया होगा। स्त्री के इसी शर्मीले स्वभाव के चलते अनैतिक क्रियाओं को करने की हिम्मत इन बाबाओं में जन्मती है। 
इसलिए बाबा या संतों के प्रति अगाध अंध आस्था ही स्त्री शोषण इनका हथियार बनता है। हैरत तब होती है जब पढ़ी लिखी स्त्रियां भी इनके चंगुल में आ जाती हैं। यह बात समझी जानी चाहिए कि ईश्वर ने हमें मनुष्य के रूप जन्म दिया इससे बड़ा चमत्कार और क्या हो सकता है। क्या कोई बाबा ऐसा चमत्कार कर सकता है? उत्तर है नहीं। लेकिन फिर भी हम अज्ञानता या लालचवश चमत्कारों के फेर में उलझते रहते हैं। घोर सांसारिक बाबा या संतों से ईश्वरीय चमत्कार के साकार हो जाने की अभिलाषा रखते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि मनुष्य और ईश्वर के बीच संवाद में कथित बाबा या संत जैसे दलालों का क्या काम हो सकता है। हां सच्चे सद्गुरू या संत का मार्गदर्शन निश्चित हमारे जीवन की राह प्रशस्थ करता है। लेकिन संत के सामान्य लक्षण- सादगी, सरलता, विनम्रता, आडम्बर से दूर, शुचिता और भेदभाव से परे जैसे गुणों का धारण करने वाले व्यक्ति ही कल्याण की राह दिखा सकता है। मात्र संतों का चोला, बढ़ी हुई दाढ़ी, चंदन लगाने जैसे रंगे सियार के उपाय कर लेने से ये कथित महानुभाव संत नहीं हो सकते। इसीलिए माया और वैभव को देखते ही सियार की तरह अपनी औकात में अवतरित हो हुआ हुआ करने लगते हैं।
 आज सवाल मात्र आसाराम पर कोहराम का नहीं है बल्कि चिंतन इस बात पर होना चाहिए कि हम इन संतों के पीछे किस भय या लिप्सा से अंधे बनकर दौड़ रहे हैं। यों तो हम बात-बात में अपने ज्ञान का दम्भ जताते अघाते नहीं, लेकिन अज्ञात सुख की चाह में हमारा विवेक बाबाओं के फेर में बिलबिला सा जाता है। हम इतना भी विचार नहीं करते कि आत्मा की बड़ी इकाई परमात्मा है और हम उसी का विस्तार हैं। यानी मनुष्य और प्रकृति का विस्तार उसका ही विस्तार है। जैसे समुद्र की एक बूंद में वही सारे तत्व हैं, जो   समूचे समुद्र में। बस फर्क है तो दोनों की लघुता और महत्ता का। इसलिए समय है कि जब हम अपनी इस समझ से संवाद करें। कि हम भी उन सभी क्षमताओं से युक्त हैं, न कि उनसे जो ऐसे नाटकीय बाबाओं के छद्म अवरण में छुपी है। 
हास्यास्पद है कि अपने सामान्य व्यवहार में हम हर बात का तर्कपूर्ण उत्तर देते और चाहते हैं मगर बाबाओं की शरणागति में हमारा तार्किक ज्ञान कुंद हो जाता है। वर्तमान क्षण ही जीवन है जो बीत गया वह मात्र इतिहास और जो आने वाला है उस पर हमारा कोई निश्चित हक नहीं। इसलिए वर्तमान को जिएं। अंग्रेजी में वर्तमान को ‘प्रेजेन्ट’ कहते हैं और ‘प्रेजेन्ट’ का एक अर्थ उपहार भी है। अत: वर्तमान से बड़ा जीवन का कोई दूसरा उपहार नहीं। इसलिए भविष्य के काल्पनिक सुखों के लिए वर्तमान को नष्ट न कर दें। ...और फिर जिस देश में स्त्री को देवीस्वरूपा माना गया है, देवता भी इनकी स्तुति करते हों, वहां देवियों को कम से कम फर्जी बाबाओं की संगति से तो परहेज करना ही चाहिए। पहले जो जीवन मिला है उस आस्था रखें, स्वाध्याय करें, खुद पर विश्वास करें..यकीन मानिये आप उनसे खुद को सुखी और संतुष्ट पाएंगे जो मायावी बाबाओं के जबड़े में जकड़े हैं।



