Sunday, 10 June 2012

इंडिया अगेंस्ट (कांग्रेस) करप्शन

  एक लघु कथा है कि पांच डाकू थे उनमें से चार गांवों में जाकर डाका डालते और पांचवां उनकी रखवाली करता कि कहीं उन पर कोई आंच तो नहीं आ रही....एक बार पुलिस ने पांचों को गिरफ्तार कर लिया....उन्हें अदालत में पेश किया....चार को अदालत ने सजा दे दी....पांचवां बोला मैंने आज तक किसी भी डाके में भाग नहीं लिया....किसी ग्रामीण को नहीं लूटा.... यदि कोई ग्रामीण कहे कि मैंने उन्हें लूटा है तो मैं संयास ले लूंगा... ! तो क्या उसको बरी कर दिया जाये ?
इनदिनों यूपीए सरकार के मुखिया की कुछ ऐसी ही दशा दुर्दशा दिखती है। बड़े-बड़े नामों से सुसज्जित सरकार के धुरंधर अर्थशास्त्री-प्रशासक महंगाई, काला धन, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, कानून व्यवस्था, सुधारों को लागू करने में लाचार और बात-बात पर सिर धुनते, बिखरते किसी तरह ‘फेवीकोल का जोड़ है टूटेगा नहीं’ के विज्ञापन की तर्ज पर पिछले 8 साल से दिल्ली के सिंहासन से कुछ इस तरह चिपके हैं कि उनके जाते ही देश गढ्ढेÞ में  गिर पड़ेगा।  सरकार कोमा में जा चुकी है जिसका नमूना है कभी प्रधानमंत्री कहते हैं कि आने वाले साल और कठिन होंगे, हमें (आम जनता) को इसके लिए तैयार रहना होगा। उसके ग्रामीण विकास मंत्री जयरामरमेश ने यूपीए सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना मनरेगा के औचित्य और भविष्य पर सवाल खड़ा कर दिया है।  सरकार, सरकार नहीं मजाक बन कर रह गयी है।
इनदिनों देश में अजीब तरह की आपाधपी मची है। जिसे देखकर किसी भी राष्टÑभक्त का राष्ट्र की दिशा दशा देखकर चिंतित होना लाजिमी है। विगत आठ वर्षों से ऐसा व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री है। जिनके चरित्र,नैतिकता, ईमानदारी का न सिर्फ सरकार के कारिंदों द्वारा गुणगान किया जाता है, बल्कि समूचा विपक्ष भी गाहे-बगाहे उनके इस रूप की आराधना करता रहा है। लेकिन जिसके कार्यकाल में लाखों करोड़ों के घोटाले उजागर हुए  हों और  जो भ्रष्टाचार पर अंकुश रखने में हर तरह से धृतराष्टÑ की तरह अक्षम रहा हो, जिसके कार्यकाल में नामचीन अर्थशास्त्री होने के बावजूद सर्वाधिक महंगाई बढ़ी हो, जिनके चहेते मोंटेक सिंह ने जिस बेशर्मी से गरीबी का मजाक उड़ाया हो ऐसी सरकार से ना उम्मीदी  होना स्वाभविक है। कुलमिलाकर समूची अर्थव्यवस्था की जैसी दुर्दशा इस सरकार में हुई है वैसी स्वतंत्र भारत के इतिहास में देखने में नहीं आती।
  एक-गैर राजनीति और संवेदना शून्य प्रधानमंत्री जिसे देश की आवाम की नब्ज टटोलना तो दूर उल्टे जीडीपी, आर्थिक विकास दर, मौद्रिक नीति  जैसी अर्थव्यवस्था की टर्मिनोलॉजी के नाम पर बार-बार यह बयान करना कि महंगाई के वैश्विक हालातों को देखते हुए यह और बढ़ेगी, भारत को मंदी का दौर और झेलना होगा...जैसे उवाचों ने समाधान कम समस्या ज्यादा पैदा की है। इतनी ही तत्परता और संजीदगी यदि सरकार ने भ्रष्टाचार और अनुमानित 400 लाख करोड़ के काले धन की वापसी पर दिखाई होती तो देश के हालात इतने पतले न होते। कांग्रेस शासन काल में घोटालों का सिलसिला आजादी के बाद से ही नाले के रूप में चल पड़ा था जिसने आज एक वेगवती नदी का रूप धर लिया है। एक मोटी नजर इस फेरहिस्त पर मारें तो-1948 जीप घोटाला, हरिदास मूंदड़ा घोटाला 1957 से लेकर, पामोलिन तेल घोटाला, आज के कॉमनवेल्थ, आदर्श हाउसिंग सोसायटी, टूजी स्पेक्ट्रम और अब कोयला आवंटन के मामले में संदेह उपजने तक सैकड़ों मामले हैं जिन पार्टी दागदार हुई है।
