Monday, 30 July 2012

नैतिकता का पर्व रक्षाबंधन

नैतिकता का पर्व रक्षाबंधन

 भारतीय संस्कृति और परंपरा में अनेक ऐसे अवसर; पर्व-त्यौहार के रूप में समय-समय पर हमारे सम्मुख आते हैं, जो सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत संबंधों को दृढ़ करके, उनके महत्व को हमारे जीवन में रेखांकित करते हैं। फाल्गुन मास में होली के बाद अक्षय तृतीया और नागपंचमी को छोड़ दें तो सावन में रक्षाबंधन ही त्योहारों के क्रम में महीनों से आई रिक्तता को भरता है। प्रत्येक त्योहार एवं उत्सव का अपना एक दर्शन है। भाई बहन के रिश्तों को समर्पित यह श्रावण पूर्णिमा का पर्व यानी रक्षाबंधन हमारे जीवन में संबंधों की महत्ता को स्थापित करता है।
     आज के दिन चहुं ओर का नजारा देखें तो, स्त्रियां ससुराल से मायके की ओर, लड़कियां हॉस्टलों से अपने-अपने घरों का रुख करती बसों, ट्रेनों में दिख जाएंगी। धवल वस्त्रों में हाथों में सजी मेंहदी और उनमें रक्षा सूत्र(राखी) लिए भाइयों के प्रति उमड़ा प्यार, वातावरण को उत्सव का रूप दे देता है। भाई हैं तो अपने स्नेह को जताने के लिए यथासामर्थ उपहारों की सौगात लेकर जहां भी उनकी बहनें हैं, पहुंचने की भरपूर कोशिश करते हैं।  जो इस पर्व में गंतव्य तक नहीं पहुंच सकते उन्हें डाक द्वारा राखियां मिलने का इंतजार होता है अथवा आस-पड़ोस में मुहंबोली बहनों का इंतजार रहता है, जो उन्हें इस सम्मान से नवाजें। कमोबेश यही स्थिति बहनों की भी होती है। आज के दिन बहनें, भाइयों के हाथों में जो रक्षा सूत्र बांधती हैं वह किसी भी कलाई पर बांधा गया सर्वोत्तम हार होता है।
        रक्षाबंधन को फिल्मी दुनिया ने भी कुछ यूं गुनगुनाया है कि..‘बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है, प्यार के दो तार से संसार बांधा है..’   यह गीत इस त्यौहार का मानो आॅफीशियल गाना बन गया है। इस दिन हर सुबह रेडियो या टीवी पर बजता यह गीत इस त्यौहार में चार चांद लगा देता है। ये माना कि गाना बहुत पुराना नहीं है, पर भाई की कलाई पर राखी बांधने का सिलसिला बेहद प्राचीन है। सिन्धु सभ्यता में आर्यों के बीच इस त्यौहार के चलन में होने के प्रमाण हैं। यों तो इतिहास में कई ऐसे उदाहरण हैं, जो इसके प्रतीक रूप में अस्तित्व में होने के गवाह है। यथा-जब कृष्ण ने  शिशुपाल का वध किया था, तब युद्ध के दौरान कृष्ण के बाएं हाथ की उंगली से रक्त को बहते देखकर द्रोपदी ने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीरकर कृष्ण की उंगुली में बांधा था। तभी से कृष्ण ने द्रोपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था। और हस्तिनापुर में द्रोपदी के चीरहरण में चीर (वस्त्र) देकर उसकी अस्मिता रक्षा की थी। आधुनिक इतिहास में चित्तौड़ की विधवा रानी कर्णावती ने गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह से अपनी प्रजा की सुरक्षा के लिए हुमायंू को राखी भेजी थी, तब हुमायूं उनकी रक्षा की और उन्हें बहन मान लिया था।
          स्त्री पुरुष संबंधों में मां-बेटे के रिश्ते के बाद भाई-बहन का संबंध ही ऐसा है, जो नैसर्गिग रूप से अभिन्न,अमिट और अतुलनीय है। इसकी एक वजह उनका एक ही गर्भ से उत्पन्न होना है। वृक्ष की शाखाएं कितनी भी फैल जाएं पर जड़ें उनके अस्तित्व तक एक ही बनी रहती हैं और उनमें समान गुण-धर्म सदैव बने रहते हैं।  कई बार तो दोनो(लड़का-लड़की) की शक्ल देखकर ही अनुमान लगा पाना सहज होता है कि ये परस्पर भाई-बहन हैं। रक्षाबंधन का पर्व एक ही आंगन में पले-बढ़े, खेले-कूदे, लड़े-झगड़े, भाई-बहन के रिश्ते की प्रगाढ़ता को दर्शाता है । 
       भारतीय समाज की संरचना व इसके रीति रिवाज ही ऐसे हैं जहां रिश्तों का महत्व दुनिया के अन्य समाजों से बेहतर रहा है। भारतीय खासकर हिन्दू संस्कृति में स्त्रियां, पुरुष की आयु और सुरक्षा की कामना करती आई हैं। जब वह क्वांरी रहती है तो वह भाई के लिए यही भावना रक्षा सूत्र के माध्यम से अभिव्यक्त होती है, तो विवाहोपरांत करवा चौथ और तीज के कठिन व्रत के जरिए अपने पति के लिए। लेकिन भाई को रक्षा सूत्र बांधने का सिलसिला जीवंत बना रहता है।
          रक्षा बंधन का मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है, जो भाइयों को उनकी बहनों के प्रति जिम्मेदारी को व्यक्त करता है। यह जिम्मेदारी सिर्फ बहनों की रक्षा करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि शादी के बाद भी यही क्रम जारी रहता है। इसके अलावा भी कई अवसरों पर भाई अपनी बहन के प्रति अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करता है। रक्षा बंधन पर जब बच्चियों ने पूर्व राष्टÑपति ए पी जे अब्दुल कलाम की कलाई पर रेशम की डोर बांधी थी तो उनके कवि हृदय में भाव जाग उठे और उन्होंने कहा -
                                    बहनों का प्यार पूर्ण चन्द्रमा के चमकने जैसे है,
                                      भाइयों का प्यार उदय होते सूर्य के प्रकाश जैसा है।
                                       हमारे जीवन और हमारे   घरों को ये रोशन करते हैं,
                                         विचारों में सज्जनता के साथ आप दीर्घायु हों!