Saturday, 31 August 2013

बहुत रस है "मिडिल क्लास"

बड्डे ने अर्ली मॉर्निग चुटकी ली कि अपने मौन मनमोहन जी, अब अपना मुख गाहे बगाहे खुद भी खोलने लगे हैं।मगर बड़े भाई उन्होंने मुखड़ा भी तब खोला जब पानी सर पर आ गया और देश पानी-पानी (बारिश से और साख से भी) हो रहा है। तिस पर घोषणा कि हमारे भरोसे न रहो देश कठिन आर्थिक स्थितियों में घिरा हुआ है। ई ससुरी इस सरकार ने दस बरस में देश को ऐसे हालातों में लाकर धर दिया कि आवाम की लानत मलानत हो रही है। लोग जी जी कर मर रहे हैं और मर मर कर जी रहे हैं। हालांकि अब पीएम की कुर्सी ही 'डेंजरजोन' में है। जब अर्थशात्री पीएम ही खतरा मान ले तो फिर पब्लिक कहां सर पटके, और राहत की उम्मीद बांधे। और फिर अब तो चला चली की बेला है, सो जनता से सच छुपाने का कोई औचित्य नहीं। यह तो 'कनफेशन' का टाईम है, क्योंकि अब चुनाव दूर नहीं। जो करना है सो जल्दी करना है। खाद्य सुरक्षा बिल को लाने की हड़बड़ी इसी का नतीजा है। रुपया चाहे गिरावट का शतक मार ले।मगर रुपइया, दो रुपइया में अन्न देकर सरकार गरीबों का रहनुमा क्यों न बन लें। क्योंकि अंत भला सो सब भला। पॉसिबल है कि 'पेट के बदले वोट' कार्ड चल निकले। राजनीति अपार संभावनाओं का मैदान है इसलिए इस नए खेल में अंतिम क्षणों में गुल खिल जाए तो क्या बुरा है? उधर कुछेक सव्रे के मुताबिक मनमोहन और राहुल की उम्र के लगभग औसत उम्र(80+44=62)वाले मोदी ने बिना प्रधानमंत्री बने जिस तरह से आभासी प्रधानमंत्रीय भूमिका निभाने का जज्बा दिखाया है। उससे गत दस बरस से पीएम की कुर्सी पर नियुक्त मनमोहनजी से, बिना पीएम बने लोकप्रियता की टीआरपी में आगे निकल गए। उधर इनके खजांची चिदम्बरमजी ने रुपए की रोज-रोज की गिरावट पर पहले तो फिल्मी 'स्टाइल' में तसल्ली दी कि 'डोन्ट वरी' सब दुरुस्त हो जाएगा, लेकिन फिर भी रुपया है कि मानता ही नहीं, निरंतर लुढ़क रहा है, सो कुढ़कर कह दिया कि 'रुपया के गिरने से मेरे जेब में रखे पांच सौ का नोट क्या 342 का हो गया?' मुसीबत में ज्ञान बिलबिला जाता है सो मंत्री जी ताव में भूल गए कि जब तेल आयात होगा तो डॉलर में होगा, तब जित्ता 500 रुपईया में तेल आता था अब उत्ता नहीं आयेगा। यानी धरे रहो अपना नोट जेब में मगर गाड़ी की टंकी में तेल तली में रह जाएगा, न कि छलकेगा। अरे बड्डे सरकार जानती है कि इस देश की में मिडल क्लास में बहुत रस है। वह इसी रस को निचोड़ना चाहती है। सो जितनी भी चिल्लपों है वह इसी क्लास में। इसीलिए मनमोहन जी ने 'मिडिल क्लास' के बरक्स कठिन स्थितियों का जिक्र किया है। क्योंकि गरीब का पेट सरकार भरेगी और अमीर खुद सक्षम है।