घपलों-घोटलों की लम्बी फेरहिस्त दर्शाती है कि कभी पार्टी ने इस पर अंकुश रखने की कोई ठोस योजना नहीं बनाई। यह हकीकत है कि गठबंधन सरकारों में यह प्रवृत्ति तीव्र गति से बढ़ी है,चाहे कांगे्रस के नेतृत्व में यूपीए हो या भाजपा के नेतृत्व में राजग।  लेकिन यूपीए के पिछले दो कार्यकाल में जिस कदर सरकारी खजाने की लूट मची है उसको देखकर कहना पड़ता है किअंग्रेजों द्वारा लूटे गए इंडिया की मिसालें आज की तुलना में फीकी हैं।
अब जबकि अन्ना हजारे समूह ने प्रधानमंत्री की ईमानदारी पर सवाल खड़े किए हैं तो स्वयं मनमोहन सिंह और उनके कु नबे के मंत्री इसे बेबुनिाद बता कर पल्ला झाड़ लेने और अन्ना को राष्टÑ विरोधी के हाथ में खेलने जैसे डायलॉग जड़कर सर छिपाने की कवायद में जुटे हैं। आरोपों के खिलाफ शुतुर्मुर्गी मुद्रा अख्तियार करने बजाय सरकार को आंख खोलकर चीजों देखना और उनके जबाव देने चाहिए। आखिर यूपीए को जनता ने चुना है और गठबंधन की मजबूरी के नाम पर इससे आंख नहीं मूंदी जा सकती। इसी बचाव की नीति का नतीजा है कि आज वह चौतरफा कटघरे में खड़ी नजर आती है। फेसबुक और टिवटर की सोशल बेबसाइटों में कांग्रेस और यूपीए के विरुद्ध जनमानस के गुस्से को साफ पढ़ा जा सकता है।
    आज स्वयं सरकार की कारिस्तानियों से ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ की मुहिम ‘इंडिया अगेंस्ट कांग्रेस’ बनती जा रही है या कहा जाय कि बन चुकी है तो ज्यादा बेहतर होगा। दरअसल, अन्ना समूह द्वारा ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ मिशन की शुरूआत में किसी भी दल, कर्मचारियों  अथवा  प्राइवेट कंपनियों द्वारा कैसा भी करप्शन हो के विरुद्ध था। जिसके लिए लोकपाल और अन्य व्यवस्थागत सुधारों की मांगों को एकतरफा अनसुना कर देने के बाद आहिस्ता-आहिस्ता यह मुहिम कांग्रेस विरुद्ध ज्यादा बनती गई। यद्यपि अन्य दल भी इसी दलदल में धंसे हैं। हालिया   भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्षमण को  हुई सजा और येदियुरप्पा की बेदखली इसी की बानगी है।
 अब जबकि चुनाव में दो वर्ष शेष हैं, सरकार के पास पूरा मौका है कि वह अपना दामन धो-पोंछ सके पर इसके लिए कालेधन, भ्रष्टाचार को लेकर वह ऐसा कुछ करती दिखे ताकि यह समझा जा सके कि वह तंद्रा से जाग चुकी है। भाजपा जिसे कांग्रेस का विकल्प माना जा रहा है जिसके लिए पार्टी में अगला प्रधानमंत्री कौन होगा के निमित्त आभाषी युद्ध शुरु हो गया है। ऐसे में कांग्रेस के पास अवसर  है कि वह स्थिरता के साथ महंगाई, भ्रष्टाचार, कालेधन पर अपना रुख सख्त करके दागदार दामन और शर्मसार छवि को स्वच्छ व सम्मानजनक बना सकती है। अन्यथा अपने विरुद्ध जनता के गुस्से को वह बिहार, यूपी के चुनावों में देख ही चुकी है।
                                                                                                                                 -  श्रीश पाण्डेय

