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Tuesday, 22 January 2013

वो बेदर्दी से सर काटे हैं और हम.


कल के अखबारों में गृहमंत्री शिंदे और दिग्विजय सिंह के छपे कथित बयानों के बरक्स 'अमीर मिनाई' की गजल, जिसे जगजीत सिंह ने सुर दिया था; शहीदों के लिए रोशन हो आई कि "वो बेदर्दी से सर काटे हैं अमीर और हम कहे हैं कि हुजूर आहिस्ता- आहिस्ता, जनाब आहिस्ता-आहिस्ता"। सैनिकों का सर कलम होने के बाद भी सरकार, पाकिस्तान से शांति-अमन के जाप की शास्त्रीय शैली में पहले "जनाब" की धमकी, फिर "हुजूर" की मुद्रा अख्तियार किए हैं। आईएसआई द्वारा सी€धे तौर पर चलाए गए खूनी आतंकवादी हमलेआज भी जारी हैं। हमने तो संसद पर हमले और मुम्बई पर 26/11 के हमले के बावजूद न तो पाकिस्तान से राजनयिक संबंध न छोड़े और न ही उसको सबक सिखाने की भाषा बोली। शांति के पाखंड में हमारी सत्ता इतनी गिरी कि संसद पर हुए हमले के शहीदों के परिवारजनों ने गुस्से में वीरता के अलंकरण लौटा दिए तो भी हम चुप रहे और हमने अमन की राह पर चलने के लिए संसद पर हमले के गुनाहगार देश द्रोहियों को छुड़ाने की मुहिम चलाई और जिसे उच्चतम न्यायालय ने फांसी की सजा दी, उसे भी बचाने का बंदोबस्त करने लगे। इस दौरान कारगिल भी हुआ, बस लेकर हम लाहौर भी गये और कारगिल के कसाई को लाल कालीन बिछाकर आगरा में न्यौता भी। इन सबका नतीजा यह मिला है कि पाकिस्तान हमारे फौजियों के सर काट ले जा रहा है।
ऐसे संवेदनशील हालातों के बावजूद दुनिया में आतंक का खौफ फैलाने वाले ओसामा को "ओसामा जी" और अब देश के सैनिकों के सर काटने की साजिश में शामिल हाफिज सईद को "साहब" का सम्मानीय सम्बोधन, न केवल उन सभी शहीदों का अपमान है, जो राष्ट्र सुरक्षा के लिए प्राणाहुति देते आ रहे हैं, बल्कि हर सच्चे भारतीय के लिए शर्मिदगी की बात है कि कैसे हैं, उनके लोकतंत्र के रहनुमा।
यह भी लज्जा की बात है कि देश के गृहमंत्री ने स्वीकारा है कि "लाइन ऑफ कंट्रोल" पर हाफिज सईद जैसे आंतकी के आने और उकसाने के बाद दो भारतीय सैनिकों की बर्बर हत्या हुई है। लेकिन मंत्री जी को सीमा पार के नहीं, उल्टे देश के किसी दल या संगठन में ही आतंकियों की संभावनाएं दिख रही हैं।
सम्भवत: देश के इतिहास में यह पहला मौका होगा जबकि किसी आतंकी ने देश के गृहमंत्री के सुर में सुर मिलाया हो और हिमाकत की हो कि भारत को आतंकी राष्ट्र घोषित किया जाए। कम से कम राष्ट्रीय मुद्दे पर तो राजनीतिक एकता दिखनी चाहिए थी। पर यह दुर्भाग्यपूर्ण है। दरअसल, ध्यान भटकाने वाले कथित बयान एक सोची समङी सियासत का हिस्सा है। मिशन लोकसभा 2014 के आम चुनाव के निमित्त जयपुर की चिंतन बैठक में क्या-क्या चिंतन हुए इसका खुलासा एक-एक करके सामने आने लगा है। चिंतन का समापन पहले से तय मानी जा रही राहुल की ताजपोशी के साथ हुआ। उनकी टीम के स्तंभकारों को जिन दायित्वों को सौंपा गया है उसका आगाज ताबड़तोड़ पहले गृहमंत्री शिंदे ने और फिर आंतकियों को सम्मान से देखने वाले दिग्विजय सिंह ने कर दिया है। सोनिया गांधी ने राहुल से रोते हुआ कहा था कि सियासत जहर के समान है। मगर अब जान पड़ता है कि यही जहर वह अपने सिपहसालारों से उगलवाने जा रही हैं।
दरअसल, राजनीति का चाल, चरित्र व चेहरा कितना विकृत और विचित्र हो चुका है इसका अनुभव उन्हें जरूर होगा, जिन्होंने कांग्रेस पार्टी को सर्वहारावर्ग की राजनीति करते देखा सुना था। मगर मात्र दो दशकों में यह नौबत क्यों आ गई, इस पर चिंतन के बजाय वह सत्ता पर लगाम रखने के कठोर व निरंकुश उपायों के अमल पर उतारू है। हो न हो, इसी चलते उसकी यह दशा हुई है कि वह अपने ही घर माने जाने वाले उत्तरप्रदेश, बिहार जैसे दो बड़े राज्यों से बेदखल हो चुकी है। जयपुर चिंतन के बाद यह बात सुनिश्चित जान पड़ती है कि कांग्रेस वोट कबाड़ने की कवायद में किसी हद तक जाने को तैयार है। मुसलमान वोटों पर काला जादू चलाने जिम्मा निश्चित तौर पर दिग्गी को सौंपा गया है। दिग्विजय उप्र के प्रभारी रहे हैं और उन्हें पता है कि वहां 4 करोड़ से अधिक निर्णायक मुसलिम मतदाता हैं, जिन पर मुलायम का कब्जा है। सामान्य पूर्वाग्रह है कि मुसलमान भाजपा को वोट नहीं करते, जिसको पुख्ता करने के लिए दिग्विजय और गृहमंत्री के बयान पर्याप्त हैं। दरअसल कांग्रेस, सपा के वोट में सेंध लगाने के लिए शुरू से मुसलिम आरक्षण जैसे कथित मुद्दों पर जोरआजमाईश करती रही है। और अब वह हिन्दू आतंकवाद का शिगूफा छोड़कर, एक तीर से महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे कई निशाने साधने जा रही है। क्योंकि उनके मंत्री बेनीप्रसाद पहले ही कह चुके हैं कि जनता पिछली खामियों को भूल जाती है और यही बात चिंतन बैठक में कही गई कि जो हुआ सो हुआ अब हमें आगे की ओर देखना है।

Saturday, 5 January 2013

बड़े नहीं, बड़े वाले लोकतंत्र हैं हम



बड्डे ने कड़कती सर्दी में करारा सवाल दागा कि हम सबसे बड़े लोकतंत्र हैं या बड़े वाले लोकतंत्र? हमने कहा दोनों हैं। वे बोले कैसे? बड़े तो वोटरों की संख्या से है और बड़े वाले अपने लिबरल होने के तरीके से। वो भी इस कदर हैं कि इस मुद्दे पर रामायण और महाभारत से भी बड़े ग्रन्थ लिखे जा सकें, फिर भी हमारी लिबर्टी की गाथाएं कलमबद्ध होना सम्भव नहीं। अपने देश की डेमोक्रेसी ही ऐसी है कि चाहे जो- कानून, नेता या जनता की ऐसी-तैसी करता रहे, पर हम शांति और सहनशीलता की दुहाई में सीना फुलाए नहीं अघाते। कुछ रोज पहले कसाब को बड़ी मश्क्कत व जिल्लत ङोलने और करोड़ों की कबाब, बिरयानी की जिबाने के बाद उसे लटका पाए, वो भी चोरी छिपे। 'क्लियर कट' देश के दुश्मन को टांगने में इतनी लिबरर्टी इंडिया में ही सम्भव है।
इसीलिए अफजल अभी तक एक दशक से 'लिबर्टी' को 'इंज्वाय' रहा है। वो तो देश की नासपिटी जनता है जो बीच-बीच में आवाज उठा देती है कि, टांगों इन कमबख्तों को, वरना अब तक वह आरोपों से भी रिहा हो गया होता। आखिर दुनिया के सबसे हम बड़े वाले लिबरल लोकतंत्र जो हैं।
आतंकवाद का लोकतांत्रिक चेहरा है 'अलगाववाद' और उसके नेता गिलानी देश के दिल, दिल्ली में आकर, अलग राष्ट्र, अलग करेंसी की डिमांड करके व चैलेंज देकर चला जाता है। सरकार, लोकतंत्र (वोटतंत्र) के नाम पर सब सुन लेती है। सहनशीलता और आजादी की बेमिशाल नजीर है यह देश। और अब तो हिट हो गई बड्डे क्योंकि,आंध्र के एक विधायक अकबरुद्दीन ओबैसी जिसने खुल्लम खुल्ला ताल ठोंकी है कि भारत सरकार में दम है तो पंद्रह मिनट के लिए पुलिस हटा ले तो हम 25 करोड़, 100 करोड़ भारतीयों का क्या हाल करते हैं। ऐसे कथित एमएलए हमारी व्यवस्थापिका के अंग हैं जो कालिदास के आचरण की भांति व्यवस्था में बैठे व्यवस्था को चैलेंज कर रहे हैं। इनके लिए हमारी सरकारें लिबर्टी के नाम पर शुतुरमुर्ग टाइप आंखें मूदें खामोश है! आखिर क्यों? दामिनी की चिता तो तुरत-फुरत जला दी, वो भी माता-पिता की मर्जी के खिलाफ, लेकिन इनके गलीज बयानों का भी असर नहीं होता सरकारों पर!
लिबर्टी की हद तो यह है कि भारत में मुम्बई के नाला सोपारा में लक्ष्मीनगर का नाम बदलकर 'छोटा पाकिस्तान' और 'लादेन नगर' जैसी बस्तियां भी अस्तित्व में हैं। हाईट तो यह है कि इन इलाकों के बिजली बिल भी इसी नाम आते हैं। देश व सरकार की नाक खुले आम कट रही और वह बेखबर है, लिबरल है। बड्डे यह सब इसलिए पॉसिबल है कि हम दुनिया के सबसे 'बड़े' नहीं, बल्कि 'बड़े वाले लिबरल लोकतंत्र' है।