Tuesday, 20 August 2013

समाज का दायरा

   जीवन के विकास और विनाश का क्रम, चाहे वह साधनों के स्तर पर हो अथवा संरचना के, समय के साथ क्रमिक रूप से अप्रत्याशित तरीकों से होता रहता है। आज हमारा वर्तमान जितने साधनों, सुविधाओं से लबरेज है, वह किसी दौर में अकल्पनीय, असम्भव सा और मानव सोच से परे था। ज्यादा पहले नहीं महज चार सौ बरस पहले यदि अकबर के युग में कोई बादशाह से कहता कि हुजूर आगे ऐसा युग आयेगा जब मोबाइल जैसे बित्ते भर यंत्र से लोग-बाग दूर-दूर तक बात कर सकेंगे अथवा टेलीवीजन व इंटरनेट के माध्यम से सुदूर इलाकों की घटनाओं को  न सिर्फ देख सकेंगे बल्कि सचित्र संवाद भी कर सकेंगे, तो शायद उस शख्स को बेबकूफ या विक्षिप्त मानकर कारागार में डाल दिया जाता। थोड़ा और पहले के इतिहास पर नजर करें तो यूरोप के खगोलविद कोपरनिकस के यह जब घोषित किया कि धरती और समस्त ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हुए अपनी धुरी पर गतिमान हैं। इस बात का बतंगड़ खड़ा हो गया लेकिन बाद वर्षों में इस खगोलीय प्रघटना की पुष्टि जब गैलिलिओ ने की तो उनकी आँख फोड़ दी गयी. लेकिन तब असम्भव सी लगने वाली बात बाद में सत्य साबित हुई। अज्ञानता और वक्त के गर्भ में छिपे रहस्यों पर जब तक ज्ञान का प्रकाश नहीं पड़ता वे अविश्वसनीय होते हैं। एक और वाकया मुझे बचपन का स्मरण हो आता है। करीब 30-32 साल पहले का जब मैं अपने गांव के बड़े से आंगन में दादी के साथ चारपाई पर खुले आसमां तले लेटे-लेटे किस्से कहानियां सुन रहा था। वह  स्वच्छ धवल आकाश वाली काली रात थी। आसमान ऐसे लग रहा था मानो तारों की बारात सजी हो। ऐसे दृश्य शहरी जीवन में बहुमंजिला इमारतों में कहीं नहीं हैं। अलबत्ता कुछ लोग बाजार से खरीदे रेडियम के सितारे अपने बेड रूम की छत में चिपका कर प्रकृति के नजारे को कृत्रिम रूप से देखने और अपने बच्चों को दिखाने की कोशिश जरूर करते हैं। ...हां तो कहानी सुनते वक्त मेरे कान तो दादी की आवाज पर थे, मगर निगाहें उन बेहद चमकीले तारों पर और बादलों में छिपते निकलते चन्द्रमा की चंचलता पर। तभी मैंने और दादी ने एक साथ एक तारा आसमान से टूटते हुए देखा, जो धरती की ओर आते हुए बुझ सा गया। दादी ने कहानी को बीच में रोककर इस प्रघटना पर शोक नुमा आवाज में राम-राम कहकर एक अल्पविराम के बाद कहानी को आगे बढ़ाना शुरू ही किया था। मैंने कौतूहलवश दादी से सवाल किया कि ये क्या था? तो उन्होंने कहा कि बेटा यह तो ईश्वरीय लीला है। किसी तारा का टूटना जीवधारी के धरती से स्वर्गवास होने का संकेत है। तब मेरे मन में दादी की बात किसी सत्य तथ्य की भांति पैठ गई थी और तब तक बैठी रही जब तक भूगोल की पुस्तकों में खगोलीय घटनाओं के बारे में पढ़ समझ नहीं लिया कि यह किसी उल्कापिंड का धरती की ओर गिरने के दौरान उसके वायुमंडल में आते ही जल उठने की चमक है, न कि तारे का टूटना। इस तरह ऐसे अनेक मिथक हमारे जीवन का हिस्सा सदियों तक बने रहे हैं, जब तक उनका उदघाटन नहीं हो गया। 