इस उत्सव को सदियों से हम समाज परिवार के बीच मनाते आ रहे  हैं। मगर अब प्राय: हमारे जीवन से प्यार, संवेदनाएं, भावनाएं नदारत हैं। त्यौहारों को हम बस एक कोरम पूरा करने के लिए अपनाते हैं। इसकी मर्यादा को घर की डेहरी के बाहर कदम रखते ही बिसरा देते हैं। गुवहाटी जैसी घटनाएं दर्शाती हैं कि समाज का नैतिक पतन किस हद तक हो चुका है। जिस लड़की के साथ के अनैतिक कृत्य हुआ, वह किसी भाई की बहन होगी और जिन्होंने दुष्कर्म किया वे भी किसी बहन के भाई होंगें।  किसी भी समाज की संरचना मूल्यों के चौपाए पर टिकी होती है। जब यही खोखले हो जाएंगे, तब जिस संरचना में हमारा जीवन पल्लवित, विकसित  हो रहा है, वही ध्वस्त-धराशायी हो जाएगा। रक्षाबंधन जैसे नैतिक त्यौहार हमें जताते हैं कि हम न सिर्फ घर में मौजूद बहन के प्रति संवेदनशील बने बल्कि समाज में अपनी इसी सोच के साथ आगे बढ़ें कि सारा विश्व हमारा एक परिवार है। 1896 में  विवेकानंद ने जब न्यूयार्क में धर्म संसद को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘लेडीज एडं जेन्टिलमैन’ की जगह सभागाार में मौजूद जनसमुदाय को ‘सिस्टर एडं ब्रदर्स’(बहनों और भाइयो)कहकर संबोधित किया तब दुनिया में भारत की संस्कृति और संरचना को नयी पहचान मिली थी।
        तो इस पवित्र उत्सव रक्षाबंधन का औचित्य तभी जब इसको मनाते वक्त भाई बहनों को वचन दें कि वे सुरक्षा के दायित्व को सिर्फ अपनी जैविक बहनों तक नहीं बल्कि इससे इतर भी निर्वहन करेगें। ऐसा ही संकल्प बहनें भी ग्रहण करें तो समाज में दिनोंदिन आ रही विकृति का एक सीमा तक उन्मूलन हो सकेगा। वर्ना त्यौहारों जिस श्रृंखला को हम वर्ष भर मनाते हैं वे सब के सब हमारी हिप्पोक्रेसी के प्रतीक बन कर रह जाएंगे। नैतिकता से लबरेज इस पर्व की आप सभी भाई-बहनों को शुभकामनाएं।

श्रीश पांडेय

Thursday, 28 June 2012

बचपन के जमाने फिर नहीं आते...

   
प्रकृति के परिवर्तन हमें बताते हैं कि कैसे वह वक्त और वातावरण के मुताबिक अपने विभिन्न रूपों में उपस्थित होकर हमारे जीवन में विविध रंग भरकर, हमारा लगाव और जिजीविषा, जिन्दगी के प्रति उत्पन्न करती है। प्रकृति के सदृश्य हमारे जीवन में भी समय के साथ निरंतर बदलाव- उम्र, समझ और संबंधों के स्तर पर होते रहते हैं। लेकिन प्रकृति और मानव के परिवर्तन में जो गाढ़ा अंतर है वह यह कि प्रकृति अपने मिजाज को हर वर्ष दोहराती है, तो वहीं मनुष्य के जीवन में उम्र के स्तर पर आये परिवर्तनों की पुनरावृत्ति नहीं होती। अब बारिश को ही ले लें तो, एक बार फिर हमें भिगोने को आतुर है। भीषण गर्मी से नीरस हो गए जीवन में वर्षा की फुहारें रस भरने को उमड़ रही हैं। बारिश जहां किसानों को कृषि कार्यों में उलझा देती है, तो प्रशासन, कर्मचारियों  को उसके प्रबंधन में, तो पत्रकारों की जमात मानसून के अनुमानों की खबरों पर कलम घिसती नजर आती है। लेकिन इस बारिश का असली आनंद  हमारा बचपन ही लूटता आया है, जो बार-बार नहीं आता।
 ‘बचपन’ शब्द ही विशिष्ट है मानव विकास में यह उम्र के विभिन्न चरणों के लिए प्रयुक्त हो सकता है। सरल शब्दों में बचपन को जन्म से आरंभ हुआ माना जाता है। अवधारणा के रूप में कुछ लोग बचपन को खेल और मासूमियत से जोड़ कर देखते हैं, जो किशोरावस्था में समाप्त होता है। दरअसल, शैशवावस्था के बाद का जीवन ही बचपन है और बच्चे के लड़खड़ाते हुए चलने के साथ शुरू होता है, जब बच्चा बोलना और स्वतंत्र रूप से कदम बढ़ाने लगता है। प्रारंभिक बचपन सात से आठ साल की उम्र तक चलता है। राष्टÑीय संगठन के अनुसार, प्रारंभिक बचपन की अवधि जन्म से आठ की उम्र तक होती है। बहरहाल, बचपन की सैद्धांतिक परिभाषाओं में इसकी पहचान इसे सीमित करती है। कई बार हम बड़े होकर भी अपने बचपन को जीते रहते हैं और कह उठते हैं कि क्या दिन थे वोभी आह....!
    ‘बचपन’ जीवन के व्यवस्थित नियमों से परे होता है। चिन्तामुक्त होकर खेल-कूद, मौज-मस्ती, में निमग्न रहना ही उसके अनिवार्य लक्षण हैं। उम्र का यही पड़ाव है जो  मानव जीवन  की सभी अवस्थाओं में सबसे नायाब है, अनमोल है, अद्भुत है। बपचन को याद करते समय सुभद्रा कुमारी चौहान की ‘बचपन’ शीर्षक से लिखी कविता की चंद पंक्तियां होठों पर तैर जाती है जिसके कुछ अंश यूं हैं कि .....
                                              बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी
                                             गया, ले गया तू जीवन की सब से मस्त खुशी मेरी।।
                                          चिन्ता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छन्द।
                                               कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनन्द?
                                                ऊंच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
                                                     बनी हुई थी वहां झोपड़ी और चीथड़ों में रानी।
                                                  रोना और मचल जाना भी क्या आनन्द दिखाते थे
                                                      बड़े-बड़े मोती-से आंसू जयमाला पहनाते थे।।

यह तथ्य निर्विविाद रूप से सर्वमान्य है कि बचपन चाहे किसी भी सामाजिक स्तर पर हो उसकी बेफिक्री ही उसे प्रकृति के करीब ला खड़ा कर देती है। बच्चों को बारिश के पानी में भीगते, बहते पानी में नाव चलाते और उसके प्रवाह के पीछे किलकारी मारते हुए भागते देखकर हर शख्स को उसका बचपन आंखों में कौंध जाता है। बच्चे तब यह नहीं जानते कि वे बड़े होकर अपनी इस अल्हड़ता को, जगजीत की गाई नज्म... ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो, वो बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी...को किसी रिकार्ड में  सुन कर इन सुनहरे पलों को याद करेंगे। बच्चों को बारिश में भीगने के बाद बीमार पड़ने जैसे ख्याल उनके पास फटकते ही नहीं....बड़े बुजुर्ग भले ही बारिश में न जाने और बीमार पड़ जाने के डर से बच्चों को चेताते व खुद चिंतित रहते हों, पर बचपन इन सुझावों को एक तरफा खारिज कर देता है। बच्चों का बरसते पानी में बेपरवाह मौज-मस्ती से राकने के लिए बड़ों के द्वारा लगाये गए बंधनों को वे कठोरतम महसूस करते हैं और हम बड़े भी बच्चों के साथ सहज नहीं रह पाते... कई तरह के एटिकेटस के नाम पर हम उन्हें पल-पल सिखाते हुए टोकते हैं कि यह नहीं करना ,वह नहीं करना...इस सिलसिले में दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्रध्यापिका ममता धवन कहतीं हैं कि जब कभी मेरा बेटा खेलते हुए कोई वस्तु बिखरा देता है तो मैं उसे डांटने या मना करने के बजाए दूसरी और वस्तुएं फैलाने के लिए दे देती हंू और उसके द्वारा इस बचपन में लिए जा आनंद से अभिभूत होती हूं। इसलिए बचपन को आवश्यकता से अधिक नहीं छेड़ा जाना चाहिए, क्योंकि हर बच्चा अपनी  नैसर्गिक गतिविधियों से बहुत कुछ सीखता है। बच्चों को उनका बचपन जीने के हक को,जीवन की   औपचारिकताओं से प्रथक रखें ताकि वह इस अनमोल जीवन को भरपूर जी सके। ‘बचपन’ के बरक्स एक शेर रोशन हो आता है कि...
                                                     उडने दो परिदों को अभी शोख हवाओं में,
                                                              फिर लौट के बचपन के जमाने नहीं आते।