Monday, 31 December 2012

मैं समय हूं, गतिमान हूं सदा



सा ल 2012 की शुरुआत जिस जोश-ओ-खरोश से हुई थी, उसका अंत उतना ही गमजदा और निराशाजनक रहा।
मनमोहन सिंह ने कहा था कि यह वर्ष 2012, लोकपाल के नाम होगा, रोजगार के अवसरों में वृद्धि और काले धन पर अंकुश व महंगाई पर नियंत्रण का होगा। लेकिन 2013 के मुहाने पर खड़े होकर देखें तो ऐसी खबरें या बातें कम ही नजर आती हैं जिसे हम, समाज या देश के स्तर पर इजाफे के तौर पर सहेज सकें या उन पर फख्र कर सकें।
कई तरह के विकास के दावों और वादों के बीच भ्रष्टाचार, महंगाई, धांधली की परम्परागत अंधेरगर्दी के बावजूद, दिसम्बर का आखिरी पखवाड़ा दामिनी के दंश से देश को झकझोर गया।
साल की शुरुआत में माया कलेंडर का डर भी दुनिया के विभिन्न हिस्सों में दिखा कि 21-12-12 को मानव का धरती से अंत हो जाएगा। इस अफवाह ने आम चर्चाओं व खबरों में सुर्खियां बटोरीं। मगर सकारात्मक सोच रखने वालों का मत था कि ऐसी बातें आधारहीन हैं और गलत साबित भी हुईं। समय चक्र है जो अपने नियम से सदा गतिमान रहता है और रहेगा। आपको याद होगी महाभारत धारावाहिक में हरीश भिमानी की आवाज-'मैं समय हूं..'समय' किसी का इंतजार नहीं करता..इतिहास के पन्नों पर अपनी छाप छोड़कर आगे बढ़ जाता है। 'समय' इतिहास के पन्नों पर ऐसे अध्याय लिख जाता है कि वे समाज में सदियों तक दोहरये जाते हैं। बालात्कार और स्त्री शीलहरण की न जाने कितनी घटनाएं मानव इतिहास में घटी होंगी और घट रही हैं, मगर हस्तिनापुर में दुस्साशन द्वारा द्रोपदी के चीरहरण की नजीर आज भी दी जाती है और अब दामिनी की घटना समाज पर ऐसा दाग है जो सदियों तक करुण याद के रूप में दर्ज रहेगी।
तारीख (31 दिसम्बर 2012) की गणना के हिसाब से, ऐसा ही दिन है आज, जो अच्छी-बुरी स्मृतियों को पीछे छोड़कर आगे की तारीख (1 जनवरी 2013) को उम्मीदों से देख रहा है। सच कहा जाए तो देखना भी चाहिए। हां मगर यह भी कि जो समाज अपने इतिहास से सबक नहीं लेता, उसकी उम्र ज्यादा नहीं होती।
इसलिए नव वर्ष सिर्फ तारीखों का बदल जाना नहीं है, यह इससे परे कई तरह की घटनाओं-गणनाओं के परिवर्तन से जुड़ा है। यह महज एक तारीख है जो पिछले वक्त का आंकलन और नए के लिए संकल्प का विकल्प लेकर आती है।
इस तारीख से किसी की बढ़ती उम्र के वर्ष गिने जाते हैं, तो किसी की नौकरी के वर्ष, लेकिन हर नया वर्ष गांव, नगर, शहर, देश-दुनिया की सभ्यता और प्राचीनता में हौले से एक वर्ष और दर्ज कर देता है। बहरहाल, इस समूची प्रक्रिया में बधाई, संदेशों का तांता और अधिकतम लोगों को याद कर लेने की चाह में ई-मेल, मोबाइल, फोन, फेसबुक, ट्विटर जैसे साधन अब संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बनकर उभरे हैं।
लेकिन यह कोरी प्रक्रिया है, जो परम्परा की लीक पीटने सिवा कुछ नहीं रह गई। इस तमाम उत्सवी कवायद के बीच, यदि आज के दिन, हम एक पल एकांत में बिता कर सोचें कि हमारा समाज, हमारी सभ्यता, यहां तक की हमारा समूचा विकास, मानव के हितार्थ कितना हुआ और विनाश के लिए कितना? तब सामान्य व्यक्ति भी बड़ी साफगोई से यह स्वीकारेगा कि हमने सुविधा के नाम पर अपने विनाश का सामान खुद-ब- खुद तैयार कर लिया है और जो रही-सही कसर है उसे दिन-ब-दिन पूरा करने पर आमदा हैं। तो जिन पर समाज, राष्ट्र और पूरी दुनिया का दरोमदार है, खासकर जो विशेष समझ और बुद्धि से युक्त हैं, उनकी निगाहें न सिर्फ उस विनाशकारी मंजर की तस्वीर को तजबीज पा रही होंगी बल्कि साफ-साफ देख भी रही होगी। क्योंकि आज हमारा जीवन ही पूरी तरह साधनों की गिरफ्त में है। विकास के इस सफर में हम सुख-साधनों के जितने करीब आये हैं, प्रकृति से उतने ही दूर हुए हैं। हमारा खान-पान जिस कदर प्रदूषण युक्त हुआ है, उससे सर्वथा नई तरह की लाइलाज बीमारियों का प्रादुर्भाव हुआ है। जीवन की गति बढ़ी है पर जिसके लिए जीवन है वही पीछे छूट रहा है। विडम्बना है कि इस गचर-पचर को हम महसूस भी करते हैं, पर कौन कदम उठाए, कैसे अमल करे, इसकी तरकीब नहीं सूझती।
लेकिन 'समय' है कि सब देखता रहा है और देख रहा है- मनुष्य का सामान्य स्वभाव है कि वह अपने लिए हर स्थिति में सुख की कल्पना और चाह करता है।
संसार में एक भी ऐसा प्राणी नहीं होगा जो अकारण सुख से वंचित रहने की सोचे भी। इसी फेर में साधनों का ध्रुवीकरण इतना बेतरतीव हुआ है कि भारत सहित दुनिया इसी मुद्दे पर दो स्पष्ट पाटों में बंट चुकी है। इस असमानता का अंतर कम कर पाए तो आगामी वर्ष जरूर शुभ हो सकता है। वरना, साल और भी आएंगे- जाएंगे मगर इतिहास के पन्ने पड़े निशान हमें झकझोरते रहेंगे। फिर भी उर्मिलेश दो पंक्तियों के सहारे आगे बढ़ते रहें कि - बेवजह दिल पे कोई बोझ न भारी रखिए, 
  जिंदगी जंग है इस जंग को जारी रखिए।

Friday, 21 December 2012

राजनीती के रीटेल मे मोदी ब्रांड

पिछले कुछ दिनों से अर्थव्यवस्था में एफडीआई में रीटेल की सुर्खियां अभी खुर्द-बुर्द भी नहीं हुईं थी कि राजनीति के रीटेल में मोदी ब्रांड चल निकला। खिसियाये लोग खंभा नोच कर स्टेटमेंट देते चैनलों के पर्दो पर भटक रहे हैं कि मोदी पिछले चुनाव के मुकाबले दो सीटें कम हासिल कर पाए और वे दो सीटें ज्यादा। रिजल्ट भले सत्ता को रीटेन करने का रहा हो, लेकिन विरोधी खम ठोंक सकते हैं कि दो सीटों का ही सही पर मोदी का बाल बांका तो कर दिया ना। यह कहते हैं कि खुश होने की वजह विरोधी नेता ढ़ूंढ निकालते हैं चाहे इसके लिए कितना भी ठीठ बनना पड़े तो क्या है। अब आलम है कि चाहे उनके विरोधी हों या उनके ही दल में रंजिश रखने वाले नेता, मोदी से जलें-भुने या कोसें-कुढ़ें पर मोदी सबकी छाती पर मूंग दलते हुए आज की राजनीति की 'व्यक्ति पूजा' की नई टेक्नोलॉजी के नए सूरमा बनकर उभरे हैं। और सट्टेबाजों की गणित सात हाथ नीचे गड़ गई।
बड्डे. पुराने जमाने के ज्योति बाबू को छोड़ दें तो मोदी ऐसे अकेले मुख्यमंत्री हैं जो अपने दम पर सत्ता की हैट्रिक लगाने में कामयाब रहे हैं। हो न हो, भारतीय राजनीति के छितिज पर सभी दलों के लिए मोदी का मुद्दा अनुसंधान का विषय बना होगा कि उन्होंने 'इंपासिबिल' को 'पॉसिबिल' कैसे बना दिया गया।
यहां तक कि भाजपा की केंद्रीय इकाई में वर्षो से तंबू गाड़े शीर्ष नेता मौका ताककर पीएम बन् का ख्वाब, उम्र दराज होने से पहले संजो हैं और ऐसा लाजिमी भी है और भय भ् क्योंकि पूरी जिंदगी खपाकर भाजपा को खड़ा करने वाले आडवाणी की आंख् का पानी, पीएम बनने की प्रतीक्षा में सू गया, 'पर' कट कर गिर गए और अंत उन्होंने दुखी मन से अपने अरमानों को आंसुओं में बह जाने देना ही मुनासिब समझ। लेकि संघ और भाजपा की छवि से परे मोदी राजनीति रीटेल में ऐसा ब्रांड बनकर उभरे हैं कि केंद्र की राजनीति में लिपे-पुते नेता सन्निपात के आघात को ङोल रहे हैं। क्योंकि बिना किसी की छत्र छाया और खाद पानी के मोदी की अमरबेल गुजरात को लप् लेने के बाद दिल्ली की ओर देख रही है। बड्डे बोले- 'बड़े भाई सो तो है।' इन फैक्ट मोदी की माया अब गुजरात से निक कर समूचे देश को मोह रही है तो उसकी वजह भी इसलिए 'नरेंद्र दामोदर दास मोदी' अब "नेशनल दमदार मोदी" की छवि के रूप में राजनीति की खरपतवार को सफा चट करके स्वयंभू बनने कगार पर हैं। सफल् से अहम और अहम से पतन की बड़ी वैज्ञानिक गणित है। इसलिए बड्डे बोले - बड़े भाई डेमोक्रेसी में अच्छे-अच्छों की ऐसी-तैसी होती भी खूब देखी गई है। वी सिंह की नजीर क्या कम है समझने-बूझने के लिए।

Thursday, 13 December 2012

विकास का बाईप्रोडक्ट ' बेईमानी'

बड्डे ने सबेरे-सबेरे अपना सुर अलापा कि बड़े भाई देश अराजक होने कगार पर है। हमने पूछा- देश या जनता या फिर नेता। बोले कोई भी हो बात 'सेम' है। नेता पक्ष का हो या विपक्ष का अथवा उभय पक्ष का, तीनों की पैदाइश देश में 'म्यूचुअल' है। यानी तीनों जनता से जन्मते हैं और जनता में विलीन हो जाते हैं। लेकिन जब तक नेता अपने सफेद चोले में रहता है, तब तक वह अपने जन्मदाता से विशिष्ट बना रहता हैं। क्योंकि जिसके पास सत्ता का पत्ता है वह किसी की सुनता नहीं और जो इससे मरहूम है वह किसी को सुनने देना नहीं चाहता।
अलबत्ता, चिंता की बात यह नहीं कि कौन किसको गाजर-मूली समझ रहा, क्योंकि इस नूराकुश्ती का कल्चर देश की राजनीति में ओल्ड है।
फिर भी जो दिखता है वही बिकता है। यानी माहौल में बमचक है। बेईमानी की तू-तू, मैं-मैं की मचमच के बीच अब सवाल लूट का नहीं बल्कि तुलना का है।
जब विकास की तुलना दो भिन्न सरकारों के बीच करके, उनके अलम्बरदारों मूंछ ऐंठ और सीना ठोंक सकते हैं, तो इस दौरान लूटी गई राशि और स्विस खातों में जमा रकम की तुलनात्मक विवेचना किये बिना भी यह तय करना सम्भव नहीं कि कौन छोटा और कौन बड़ा बेईमान था। कई बार यह दबी जुबां से कानाफूसी में माना और स्वीकारा गया कि विकास और बेईमानी अनुपातिक हैं, पूरक हैं।
इसलिए विकास को देखकर बेईमानी या भ्रष्टाचार का 'पर्सन्टेज' निकालना बेहद आसान है। देश के नेताओं की नई पौध को इसका विश्लेषण पढ़ाने और समझने के लिए, आजादी से लेकर अब तक के आंकड़े पाठ्यक्रमों में शामिल किए जाने चाहिए, ताकि हमारी पीढ़ी अपने करियर का चुनाव करते समय कोई चूक न कर बैठे कि बेहतर कैरियर का मार्ग कौन सा था?सेवा चाहे सरकारी हो या जनता की, दोनों में 'लाभ का तत्व' 'इक्वल' है।
इस 'तत्व' का बोध नेताओं की जमात ने बेहतर समझ और अपने वारिसों को समय आने पर सौंपा है।
दरअसल, इस करियर में आजीवन यूनीफार्म एक सी यानी 'फक्क सफेद' जिसमें काला धन छिपाना 'कम्फरटेबल' होता है। मुद्दे भी रटे रटाये जो सालों से जनता को 'फूल' बना रहे हैं। ऑल पार्टी के लीडर वर्षो से, बेशर्मी से, किसान, गरीब, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के तवे में अपना पराठा सेंकते रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, गरीबी के चिरंजीवी मुद्दे थे और बने रहेंगे। क्योंकि इन्हीं में विकास और बेईमानी का राज 'इनक्लूड' है। करना बस इतना है कि विकास की लीपापोती दिखे और बेईमानी 'लीक' न हो, वो भी चुनाव के ऐन वक्त पर। क्योंकि पहले के विकास और घपले-घोटालों को जनता भूल जाती है।