जब से मनुष्य ने समुदाय में रहना शुरू किया तब से लेकर कोई सौ साल पहले तक उसके जीवन और समाज  का दायरा बहुत अधिक नहीं था। शादी-संबंध आस-पास के गांवों में होते थे और सारा जीवन एक निश्चित दायरे में समाप्त हो जाता था। लेकिन आजादी के बाद के वर्षों में यह सामाजिक वृत्त बढ़ा है, तो इसके नेपथ्य में काफी हद तक इस दौर का तकनीकि विकास है। इस बड़े वृत्त का क्षेत्रफल तो अधिक हुआ मगर इसकी मिठास घटती गई है। फिर शुरू हुआ नए तकनीकि संसाधनों पर आधारित समाज को दौर। आज से तीन दशक पहले सोशल मीडिया के अंतर्गत फेसबुक और टिवटर जैसे अभिव्यक्ति के प्लेटफार्म की किसी ने कल्पना भी न की होगी। लेकिन आज ये जिन्दगी के ऐसे अंग बनते जा रहे हैं कि अब इनके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। अभी तक समाज में हमारे विस्तार का तरीका पास-पड़ोस, रिश्ते-नाते और स्कूल-कॉलेज या दफ्तरों में सहपाठी और सहयोगियों के बीच पनपता और विकसित होता रहा है। ऐसे समाज में हमारी अंतरक्रिया प्रत्यक्ष और वास्तविक होती है। लेकिन विकास के इस क्रम में ज्यों-ज्यों साधनों और सुविधाओं का प्रादुर्भाव हुआ त्यों-त्यों प्रत्यक्ष सामाजीकरण का दायरा भी सिकुड़ता हुआ घर की चहादीवारी से कमरे तक सीमित होता गया। इसकी वजह पहले टेलीवीजन था अब इंटरनेट है।  इंटरनेट के विस्तार ने एक वर्चुअल समाज की अवधारणा हमारे सामने ला दी है। जिसका रास्ता वास्तविक समाज से ऐसे काल्पनिक समाज की ओर जाता है, जो हो के भी नहीं है, मगर विचारों, भावनाओं, चिंतन में नित्य, सतत विद्यमान है। यह ऐसा विस्तार है जिसका आधार एक छाया चित्र और शब्दों के संवाद के सिवा और क्या है? लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता यह कब हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन जाता है अनुभव कर पाना कठिन है, लेकिन एक बार यह आकार ले ले तो फिर इसके बिना रहना भी कठिन है। गर इस व्यवस्था के मनोविज्ञान पर गौर करें तो ऐसा समाज हमारी गैर-जिम्मेवारी की बढ़ती स्वच्छंद प्रवृत्ति का प्रतीक है। आधुनिक दौर में मनुष्य वही चाहता है जो पुराने समय में, क्योंकि उसकी इंद्रिया आज भी उतनी ही हैं जितनी सदा से थीं। बस फर्क है तो जिम्मेदारियों से बचने का गणित। इसकी एक बड़ी वजह है   इंटरनेट पर वर्चुअल दुनिया का तेजी से उदय और विस्तार। लेकिन आज जब हम ज्ञात या परिचित के साथ यदि समायोजित होने में असहज महसूस करने लगे हैं। तब यह मानना पड़ता है कि देह के स्तर पर भले हम परिवर्तित न हुए हों, मगर मानसिक, महत्वाकांक्षाओं या लालच के स्तर पर हममें बड़ी तब्दीली आ चुकी है। छद्म आवरण, बनावटी बातें, दिखावे का प्रदर्शन हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं। इसलिए टिवटर और फेसबुक की जमीन पर कुकरमुत्तों की तरह उदय और अस्त होते रिश्तों का आधार मात्र यह बनता जा रहा कि कौन किसकी कही बात पसंद करता, टिप्पणी करता या ऐसा नहीं करता है। यहां भी एक प्रतियोगिता है कि किसके कितने मित्र हैं जिसका फेसबुकिया स्टेटस इस पैमाने पर उच्च या निम्न श्रेणी में देखा जाता है कि उसके स्टेटस पर कितने लाईक और टिप्पणी आर्इं। ख्याली पुलाव की तरह इन दोस्तों से लोग रू-ब-रू होते हैं। यह बात दीगर है कि रोज रोज के सत्संग से कुछ लोग वाकई अजीज और घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं। यह प्रयोग नया है इसलिए आकर्षक है। मगर यह भूलना बड़ी भूल होगी कि स्वाचालित खिलौने या तकनीकि संसाधन वास्तविक मानवीय संगत का विकल्प हो सकते।