           श्रीश पांडेय

Sunday, 24 June 2012

बात बचपन की

  तीन दशक पहले बात बचपन की है जब मैं तीसरी या चौथी दर्जे में पढ़ता था। उनदिनों कुछ ऐसा वातावरण था, जब स्कूल जाने का मतलब पढ़ाई से कहीं महत्वपूर्ण खेलकूद और मौज मस्ती था। न तो मासिक टेस्ट थे, न ही रोज का अनिवार्य होमवर्क। टिफिन में खाने के आइटम लगभग हफ्ते भर एक से- रोटी या पराठा के साथ सब्जी या कभी मां को समय न रहा तो अचार से दो चार होना पड़ता था। लेकिन अब बच्चों के टिफिन का जायका मैगी, नूडल्स, सैंडविच, पास्ता जैसे स्वादों में रूपांतरित हो गया है। ठंड हो या गर्मी सभी में यही अटरम-शटरम बच्चों की पसंद बन चुका है।
    बहरहाल, खाने के साथ-साथ पढ़ाई-लिखाई की पद्धति में जो बड़ी तब्दीली आयी है वह यह कि अब मां-बाप बच्चे के स्कूल जाते ही तय करने लगते हैं कि बच्चे को क्या बनना चाहिए। ‘दिल चाहता है’ फिल्म को सराहने वाले,उसके  दर्शन पर ताली पीटने अभिभावक भी अपने बच्चे को उसका नहीं बल्कि अपना ख्वाब पूरा करने का साधन मान बैठते हैं। दरअसल, बच्चा क्या बनना चाहता है ये बात गौण हो चली है, यहां तक कि उसके भविष्य की राहअभिभावकों द्वारा गर्भ से ही गढ़ी जाने लगी है। इसी का नतीजा है कि बच्चों पर नर्सरी कक्षा से ही स्कूल में अव्वल आने का दबाब झलकने लगता है। उधर किताबों के बोझ को देख कर मानना पड़ता है कि बच्चा भले ‘केजी वन’ में पढ़ता हो पर उसका बस्ता ‘टू केजी, थ्री केजी...फाइव केजी’ का होता है। आज कच्ची उम्र में किताबी अध्ययन करने और  उसमें पारंगत होने की ललक भले ही शुरुआती दिनों में मां-बाप की रहती हो, पर जल्दी ही यही आदत बच्चों में पड़ जाती है। पढ़ाई का यह दबाव साल-दर-साल उच्च कक्षाओं में प्रवेश करने के साथ अनुपातिक रूप से बढ़ता रहता है। ऐसे में बचपन खासकर शहरी इलाकों में किताबों के साथ किसी फिल्मी दृश्य की तरह पल झपकते ही कब जवान हो जाता है, समझ मुश्किल है।
      मैं जब अपने बचपन को सोचता हूं इतने वर्षों में आये फर्क को साफ महसूस करता हंू। क्योंकि हमारी जितनी जानकारी कक्षा 5 में होती थी, उतना आज के बच्चे कक्षा एक में जानते हैं। यानी आज के बच्चों का ज्ञान उम्र से पांच गुना आगे है। जहां तक शिक्षक-शिक्षार्थी के परस्पर की संबंध की बात है, तो वह बेहद मर्यादित और अनुशासित था। मैं पढ़ने में वैसे भी लापरवाह रहा हंू, इसलिये अपने अध्यापकों से प्राय: डांट ही नहीं,  मार भी पड़ जाना अचरज की बात नहीं थी, लेकिन उस मार या डांट में भी एक अपनापन, प्यार और अधिकार था।  तभी तो जब कभी घर में, स्कूल से शिकायत आ जाए, तो समझ लीजिये बजाय शिक्षकों से जबाव तलब के, यही मार और डांट बोनस की तरह दोगुनी हो जाती थी। बुजुर्गवार बताते हैं कि 50-60 के दशक में शिक्षकों का विद्यालय में अनुशासन इतना सख्त था कि किसी छात्र के विद्यालय मेें अनुपस्थित रहने पर उसको ढूंढने के लिए चार-पांच छात्र इसलिए भेजे जाते थे कि यदि गैर-हाजिरी का कोई उचित कारण न हो तो उसे पकड़वाकर विद्यालय बुला लिया जाता था। तब शिक्षक का समूचे विद्यालय के बच्चों पर पिता के समान अधिकार होता था। पर आज प्राय: शिक्षकों के सख्त अनुशासन को असंवेदनशील अमानवीय मानकर उनसे ही सवाल दाग दिए जाते हैं। इसीलिए भले उन दिनों की स्मृति आज की पीढ़ी के लिए स्वप्न और अविश्वसनीय हो, पर सब कुछ ऐसा चलता था मानो हमारा जीवन प्रकृति के कितने करीब है। कल का वही बालक यानी मैं आज पिता हूं और जब अपने बच्चे को स्कूल जाते