Friday, 7 December 2012

उसी से ठंडा उसी से गरम

जनतंत्र में "तंत्र" "जन" को कैसे बुद्धू बनाता है, इसका इग्जाम्पल संसद में एफडीआई की बहस के बहाने देश और दुनिया ने खुले आम देखा सुना। सपा और बसपा के दोहरे आचरण की सबने खबर ली। क्योंकि हमारे यहां "बहती गंगा में हाथ धोने" की प्रवृत्ति एक संस्कार के रूप में प्रतिष्ठित है। बावजूद इसके सपा, बसपा के चरित्र चिंतन को कोसने वाले लोग "फुलिश" हैं। क्योंकि इन दलों का बर्थ ही विशेष वर्ग को लेकर, विशेष तरह की राजनीति के लिए हुआ है और इसीलिए सत्ता का पत्ता उनके हाथ में ऑलवेज बना रहता है। अवसरवाद एक बड़ा राजनैतिक गुण है।
जिसकी भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक पहचान अब जाकर दर्ज हो रही है। पर बड्डे तुम हो कि इसे दुर्गुण मानते हो और चाहते हो कि नेता अपने धवल वस्त्रों की तरह अपनी करतूतों में भी दिखें। दरअसल, देश पिछले 60 वर्षो से इसी मुगालते में रहा है कि हमें छोड़कर सभी लोग बेहद ईमानदार, स्वच्छ छवि के हों। बस यही चूक चिल्लपों की वजह बनती रही है।
बड्डे बड़बड़ाये बोले- आप भी पत्रकार होकर बेहूदा बात करते हो, कांग्रेस का समर्थन करने और न- नुकुर करने में विशेष वर्ग की बात कहां से आ गई। यह तो देश में एफडीआई को लेकर विरोध और समर्थन से उत्पन्न चिकचिक और किचकिच का मसला है। और फिर ये नेचुरल है कि जब दो या अधिक दल एक साथ रहेंगे तो दलदल होगा ही। यानी "तुम्ही से मोहब्बत तुम्ही से बेवफाई" जैसे हालात लाजिमी है। उधर सर्वविदित है कि सपा और बसपा दो धुरंधर पैदाईशी प्रतिद्वन्दी हैं। पर लोभ वश छत्तीस का आंकड़ा रखने के बावजूद दोनों कांग्रेस को साईकिल और हाथी पर बैठाने के लिए 24 घंटे तत्पर हैं। दोनों एक साथ सरकार का साथ नहीं छोड़ सकते, इसका इल्म सरकार को बाकायदा है और उसका यही कॉनफिडेंस एफडीआई को लाने के पीछे है। बड्डे बोले- बड़े भाई पर संसदीय भाषण में सरकार को गाली और वोटिंग में पप्पी। ये सब किसलिए। जब मुलायम सख्त होते हैं तो माया पिघल जाती हैं और जब माया सख्त तो फिर उनका नाम ही मुलायम है। बड्डे मैसेज बड़ा क्लियर है, जिसके दस पंद्रह सांसद होंगे वे ही सरकार की कार ड्राईव करेंगे। केजरीवाल ने इस सीक्रेट को समय रहते
समझ बूझ के अन्ना से पल्ला झड़ लिया। क्योंकि "कुर्सी की गर्मी" ये अंदर की बात है बड्डे। अरविंद ने अपने सरकारी पद का बलिदान जनता के लिए दिया था, तो अब जनता की रिस्पॉसिबिलिटी है कि वह उन्हें सरकारी पद के बदले, सरकार में पदासीन करे। केंद्र की सरकार, सपा और बसपा कार में "एसी" सिस्टम की तरह हैं। जब ठंडा हो तो ब्लोअर चलाओ और गरम हो तो कूलिंग यानी "उसी से ठंडा उसी से गरम"

Thursday, 29 November 2012

हमीं ने दर्द दिया है हमीं दवा देंगे



बड्डे बोले- जैसई-जैसई चुनाव का चुनचुना नेताओं खासकर यूपीए को काटने लगा है, उसकी घोषणाएं चुनावी राजनीतिक धर्म के माफिक होती जा रही हैं। हमने कहा बड्डे तुम बोका हो !
क्यों न हों जब मौका भी है, दस्तूर भी और जरूरत भी है, तो इसे कैश क्यों न किया जाय। जब निकटतम प्रतिद्वन्दी भाजपा गृह कलह के भंवर में डूब उतरा रही हो, तब इसका बेनीफिट क्यों न उठाया जाए। मौके की नब्ज और नजाकत को रीड करने में कांग्रेस से कुशल कारीगर और कौन हो सकता है। तभी तो भीषण टाइप के घपलों के बाद भी वह सत्ता में वर्षो से जमी रही है। इसीलिए उसका कॉनफिडेंस भी है कि वह पुन: वापसी कर लेगी। क्योंकि वह कोई भी काम गैर-योजनागत नहीं करती। सब कुछ योजनबद्ध है, फिट है और टिच्च है। चुनाव तैनाती की कड़ी में टीम को टाईट कर दिया गया है। पहला मरहम जनता के किचन में यह कहकर लगाया जा सकता है कि "हमीं ने दर्द दिया है हमीं दवा देंगे"। गैस सिलेंडर की सब्सिडी का गेम अब खुलकर आने लगा है। मींटिगों, प्रस्तावों के जरिए पसीना बहा- बहा के यह जताने कि कोशिशें तेज हो चुकीं हैं कि सरकार को इसके लिए 18 हजार करोड़ का बोझ ङोलना होगा, तो वह ङोलेगी। तेल कंपनियों के ठेकेदारों को समझ-बुझ के राइट कर दिया गया है कि चुनाव होने तक घाटे की बड़बड़ नहीं, क्योंकि अब जनता चुनाव तक "बोझ" नहीं जरूरी ऑक्सीजन है, जान है, जाने जहान है।
एक खुशी सारे गमों का गलत कर देती है।
इसलिए अब एक-एक करके खुशियों कई लच्छे फेंके जा रहे हैं। मसलन मनरेगा से मनमानी हटेगी, आम आदमी का पैसा उनकी जेब में सीधे डाला जाएगा ताकि वह तरंग में रहे और अपना वोट भी कैश की तरह सीधे यूपीए के नाम डाल दे। गेम सीधा है। यानी "राहत" है ऑल क्लियर बाकी सब बकवास। आम आदमी और सरकार कमिंग डेज में खुलेआम इस लेन-देन में इनवाल्व होती दिखेगी।
उधर केजरीवाल की" आम आदमी की पार्टी" कांग्रेस के लिए मल्टीविटामिन की गोली साबित हो रही है। क्योंकि कुछ अक्खड़ टाइप के लोग जो "राहत" के जाल में नहीं फंसते वे अपनी लोकतंत्रीय ताकत "वोट"को अलग-अलग दलों में ठप्पा लगाने के तुर्रा  में ठिकाने लग जाएंगे। यानी उसके खिलाफ गुस्सा फुस्स होकर बिखर कर जाएगा। इसलिए यूपीए जनता के समस्त संतापों को हर कर यह अहसास कराने में जुट चुकी है कि गर इस देश में कोई माई-बाप था, है और रहेगा, तो वह कांग्रेस और उसके कारिंदे हैं। "अंत भला तो सब भला" जैसी कहावतें गर बनी हैं तो ऐसे मौकों की तलाश में गढ़ी गई होगी। तो बड्डे कांग्रेस को वोट देने के कैश फायदे ही कई दर्दो की दवा है।
 श्रीश पांडेय

Friday, 23 November 2012

फांसी के फंदे अभी और हैं.


चार साल तक कसाब के रख रखाव में करोड़ों फूंकने और कसाब का हिसाब लेने के बाद बड्डे बोले- देखो बड़े भाई मरे मराये को मार के देश के कर्णधार कुर्ता मोड़-मोड़ के ऐसे अकड़ रहे हैं जैसे की आतंक सहित पाकिस्तान को ही पटखनी दे दी हो। यह मैटर दीगर है कि अजमल का "मल" साफ हो गया मगर, एक दशक से अफजल का "जल" अभी भी छलक रहा है। जब क्लियरकट अपराधी को इतने वर्षो तक देश महफूज रखा जा सकता है, तब जिन पर संदेह है उनका तो बाल बांका भी देश का कानून नहीं कर सकता। एक आतंकी को सजा देने में सरकार इतनी क्यों सहमी है? इसके पीछे अफवाहों और आरोपों का बाजार सुर्ख है। लेकिन हमारी सरकार से उदार इस धरती दूसरी हरगिज नहीं हो सकती। मानव को कीड़े मकोड़ों की तरह मसलने वालों के प्रति हमारी मानवीयता अखिल ब्रम्हांड में अद्वितीय है।
अमेरिकी मुखिया ओबामा ने कहा था कि हमें गर्व है कि हम इस धरती के सर्वश्रेष्ठ देश हैं, क्योंकि वे अपने दुश्मन आतंकी ओसामा को पाकिस्तान में घुसकर निपटा सकते हैं। हमने कहा बड्डे- गर उन्हें गर्व है तो हमें भी फख्र होना चाहिए। आखिर ये देश बुद्ध, महावीर और गांधी का है। जब अहिंसा से बापू ने अंग्रेज भगा दिये तो एक दिन आंतकी भी हमारे शांतिप्रिय व्यवहार से शांत हो जाएंगें। पर कसाब एडं कम्पनी ने जितने मारे उससे कई गुना तो देश में अपने ही अपनों को निपटा रहे हैं।
अब अफजल पर देश जल्दी में है। क्या सरकार, क्या विपक्ष और क्या छुटभइया नेता सब के सब ताल ठोंक रहे हैं कि इसे भी लटकाओ। यों तो सरकार मामले लटकाने में माहिर है। न जाने कितने बिल लटके हुए हैं। कुछ प्रकरण इसलिए पैंडिंग हैं कि उनकी जांचें अखण्ड रामायण की तरह बांची जा रही है। महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सुलग रहे जनमानस को लोकपाल, अविश्वास प्रस्ताव, सरकार में फेरबदल, एफडीआई जैसे मामले ठंडा करने का काम करते रहे हैं।
जब आतंकी देश में घुसकर खुले आम आदमी को भूंज सकते हैं, संसद में सांसदों को निपटा सकते थे।
वो तो भला हो कुछ सैनिकों की शहादत और कुछ ने उन्हें मार दिया उस दिन वरना उस दिन देश अपने नाथों से अनाथ हो जाता। बहरहाल संसद में गतिरोध जारी है देश चल रहा है। आतंकियों की फांसी और एफडीआई में फंसी सरकार की कार है कि पंचर होती नहीं दिखती। ममता के बाद मुलायम और यदि जरूरत हुई तो उनके बाद माया सरकार को फांसी घर से बाहर ले आने के लिए आतुर और कृतज्ञ भाव से नतमस्तक हैं। फिर भी जिस तरह से एफडीआई पर विरोध उभरा है वह सरकार के लिए फांसी का फंदा न साबित हो।