Thursday, 19 April 2012

कितने निर्मल है बाबा

भारत चमत्कार, आशीर्वाद, कौतूहल से भरे कारनामों की सम्भावनाओं का देश है। यहां धर्म के नाम पर जितने आलौकिक चमत्कार बाबाओं ने दिखाये हैं, उतने विश्व के किसी और मुल्क में मुश्किल हंै। बाबाओं के जादुई करिश्मों के पीछे देवी देवताओं द्वारा वायु मार्ग से गमन और मनचाही वस्तुओं व सफलता को पल झपकते प्रदान कर देने की कल्पना ही इस आकर्षण का आधार है। मनुष्य आरम्भ से साधना-उपासना द्वारा ऐसी अलौकिक शक्तियों को हासिल करने के प्रयास करता आया है, जो उसे आसानी से सफलता के पायदान पर पहुंचा सके। कमोबेश अलौकिक सत्ता के प्रति जनसामान्य में आकर्षण की वजह यही रही है कि हमारे वेद, पुराण और धर्म ग्रन्थ- तंत्र-मंत्र के जादुई चमत्कारों से पटे पड़े हैं। इसीलिए समय-समय पर भारत में अनेक बाबाओं का उद्भव और पराभव भी देखने में आया है। जिनमें से कुछ का प्रभाव उनके जीवन काल में और उसके बाद भी विद्यमान है, तो वहीं कुछ की शक्तियों का भांडाफोड़ चंद वर्षों में होता देखा गया और उनकी कलई खुलते ही उनके चमत्कारों की खुमारी भी जनता में बाढ़ के पानी के तरह उतरती देखी गई।
      इनदिनों देश में ऐसे ही एक हैं निर्मल बाबा जो, अपनी कृपा को धन के एवज में बेच रहे हैं। लाखों में शुरू हुआ यह कुटीर उद्योग आज करोड़ों की इन्डस्ट्री बन गया है। बाबा अपने भक्तों पर कृपा कैसे करते हैं? यह तो रहस्यमय है। पर जो भी उपाय वह अपने भक्तों को सुझाते हैं, वह एक बारगी तो हास्यास्पद और मजाकिया लगते हैं, पर यह तो मानना ही पड़ता है कि असर भी हुआ होगा, तभी तो दिनोंदिन जन समुदाय बाबा के दरबार में उमड़ रहा है। बाबा के विरोध और समर्थन में तर्क और बहस ऐसा सिलसिला देश में चल पड़ा है कि बाबा का हर बयान ब्रेकिंग न्यूज बना है।
  दरअसल, देश में ऐसे बाबा, महात्माओं की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है। जिनके  लिए जगह-जगह पंड़ालों में श्रद्धालुओं की भीड़ ताली पीटते नमन करती, दान देती नजर आती है। टीवी चैनलों पर इन बाबाओं का छितिज आकाश गंगा की तरह बढ़ रहा है। ज्योतिषी उपायों, वास्तु के फायदे-नुक्सान का एक ऐसा विज्ञान विकसित हो गया है कि विकास के इनके मापदण्ड, विज्ञान को पीछे छोड़ते दिखते हैं। इस निमित्त बाकायदा सुसज्जित कार्यालय खुल हैं। एक निर्धारित फीस है, पैकेज हैं। पर अहम सवाल यह है कि क्या ‘धर्म’ और उसके चमत्कार का प्रयोग, जीवन की भौतिक लिप्साओं को प्राप्त करने का साधन मात्र है? क्या इससे ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ की धारणा लुप्त नहीं होती जा रही है? क्योंकि जितनी भी मुरादें निर्मल बाबा से लोगों द्वारा मांगी जा रही हैं, वे सब की सब निजी लाभ से संबंधित हैं। एक भी शख्स दरबार में देखने में नहीं आया जिसने देश के लिए, जरूरत मंदों के लिए अथवा सामाजिक बुराईयों पर अंकुश के लिए कोई मनोकामना रखी हो और न ही बाबा की ओर से ऐसी कोई पहल होती दिखती है।