और उसके वातावरण को देखता हूं, तो 30-35 सालों में आये फर्क को बेहतर समझ पा रहा हंू, कि क्यों हमारा जीवन कृत्रिमता की ओर निरंतर उन्मुख है। बच्चे बचपन से ही मशीनीकृत जिंदगी के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। रोज स्कूल की भागमभाग, वहां मिले गृहकार्य (होमवर्क) को पूरा करना, फिर एक-दो ट्यूशन और बचा हुआ समय टेलीवीजन पर कार्टून देखना ही उनकी दिनचर्या बन चुकी है। खुली हवा में सांस, मित्रों के साथ गप्पें अब जीवन से नदारत है। खेल के मैदान का मुंह तो महानगरों के बच्चे शायद ही कभी देख पाते हों। महानगर ही क्यों, अब तो यही हाल कमोबेश शहरों और कस्बों का होता जा रहा है।  दरअसल, पढ़ाई के बढ़ते उत्तरोत्तर बोझ ने बच्चों को किताबी कीड़ा बना कर रख दिया है। यह बात दीगर है कि इसकी वजह से वे भले इंजीनियर, डॉक्टर, प्रबंधक, प्रशासनिक अधिकारी बन रहे हों, पर इंसान बनने के मूलभूत गुणों से वंचित होते जा रहे हैं। क्योंकि इंसानी संगत का विकल्प टीवी, स्वचालित खिलौने और केवल किताबी ज्ञान ही नहीं हो सकता। छोटे  परिवार, स्वार्थमय जीवन, अपने पराये का भेद आज की पीढ़ी कच्ची उम्र में ही सीख जाती है।
   कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक ओर मानव सभ्यता विकास और उन्नति के शीर्ष पर अपने कदम रख रही है, तो दूसरी ओर हम और हमारी पीढ़ी संवेदनाशून्य, भावशून्य होकर मानवीय मूल्यों व उसकी गरिमा को रसातल में ले जाने पर उतारू हैं। इसकी वजह बहुत हद तक जीवन में विद्यमान प्रतियोगिता और कृत्रिमता है। साधनों/भौतिकता का विकास, साध्य(मानव) के लिए है, पर यह जानकर पीड़ा होती है कि साध्य ही साधनों के वशीभूत होता जा रहा है। विकास की जो गंगा बहाई जा रही है वह नि:संदेह आने वाले वक्त में अर्थर्हीन होकर रह जाएगी। क्योंकि संवेदनहीन होता आज का बचपन ही तो कल का भविष्य है।
ऐसे में  बचपन के बरक्स अनायास ही जगजीत की गुनगुनाई गजल बरबस जुबां पर आ जाती है कि...ये दौलत   भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो वो बचपन का सावन,वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी... इसका स्मरण और इसके बोल का आज भी दिल को नम कर जाना दर्शाता है कि बचपन से अनमोल कुछ भी नहीं। पर इस बहुमूल्य बचपन को पढ़ाई का बोझ और आज का मशीनीकृत शिक्षा पद्धति लीलती जा रही है। स्कूलों ने भी अपने परिणामों को बेहतर दिखाने के फिराक में बच्चों पर इकाई टेस्ट, मासिक टेस्ट, त्रैमासिक टेस्ट, छमाही टेस्ट और फिर वार्षिक परीक्षा के पूर्व एक और अभ्यास टेस्ट का भार डाल रखा है। तब कहीं जाकर वार्षिक परीक्षा का आयोजन होता है। यानी बचपन से शुरू हुआ पढ़ाई का ये सिलसिला अच्छी नौकरी/ रोजगार हासिल कर लेने तक अनवरत रहता है। सवाल बड़ा और बारीक है कि क्या हम इस दुनिया में इसीलिए जन्मते हैं कि एक मशीन की तरह रोटी के लिए और बेहतर रोटी के लिए संघर्ष करते अपना जीवन गुजार दें? क्या हम सिर्फ भोग के लिए? क्या हम अपनी पीढ़ी को सुखमय जीवन की शिक्षा हर कीमत पर देना चाहे हैं। हो न हो आज जितनी असंवेदनशीलता हमारे चंहु ओर पसर रही है उसके नेपथ्य में बचपन का असमय समाप्त होना, सामाजिक संरचना का शिथिल होना है। बचपन है तो भविष्य है... बाल मन की इस बोझिल पढाई उससे मुक्ति का प्रतिबिम्ब शकील जमाली के इस में शेर रोशन हो आता है कि-
सफर से लौट जाना चाहता है, परिंदा आशियाना चाहता है,
कोई स्कूल की घंटी बजा दे, ये बच्चा मुस्कराना चाहता है