Friday, 16 November 2012

कांग्रेस के कर्णधारों की धार

भाजपा का संकट और उसके खुशी के आलोक में दीवाली मना रहे कांग्रेसियों ने मौका ताक कर 2014 चुनाव की तैयारियों की तैनाती का ताड़पत्र जारी कर दिया है। सूची में राहुल बाबा का मासूम मुखड़ा सामने रख देने से संदेश साफ है कि पार्टी के भीतर कितनी भी गुटबाजी या जूतम पैजार हो, पर राहुल बाबा के सामने सब सावधान की मुद्रा में शटअप हो जाएंगे। क्योंकि राहुल का धवल कुर्ता जो भ्रष्टाचार के छींटों से मुक्त है और उनके चेहरे व चोले की सफेदी कॉमनवेल्थ से लेकर टू-जी, कोयला घोटाला तक सभी की कालिमा को कफन के कपड़े की तरह ढक लेगी। बड्डे बोले- बड़े भाई राहुल बाबा यूपी, बिहार और अन्य राज्यों के चुनावों अपने सरनेम ‘गांधी’ की गहराई नाप चुके हैं। पर फिर भी दिल है कि मानता नहीं। हमने कहा कांग्रेस का खूंटा है ‘गांधी’ नाम का मंत्र। क्योंकि इससे देश की आवाम में भी भ्रम बना रहता है कि जितने भी गांधी हैं सब के सब मोहनदास करमचंद गांधी के विरासतदार हैं और उनका आशीष केवल इसी परिवार के प्राप्त है।

बड्डे बोले जितने भी नाम चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए चुने गए हैं, उसमें अधिकतर वे नाम हैं जिन्होंने वर्षो से बैक डोर से राजनीति में दखल रखा है। अरे बड्डे ये तो पार्टी की परम्परा है कि बस एक बार नाम बना लो फिर जीवन भर देश और दल को दलते रहो। इस सूची में एक नाम तो ऐसा है जिन्हें न तो सड़कें, न बिजली और न ही नौकरियों में भर्ती पसंद हैं। वे मानते हैं कि चुनाव मुद्दों-वुद्दों से नहीं, मैनेजमैंट(प्रबंधन) से जीते जाते हैं।

यह बात दीगर है कि उनके इसी कौशल के चलते उनके ही राज्य में पार्टी की ऐसी वाट लगी आज तक दल सदमें में है। पर अब भी पार्टी में उनके प्रति मोह उनकी मैनेजमैंट कला का नतीजा है। बड्डे बोले- बड़े भाई जेई तो राजनीति है। उनमें प्रबंधन कला न होती तो दो- दो राज्यों में पार्टी को वेंटिलेटर पर लाने के बाद भी हाईकमान की निगाह में हैसियत नहीं घटी।
चुनावी मुहिम में जिन कर्णधारों की धार को आजमाया गया है उनमें कुछ ईमानदार टाईप के मंत्री- नेता नॉमिनेट किए गए हैं, तो कुछ इसलिए कि उनके बिना सूची सूनी रह जाती। दरअसल, केंद्र में कांग्रेसियों मौजूदा कार्यकाल कलंकित होने के बाद भी यदि वे सत्ता में वापसी का दिवा स्वप्न देख रहे हैं, तो इसमें उनकी योग्यता कम, विपक्ष की अयोग्यता ज्यादा है। उधर प्रधानमंत्री पद का मोह भाजपा में कलह की वजह बना है। हो न हो, यही कलह कांग्रेस के लिए ‘रिवाइटल’ की गोली साबित हो रही है कि ‘लूटो जी भर के’ क्योंकि उसके एक मंत्री ने पार्टी को यह मंत्र दिया कि कुछ भी करो जनता सब भूल जाती है।

Monday, 12 November 2012

जलाओ इतने दिए मगर ...

हमारी ऐसी मान्यता और स्वीकार्यता है कि जहां ज्योर्तिमय प्रकाश है वहीं दिव्यता और देवता हैं। इसीलिए भारत को देवभूमि माना जाता है। यहां का समूचा दर्शन मानव कल्याण और उसके विकास से जुड़ा रहा है। सूर्य हमारी संस्कृति का प्रकाशपुंज है, जिसे हम नियमित अर्घ्य देकर पूजते हैं, पूर्णिमा का चन्द्रमा भी तिमिर से लड़ता है, लेकिन अमावस का चांद फिर प्रकाश का ग्रहण कर अंधेरा ला देता है। इस तरह प्रकाश और अंधकार का संघर्ष सनातन है और रहेगा। कार्तिक मास की अमावस अन्य सभी अमावसों में सबसे गहरी और काली होती है, ऐसे में दीपक का प्रकाश इस अंधेरे को चुनौती देता और संघर्ष करता दिखता है। इसीलिए आज के दिन घर आंगन तुलसी के चबूतरे और गावों, नगरों, शहरों, अमीर-गरीब, खेत खलिहान, मकान-दुकान से लेकर समस्त दिशाएं प्रकाश के उजास में तिमिर को चीरती जीवन में कर्मरत होने और संघर्षरत होने की प्रेरणा देती हैं। इसका दर्शन भी यही है कि कितना भी अंधेरा हो मगर मानवीय प्रयास उजाले के रंग भर ही देते हैं। जैसे एक वनवासी राम ने रीछ-बानरों की सेना बनाकर धरती के सर्वाधिक शक्तिशाली रावण को परास्त कर दिया था।
दीपावली या दिवाली अथवा प्रकाशपर्व के अवसर पर दीवारों पर लिखा शुभ-लाभ क्रमश: गणेश-लक्ष्मी के पूजन से जुड़ा है। लक्ष्मी सामाजिक समृद्धि का आधार है जिसकी चाह सभी करते हैं, लेकिन समृद्धि(धन) ही सब कुछ नहीं, इसके इस्तेमाल के लिए विवेक अनिवार्य है। इसीलिए लक्ष्मी के साथ गणेश की पूजा का क्रम निर्धारित किया गया है। क्योंकि बुद्धि के आभाव में धन का दुरुपयोग और नैतिक पतन तय है। इस पूजन का संदेश भी यही है कि हम विवेकवान और समृद्धवान बने। यह उत्सव घर की चहार दिवारी से बाहर एक समाज और एक राष्टÑ के रूप में चहुं ओर मनाया एवं आयोजित किया जाता है। खुशी, उल्लास और आनंद से सरोबार यह दिन यों तो राम के नगर प्रवेश और उनके स्वागत से सम्बद्ध है, पर आधुनिक संदर्भों में इसे इस भाव (अयोद्धा उत्सव) से कम बल्कि साफ सफाई, लक्ष्मी पूजन और वस्तुओं की खरीद फरोख्त के तौर पर मनाया जाने लगा है। मिट्टी के दीपकों का स्थान विद्युत के टिमटिमाती रंगीन रोशनियों ने लिया है, तो गोबर के गणेश और लक्ष्मी पूजा का सुंदर डिजायनर मूर्तियों ने, ऐसे ही गोबर और छुई से लिपे पुते इकोफ्रेंडली आंगन और दीवारों की जगह केमिकल रंगों की चमकदार पेंट्स ने ले ली है। आटे से बने चौक को पत्थरों के पाउडरों से बनी रंगोली ने विस्थपित कर दिया है। पहले उत्सवों की सूचना ऋतुएं देतीं थीं,अब इनकी खबरें अखबारी विज्ञापन देते हैं। समय के साथ स्थितियों में आये परिवर्तन से उत्सवों व आयोजनों का स्वरूप बदल जाना स्वभाविक है, इसी का नतीजा है कि सिर्फ दीपावली ही नहीं अन्य त्योहारों-उत्सवों के साथ ऐसी दशाएं बनती जा रही हैं। लब्बोलुआब यह कि अब वस्तुएं उत्सव का विकल्प बनती जा रही हैं, बाजार में वस्तुओं के क्रय की क्रांति है। इधर उत्सवी मानव हलाकान है, क्योंकि महंगाई आसमान पर है। यह ट्रेंड निराशाजनक है कि दीपावली में बाजारी खरीददारी स्टेटस सिंबल बन गई है, इस उत्सव-त्योहार में वस्तुओं का दखल बढ़ा है और भावों और मूल्यों का घटा है। आइए हम इस प्रकाश के मर्म का आत्मसात करते हुए व्रत लें कि यह उत्सव एक दिन का न रहकर हम सभी के जीवन में सतत बना रहे।
जलाओ इतने दिए मगर ये ख्याल रहे
अंधेरा किसी कोने में रह न जाए।
शुभकामना है कि दीपोत्सव का यह पर्व भारत सहित विश्व के जनसमुदाय को आलोकित करे और ‘तमसो मां ज्योर्तिगमय’ की भावना से जीवन में व्याप्त तमस रूपी अंधकार से प्रकाश की ओर उन्मुख करे।

श्रीश ......

Thursday, 8 November 2012

अपने-अपने ‘आईक्यू’

  गडकरी द्वारा विवेकानंद और दाऊद के ‘आईक्यू ’की तुलना किए जाने पर बड्डे फोन पर ही पूङ बैठे कि बड़े भाई ये ‘आई क्यू, वाईक्यू’ क्या है? यों तो ‘आईक्यू’यानी इंटेलीजेंट कोशियंट (बुद्धिलब्धि) पर हमने सरल भाषा में कुछ  यूं समझया कि ‘दोनों में कौन कितना सयाना है, यही इसके नाप-जोख का पैमाना है’ विवेकानंद ने दुनिया को  आध्यात्म की पहचान दी और उसके मानव कल्याण में इस्तेमाल का पाठ पढाया, इसीलिए उनकी और भारत की यश कीर्ति विश्व भर में फैली। जबकि दाऊद की पहचान अपराध जगत सहित गैर सामाजिक कृत्यों में है और वह भी भारत का उत्पाद है। इस लिहाज से भारत का अपयश और बेज्जती दुनिया भर में चर्चित हुई। दोनों शख्सियतों में तत्व ‘चर्चित’होने का समान है, बस मुकाम जुदा हैं। इस तुलनात्मक विश्लेषण में उलझकर गडकरी कुङ ऐसा उगल गए कि बखेड़ा खड़ा हो गया। बहरहाल विवेकानंद और दाऊद के ‘आईक्यू’ की तुलना से इतना तो साबित हो गया कि गडकरी का ‘आईक्यू’ कमतर है। वर्ना न तो वे ऐसी तुलना करते और न ही अपनी कंपनी ‘पूर्ति’ में ड्राईवर, चपरासियों के नाम बोर्ड आॅफ डायरेक्टर में न रखते। संघ के दुलारे गडकरी अब उन्हीं के आंख की किरकिरी बने हैं। उधर देश के नेताओं के अपने-अपने ‘आईक्यू’हैं। एक नेता का ‘आईक्यू’कहता है कि जनता भ्रष्टाचार व महंगाई को वक्त के साथ भूल जाती है, तो दूसरे का ‘आईक्यू’है कि 71 लाख का घपला भ्रष्टाचार के दायरे में नहीं आती। एक मंत्री  तो भ्रष्टाचार में लिप्त अपनी पत्नी और शाही दामाद की रक्षा में ही उनका ‘आईक्यू’ दिखता है। तो कुङ धर्मनिरपेक्ष छवि  गढ़ने की आड़ में ‘ओसामाजी’ जैसे सम्बोधनों से मानवीयता का ‘आईक्यू’ जताने से गुरेज नहीं करते। अमेरिका में चुनाव में हार के बाद रोमनी ने अपने ‘आईक्यू’ से कहा कि हम सरकार के साथ हैं, लेकिन बड्डे अपने यहां है कि कैसे जोड़-तोड़, खींचतान से कैंडीडेट को यहां मिला लो, वहां से खरीद लो। इसके लिए बाकायदा हर दल में विशेष ‘आईक्यू' से युक्त व्यक्ति तैनात हैं।