  बड़ा सवाल है कि एक संत का समाज में क्या योगदान होना चाहिए? संत पूरे समाज का होता है, उसका ध्यान केंद्र मात्र ही व्यक्ति नहीं, समाज, राष्टÑ यहां तक कि सम्पूर्ण विश्व होता है। जो वास्तव में साधुता को पा जाते हैं या जिन पर ईश्वर की थोड़ी भी कृपा हो जाती है। वे उसका लालच या स्वयं का दम्भ भरने के लिए प्रदर्शन नहीं करते। बुद्ध को ज्ञान हुआ तो वे मौन हो गए। रहीमदासजी कहते हैं कि-
       रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहिं।
       जे जानत ते कहत नहिं, जे कहत ते जानत नाहिं।।
पर आज संतों की परिभाषा में परिवर्तन हो गया है। धर्म के धंधें की नई थ्योरी चल पड़ी है। खासकर भारत जैसे आस्था प्रधान देश में धर्म गुरुओं से यकायक लाभ मिल जाने की भाग्यवादी संकल्पना ने आकार ले लिया है। लाभ के निमित्त देश में भेड़चाल है। कैसे भी संसार की भौतिक उपलब्धियों पर हमारा अधिकाधिक वर्चस्व हो, इसके लिए चाहे कितना भी अनैतिक होना पड़े यह अब मायने नहीं रखता। हमारे जीवन का हर पल भोग को समर्पित है। दरअसल, जब हम भीतर से कमजोर होते हैं तो बाबाओं के चमत्कारों के चंगुल में फंसते हैं, उनसे उम्मीदें परवान चढ़ती हैं। खासकर महिलाएं ज्यादा आकर्षित होती हैं। बाबाओं का प्राथमिक लक्ष्य भी महिलाएं हमेशा से रही हैं।
 पर कोल्डड्रिंक्स पीने, रूमाल रखने, पेठा बांटने, टाई बांधने जैसे टोटके नुमा समाधान देकर क्या बाबा भगवद्गीता की कर्म और उसके फल के सिद्धांत के विरुद्ध नया मायाजाल नहीं रच दिया है? ऐसे कथित उपायों द्वारा ईश्वरीय कृपा होने की बात कहकर क्या वे हिन्दू धर्म का माखौल नहीं उड़ा रहे? हां ये सच है कि उनका पिछला जीवन क्या था, इस आधार पर उनके ज्ञान पर कोर्ई टिप्पणी करना बेमानी होगा, क्योंकि ईश्वरीय कृपा से जीवन में आमूलचूल परिवर्तन के उदाहरण हमारे यहां (जैसे डाकू रत्नाकर का बाल्मीक बन जाना) भरे पड़े हैं। पर ईश्वरीय कृपा का ऐसा भौंडा प्रदर्शन चाहे निर्मल बाबा करें अथवा कोई अन्य हमारी संस्कृति और आस्था पर आघात है। धर्म जब धंधा बन जाए तो वह धर्म नहीं रह जाता।
  यदि हम देश के इतिहास को देखें तो संतों ने योगविद्या अथवा साधना उपासना से अर्जित ऊर्जा का प्रयोग धन एकत्र करने में कभी नहीं किया। वस्तुओं का विनिमय बिजनेस है पर कृपा का विनिमय दुर्भाग्यपूर्ण है। बाबा को कृपा बांटने से   पहले अपनी निर्मलता को टटोलना होगा, साथ ही लोगों की समस्याओं का समाधान चाट पकौड़ी खाकर, डियोड्रेंट लगाकर देने और लेने वालों को भी अपनी बौद्धिकता को नापना होगा। अपने गिरेबां में झांकना होगा।
 देश में ‘बाबा’ या ‘संत’ शब्द आस्था का प्रतीक है और ऐसी हरकतों से ये शब्द अनास्था, अविश्वास में तब्दील होते जा रहे हैं। आलौकिक सत्ता के प्रति यही आस्था हमारे जीवन का आधार है। इसे हर हाल में महफूज रखना हमारे लिए और आने वाली पीढ़ी के लिए अनिवार्य है।
श्रीश पांडेय