श्रीश पांडेय 

Sunday, 10 June 2012

इंडिया अगेंस्ट (कांग्रेस) करप्शन

  एक लघु कथा है कि पांच डाकू थे उनमें से चार गांवों में जाकर डाका डालते और पांचवां उनकी रखवाली करता कि कहीं उन पर कोई आंच तो नहीं आ रही....एक बार पुलिस ने पांचों को गिरफ्तार कर लिया....उन्हें अदालत में पेश किया....चार को अदालत ने सजा दे दी....पांचवां बोला मैंने आज तक किसी भी डाके में भाग नहीं लिया....किसी ग्रामीण को नहीं लूटा.... यदि कोई ग्रामीण कहे कि मैंने उन्हें लूटा है तो मैं संयास ले लूंगा... ! तो क्या उसको बरी कर दिया जाये ?
इनदिनों यूपीए सरकार के मुखिया की कुछ ऐसी ही दशा दुर्दशा दिखती है। बड़े-बड़े नामों से सुसज्जित सरकार के धुरंधर अर्थशास्त्री-प्रशासक महंगाई, काला धन, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, कानून व्यवस्था, सुधारों को लागू करने में लाचार और बात-बात पर सिर धुनते, बिखरते किसी तरह ‘फेवीकोल का जोड़ है टूटेगा नहीं’ के विज्ञापन की तर्ज पर पिछले 8 साल से दिल्ली के सिंहासन से कुछ इस तरह चिपके हैं कि उनके जाते ही देश गढ्ढेÞ में  गिर पड़ेगा।  सरकार कोमा में जा चुकी है जिसका नमूना है कभी प्रधानमंत्री कहते हैं कि आने वाले साल और कठिन होंगे, हमें (आम जनता) को इसके लिए तैयार रहना होगा। उसके ग्रामीण विकास मंत्री जयरामरमेश ने यूपीए सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना मनरेगा के औचित्य और भविष्य पर सवाल खड़ा कर दिया है।  सरकार, सरकार नहीं मजाक बन कर रह गयी है।
इनदिनों देश में अजीब तरह की आपाधपी मची है। जिसे देखकर किसी भी राष्टÑभक्त का राष्ट्र की दिशा दशा देखकर चिंतित होना लाजिमी है। विगत आठ वर्षों से ऐसा व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री है। जिनके चरित्र,नैतिकता, ईमानदारी का न सिर्फ सरकार के कारिंदों द्वारा गुणगान किया जाता है, बल्कि समूचा विपक्ष भी गाहे-बगाहे उनके इस रूप की आराधना करता रहा है। लेकिन जिसके कार्यकाल में लाखों करोड़ों के घोटाले उजागर हुए  हों और  जो भ्रष्टाचार पर अंकुश रखने में हर तरह से धृतराष्टÑ की तरह अक्षम रहा हो, जिसके कार्यकाल में नामचीन अर्थशास्त्री होने के बावजूद सर्वाधिक महंगाई बढ़ी हो, जिनके चहेते मोंटेक सिंह ने जिस बेशर्मी से गरीबी का मजाक उड़ाया हो ऐसी सरकार से ना उम्मीदी  होना स्वाभविक है। कुलमिलाकर समूची अर्थव्यवस्था की जैसी दुर्दशा इस सरकार में हुई है वैसी स्वतंत्र भारत के इतिहास में देखने में नहीं आती।
  एक-गैर राजनीति और संवेदना शून्य प्रधानमंत्री जिसे देश की आवाम की नब्ज टटोलना तो दूर उल्टे जीडीपी, आर्थिक विकास दर, मौद्रिक नीति  जैसी अर्थव्यवस्था की टर्मिनोलॉजी के नाम पर बार-बार यह बयान करना कि महंगाई के वैश्विक हालातों को देखते हुए यह और बढ़ेगी, भारत को मंदी का दौर और झेलना होगा...जैसे उवाचों ने समाधान कम समस्या ज्यादा पैदा की है। इतनी ही तत्परता और संजीदगी यदि सरकार ने भ्रष्टाचार और अनुमानित 400 लाख करोड़ के काले धन की वापसी पर दिखाई होती तो देश के हालात इतने पतले न होते। कांग्रेस शासन काल में घोटालों का सिलसिला आजादी के बाद से ही नाले के रूप में चल पड़ा था जिसने आज एक वेगवती नदी का रूप धर लिया है। एक मोटी नजर इस फेरहिस्त पर मारें तो-1948 जीप घोटाला, हरिदास मूंदड़ा घोटाला 1957 से लेकर, पामोलिन तेल घोटाला, आज के कॉमनवेल्थ, आदर्श हाउसिंग सोसायटी, टूजी स्पेक्ट्रम और अब कोयला आवंटन के मामले में संदेह उपजने तक सैकड़ों मामले हैं जिन पार्टी दागदार हुई है।
घपलों-घोटलों की लम्बी फेरहिस्त दर्शाती है कि कभी पार्टी ने इस पर अंकुश रखने की कोई ठोस योजना नहीं बनाई। यह हकीकत है कि गठबंधन सरकारों में यह प्रवृत्ति तीव्र गति से बढ़ी है,चाहे कांगे्रस के नेतृत्व में यूपीए हो या भाजपा के नेतृत्व में राजग।  लेकिन यूपीए के पिछले दो कार्यकाल में जिस कदर सरकारी खजाने की लूट मची है उसको देखकर कहना पड़ता है किअंग्रेजों द्वारा लूटे गए इंडिया की मिसालें आज की तुलना में फीकी हैं।
अब जबकि अन्ना हजारे समूह ने प्रधानमंत्री की ईमानदारी पर सवाल खड़े किए हैं तो स्वयं मनमोहन सिंह और उनके कु नबे के मंत्री इसे बेबुनिाद बता कर पल्ला झाड़ लेने और अन्ना को राष्टÑ विरोधी के हाथ में खेलने जैसे डायलॉग जड़कर सर छिपाने की कवायद में जुटे हैं। आरोपों के खिलाफ शुतुर्मुर्गी मुद्रा अख्तियार करने बजाय सरकार को आंख खोलकर चीजों देखना और उनके जबाव देने चाहिए। आखिर यूपीए को जनता ने चुना है और गठबंधन की मजबूरी के नाम पर इससे आंख नहीं मूंदी जा सकती। इसी बचाव की नीति का नतीजा है कि आज वह चौतरफा कटघरे में खड़ी नजर आती है। फेसबुक और टिवटर की सोशल बेबसाइटों में कांग्रेस और यूपीए के विरुद्ध जनमानस के गुस्से को साफ पढ़ा जा सकता है।
    आज स्वयं सरकार की कारिस्तानियों से ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ की मुहिम ‘इंडिया अगेंस्ट कांग्रेस’ बनती जा रही है या कहा जाय कि बन चुकी है तो ज्यादा बेहतर होगा। दरअसल, अन्ना समूह द्वारा ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ मिशन की शुरूआत में किसी भी दल, कर्मचारियों  अथवा  प्राइवेट कंपनियों द्वारा कैसा भी करप्शन हो के विरुद्ध था। जिसके लिए लोकपाल और अन्य व्यवस्थागत सुधारों की मांगों को एकतरफा अनसुना कर देने के बाद आहिस्ता-आहिस्ता यह मुहिम कांग्रेस विरुद्ध ज्यादा बनती गई। यद्यपि अन्य दल भी इसी दलदल में धंसे हैं। हालिया   भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्षमण को  हुई सजा और येदियुरप्पा की बेदखली इसी की बानगी है।
 अब जबकि चुनाव में दो वर्ष शेष हैं, सरकार के पास पूरा मौका है कि वह अपना दामन धो-पोंछ सके पर इसके लिए कालेधन, भ्रष्टाचार को लेकर वह ऐसा कुछ करती दिखे ताकि यह समझा जा सके कि वह तंद्रा से जाग चुकी है। भाजपा जिसे कांग्रेस का विकल्प माना जा रहा है जिसके लिए पार्टी में अगला प्रधानमंत्री कौन होगा के निमित्त आभाषी युद्ध शुरु हो गया है। ऐसे में कांग्रेस के पास अवसर  है कि वह स्थिरता के साथ महंगाई, भ्रष्टाचार, कालेधन पर अपना रुख सख्त करके दागदार दामन और शर्मसार छवि को स्वच्छ व सम्मानजनक बना सकती है। अन्यथा अपने विरुद्ध जनता के गुस्से को वह बिहार, यूपी के चुनावों में देख ही चुकी है।
                                                                                                                                 -  श्रीश पाण्डेय