बड्डे हमारे यहां तो ‘आईक्यूष्ठ' लगा कर महंगाई तक बढ़ाई-घटाई जाती है। चुनाव हों तो ‘आईक्यू‘लगाओ और दाम को बांधे रखो और जैसे ही चुनाव निपटे अंतरराष्ट्रीय दामों में इजाफे वाला ‘आईक्यू‘लगाओ और ‘दाम‘बढ़ा के ‘दम‘ले लो उसी जनता का, जिसने उन्हें वोट दिया है। खैर क्या बयान देना है और क्या नहीं, इसके लिए निश्चित ‘आईक्यू‘और निश्चित व्यक्ति होता है। पर गडकरी कैसे चूक गए? यह बात उनके वरदहस्त संघ की समझ से परे है। हो न हो अब ‘आईक्यू' प्रकोष्ठ बनेगा जिसमें सार्वजनिक मंचों पर कुछ  कहने से पहले मौके के मुताबिक ‘आईक्यू‘लेना होगा।

- लेखक स्टार समाचार के सबएडीटर हैं।

ब्लॉगबाजी श्रीश पांडेय

Thursday, 1 November 2012

जब जेबों की होगी सीबीआई जांच

बड्डे बड़े भौंचक से केजरीवाल के खुलासों को कई दिनों से अखबार में लाइन-दर-लाइन बांचते कर कह रहे हैं कि बड़े भाई देश में कम से कम एक तो मर्द है जो बिना किसी सत्ता के सत्ताधीशों की पोल खोल.उनकी चूलें हिला रहा है।
और अब तो उसने ऐसी बात कह दी कि मुकेश अंबानी 'कांग्रेस' और 'भाजपा' को जेब में लिए घूमते हैं। हो न हो, दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों का भेजा तो फ्राई हो ही गया होगा। अरे! बड्डे पहले भी धीरूभाई के ऊपर ऐसे संदेह उपजे थे। बेटा बाप से नहीं सीखेगा तो क्या.हमसे-तुमसे ज्ञान लेगा।
तभी तो देश में कभी वर्षो से अमीरी के पर्याय रहे टाटा िबड़ला आज अंबानी समूह से फिसड्डी रह गए।
टाटा-बिड़ला भी सोच में होंगे कि उनसे कैसे चूक हो गई कि वे सरकारों को 'जेब में रखने'. के मंत्र का जप नहीं पाये। बड्डे... इस देश का अदना सा आदमी न जाने क्या-क्या जेब में ले के घूमता है- बम,कट्टा, गांजा- भांग,चरस और.! दरअसल, बात-बात पर यह संवाद कि ' तुमाय जैसे छत्तीस ठो जेब में पड़े रहते हैं'  कहने वाले की ताकत को बयां करते हैं। 'जेब में रखने' का दर्शन भी यही है कि जिसको जेब में रखा जाए उस पर पूरी तरह नियंत्रण हो। प्रशासनिक हलकों में गौर करें तो यह डॉयलाग अक्सर सुनने में आता है कि फलां पटवारी... तहसीलदार, एसडीएम, कलेक्टर को जेब में लेकर घूमता है, तो छुट भईया नेता भी. मंत्री क्या, मुख्यमंत्री तक को खीसे में रखने की कुव्वत रखता और मूंछ ऐठता है। बड्डे बोले बड़े भाई यहां तक तो ठीक है मगर एक आदमी सरकारें जेब में लिए घूमता हो, ये तो हद हो गई। अमेरिका में तो और बड़े वाले आसामी हैं, लेकिन वहां कभी यह राज नहीं खुला कि 'डेमोक्रेट' या 'रिपब्लिकन' की सरकारें किसी बिल गेट्स जैसे की जेब में कैद रही हैं। खैर अभी तो मात्र दो दलों का एक व्यक्ति की जेब में कैद होने का राजफाश हुआ है। सपा, बसपा, माकपा,जदयू जैसे दल भी किसी न किसी के जेब में कैद हो सकते हैं, जिसका राज अब केजरीवाल की जेब में जरूर होगा।
बड्डे बोले सो तो है बड़े भाई. ये अपना केजरीवाल विकीलीक्स की तर्ज पर केजरीलीक्स साबित हो रहा है। बड़ा सयाना है अपना केजरीवा.अल्टी-पल्टी करके कांग्रेस और भाजपा पर निशाना साध रहा है। खासकर जब से अन्ना की जेब से बाहर आये हैं, तब से अपनी जेब से वह सब निकालने को आतुर हैं जो उन्होंने वर्षो की मेहनत से जोड़-जुगाड़ से संचित किया था। हो न हो, अब इतना तो तय है कि केजरीवाल की जेब की सीबीआई जांच के आदेश दिए जाएंगे, ताकि उस स्रोत  का पता लगाया जा सके जहां से केजरी की जेब में सरकार के राज इम्पोर्ट हो रहे हैं। हो सकता कई और खेमका इसके स्रोत  हों।

Thursday, 18 October 2012

भारत के विकिलीक्स हैं केजरीवाल

केजरीवाल इनदिनों ऐसी फुटबाल खेल रहे हैं जिसमें कभी किक कांग्रेस के कारिंदों पर होती है तो कभी भाजपा के। देश के दोनों बड़े राजनैतिक दल सकते में हैं।
राजनैतिक गंदगी की सफाई की लड़ाई में बाबा, अन्ना जैसों के बैकफुट में आने के बाद, फ्रंटफुट में आये केजरीवाल एक-एक को देख लेने की कसम खा चुके हैं। वे चुन-चुन के बड़े दामाद टाइप जो बिना कुछ करे चमत्कारिक सत्ता की दम पर करोड़ों लील गए,दाद देनी होगी दामाद की कि बड़ी साफ गोई से मुकर गये घपले के पचड़े से। एक चमचे टाईप मंत्री जो असहाय विकलांगों के हिस्से की रकम पर कुदृष्टि लगा बैठे और कुछ अध्यक्ष टाईप लोग जो किसानों की जमीनें और सिंचाई के पानी से खुद को तर करने में लिप्त हैं। कहते हैं कि ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता’ पर केजरीवाल अकेले ही ऐसे चेहरों को बेनकाब करने में भिड़े हैं। वैसे यह सही समय है जो उन्होंने चुना है। दीपावली की पुताई में जहां घर-द्वार सफेदी से चमक रहे हैं वहांअकेजरीवाल इस सफेदी के पीछे छिपी कालिख को उजागर करने में जुटे हैं, ताकि देश भी जान समझ ले कैसे रातों रात 7 करोड़ से 54 करोड़ में बनाए जाते हैं। दामाद बनने के फायदे गिनाते हुए बड्डे बोले-बड़े भाई अफसोस है कि मैडम के एकई बिटिया थी, वरना हम भी अपने लड़के का प्रस्ताव प्रस्तावित तो कर ही देते। जब बर्तन का धंधा करने वाले का नम्बर लग सकता था तो अपना लड़का तो विदेश में साफ्टवेयर इंजीनियर है। वह इस रातो-रात मिलने वाली अकूत रकम को बड़े इत्मिनान से मैनेज कर लेता। कहीं चूं-चपड़ तक न होती और फिर कालाधन विदेश में ही महफूज रह सकता है। उधर काला धन का आंकड़ा देते, चीखते-चिल्लपों करते, बाबा, अन्ना जैसों के गले चोक हो चुके हैं। रहा सवाल केजरीवाल का तो उसको अपने चमचे टाईप मंत्री निपटा लेंगे। चमचे टाईप मंत्री फरुखाबाद आने की धमकी देकर खुले आम कह रहे हैं कि ‘रगों दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल, जो आंख से ही न टपका वो लहू क्या है।’ खून की बातें खुले आम संविधान में शांति और व्यवस्था की सपथ खाये मंत्री करने लगे हैं, तो अपराधियों का क्या कहना। लेकिन बड्डे बोले‘अ पना केजरीवाल तो इंडियन टाईप का विकीलीक्स निकला।’ ‘अ’ से असांजे और ‘अ’ से अरविंद यानी केजरीवाल भारत के अरविंद असांजे हैं। ऐसी-ऐसी खबरें निकाल रहा है कि जैसे एक-एक की ऐसी-तैसी करके ही दम लेगा। वहां से भी जहां कभी शक की कोई गुंजाईश न थी। हो न हो, बसपा, सपा, तृणमल, डीएमके, जैसों पर भी जांच की आंच आयेगी। खैर अब तो देखने वाली बात है कि विकीलीक्स का इंडियन संस्करण और क्या-क्या गुल खिलाता है.!!!

Thursday, 11 October 2012

चमचे का नमक, चेहरे की चमक

  बड्डे को हल्के मूड में देख हमें सुकून आया कि चलो आज तो कुछ अच्छी खबर है। हमें देखते ही बोल पड़े- बड़े भाई कल के चारण-भाट आज के चमचों के रूप में रूपांतरित हो गए हैं। पहले ये कविताओं, गीतों या किताबों में तारीफों के कशीदे पढ़करअपने स्वामियों का मन मोहने और इनाम हासिल करने की जुगत में बे-वजह खीस निपोरते पाए जाते थे और आज भी ये अपने-अपने आकाओं की ऐसी ऊर्जा बने हुए हैं, जिसके बिना बॉस का अस्तित्व ही खतरे में लगता है। चमचे सिर्फ राजनीति में ही नहीं, बल्कि हर जगह अपने विभिन्न रूपों में पाए जाते हैं। इनकी वैराइटी खाने के चम्मच(स्पून) की तरह छोटी-बड़ी, चमकीली अथवा कम या अधिक मूल्य (वैल्यू) की होती है। बहरहाल, चमचों की जितनी प्रजातियां भारत में पाई जाती हैं उतनी विश्व के किसी और मुल्क में मिलना मुश्किल है। जैसे खाने का चम्मच हमें सुविधा और सहायता देता है वैसे ही नेताओं, धमर्गुरुओं, अफसरों के चमचे,चेले उनकी खुशामदीद में व हर कही बात को सच साबित करने में सहयोग देते हैं।

चमचों की अखंड धारणा और एक सूत्री कार्यक्रम है कि अपना बॉस गलत न तो बोल, न कह सकता।

समर्पण और शरणागति ही चमचत्व का तत्व है। ईश्वर भी भक्तों से यही चाहता है कि तू मेरा बन, फिर कृपा ही कृपा है। बस यही तो चमचों का दायित्व है कि वे न सिर्फ अपने आका की बात का आंख मूंदकर समर्थन करें, जयकारे लगाएं बल्कि वे उनके प्रतिद्वन्दी पर हमला भी करें और इससे उत्पन्न सारा कसाय कल्मश अपने सीने पर ङोल लें। आंच तक न आने दें अपने भाग्यविधाता पर। चमचों का सौंदर्य ही इसमें है कि वे निरंतर चैतन्य अवस्था में एक्टिव बने रहें। यूपीए के एक मंत्री तो खुलेआम कह रहे हैं कि अपना तो काम ही यही है कि आका के परिवार पर कोई आंच आये तो सारा ताप वे अपने सीने में लेने को तत्पर हैं। यानी मंत्री वे बाद में पहले तो चमचे ही हैं। सारा देश गलती कर सकता है पर उनके आका गलतियों से सवर्था मुक्त हैं। जैसे ईश्वर गलतियों से परे है। तभी तो हम चमचे उन्हें(बॉस) देवता की तरह पूजते हैं। दरअसल चमचे अपने बॉस का नमक है। नमक से ही देह में चमक आती है। नमक का अनुपात बनाए रखना चमचों का अनिवार्य दायित्व है। इसलिए हर बॉस की शकल में मौजूद चमक को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि किसके पास कितने आयोडीनयुक्त नमकदार चमचे हैं। जो समय-समय पर नमक की आपूर्ति संतुलित रूप में करते रहते हैं। एक पूर्व बड़बोले सीएम इस नमक को संतुलित नहीं रख पाए तो दरबार से बाहर कर दिए गए। आखिर बड्डे बोले बड़े भाई चमचा वही जो नमकदार हो।
                                                                                     श्रीश पांडेय