Sunday, 25 March 2012

जीवन का आधार मां

 

इनदिनों देशभर में नवरात्रि का उत्सव चल रहा है। प्रत्येक वर्ष में यह अवसर चार बार(जिसमें दो बार प्रत्यक्ष और दो बार अप्रत्यक्ष जिसे हम गुप्त नवरात्रि भी कहते है) आता है। चैत्र माह की नवरात्रि से हिन्दू वर्ष का आरम्भ होता है। ये चारों नवरात्रियां तीन-तीन माह के अंतराल पर आती हैं। गौर से देखें तो हर तीन माह में मौसम में परिवर्तन के संधिकाल में इनका प्राकट्य होता है और इससे इनदिनों किये जाने वाले व्रत का वैज्ञानिक आधार भी समझा जा सकता है। पेट की स्वच्छता मौसम के परिवर्तन के साथ अनिवार्य है इसीलिए हमारे मनीषियों ने इनको एक निश्चित अंतराल पर वातावरण से अनुकूलन करने के लिए आरम्भ किया था। इसी वैज्ञानिकता को धर्म के साथ जोड़कर, धर्म और विज्ञान के अदभुत सौन्दर्य को, मानव कल्याण के लिए रखा था। ये नौ दिन शक्ति की आराधना का समय भी माना जाता है। माता एक ही है पर वह हमारे सामने विविध रूपों में आती है। उसकी अनेक शक्तियां और अभिव्यक्तियां हैं, जो इस विश्व में उनका कार्य करती हैं। पर जिनको हम पूजते हैं वह एक ही है और वही भगवान की दिव्य चेतना शक्ति है एवं सृष्टि का कारक है।
   जनसाधरण को प्राय: इस भ्रम में देखा जाता है कि वे इन नौ दिनों में देवी के किस रूप की साधना या पूजा उपासना करें। नौ दिनों में क्रमश: शैलपुत्री, ब्रम्हचारिणी, चंद्रघटा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धदात्री के रूप में मॉं की उपासना पद्धति शास्त्रोक्त है। पर एक गृहस्थ के लिए दैनिक कामकाज के बीच इन रूपों की विधिवत साधना सुगम नहीं हो पाती।  इसलिए  सभी  गृहस्थ  साधक जो मॉं की उपासना करना चाहते हैं उन्हें इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए कि वे दुर्गा, काली, लक्ष्मी या फिर सरस्वती की उपासना करें। जैसे हमारी जन्मदात्री मॉं यह भली भांति जानती है कि उम्र के विभिन्न पड़ावों में कब बच्चों को दूध देना है,कब किताबें और खेलकूद की सामग्री और कब सुलाना है, ठीक इसी तरह आदि शक्ति मॉं भी अपने भक्तों, साधकों को समयानुसार इच्छित फल बिना मांगे प्रदान करती है। इसलिए जनसामान्य को मॉं की सात्विक उपासना का क्रम करना चाहिए। इसलिए इन नौ दिनों में सिर्फ मॉं का ध्यान और ऊर्जा एकत्रित करने में लगाना चाहिए। क्योंकि मॉं ही जगत का आधार है। लेकिन यह देखकर पीड़ा होती है कि धर्म हमारे लिए आस्था कम आडम्बर की विषय वस्तु अधिक बनकर रह गया है। हम कलेंडर में विराजित मॉं के प्रति तो श्रद्धान्वत तो होते हैं पर घर-घर में विद्यमान जीवन देने वाली मॉं की उपेक्षा कर बैठते हैं। हम भूल जाते हैं कि मॉं तो सिर्फ  मॉं होती है, वह अच्छी या बुरी नहीं होती और न हो सकती है।
 आज की इस भौतिकतावादी सभ्यता में तथाकथित बुद्धिवादी मनुष्य ने अपने सुख और समृद्धि की खोज में स्वयं को भुला दिया है। मानव समाज  किस लक्ष्य की ओर अग्रसर है समझ पाना कठिन है। आज वह तमाम भौतिक साधनों के बीच आत्मविपन्नता, अर्थहीनता और इतनी घनी ऊब के बीच जीने को विवश है कि वह जीवन का स्पंदन तो महसूस करता है पर किसी व्यक्ति में जीने का भाव नहीं दीखता। लगता है मानो हर ओर जीवन तो है, पर लोग उसे बोझ की तरह ढ़ो रहे हैं। न कहीं सौन्दर्य, न सुख, न संतोष और न शान्ति है। जहां जीवन का आनंद न हो, अलोक न हो, वहां निश्चय मानिए कि जीवन नाममात्र का होता है। गौर से देखें तो हम भौतिक समृद्धि की होड़ में जीना ही भूल गए हैं।