Thursday, 19 April 2012

कितने निर्मल है बाबा

भारत चमत्कार, आशीर्वाद, कौतूहल से भरे कारनामों की सम्भावनाओं का देश है। यहां धर्म के नाम पर जितने आलौकिक चमत्कार बाबाओं ने दिखाये हैं, उतने विश्व के किसी और मुल्क में मुश्किल हंै। बाबाओं के जादुई करिश्मों के पीछे देवी देवताओं द्वारा वायु मार्ग से गमन और मनचाही वस्तुओं व सफलता को पल झपकते प्रदान कर देने की कल्पना ही इस आकर्षण का आधार है। मनुष्य आरम्भ से साधना-उपासना द्वारा ऐसी अलौकिक शक्तियों को हासिल करने के प्रयास करता आया है, जो उसे आसानी से सफलता के पायदान पर पहुंचा सके। कमोबेश अलौकिक सत्ता के प्रति जनसामान्य में आकर्षण की वजह यही रही है कि हमारे वेद, पुराण और धर्म ग्रन्थ- तंत्र-मंत्र के जादुई चमत्कारों से पटे पड़े हैं। इसीलिए समय-समय पर भारत में अनेक बाबाओं का उद्भव और पराभव भी देखने में आया है। जिनमें से कुछ का प्रभाव उनके जीवन काल में और उसके बाद भी विद्यमान है, तो वहीं कुछ की शक्तियों का भांडाफोड़ चंद वर्षों में होता देखा गया और उनकी कलई खुलते ही उनके चमत्कारों की खुमारी भी जनता में बाढ़ के पानी के तरह उतरती देखी गई।
      इनदिनों देश में ऐसे ही एक हैं निर्मल बाबा जो, अपनी कृपा को धन के एवज में बेच रहे हैं। लाखों में शुरू हुआ यह कुटीर उद्योग आज करोड़ों की इन्डस्ट्री बन गया है। बाबा अपने भक्तों पर कृपा कैसे करते हैं? यह तो रहस्यमय है। पर जो भी उपाय वह अपने भक्तों को सुझाते हैं, वह एक बारगी तो हास्यास्पद और मजाकिया लगते हैं, पर यह तो मानना ही पड़ता है कि असर भी हुआ होगा, तभी तो दिनोंदिन जन समुदाय बाबा के दरबार में उमड़ रहा है। बाबा के विरोध और समर्थन में तर्क और बहस ऐसा सिलसिला देश में चल पड़ा है कि बाबा का हर बयान ब्रेकिंग न्यूज बना है।
  दरअसल, देश में ऐसे बाबा, महात्माओं की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है। जिनके  लिए जगह-जगह पंड़ालों में श्रद्धालुओं की भीड़ ताली पीटते नमन करती, दान देती नजर आती है। टीवी चैनलों पर इन बाबाओं का छितिज आकाश गंगा की तरह बढ़ रहा है। ज्योतिषी उपायों, वास्तु के फायदे-नुक्सान का एक ऐसा विज्ञान विकसित हो गया है कि विकास के इनके मापदण्ड, विज्ञान को पीछे छोड़ते दिखते हैं। इस निमित्त बाकायदा सुसज्जित कार्यालय खुल हैं। एक निर्धारित फीस है, पैकेज हैं। पर अहम सवाल यह है कि क्या ‘धर्म’ और उसके चमत्कार का प्रयोग, जीवन की भौतिक लिप्साओं को प्राप्त करने का साधन मात्र है? क्या इससे ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ की धारणा लुप्त नहीं होती जा रही है? क्योंकि जितनी भी मुरादें निर्मल बाबा से लोगों द्वारा मांगी जा रही हैं, वे सब की सब निजी लाभ से संबंधित हैं। एक भी शख्स दरबार में देखने में नहीं आया जिसने देश के लिए, जरूरत मंदों के लिए अथवा सामाजिक बुराईयों पर अंकुश के लिए कोई मनोकामना रखी हो और न ही बाबा की ओर से ऐसी कोई पहल होती दिखती है।
  बड़ा सवाल है कि एक संत का समाज में क्या योगदान होना चाहिए? संत पूरे समाज का होता है, उसका ध्यान केंद्र मात्र ही व्यक्ति नहीं, समाज, राष्टÑ यहां तक कि सम्पूर्ण विश्व होता है। जो वास्तव में साधुता को पा जाते हैं या जिन पर ईश्वर की थोड़ी भी कृपा हो जाती है। वे उसका लालच या स्वयं का दम्भ भरने के लिए प्रदर्शन नहीं करते। बुद्ध को ज्ञान हुआ तो वे मौन हो गए। रहीमदासजी कहते हैं कि-
       रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहिं।
       जे जानत ते कहत नहिं, जे कहत ते जानत नाहिं।।
पर आज संतों की परिभाषा में परिवर्तन हो गया है। धर्म के धंधें की नई थ्योरी चल पड़ी है। खासकर भारत जैसे आस्था प्रधान देश में धर्म गुरुओं से यकायक लाभ मिल जाने की भाग्यवादी संकल्पना ने आकार ले लिया है। लाभ के निमित्त देश में भेड़चाल है। कैसे भी संसार की भौतिक उपलब्धियों पर हमारा अधिकाधिक वर्चस्व हो, इसके लिए चाहे कितना भी अनैतिक होना पड़े यह अब मायने नहीं रखता। हमारे जीवन का हर पल भोग को समर्पित है। दरअसल, जब हम भीतर से कमजोर होते हैं तो बाबाओं के चमत्कारों के चंगुल में फंसते हैं, उनसे उम्मीदें परवान चढ़ती हैं। खासकर महिलाएं ज्यादा आकर्षित होती हैं। बाबाओं का प्राथमिक लक्ष्य भी महिलाएं हमेशा से रही हैं।
 पर कोल्डड्रिंक्स पीने, रूमाल रखने, पेठा बांटने, टाई बांधने जैसे टोटके नुमा समाधान देकर क्या बाबा भगवद्गीता की कर्म और उसके फल के सिद्धांत के विरुद्ध नया मायाजाल नहीं रच दिया है? ऐसे कथित उपायों द्वारा ईश्वरीय कृपा होने की बात कहकर क्या वे हिन्दू धर्म का माखौल नहीं उड़ा रहे? हां ये सच है कि उनका पिछला जीवन क्या था, इस आधार पर उनके ज्ञान पर कोर्ई टिप्पणी करना बेमानी होगा, क्योंकि ईश्वरीय कृपा से जीवन में आमूलचूल परिवर्तन के उदाहरण हमारे यहां (जैसे डाकू रत्नाकर का बाल्मीक बन जाना) भरे पड़े हैं। पर ईश्वरीय कृपा का ऐसा भौंडा प्रदर्शन चाहे निर्मल बाबा करें अथवा कोई अन्य हमारी संस्कृति और आस्था पर आघात है। धर्म जब धंधा बन जाए तो वह धर्म नहीं रह जाता।
  यदि हम देश के इतिहास को देखें तो संतों ने योगविद्या अथवा साधना उपासना से अर्जित ऊर्जा का प्रयोग धन एकत्र करने में कभी नहीं किया। वस्तुओं का विनिमय बिजनेस है पर कृपा का विनिमय दुर्भाग्यपूर्ण है। बाबा को कृपा बांटने से   पहले अपनी निर्मलता को टटोलना होगा, साथ ही लोगों की समस्याओं का समाधान चाट पकौड़ी खाकर, डियोड्रेंट लगाकर देने और लेने वालों को भी अपनी बौद्धिकता को नापना होगा। अपने गिरेबां में झांकना होगा।
 देश में ‘बाबा’ या ‘संत’ शब्द आस्था का प्रतीक है और ऐसी हरकतों से ये शब्द अनास्था, अविश्वास में तब्दील होते जा रहे हैं। आलौकिक सत्ता के प्रति यही आस्था हमारे जीवन का आधार है। इसे हर हाल में महफूज रखना हमारे लिए और आने वाली पीढ़ी के लिए अनिवार्य है।
श्रीश पांडेय

Sunday, 25 March 2012

जीवन का आधार मां

 