Saturday, 6 July 2013

न गरीब रहेगा, न ही गरीबी

बड्डे खाद्य सुरक्षा की सरकारी पहल से भौंचक्के हो बड़बड़ाये कि- 'बड़े भाई पहले दुत्कार और फिर प्यार। जा तो कछु ऐसई है जैसे 'तनक धमक दई, फिर पुटया लऔ!' सरकारें बड़ी सयानी हैं बड्डे। चुनाव आये नहीं कि उसे कभी गरीबी रास आती है तो कभी यह सताने लगती है। खाद्य सुरक्षा के 'इमोशनल' उपाए (एक-दो रुपइया किलो में अनाज) यानी तकरीबन फोकट में पेट भरने का सिस्टम सरकार को तभी सूझ जब उसके 'एग्जाम' (चुनाव) सर पर आ चुके है। अरे तो क्या हुआ! तुम भी तो पढ़ाई तभी करते थे जब तलक परीक्षा का 'टाईम टेबल' वॉल पर चस्पा न हो जाए। मगर बड्डे तुम हो कि जब देखो सरकारों की करतूतों पर छाती पीटते, उसमें नुक्ताचीनी करते हो। 'यू नेवर अंडरस्टैंड' कि सरकार किसी 'होम्योपैथी मेडिसिन' की 'इस्टाइल'(पहले मर्ज का बढ़ना फिर घटना) में अपने काम-काज को बिना साइड इफेक्ट के निपटाती है। पहले वह मजर्(महंगाई, गरीबी, मौंते, मुसीबतें) को बढ़ाती हैं, फिर जब तुम आहत हुए तो, राहत का मरहम लगाती हैं। इस पर उदास बड्डे ने आह भरते हुए एक शेर दाग दिया कि 'उस ने हमारे जख्म का कुछ यूं किया इलाज, मरहम ही गर लगाया तो कांटे की नोक से' बावजूद इसके राजनैतिक थुक्काफजीती का आलम यह है कि विपक्ष समेत जो दल सरकार के साथ दलदल में धंसे हैं उनकी भी आपत्ति इस बात को लेकर है कि उनसे बगैर पूछे, बिना अहमियत दिए एकतरफा सारी क्रेडिट सरकार कैसे हजम कर सकती है। गरीब केवल सरकार के कैसे हो सकते हैं।'गरीब और उसकी लुगाई तो सबकी भौजाई होती है।'तो कांग्रेस का गरीबों पर 'सिंगल' दावा कैसे मंजूर हो सकता है। लेकिन बड्डे जब सरकार संसद में बहस कराना चाहती थी, विरोधियों को मना रही थी तो ये बर्हिगमन कर कैंटीन में चाय की चुस्कियां ले रहे थे। और अब सरकार 'रैम्बो' टाईप से कानून की बना रही तो चिल्लपों मची है। लेकिन बड्डे अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कहीं गैस सिलेंडरों(9)की शुरुआती सुझव की तर्ज पर कानून में यह सुराग न बना दिया जाए कि जहां कांग्रेसी सरकारें हैं केवल वहां के गरीब इस खाद्य सुरक्षा का सुख ले सकेंगे। अलबत्ता बड्डे सरकार इस अध्यादेश के जरिए एक तीर से दो शिकार करने जा रही है। अभी 26 और रुपए 32 रुपईया कमाने वाले गरीब नहीं थे। अब यही लोग गांव के सामंत कहलाएंगे और उनके अन्नागार एफसीआई के गोदामों से ज्यादा सम्पन्न होंगे। सरकार यह दावा कर लोकल से ग्लोबल तक के मंचों में अपनी पीठ ठोक-ठुकवा सकेगी कि अब इंडिया विपन्न नहीं सम्पन्न कंट्री है। यहां 'न गरीब रहेगा, न ही गरीबी'..समङो बड्डे!