     आज के परिवेश में हम विकृतियों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। मानों हमारे भीतर के जीवन का निश्चित आधार टूट गया हो। जैसे कोई अति आवश्यक  जीवनस्नायु नष्ट हो गए हों और सारा समाज किसी संस्कृति में नहीं, विकृति में जी रहा हो। इस विकृति और विघटन के परिणाम व्यक्ति से लेकर सम्पूर्ण वातावरण में व्याप्त हो गए हैं। परिवार से लेकर पृथ्वी की समस्त परिधि तक उसकी बेसुरी प्रतिध्वनियां सुनाई पड़ रही हैं। ऐसे वातावरण में आज का जीवन नर्क और समाज मृत, सड़ा हुआ, दुर्गन्ध देता शरीर हो गया है। क्योंकि लोग चित्त की बहुत सी विक्षिप्तताओं को पहचानने में बिलकुल असमर्थ हो गए हैं।  सत्ता की, संग्रह की, शक्ति की दौड़ में समाज बेसुध हो चला है। आत्महीनता से पीड़ित व्यक्ति सत्ता और पद की खोज में अंधा हो चला है। यह भी कहा जा सकता है कि आज मनुष्य की समृद्धि, क्षमता और शक्ति तो दिन-दूनी, रात चौगुनी बढ़ती जा रही है। भौतिकता की चकाचौंध के बीच स्वयं का अस्तित्व भी एक मशीन के रूप में रह गया है। कहना पड़ता है कि भगवान बचाए मनुष्य को इस तथाकथित समृद्धि से। क्योंकि सच्चाई है कि यह समृद्धि नहीं विनष्टि का किनारा है, जहां मनुष्यता का पहलू लुप्त होता जा रहा है और मनुष्य पशु से बदतर जीवन जीने को विवश है।
  ऐसे में यह कहना सम्भव नहीं कि मनुष्य की समृद्धि बढ़ गई है। हां वस्तुओं की समृद्धि अवश्य बढ़ी है, पर मानवता की समृद्धि उसी अनुपात में घट गई है। यह सच है कि विज्ञान के आलोक ने मनुष्य की निगाहें खोल दी हैं और उसको झकझोरा है। लेकिन साथ ही उसका बचपन भी छीना है और उसे असमय प्रौढ़ता दे दी है। क्योंकि इस युग का मानव केवल शक्ति की खोज में लगा हुआ है और कथित शक्तियों की उपलब्धि उसके लिए ही खतरा साबित हो रही है।
मनुष्य का मनुष्य को ही ठीक से न पहचानना इस आत्मघाती सम्भावना जड़ है। पदार्थ की अनंत शक्ति से आज का   मानव परिचित है,बल्कि परिचित ही नहीं उसका विजेता भी है। मनुष्य ने पदार्थाणु को तो पहचाना है पर वह आत्माणु से दिनोंदिन अपरिचित होता जा रहा है। यही इस युग की सबसे बड़ी भूल है और विडम्बना भी।
हमारी उपासना,साधना पद्धति हमें अधिकाधिक मानवीय होने की प्रेरणा देती है। जब हम मॉं की उपासना करते हैं और मनोवांक्षित फल की आकांक्षा करते हैं तो यह भी अनिवार्य हो जाता है कि मॉं के गुणों को जीवन में धारण करें। यही हमारी साधना की सफलता है। अन्यथा यह सम्पूर्ण पूजा पद्धति एक क्रिया मात्र बनकर रह जाती है। नौ दिन विशेष हैं और वर्ष में दो बार आते हैं। इस तरह से यदि जीवन औसत 70 वर्ष का माने तो यह अवसर जीवन में 140 बार आता है, जबकि हम विशेष ध्यान-साधना के माध्यम से ऊर्जा अर्जित कर मानव जीवन का भौतिकता के साथ-साथ आध्यात्मिक भी उन्नयन कर सकते हैं। आखिर यही तो इस जीवन का ध्येय। आइये मॉं के इन नौ आराध्य दिनों की वंदना इस मंत्र के साथ करें-
या देवी सर्वभूतेषु मात्र रूपेण संस्थित:,
नमस्तस्यै,नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमो नम:।