इनदिनों देशभर में नवरात्रि का उत्सव चल रहा है। प्रत्येक वर्ष में यह अवसर चार बार(जिसमें दो बार प्रत्यक्ष और दो बार अप्रत्यक्ष जिसे हम गुप्त नवरात्रि भी कहते है) आता है। चैत्र माह की नवरात्रि से हिन्दू वर्ष का आरम्भ होता है। ये चारों नवरात्रियां तीन-तीन माह के अंतराल पर आती हैं। गौर से देखें तो हर तीन माह में मौसम में परिवर्तन के संधिकाल में इनका प्राकट्य होता है और इससे इनदिनों किये जाने वाले व्रत का वैज्ञानिक आधार भी समझा जा सकता है। पेट की स्वच्छता मौसम के परिवर्तन के साथ अनिवार्य है इसीलिए हमारे मनीषियों ने इनको एक निश्चित अंतराल पर वातावरण से अनुकूलन करने के लिए आरम्भ किया था। इसी वैज्ञानिकता को धर्म के साथ जोड़कर, धर्म और विज्ञान के अदभुत सौन्दर्य को, मानव कल्याण के लिए रखा था। ये नौ दिन शक्ति की आराधना का समय भी माना जाता है। माता एक ही है पर वह हमारे सामने विविध रूपों में आती है। उसकी अनेक शक्तियां और अभिव्यक्तियां हैं, जो इस विश्व में उनका कार्य करती हैं। पर जिनको हम पूजते हैं वह एक ही है और वही भगवान की दिव्य चेतना शक्ति है एवं सृष्टि का कारक है।
   जनसाधरण को प्राय: इस भ्रम में देखा जाता है कि वे इन नौ दिनों में देवी के किस रूप की साधना या पूजा उपासना करें। नौ दिनों में क्रमश: शैलपुत्री, ब्रम्हचारिणी, चंद्रघटा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धदात्री के रूप में मॉं की उपासना पद्धति शास्त्रोक्त है। पर एक गृहस्थ के लिए दैनिक कामकाज के बीच इन रूपों की विधिवत साधना सुगम नहीं हो पाती।  इसलिए  सभी  गृहस्थ  साधक जो मॉं की उपासना करना चाहते हैं उन्हें इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए कि वे दुर्गा, काली, लक्ष्मी या फिर सरस्वती की उपासना करें। जैसे हमारी जन्मदात्री मॉं यह भली भांति जानती है कि उम्र के विभिन्न पड़ावों में कब बच्चों को दूध देना है,कब किताबें और खेलकूद की सामग्री और कब सुलाना है, ठीक इसी तरह आदि शक्ति मॉं भी अपने भक्तों, साधकों को समयानुसार इच्छित फल बिना मांगे प्रदान करती है। इसलिए जनसामान्य को मॉं की सात्विक उपासना का क्रम करना चाहिए। इसलिए इन नौ दिनों में सिर्फ मॉं का ध्यान और ऊर्जा एकत्रित करने में लगाना चाहिए। क्योंकि मॉं ही जगत का आधार है। लेकिन यह देखकर पीड़ा होती है कि धर्म हमारे लिए आस्था कम आडम्बर की विषय वस्तु अधिक बनकर रह गया है। हम कलेंडर में विराजित मॉं के प्रति तो श्रद्धान्वत तो होते हैं पर घर-घर में विद्यमान जीवन देने वाली मॉं की उपेक्षा कर बैठते हैं। हम भूल जाते हैं कि मॉं तो सिर्फ  मॉं होती है, वह अच्छी या बुरी नहीं होती और न हो सकती है।
 आज की इस भौतिकतावादी सभ्यता में तथाकथित बुद्धिवादी मनुष्य ने अपने सुख और समृद्धि की खोज में स्वयं को भुला दिया है। मानव समाज  किस लक्ष्य की ओर अग्रसर है समझ पाना कठिन है। आज वह तमाम भौतिक साधनों के बीच आत्मविपन्नता, अर्थहीनता और इतनी घनी ऊब के बीच जीने को विवश है कि वह जीवन का स्पंदन तो महसूस करता है पर किसी व्यक्ति में जीने का भाव नहीं दीखता। लगता है मानो हर ओर जीवन तो है, पर लोग उसे बोझ की तरह ढ़ो रहे हैं। न कहीं सौन्दर्य, न सुख, न संतोष और न शान्ति है। जहां जीवन का आनंद न हो, अलोक न हो, वहां निश्चय मानिए कि जीवन नाममात्र का होता है। गौर से देखें तो हम भौतिक समृद्धि की होड़ में जीना ही भूल गए हैं।
     आज के परिवेश में हम विकृतियों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। मानों हमारे भीतर के जीवन का निश्चित आधार टूट गया हो। जैसे कोई अति आवश्यक  जीवनस्नायु नष्ट हो गए हों और सारा समाज किसी संस्कृति में नहीं, विकृति में जी रहा हो। इस विकृति और विघटन के परिणाम व्यक्ति से लेकर सम्पूर्ण वातावरण में व्याप्त हो गए हैं। परिवार से लेकर पृथ्वी की समस्त परिधि तक उसकी बेसुरी प्रतिध्वनियां सुनाई पड़ रही हैं। ऐसे वातावरण में आज का जीवन नर्क और समाज मृत, सड़ा हुआ, दुर्गन्ध देता शरीर हो गया है। क्योंकि लोग चित्त की बहुत सी विक्षिप्तताओं को पहचानने में बिलकुल असमर्थ हो गए हैं।  सत्ता की, संग्रह की, शक्ति की दौड़ में समाज बेसुध हो चला है। आत्महीनता से पीड़ित व्यक्ति सत्ता और पद की खोज में अंधा हो चला है। यह भी कहा जा सकता है कि आज मनुष्य की समृद्धि, क्षमता और शक्ति तो दिन-दूनी, रात चौगुनी बढ़ती जा रही है। भौतिकता की चकाचौंध के बीच स्वयं का अस्तित्व भी एक मशीन के रूप में रह गया है। कहना पड़ता है कि भगवान बचाए मनुष्य को इस तथाकथित समृद्धि से। क्योंकि सच्चाई है कि यह समृद्धि नहीं विनष्टि का किनारा है, जहां मनुष्यता का पहलू लुप्त होता जा रहा है और मनुष्य पशु से बदतर जीवन जीने को विवश है।
  ऐसे में यह कहना सम्भव नहीं कि मनुष्य की समृद्धि बढ़ गई है। हां वस्तुओं की समृद्धि अवश्य बढ़ी है, पर मानवता की समृद्धि उसी अनुपात में घट गई है। यह सच है कि विज्ञान के आलोक ने मनुष्य की निगाहें खोल दी हैं और उसको झकझोरा है। लेकिन साथ ही उसका बचपन भी छीना है और उसे असमय प्रौढ़ता दे दी है। क्योंकि इस युग का मानव केवल शक्ति की खोज में लगा हुआ है और कथित शक्तियों की उपलब्धि उसके लिए ही खतरा साबित हो रही है।
मनुष्य का मनुष्य को ही ठीक से न पहचानना इस आत्मघाती सम्भावना जड़ है। पदार्थ की अनंत शक्ति से आज का   मानव परिचित है,बल्कि परिचित ही नहीं उसका विजेता भी है। मनुष्य ने पदार्थाणु को तो पहचाना है पर वह आत्माणु से दिनोंदिन अपरिचित होता जा रहा है। यही इस युग की सबसे बड़ी भूल है और विडम्बना भी।
हमारी उपासना,साधना पद्धति हमें अधिकाधिक मानवीय होने की प्रेरणा देती है। जब हम मॉं की उपासना करते हैं और मनोवांक्षित फल की आकांक्षा करते हैं तो यह भी अनिवार्य हो जाता है कि मॉं के गुणों को जीवन में धारण करें। यही हमारी साधना की सफलता है। अन्यथा यह सम्पूर्ण पूजा पद्धति एक क्रिया मात्र बनकर रह जाती है। नौ दिन विशेष हैं और वर्ष में दो बार आते हैं। इस तरह से यदि जीवन औसत 70 वर्ष का माने तो यह अवसर जीवन में 140 बार आता है, जबकि हम विशेष ध्यान-साधना के माध्यम से ऊर्जा अर्जित कर मानव जीवन का भौतिकता के साथ-साथ आध्यात्मिक भी उन्नयन कर सकते हैं। आखिर यही तो इस जीवन का ध्येय। आइये मॉं के इन नौ आराध्य दिनों की वंदना इस मंत्र के साथ करें-
या देवी सर्वभूतेषु मात्र रूपेण संस्थित:,
नमस्तस्यै,नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमो नम:।