Friday, 21 June 2013

केदारनाथ के दरबार में हाहाकार

बड्डे बाढ़ की विभीषिका से भौंचक्के हो बोले- बड़े भाई केदारनाथ जो सारे संसार के नाथ हैं, लेकिन एक रात में हजारों को अनाथ कर गए। जिते देखो उते भक्तन की कब्रगाह बनी है। समूचा परिसर शमशान में तब्दील हो चुका है। अरे बड्डे! भोले तो ठहरे अघोरी। वे शमशान के राजा हैं। उन्हें ऐसे ही स्थान रास आते हैं।इसलिए वर्षो से आदमियों और वहां के पंडों ने कब्जा कर सराय, होटल बना धंधा शुरू कर, गंदगी का साम्राज्य फैला रखा था। जिससे देव भूमि में मच्छर और वायरसों का प्रकोप पसर रहा था। ऐसे में वे किस सरकार से कहते कि मेरे इलाके का अतिक्रमण हटाओ। सो कैलाश में उन्होंने निगाह टेढ़ी की और इन्द्रदेव को इशारा किया और एक झटके में मामला साफ हो गया। और तो और आदिगुरू शंकराचार्य जिन्होंने आठवीं सदी में मंदिर की नींव रखी थी और जिनकी समाधि मंदिर के ठीक पीछे है उनको भी नहीं बख्शा। अब वहां सफाचट मैदान है। अब है कि आस्तिक बनाम नास्तिक की जुबानी जंग चल पड़ी है।
मिस्टर नास्तिक ने स्टेटमेंट दिया कि- ईश्वर होता तो उसकी पूजा उपासना के लिए दूर-दूर से आये यात्रियों को भोले बाबा बचा न लेते 'दिस वाज द अपॉरच्यिुनटी टू प्रूव दैट ही इज सम व्हेयर'। लेकिन सिर्फ अपना ही ख्याल रखा। खुद तो खम्बा गाड़ के जहां के तहां अड़े हैं। लेकिन जिन्होंने उस खम्बे को पकड़कर शरण लेने की कोशिश की उन्हें भी नहीं बख्शा। तुम कहते हो कि स्वर्ग से गंगा का अवतरण हुआ जिसे पाताल में जाने से रोकने के लिए भोले बाबा ने अपनी जटाओंे में रोक लिया तो फिर यह कैसा गंगा में उबाल आ गया। कि उनके भक्तों को लील गया। सो कहीं ईश्वर नहीं है। सब मन का भ्रम है, पाले रहो, देश सदियों इसी के सहारे रहा।पहले कई टुकड़ों में बंट चुका और दुनिया में सबसे पिछड़ गया। अड़ोसी-पड़ोसी(चीन-पाक) सब आखें तरेर रहे हैं। हम भगवान भरोसे यथास्थिति में पड़े हैं।
तभी मिस्टर आस्तिक बोले- तुम नास्तिक लोग 'आलवेज निगेटिव' सोच रखते हो। प्राकृतिक आपदा सदा से आती रही हैं। वे लोग किस्मत वाले हैं जिन्हें भगवान के स्थान से मुक्ति मिल गई। ठीक केदारनाथ मंदिर के पीछे वाले पहाड़ से स्वर्गारोहणी का रास्ता है। जो भक्त असमय कालकलवित हो गए, वे सांसारिक दृष्टि से भले परिवारजनों के लिए पीड़ा का सबब हैं। अरे बड्डे! यह देह ही नश्वर है, लेकिन देव स्थान में जाए तो किस्मत की बात है। पहले भी तीर्थ जाने वालों को फूल-माला पहना कर विदा किया जाता था कि अगर लौटे नहीं तो समझो भगवान ने स्वर्ग बुला लिया। मैं तो कहता हूं कि यह बहस बकवास है।सब प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा है। इसलिये अब तो चेतो और पीड़ितों के लिए राहत की सोचो!!