श्रीश पांडेय

Monday, 5 March 2012

स्कूल में नक़ल

   मार्च के महीने में सरकार की उपलब्धियों का इम्तिहान वार्षिक बजट के जरिए होता है तो यही महीना प्राय: स्कूलों में विद्यार्थियों के इम्तिहान का भी होता है। इसी क्रम में इनदिनों प्रदेश के  विद्यालयों में हाई स्कूल और हायर सेकेंड्री की  परीक्षा आयोजित की जा रही है। गांव, कस्बों और शहरों में सुबह से स्वच्छ धवल कपड़ों में सजे बच्चों के हाथ में नोट्स के रट्टा मारते समूहों के दृश्य गली, नुक्कड़, चौराहों पर देखे जा सकते हैं। दरअसल, यह स्कूली परीक्षा का ऐसा अंतिम उत्सव  और कॅरियर को मनोवांक्षित दिशा में ले जाने वाला अहम पड़ाव  है,जहां से भविष्य की राह बनती है।
   परीक्षा कैसी भी हो उसमें एकाग्रता, मेहनत और लगन से सफलता पायी जा सकती है। लेकिन दुर्भाग्य से इसके लिए नकल-जुगाड़ के प्रबंध न सिर्फ छात्रों द्वारा, यहां तक कि सरकारी और कथित निजी सरकारी मान्यता प्राप्त स्कूल के संचालकों द्वारा भी किए जाने के आरोप जब-तब लगते रहते हैं। सरकार के निर्देश हैं कि परीक्षाओं में सफलता का प्रतिशत उत्तरोत्तर बढ़े और ऐसा न होने पर शो-काज नोटिसों कर गाज भी शिक्षकों पर गिरती है। यही वजह है कि दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित विद्यालयों में नकल जैसी तकनीकि को अपरोक्ष रूप से प्रश्रय दिया जाता रहा है। वार्षिक परीक्षाओं के माध्यम से किसी विद्यार्थी की वर्ष भर की मेहनत और विद्यालयों द्वारा प्रदत्त शिक्षा का मूल्यांकन किया जाता है। लेकिन सम्पूर्ण प्रदेश में जिस तरह से इन इम्तिहानों में नकल के प्रकरण थोक की दर से दर्ज किये जा रहे हैं, उससे विद्यार्थियों की तैयारी और उनके स्कूल में हुए अध्यापन की कलई भी खुलती दिख रही है, कि साल भर विद्यालयों में विद्यार्थी ने क्या पढ़ा और उन्हें शिक्षकों द्वारा क्या पढ़ाया गया।
    गौरतलब है कि स्कूलों की इन अंतिम परीक्षाओं (12वीं) के लिए प्रदेश में तीन तरह के बोर्ड संचालित हैं- सीबीएससी, आईसीएससी और मध्य प्रदेश बोर्ड। प्रथम दो संस्थाओं का प्रचलन निजी स्कूलों में है, जबकि मध्यप्रदेश बोर्ड प्राय: शासकीय स्कूलों में संचालित है। पाठÞ्यक्रम और परीक्षा के लिहाज से भी मध्य प्रदेश बोर्ड को अन्य बोर्डों के बनिस्बत दोयम दर्जे का माना जाता है। यानी पढ़ाई आसान और पाठ्यक्रम अपेक्षाकृत सरल व सुबोध होता है। बावजूद इसके जितने भी नकल प्रकरण दर्ज किए जा रहे हैं, उनमें से 95 फीसदी सरकारी स्कूलों अथवा सरकारी मान्यता प्राप्त उन निजी स्कूलों में जो ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में अवस्थित हंै। परीक्षाओं में हो रही नकल दो बातों पर मोहर लगाती है, एक तो विद्यालयों में शिक्षक साल भर क्या करते हैं, दूसरे विद्यार्थी भी तमाम शैक्षणिक सुविधाओं के बीच कितना पढ़ाई के प्रति गम्भीर हैं। विडम्बना है कि तीन तरह के बोर्डों में मध्य प्रदेश बोर्ड के प्रश्न-पत्रों का स्तर ऐसा रखा गया है, ताकि अधिक से अधिक छात्र उत्तीर्ण हो सकें और सरकार अपनी पीठ थपथपा कर, खम ठोक सके कि उसके शालाओं की स्थिति बेहतर है। जबकि हकीकत यह है कि उसके पाठ्यक्रम, सीबीएससी और आईसीएससी के पाठ्यक्रमों से 30 फीसदी कम हैं और प्रश्न पत्रों के स्तर में बड़ा अंतर भी। बात बड़ी साफ है कि सरकारी स्कूलों से निकले छात्रों और अन्य केन्द्रीय बोर्डों के छात्रों के स्तर में एक बड़ा अंतर पहले से मौजूद होता है, जिसका खमियाजा उसे आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं में भोगना पड़ता है। परिणामत: आईआईटी, पीएमटी और पीईटी की प्रतियोगिता में उच्च स्तरीय सफलताओं में मप्र बोर्ड से उत्तीर्ण बच्चों का प्रतिशत नाममात्र का देखने में आया है।