श्रीश पांडेय

Monday, 5 March 2012

स्कूल में नक़ल

   मार्च के महीने में सरकार की उपलब्धियों का इम्तिहान वार्षिक बजट के जरिए होता है तो यही महीना प्राय: स्कूलों में विद्यार्थियों के इम्तिहान का भी होता है। इसी क्रम में इनदिनों प्रदेश के  विद्यालयों में हाई स्कूल और हायर सेकेंड्री की  परीक्षा आयोजित की जा रही है। गांव, कस्बों और शहरों में सुबह से स्वच्छ धवल कपड़ों में सजे बच्चों के हाथ में नोट्स के रट्टा मारते समूहों के दृश्य गली, नुक्कड़, चौराहों पर देखे जा सकते हैं। दरअसल, यह स्कूली परीक्षा का ऐसा अंतिम उत्सव  और कॅरियर को मनोवांक्षित दिशा में ले जाने वाला अहम पड़ाव  है,जहां से भविष्य की राह बनती है।
   परीक्षा कैसी भी हो उसमें एकाग्रता, मेहनत और लगन से सफलता पायी जा सकती है। लेकिन दुर्भाग्य से इसके लिए नकल-जुगाड़ के प्रबंध न सिर्फ छात्रों द्वारा, यहां तक कि सरकारी और कथित निजी सरकारी मान्यता प्राप्त स्कूल के संचालकों द्वारा भी किए जाने के आरोप जब-तब लगते रहते हैं। सरकार के निर्देश हैं कि परीक्षाओं में सफलता का प्रतिशत उत्तरोत्तर बढ़े और ऐसा न होने पर शो-काज नोटिसों कर गाज भी शिक्षकों पर गिरती है। यही वजह है कि दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित विद्यालयों में नकल जैसी तकनीकि को अपरोक्ष रूप से प्रश्रय दिया जाता रहा है। वार्षिक परीक्षाओं के माध्यम से किसी विद्यार्थी की वर्ष भर की मेहनत और विद्यालयों द्वारा प्रदत्त शिक्षा का मूल्यांकन किया जाता है। लेकिन सम्पूर्ण प्रदेश में जिस तरह से इन इम्तिहानों में नकल के प्रकरण थोक की दर से दर्ज किये जा रहे हैं, उससे विद्यार्थियों की तैयारी और उनके स्कूल में हुए अध्यापन की कलई भी खुलती दिख रही है, कि साल भर विद्यालयों में विद्यार्थी ने क्या पढ़ा और उन्हें शिक्षकों द्वारा क्या पढ़ाया गया।
    गौरतलब है कि स्कूलों की इन अंतिम परीक्षाओं (12वीं) के लिए प्रदेश में तीन तरह के बोर्ड संचालित हैं- सीबीएससी, आईसीएससी और मध्य प्रदेश बोर्ड। प्रथम दो संस्थाओं का प्रचलन निजी स्कूलों में है, जबकि मध्यप्रदेश बोर्ड प्राय: शासकीय स्कूलों में संचालित है। पाठÞ्यक्रम और परीक्षा के लिहाज से भी मध्य प्रदेश बोर्ड को अन्य बोर्डों के बनिस्बत दोयम दर्जे का माना जाता है। यानी पढ़ाई आसान और पाठ्यक्रम अपेक्षाकृत सरल व सुबोध होता है। बावजूद इसके जितने भी नकल प्रकरण दर्ज किए जा रहे हैं, उनमें से 95 फीसदी सरकारी स्कूलों अथवा सरकारी मान्यता प्राप्त उन निजी स्कूलों में जो ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में अवस्थित हंै। परीक्षाओं में हो रही नकल दो बातों पर मोहर लगाती है, एक तो विद्यालयों में शिक्षक साल भर क्या करते हैं, दूसरे विद्यार्थी भी तमाम शैक्षणिक सुविधाओं के बीच कितना पढ़ाई के प्रति गम्भीर हैं। विडम्बना है कि तीन तरह के बोर्डों में मध्य प्रदेश बोर्ड के प्रश्न-पत्रों का स्तर ऐसा रखा गया है, ताकि अधिक से अधिक छात्र उत्तीर्ण हो सकें और सरकार अपनी पीठ थपथपा कर, खम ठोक सके कि उसके शालाओं की स्थिति बेहतर है। जबकि हकीकत यह है कि उसके पाठ्यक्रम, सीबीएससी और आईसीएससी के पाठ्यक्रमों से 30 फीसदी कम हैं और प्रश्न पत्रों के स्तर में बड़ा अंतर भी। बात बड़ी साफ है कि सरकारी स्कूलों से निकले छात्रों और अन्य केन्द्रीय बोर्डों के छात्रों के स्तर में एक बड़ा अंतर पहले से मौजूद होता है, जिसका खमियाजा उसे आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं में भोगना पड़ता है। परिणामत: आईआईटी, पीएमटी और पीईटी की प्रतियोगिता में उच्च स्तरीय सफलताओं में मप्र बोर्ड से उत्तीर्ण बच्चों का प्रतिशत नाममात्र का देखने में आया है।
दरअसल, सरकारी स्कूलों की दशा महज शिक्षा की खानापूर्ति का जरिया बन कर रह गयी है। इस पर नये सिरे से विचार करने का वक्त आ गया है। क्योंकि सिर्फ येन-केन प्रकारेण उत्तीर्ण छात्रों से सरकारी आंकड़े तो चमक सकते हैं, पर विद्यार्थियों का भविष्य एक ऐसी अंधी सुरंग में धंसता जा रहा है जहां से उसे निराशा और अंधेरे ही नसीब होना तय है। शहरी क्षेत्रों के कुछ मॉडल स्कूलों का छोड़ दें तो, अधिकांशत: ऐसे सरकारी स्कूल मजबूरी के स्कूल साबित हो रहे हैं और वे ही छात्र यहां दाखिला लेते हैं, जिनके पास विकल्प हीनता है। सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का स्तर और पढ़ाई की गुणवत्ता किसी से छिपी नहीं है। राष्टÑ निर्माण का पुनीत कार्र्य करने वाले शिक्षकों से मजदूरी के वेतन पर कराया जा रहा शिक्षण कार्य महज एक औपचारिक गतिविधि बनकर रह गया है। ऐसा भी नहीं है कि सरकार इस पूरे वाकये से अनभिज्ञ है। पर लगता है उसने इस तथ्य से आंखें मंूदना ही बेहतर समझा है। क्योंकि न तो किसी अफसर, न ही किसी नेता के बच्चे इन स्कूलों में दाखिला लेते हैं। यहां तक कि इन स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों के बच्चे भी निजी स्कूलों में सीबीएससी और आईसीएससी पाठ्यक्रम के तहत अध्ययन में बेहतर भविष्य की राह देखते और मानते हैं।
   गौरतलब है कि ये परीक्षाएं अब इस रूप में महत्वपूर्ण हो चुकीं हैं कि  आईआईटी की प्रतियोगी परीक्षाओं में 12वीं के प्राप्तांक को भी प्रतियोगिता के बाद बनने वाली मेरिट का आधार बना दिए जाने से इस परीक्षा के अंकों का महत्व बढ़ा है। उधर सरकार ने पटवारी की प्रतियोगी परीक्षा में आधे अंक अंकसूची के आधार पर देने के निर्णय से इसके प्राप्तांकों का महत्व बढ़ा है। ऐसे में सरकारी बनाम निजी स्कूल और मध्यप्रदेश बोर्ड बनाम केंद्रीय बोर्डों में नई बहस छिड़ सकती है। देश के नामचीन   कॉलेजों में दाखिले के लिए भी 12वीं की अंकसूची का स्थान अहम है। ऐसी परिस्थितियों में प्रदेश सरकार को स्कूलों की शौक्षणिक गतिविधियों की गुणवत्ता पर ध्यान देना ही होगा, अन्यथा इन विद्यालयों से निकले बच्चों के लिए शिक्षा के माध्यम से भविष्य निर्माण की राह स्वप्न बनकर न रह जाए। इसके लिए शिक्षकों का मनोबल, उनके वेतन को सुधारकर और उन्हें शैक्षणिक ट्रेंड में आद्यतन करके बढ़ाया जा सकता है, तो छात्रों को भी समझना होगा कि मात्र नकल  या किसी जुगत से परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने मात्र से कुछ हासिल होने वाला नहीं।
  नकल से असल सफलता नहीं पायी जा सकती, इस मर्म को न सिर्फ विद्यार्थी समझें बल्कि उनके अध्यापक और अभिभावक भी। नकल से उत्तीर्ण होने वाले छात्रों की वही ठीक वही स्थिति है, जो पेढ़ की डाल पर बैठकर उसी डाल को काटने वाले कालिदास की थी। अत: छात्रों को नकल के जरिए छोटी उपलब्धियों के फिराक में शिक्षा और ज्ञान की जड़ को खोखला करने वाली प्रवृत्ति से बचना ही होगा।
                                   श्रीश पाण्डेय
                                   सम्पर्क - 09424733818.