Wednesday, 3 October 2012

औसत में जीत है

  टी-ट्वंटी वर्ल्ड कप क्रिकेट में आलम दर्जे की बल्लेबाजी के गुमान में जी रही टीम धोनी की लगातार तीसरी बार धुल जाने से बड्डे सर पर हाथ रखे कुछ यूं बैठे थे मानो अब देश का कोई भविष्य नहीं रहा, अब भारत कैसे जिएगा, क्योंकि उसका चिर प्रतिद्वन्दी, जिसको वह तीन दिन पहले 8 विकेट से कूट-पीट चुकी है वह अब भी चैंपियन बनने की दौड़ में शामिल है। हार के जीत और जीत के हार के रूल्स अब बड्डे को बिल्कुल रास नहीं आ रहे थे। पर सिवाय बड़बड़ाने के बड्डे और कुछ नहीं कर पाने की बेबसी से बेहाल बीयर की चुस्की के साथ बिस्तर डले गहरी चिंता में मशगूल थे। इतनी फिकर तो गैस, डीजल के महंगे होने, विदेशी कंपनियों की देश में घुसपैठ, और डायनासोर सरीके बडेÞ-बड़े घोटालों पर नहीं की। बड्डे बोले बड़े भाई अपन जीत के भी हार गए और दूसरे हार के भी जीत गए यह बात नहीं पच रही। गब्बर सिंह के अंदाज में बड्डे बोले कि ‘हमने कुल 6 में 5 मैच जीते और टूर्नामेंट से बेदखल, उधर वेस्टेंडीज कुल दो ठईया मैच जीत के अंदर, सरासर नइंसाफी है बड़े भाई।’     
   हमने समझाया अरे बड्डे! सब औसत का खेल है। उसी की जीत है, जिसका औसत ठीक है, वही  चैंपियन बन सकता है। औसत यानी बैलेन्स रहो। टीम धोनी के धुरंधर उत्साह में ज्यादा औसत में कमजोर साबित हुए, जबकि औसत का गणित पहले से इम्पारटेंट माना जा रहा था, चाहे वह खेल हो या चुनाव। गाड़ियों के बिकने में भी एवरेज का रोल है, जिसका ऐवरेज दुरुस्त नहीं समझो मार्केट से बाहर। एमबेस्डर, फिएट, बुलेट, राजदूत सब के सब इसी एवरेज के चलते ठिकाने लग गर्इं। परीक्षाओं में एवरेज मेन्टेन करना होता है, वरना ज्यादा में भी हार हो जाती है। फिर भी भारत के भाग्य विधाता बुद्धि में नहीं भावना में जीते हैं। सरकार कितना भी लूट-खसोट कर ले, महंगाई बढ़ा ले, तिस पर जनता कितना भी सरकार को कोस ले, कुढ़ ले, पर वह इन सबसे बेपरवाह औसत को महत्व देती है। उसे बखूबी पता है कि सब करो पर ऐन टाइम (चुनाव के वक्त) मिथ्या घोषणाएं और कुछ नकदी बांट-बंूट के नाराजगी का औसत मेन्टेन कर वह हार से बच जाएगी। पर अपनी टीम है कि कभी आठ विकेट से हारती तो कभी आठ विकेट से हराती। अब जरूरत है नेट प्रैक्टिस की बजाए औसत का गुरूमंत्र लेने की। इसके लिए टीम इंडिया को 10-रेसकोर्स की शरण में जाना होगा, जहां वह औसत को कैसे मेन्टेन किया जाए, के गुर सीखे।कांग्रेस, यूपीए सरकार को बरकरार रखने के लिए जज्बात नहीं हालात के तकाजे में देखती है। माया, ममता और मुलायम में औसतन जो फिट हो, बस उसी को भाव, बाकी से कन्नी काट लो। क्योंकि औसत में ही जीत है।

Thursday, 27 September 2012

मुखिया ने दी ज्ञान की पुडिया

  बड्डे बड़े सबेरे चौगड्डे पर अखबार लिए एक जनसमूह से मुखातिब हो सरकार के मुखिया द्वारा दी हुई ज्ञान की पुड़िया लोगों को दे रहे थे कि उन्होंने मौन त्यागकर मुंह खोला है कि गैस और डीजल के बढ़े हुए दाम जनता को भले अभी जला रहें हों, पर बाद में यही जले पर मरहम सा सुकून देंगे। फिर सस्ते के लिए हम एफडीआई तो ला ही रहे हैं। विकास के बरक्स देश की इज्जत भी तभी होगी जब विदेशी दुकाने गली-गली में सजेंगी, चमकीले स्टोरों में जनता शॉपिंग करने जाएगी और इस ग्लैमराइज्ड माहौल में उनकी कटती जेबें कभी उफ्फ् तक न कर सकेंगी। मौनीबाबा ने ज्ञान की एक और पुड़िया दी है कि देश की अर्थ व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए कड़े आर्थिक कदम उठाना जरूरी हो गया है। इसलिए जनता पेट में पत्थर बांध के जीने की आदत डाल ले। उन्होंने अब तक का सबसे बड़ा खुलासा किया है कि ‘पैसे पेड़ पर नहीं उगते’ और जिन पेड़ों पर उगते भी हैं तो, वे वहां उगते हैं जहां जनता की औकात नहीं कि पहुंच सके।
  दाम बढ़ाने का जो संकट सम्मुख है, उसकी वजह अर्थव्यवस्था में ‘अव्यवस्था’ नहीं बल्कि व्यवस्था में ‘अव्यवस्था’ है। बड्डे बोले ‘बड़े भाई खुलकर बताओ।’ हमने कहा कि देख नहीं रहे पिछले दो बरस से सरकारी खजाने की कैसी लुटाई मची है, इत्ता तो मुगल और अंग्रेज मिलकर भी नहीं लूट पाए जित्ता इस पंचवर्षीय में आलरेडी हो चुकी है। अब जहां लूट है, लाजिमी है कि घाटा भी वहीं होगा। स्पेक्ट्रम, कोयले के पेड़ों से खजाने में आने वाला राजस्व स्विस बैंकों में चला गया। इसलिए खजाना खाली है। जिसकी भरपाई लुट चुके और स्विस के तहखानों में दफ्न हो चुके धन से तो होने से रही। क्योंकि अब वह लूट, लूटकारों की निजी एसेट बन चुकी है।  इस देश में जो लूटा गया उसे वापस लाना तो ब्रम्ह के बूते में नहीं। फिर भी कोशिश के तौर पर जनता, विपक्ष, मीडिया यहां तक कि कोर्ट भी डांट-डपट चुकी है। बाबा, अन्ना का गला चिल्ला-चोट करते चोक हो चुका है। मगर मजाल है कि एक पाई भी टस से मस हुई हो। उल्टे अब तो अन्ना-बाबा भी मौन की मुद्रा अख्तियार कर बैकफुट पर हैं। ऐसे में सरकार तृणमूल को किनारे लगा मुलायम को साथ ले, गुस्से में नथुने फुला, बांहें मोड़ रही है कि कौन है जो सरकार को गिरा सके। सरकार ने मौका ताककर तीसरा नेत्र क्या खोला कि बाबा रामदेव की दुकान झुलस उठी। उधर अन्ना को केजरीवाल खाए जा रहे हैं, चैक से रकम में हेरा-फेरी को लेकर थुक्का-फजीती के चलते वर्षों से बनाई इमेज का जनाजा निकल रहा है। आखिर बड्डे सोच में पड़ गए कि अचानक मौनीबाबा के पीछे इत्ती ऊर्जा किसकी आ गई...मैडम की या मुलायम की...!!

 

Wednesday, 19 September 2012

डार्विन की डगर पर सरकार



  सबेरे-सबेरे लकड़ी बेचने वाली महिलाओं के पास बड्डे को गचर-पचर करते देख हम पूछ बैठे कि आज जलाऊ लकड़ी पर मोल भाव... इन्हें कहां जलाओगे, ढ़ाबा खोलोगे या गांव में जा बसोगे। बस फिर क्या था गैस की बढ़ी कीमतों पर  मन में जो गुस्सा मनमोहन सरकार पर था, वह लकड़ी वाली बाई से होता हुआ हम पर बरस पड़ा... बोले समझ लो मरने और खुद जलाने के लिए चिता की लकड़ियन का इंतजाम कर रहे हैं। राशन के रॉ मटेरियल को खरीदते-जुगाड़ते जिंदगी बिखरी जा रही है और अब उसे पकाने के लिए गैस सिलेंडर 800 रुपइया में मिलेगा। बड़े भाई कहां जाएगी यह सरकार इतने पाप करके। कहीं ठौर नहीं मिलेगी इस नासपीटी,करमजली को और न जाने कितने विशेषण अपने मुखाग्र से निकाले कि जो लिखे भी न जा सके। सरकार आम आदमी  को सीधे-सीधे मरने को क्यों नहीं कह देती। हमने कहा बड्डे आखिर लोकतंत्र है उसका भी कुछ लिहाज-लिहाफ होता है। सरकार तो बस इशारों में समझा रही है कि डार्विन की थ्योरी ‘सरवाईवल आॅफ द फिटेस्ट’ के मर्म को समझो कि जो आज की महंगाई में जो फिट है वही हिट है और उसी को जीने का अधिकार है। जंगल की भी यही स्थिति है ‘सिंह’ जो चाहे करे, खुद को जो बचा सके वही सरवाईव करे। इसलिए हाथी जैसे बेपरवाह बनो क्योंकि शेर उस हमला नहीं करता। हिरण, नीलगाय (आम जनता) बने तो कैसे सरवाईव करोगे। ऐसे में सरकार भी जंगली बन जाए तो गलत कहां है बड्डे। वह नेचर के नियम को फालोअप  ही तो कर रही है। अब देखो जो हाथी की स्थिति में हैं जैसे नेता से लेकर अफसर तक, चोर से लेकर डाकू तक, कालाबाजारियों से मुनाफाखोरों तक सब के सब सरवाईव करने के लिए कितने फिट हैं। महंगाई डायन उन्हीं के लिए जो आम हैं। खास के लिए तो विकास की सूचना। बच्चों को अच्छी ऐजुकेशन देना है तो पब्लिक स्कूल में अपनी जेब कटाओ, नहीं तो ‘मिड डे मील’ में पहले खिलाओ-पढ़ाओ और फिर ‘मनरेगा’ में खाओ-कमाओ। गैस  महंगी है तो कच्चा खाओ, बीमार हो जाओ तो सरकारी अस्पतालों में सड़ो, महंगाई है तो भूखे प्राण त्याग दो। और बड्डे तुम हो कि लोककल्याण के नाम पर सरकारी दामाद बनने की तमन्ना कर बैठे हो। पांच बरस में एक मुफ़त का वोट वो भी सरकारी स्टेशनरी पर और नेताओं की गाड़ी में बैठ कर क्या डाल दिया तो मुगालता पाल बैठे कि तुमने सरकार खरीद ली। सरकार बखूबी समझती-बूझती है वह जनता को इतने हिस्सों में बांट चुकी है  कि कि देश में उनका विरोध ज्वाइंट तौर कोई ‘माई का लाल’ नहीं कर सकता। इसलिए सरवाईव करने के डार्विन के मंत्र को समझो क्योंकि अब वही सरवाईव करेंगे जो डार्विन की डगर चलेंगे।    
         

Saturday, 8 September 2012

हिंदी की दशा


 भाषा कोई भी हो, वह उसे जानने वालों के मध्य संचार का अचूक माध्यम होने के साथ ही वह सभ्यता व संस्कृति के विकास का वाहक भी होती है। इतिहास  साक्षी है कि दुनिया के अलग-अलग भू-भागों में अनेक भाषाओं और बोलियों ने मानव की नैसर्गिक प्रतिभा को पल्लवति, पोषित किया है। आदि मानव में बर्बरता इसीलिए थी, क्योंकि उसकी कोई बोली या भाषा नहीं थी। बस थी तो- भूख, प्यास, नींद और मौजूद थे कहने, सुनने व समझने के लिए कुछ अस्पष्ट स्वर व संकेत। समय के साथ भाषा का निर्माण बड़े जतन से अक्षरों, शब्दों के गढ़ने के बाद हुआ।
    आज भारत में लगभग 1618 भाषा एवं बोलियां है और दुनिया में लगभग 6912 भाषाएं एवं बोलियां हैं। जिनके माध्यम से कई मानवपयोगी अनुसंधान व अविष्कार हुए हैं, लेकिन आज इनमें से अधिकांश लुप्त हो चुकी हैं और न जाने कितनी ही इसके कगार पर हैं। जैसे बड़ी मछली छोटी को निगल जाती है ठीक वैसे ही बड़ी भाषाएं छोटी भाषा और बोली को लीलती जा रही हैं और भाषा के साथ नष्ट होती है, वहां की मौलिकता, सभ्यता और संस्कृति के साथ एक समूची व्यवस्था, जिसे सदियों से हमारे पूर्वज सहेजते और विकसित करते आ रहे हैं।                                                                                                                                                                            कैसे एक विदेशी भाषा हमारी मौलिकता को नष्ट करती जा रही है, उसका एक सूक्ष्म एहसास मुझे अपने चार वर्षीय बेटे मानस श्री को उसके स्कूल में मिले गृहकार्य (होमवर्क) की एक अंगे्रजी कविता पढ़ाते वक्त हुआ। कविता थी ‘ओल्ड मेक्डोनॉल्ड हैड अ फॉर्म ईया ईया ओ... विथ सम डॉगस, बाऊ-बाऊ हेयर एण्ड बाऊ- बाऊ देयर’ और इसी प्रकार ‘विथ सम कॉऊ,.. मूं-मूं हेयर एण्ड मूं-मूं देयर’ इस कविता में कुत्ते के भौंकने (भों-भों) को बाऊ-बाऊ और गाय के रम्भानें (म्हां-म्हां) को मूं-मूं कहकर बच्चों से रट्टा लगवाया जा रहा है। धर्म क्षेत्र में देखें तो, बच्चे अब देवताओं के नाम गणेश नहीं ‘गणेशा’, राम-कृ ष्ण नहीं ‘रामा-कृ ष्णा’ जैसे सम्बोधन के आदी होते जा रहे हैं। कैसे बचपन से ही मूल स्वरों व आवाजों से इनकी महक  छिनती  जा रही है। इन्हीं एक-एक शब्दों के जरिए हमारी आने वाली पीढ़ी अपनी भाषा और संस्कृति से परे होती जा रही है। कार्ययालयों, रोजमर्रा के मेल मुलाकातों के सम्बोधनों  गुडमॉर्निंग, गुडईवनिंग, गुडनाईट ने हमारे नमस्कार, प्रणाम, शुभरात्रि जैसे शब्दों को विस्थापित कर दिया है और  जो भी बचा है वह बिना प्रभावित हुए नहीं रहने वाला। आचार-विचार और सोच में यह तब्दीली तथाकथित अंग्रेजी दा सोसायटी में तो पूरी तरह उतर ही चुकी है और अब इसका अवतरण कस्बाई इलाकों में हो रहा है।
    सृजन किसी  भी  तरह  का  हो  वह  मौलिक बोली या भाषा में ही उत्कृष्ट और पूर्ण  हो सकता  है . बात गौर करने लायक है कि मौलिकता ही रचनात्मकता की जनक है और यह अपनी मातृ भाषा में ही सम्भव है। तभी तो टैगोर द्वारा बांग्ला में लिखी ‘गीतांजलि’ भारत में एकमात्र नोबल पुरस्कार पाने वाली पुस्तक बन कर रह गई। पर राष्टÑ भाषा हिन्दी को लेकर जिस तरह से दोयम दर्जे का रुख भारत में अख्तियार किया गया है, वैसा दुनिया के किसी और मुल्क में हरगिज नहीं होगा।
     इतिहास साक्छी है कि दुनिया के अधिकांश अविष्कार मौलिक भाषा में हुए हैं। यथा आज भी चीन में मंदारिन, फ्रांस में फ्रेंच, रुस में रशियन, जापान में जैपनीज भाषा में ही समस्त कार्य जारी हैं। यहां तक कि उनके राजनयिक अपनी देश-विदेश की यात्राओं में अपने यहां राष्टÑभाषा बोलने में नहीं हिचकते। लेकिन भारत में ऐसी स्थितियों में नेता अंग्रेजी के पक्ष में रहते हैं, न कि राष्टÑभाषा के। भारत में स्थितियां दिनोंदिन विपरीत होती जा रही हैं।
   पर  देश में अंग्रेजी को रोजगार से जोड़ देने की साजिश चल पड़ी है। अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई कर रहे बच्चों को एक अलग समूह के रूप में देखा जाने लगा है, जैसा पहले कभी ब्रितानी हुकूमत के दौर में था। आज भारत की शिक्षा प्रणाली में अंग्रेजी की अनिवार्यता बना दी गई है। पिछले दो वर्षों में  इसे पढ़ने का एक नया चोर रास्ता गढ़ दिया गया। पहले देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा ‘संघलोकसेवा’ की मुख्य परीक्षा में अंग्रेजी का ऐच्छिक प्रश्न-पत्र था, जिसमें  मात्र उत्तीर्ण होना अनिवार्य था, यह तब भी  हिन्दी माध्यम में पढ़कर आये विद्यार्थियों के लिए एक बड़ी बाधा थी, पर तब कैसे भी रट कर काम चल जाता था। लेकिन,अब तो प्रारम्भिक परीक्षा में ही ‘सी-सेट’ टेस्ट के नाम पर अंग्रेजी की अनिवार्यता, पास होने के स्थान पर चयन का कारक बना दी गई है। क्या इसके मायने यह नहीं कि जो बच्चे कस्बाई या ग्रामीण क्षेत्रों में हिन्दी माध्यम के सरकारी स्कूलों में मध्यान भोजन की सुविधा के मध्य अध्ययन कर रहे हैं, वे लोकसेवाओं की परीक्षा के लिए अयोग्य हैं? उनके नसीब में अभी मुफ्त का मध्यान भोजन है, बाद में मनरेगा की मजदूरी का होगा। सवाल बड़ा है पर उठाया नहीं जाता कि ऐसे स्कूलों से निकले प्रतिभाशाली बच्चों के लिए अंगे्रजी का अतिरिक्त अतिरिक्त बोझ क्यों? जब अंग्रेजी देश की सर्वोच्च सेवाओं में चयन का माध्यम बन जाय तो एक राष्टÑभाषा में दीक्षित देखने में आया है कि कई बार उसका अंग्रेजी  ज्ञान दुरुस्त न हो पाने की वजह से, प्रतिभा होने के बावजूद उक्त सेवाओं से वंचित रह जाना पड़ता है।
   देश में इससे बड़ा भाषाई भ्रष्टाचार और क्या हो सकता है? जो तथाकथित अंग्रेजीदां नीति नियंताओं द्वारा फैलाया गया है। आर्थिक भ्रष्टाचार से तो मात्र भौतिक स्तर पर देश को नुक्सान पहुंचाता है, जिस पर कठोर कानूनी उपायों और भ्रष्ट व्यक्तियों   के सामाजिक तिरिष्कार द्वारा नियंत्रण पाया जा सकता है, लेकिन भाषा को लेकर हो रहा भेदभाव समाज की रचनाशक्ति, उसकी प्रतिभा यहां तक की सभ्यता के लिए धीमा जहर साबित हो रहा है। मुझे एक पत्रकार मित्र ने बताया है कि आज बड़े हिन्दी दैनिकों में छपने वाले आलेख कई बार अंग्रेजी भाषा के लेखकों के होते हैं, जिनके निमित्त दफ्तरों में बाकायदा हिन्दी अनुवादकों को रखा जाता है। मित्र यह कहने से नहीं चूके कि यदि हिन्दी अखबार में बने रहना (सरवाइव करना) है, सो अंग्रेजी में पढ़ना-लिखना सीखिए वरना...! उनकी यह चेतावनी हिन्दी भाषा से विरक्ति को लेकर नहीं थी, बल्कि रोजगार को बरकरार रखने को लेकर थी। मेरे रिश्ते में पितृवत भाई स्वर्गीय डा. रामजी पांडेय जो आजीवन इलाहाबाद में महादेवी वर्मा के साथ पुत्रवत स्नेह पाते रहे, उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी लेखन जगत में अंग्रेजी की अनिवार्यता का जिक्र मुझसे नहीं किया था। पर आज जो वातावरण देश के भाषायी पर्यावरण में फैलता जा रहा है, उससे यह आशंका जरूर पैदा होती है कि यही हाल रहा तो आने वाले 20-25 सालों में राष्टÑभाषा हिन्दी जरूर हाशिए पर होगी।
  इसी वर्ष जनवरी माह के पहले सप्ताह में प्रधानमंत्री ने दिल्ली में आयोजित विश्व संस्कृत सम्मेलन में संस्कृत भाषा के धार्मिक कार्यों तक सीमित हो जाने पर क्षोभ प्रकट किया था। हो सकता है कि भविष्य में कोई दूसरा प्रधानमंत्री यही क्षोभ हिन्दी भाषा को लेकर भी प्रकट करे। कितना बड़ा पाखंड और षड्यंत्र देश में राष्टÑभाषा को लेकर चल रहा है। पर क्या कभी इस दिशा में नीति नियंताओं ने खम ठोंका है? जैसे पिछले महीनो में  उजागर ‘कुपोषण’ के  काले  सच को राष्टÑीय शर्म बताया गया, उसी तरह ‘राष्टÑभाषा हिन्दी’ की उपेक्षा भी राष्टÑीय शर्म होनी चाहिए। पर अब तो बस एक तिथि है 14 सितम्बर यानी ‘हिन्दी दिवस’ जिसकी रस्म मना कर राष्टÑ भाषा को श्रद्धांजलिनुमा याद कर लिया जाता। शायद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की दी गई सीख हमने विस्मृत कर दी है कि -
 निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल।।

श्रीश पांडेय

Friday, 7 September 2012

बोल्ड़ बने, वर्ल्ड रखें मुट्ठी में

इं टरनेट पर बड्डे को सर्फिंग करते देख हम पूछ बैठे कि बड़ी-बड़ी आंखें गाड़कर क्या देख रहे हो.. वे बोले बड़े भाई कुछ नहीं बस फिकर में  हूं कि अपने देश में आधुनिकता (नंगापन) का दायरा अब इस कदर पसर चुका है कि पूरब और पश्चिम की संस्कृति में साम्यता नजर आने लगी है। अब तो देश में ही यूरोप, अमेरिका में होने का अहसास होता है। ऐसे में पश्चिम जाने की जरूरतई का है। सब कुछ दस बाई बारह की स्क्रीन में उपलब्ध है। एफएम की तरह जब चाहे, जहां चाहो खोलो और डूब जाओ, देखो दिखाओ, लाइफ बनाओ...।
    याद आती है सत्तर के दशक की कथित हॉट फिल्म ‘बॉबी’ जिसमें डिंपल के एक्सपोजर पर.. संंस्कार और संस्कृति के पोषकों ने ऐसे मुंह बिचकाया था कि मानो अब देश और देशवासियों का नैतिक पराभव शुरू हो गया। कभी पूरब और पश्चिम की नारी की तुलना का ख्याल भी हमें गर्व से भर देता था कि हमारी स्त्रियां कितनी मर्यादित और संस्कारित हैं रहन-सहन से लेकर तौर तरीकों में। पर अब जिस तरह का भौंडापन ड्रेसिंग सेंस को लेकर देश में पांव पसार रहा है। उससे भोतई प्रॉब्लम होने वाली है।
हमने कहा अरे बड्डे किस-किस को रोकोगे-टोकोगे ये देश ‘गरीब की लुगाई’ बन चुका है। जिसको जो मर्जी आये करे। कोई कोयला लूट रहा है, तो कोई स्पेक्ट्रम और जो लूट नहीं पा रहा वह खुद को लुटाकर जिस्म की कीमत पर जो बन पड़े बटोरने पर आमादा है। अब देखो शर्लिन चोपड़ा को ‘प्लेबॉय’ पत्रिका में अपनी न्यूड तस्वीर देर से देने का अफसोस है और उसकी यह स्वीकारोक्ति कि ‘मैंने पैसे के बदले सेक्स किया’ को कुछ यूं रेखांकित किया कि उसने वेश्यावृत्ति नहीं, की यह तो बोल्डनेस है। दूसरी ओर पूनम कह रही कि तू डाल-डाल, तो मैं पात-पात...मीडिया इन घटनाओं में मसाला मार के कुछ यूं पेश कर रहा है..मानो दोनों में एक स्वस्थ प्रतियोगिता चल रही है और देश की आवाम को इस बात की जानकारी होना जरूरी है कि कौन कितने कपडेÞ उतारेगा, कितना बोल्ड बन सकता है।
   बड्डे बोले कपडेÞ उतारने में बोल्ड होने जैसी क्या बात है? हमने कहा जो जितने कम कपड़े पहने और उसके बारे में जितनी ज्यादा बातें बेशर्मी से कर सके उतना बड़ा बोल्ड...। समय के साथ बहुत कुछ बदल जाता है, तब परिभाषाएं क्यों नहीं? कुछ समाचारों की साइटें तो ऐसी हैं जिसमें घपले-घोटाले,लूट, मानवीय संवेदनाओं की खबरों से ज्यादा अहमियत सेक्स और सनसनी से भरी खबरों को दी जा रही है। इसके पीछे तर्क मार्केट के टेंÑड का है, धंधा जैसे  चले, चलाना मजबूरी ही नहीं, जरूरी भी है।
दुनिया की बड़ी-बड़ी मैग्जीनों का धंधा इसी बोल्डता के आवरण में चमक और चल रहा है। टीवी के शो चाहे हास्य-व्यंग्य के क्यों न हों पर बिना बोल्ड हुए न तो चलते हैं न बिकते हैं। नए शोध के मुताबिक अब स्त्रियों को ‘आईक्यू’ पुरुषों की बनिस्बत बढ़ा है। अब उन्हें बेहतर मालूम है कि उनकी कथित बोल्डता का बिजनेस कितना बड़ा हो चुका है। जिन्हें बोल्ड बनना नहीं आता वे जीवन भर संघर्ष करती रहती हैं, शादी करके बच्चे पालती, उसी में दमती, रमती दुनिया से पलायन कर जाती हैं। पर जिसने यह सूत्र जान लिया, उनका पल भर में दुनिया की नजरों में मशहूर होना तय है। इस निमित्त शर्लिन, पूनम जैसी स्त्रियां रोल मॉडल हैं। जापान और कोरिया में तो बाकायदा बोल्ड बनने के प्रशिक्षण शिविर शुरू किए गये हैं। इसलिए बड़्डे आज की नारी का नया सूत्र है -‘बोल्ड बनिए, वर्ल्ड को मुठ्ठी में रखिए’।
आखिर बड्डे बडेÞ उदास हो के बोले बड़े भाई किसी किसी शायर ने ठीक ही कहा है कि-  
    ‘शोहरतें इस तरह भी मिलतीं हैं कि तुमने अच्छा किया बुरा करके’।
  

Sunday, 2 September 2012

आचार्य देवो भवः

  समूची कायनात में मनुष्य का जीवन ही ऐसा है जिसे जन्म से लेकर उठने , बैठने, चलने, बोलने, पढ़ने, लिखने की समस्त गतिविधियों में विभिन्न तरह के सहयोग की आवश्कता होती है। इस लिहाज से जन्म के चार पांच वर्षों तक अभिभावक समेत घर के वातावरण में मौजूद सभी वरिष्ठों से वह अबोध नित नयी गतिविधियां सीखता है। उम्र के विभिन्न पड़ावों पर समयानुरूप जो भी व्यक्ति उसको सीखने समझने जैसी गतिविधियों में सहयोग करता है वही उसका तात्कालिक आचार्य या शिक्षक होता है। लेकिन अपनी विधिवत शिक्षा को विद्यालय से महाविद्यालय तक हासिल करने के सफर में हर शख्स को शिक्षकों की आवश्यकता होती है। अलबत्ता हमारी यह सामान्य धारणा बन चुकी है कि जो हमें निर्धारित पाठ््यक्रम पढ़ाये वही क्रमिक रूप से हमारा शिक्षक होता है।  किन्तु सत्य इसके परे है। शिक्षा के समानांतर अनुशासन की सीख, चरित्र, नैतिकता जैसे मूल्यों की प्राण प्रतिष्ठा कर  एक अनुशासित नागरिक का निर्माण भी शैक्षणिक दायित्वों में शुमार होता है। इसीलिए कहा जाता है कि यदि शिक्षक राष्टÑ निर्माण का कारीगर है तो हम विद्यार्थी उसकी सामग्री। इतिहास साक्षी है कि जिस राज्य के गुरुकुल श्रेष्ठ शिक्षकों से सुसज्जित रहे उनकी यश-कीर्ति आज भी गाई जाती है। बात बड़ी साफ है कि शिक्षक भूमिका कितनी अहम थी, है और रहेगी। यह श्रेष्ठ  सभ्यताओं से समझा जा सकता है। अत: आज भी शिक्षकों का व्यक्तित्व इतना आकर्षक और मुखरित होना चाहिए कि उसे सम्पूर्ण समाज पहचाने। एक शिक्षक अपनी विद्वता से समाज में पहचान बनाता है।
            लेकिन इतने व्यापक महत्व के विषय पर जहां दुर्भाग्यवश सरकारों के रवैये और नित हो रही उपेक्षा से शिक्षकों, अध्यापन व्यवस्था और उनकी कार्यदशाओं में बेहद गिरावट आई है। वहीं अध्यापक भी शिक्षा दान के दायित्व न तो समझ रहे हैं, न ही अनुभव कर पा रहे हैं। उनकी दृष्टि में अध्यापक का वैसा ही कार्य है जैसा कि किसी क्लर्क या आॅफिस में कर्मचारी काम है। स्कूलों में घंटों में अपनी ड्यूटी पूरी कर देने, पुस्तक पढ़कर सुना देने अथवा उसकी व्याख्या कर देने भर को ही अध्यापक अपना काम समझते हैं। इसलिए अब शिक्षण का कार्य दायित्व न रह कर व्यवसाय बन चुका है और व्यवसाय संवेदना से परे होता है। इसलिए संवेदनहीन हो चुकी शिक्षा व्यवस्था से कैसे आपेक्षा की जा सकती है कि वह राष्टÑ के लिए नैतिक और निष्ठा से लबरेज युवाओं की फौज खड़ी कर सकेंगे।
          शिक्षा की महत्ता और गरिमा, उपयोगिता और आवश्यकता की जरूरत अनादिकाल से अब तक मनीषियों ने बताई है। यही वजह है कि विद्या से अमृत प्राप्त होने जैसे सूत्रों का प्रादुर्भाव हुआ। इसीलिए विद्यादान को किसी भी दान से श्रेष्ठ माना गया और इसको देने वाले शिक्षकों के लिए  कहा गया कि ‘आचार्य देवो भव:’ अर्थात जो तुम्हारा शिक्षण करता है उसे उसे देवता मानकर सम्मान दो। इसके लिए जरूरी है कि अध्यापक और विद्यार्थी के बीच सौहार्द्र, समीपता की आवश्यकता है। जो आज नहीं दिखती और यही कारण है कि आज का विद्यार्थी डिग्री, डिप्लोमा तो ले लेता है, लेकिन व्यवहारिक जीवन का शिक्षण, चरित्र, ज्ञान व उत्कृष्ट व्यक्तित्व का उसमें आभाव बना रहता है। जिसका असर तब दिखता है जब व्यक्ति सामाजिक जीवन में सहजता से खुद को समायोजित नहीं कर पाता। इसलिए मूल्यों के बगैर शिक्षा न सिर्फ अधूरी है, बल्कि  अनुपयोगी भी है। ऐसी शिक्षा जो जीवन को प्रकाशित न करे, उसे समुन्नत न बनाए वह विद्या किस काम की। शिक्षा का दायरा सिर्फ पढ़ाई नहीं बल्कि व्यक्तित्व विकास से भी जुड़ा है। अच्छी शिक्षा और संस्कारों से जीवन में आत्मविश्वास, सफलता और दृढ़ इच्छा शक्ति का विकास होता है।
     आज देश में नीचे से ऊपर तक जिस कदर लूट-खसोट का वातावरण है, चाहे सरकारी मुलाजिम हों या हाकिम अथवा नेता सभी में नैतिकता, आचरण और अनुशासन का लोप साफतौर पर देखा जा सकता है। हम और हमारी व्यवस्था यह भूलती है कि किसी रोग का उपचार तो दवाओं से किसी भी उम्र और दशा में किया जा सकता है। परन्तु चरित्र और नैतिकता का बीजारोपण बचपन और स्कूली अवस्था में ही किया जाता है। कहीं इसमें एक बार चूक हो गई तो इसका खमियाजा समूचे राष्टÑ को लम्बे समय तक भोगना पड़ता है। सवाल बड़ा और बारीक है कि क्या आज शिक्षकों को इस बात का अहसास है कि वे राष्टÑनिर्माता हैं और क्या इस महकमें को हांकने वाले मंत्रियों का ध्यान इस ओर है कि उनकी योजनाएं कक्षा पास कराने और परिणामों को कागजों की शोभा बढ़ाने अलावा, वे छात्रों की अन्य गतिविधियों को लेकर कितनी व्यवहारिक रूप से चिंतित और सक्रिय हैं? शायद नहीं!! यह समूची गड़बड़ी प्राथमिक स्तर से शुरू हो जाती है और फिर यही क्रम उच्च कक्षाओं तक बरकरार रहता है।
      इसलिए शिक्षक दिवस के दिन दो बातें जरूर स्मरण की जानी चाहिए। एक- शिक्षकों की दयनीय सेवा दशाएं और इस ओर किए जा रहे प्रयास, दूसरा उनको उनके मूल दायित्वों के निर्वहन में आ रही बाधा का विकल्प खड़ा करना। ताकि वे सिर्फ शैक्षणिक कार्यों से सम्बद्ध रहें। साथ ही वे अपने दायित्वबोध को समझें। दूसरी ओर इसमें महत्वपूर्ण जबाबदारी विद्यार्थियों की भी है कि वे अपने शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का भाव रखें। क्योंकि विद्या विनय से आती है और विनय से पात्रता... और फिर पात्र व्यक्ति ही परिवार, समाज और राष्टÑ सेवा में दक्षता से जुट सकता है। आइए अपने वर्तमान और   भूतपूर्व शिक्षकों का सम्मान,उनके प्रति अपनी श्रृद्धा, विश्वास और सम्मान को प्रकट करते हुए सभी शिक्षकों को ‘शिक्षक दिवस’ पर शत् शत् नमन करें.... !

श्रीश पांडेय