दरअसल, सरकारी स्कूलों की दशा महज शिक्षा की खानापूर्ति का जरिया बन कर रह गयी है। इस पर नये सिरे से विचार करने का वक्त आ गया है। क्योंकि सिर्फ येन-केन प्रकारेण उत्तीर्ण छात्रों से सरकारी आंकड़े तो चमक सकते हैं, पर विद्यार्थियों का भविष्य एक ऐसी अंधी सुरंग में धंसता जा रहा है जहां से उसे निराशा और अंधेरे ही नसीब होना तय है। शहरी क्षेत्रों के कुछ मॉडल स्कूलों का छोड़ दें तो, अधिकांशत: ऐसे सरकारी स्कूल मजबूरी के स्कूल साबित हो रहे हैं और वे ही छात्र यहां दाखिला लेते हैं, जिनके पास विकल्प हीनता है। सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का स्तर और पढ़ाई की गुणवत्ता किसी से छिपी नहीं है। राष्टÑ निर्माण का पुनीत कार्र्य करने वाले शिक्षकों से मजदूरी के वेतन पर कराया जा रहा शिक्षण कार्य महज एक औपचारिक गतिविधि बनकर रह गया है। ऐसा भी नहीं है कि सरकार इस पूरे वाकये से अनभिज्ञ है। पर लगता है उसने इस तथ्य से आंखें मंूदना ही बेहतर समझा है। क्योंकि न तो किसी अफसर, न ही किसी नेता के बच्चे इन स्कूलों में दाखिला लेते हैं। यहां तक कि इन स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों के बच्चे भी निजी स्कूलों में सीबीएससी और आईसीएससी पाठ्यक्रम के तहत अध्ययन में बेहतर भविष्य की राह देखते और मानते हैं।
   गौरतलब है कि ये परीक्षाएं अब इस रूप में महत्वपूर्ण हो चुकीं हैं कि  आईआईटी की प्रतियोगी परीक्षाओं में 12वीं के प्राप्तांक को भी प्रतियोगिता के बाद बनने वाली मेरिट का आधार बना दिए जाने से इस परीक्षा के अंकों का महत्व बढ़ा है। उधर सरकार ने पटवारी की प्रतियोगी परीक्षा में आधे अंक अंकसूची के आधार पर देने के निर्णय से इसके प्राप्तांकों का महत्व बढ़ा है। ऐसे में सरकारी बनाम निजी स्कूल और मध्यप्रदेश बोर्ड बनाम केंद्रीय बोर्डों में नई बहस छिड़ सकती है। देश के नामचीन   कॉलेजों में दाखिले के लिए भी 12वीं की अंकसूची का स्थान अहम है। ऐसी परिस्थितियों में प्रदेश सरकार को स्कूलों की शौक्षणिक गतिविधियों की गुणवत्ता पर ध्यान देना ही होगा, अन्यथा इन विद्यालयों से निकले बच्चों के लिए शिक्षा के माध्यम से भविष्य निर्माण की राह स्वप्न बनकर न रह जाए। इसके लिए शिक्षकों का मनोबल, उनके वेतन को सुधारकर और उन्हें शैक्षणिक ट्रेंड में आद्यतन करके बढ़ाया जा सकता है, तो छात्रों को भी समझना होगा कि मात्र नकल  या किसी जुगत से परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने मात्र से कुछ हासिल होने वाला नहीं।
  नकल से असल सफलता नहीं पायी जा सकती, इस मर्म को न सिर्फ विद्यार्थी समझें बल्कि उनके अध्यापक और अभिभावक भी। नकल से उत्तीर्ण होने वाले छात्रों की वही ठीक वही स्थिति है, जो पेढ़ की डाल पर बैठकर उसी डाल को काटने वाले कालिदास की थी। अत: छात्रों को नकल के जरिए छोटी उपलब्धियों के फिराक में शिक्षा और ज्ञान की जड़ को खोखला करने वाली प्रवृत्ति से बचना ही होगा।
                                   श्रीश पाण्डेय
                                   सम्पर्क - 09424733818.

Monday, 27 February 2012

पटवारी परीक्षा में प्रयोगधर्मिता

लोकतंत्र में जनता, सरकारों को चुनने और उनसे जनहित में कार्य करने की आशा व उम्मीद करती है। पर कभी-कभी सरकारें अति उत्साह में अथवा खुद को हाई-फाई दर्शाने की होड़ में ऐसे अव्यवहारिक कदम उठा लेती हैं, जो न सिर्फ अविवेकी होते हैं, बल्कि जिनके लिए कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है, वह उन्हीं के लिए दुष्कर हो जाते हैं।
   ऐसा ही इनदिनों मध्यप्रदेश की शासकीय सेवाओं की भर्तियों में हो रहा है। पिछले तीन-चार माह मेें संविदा शिक्षकों की भर्ती का दौर चला, जिसमें अनेक तरह की विसंगतियां देखने में आई थी और अब राजस्व की सबसे निचली इकाई पटवारी के पदों की भर्ती के लिए जिस उच्च तकनीकी का सहारा लिया जा रहा है, उसको लेकर ऊहापोह की स्थिति है। खासकर उन ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए जिनके पास कम्यूटर और इंटरनेट की सुविधा घरों में अथवा उनके कस्बाई इलाकों मेंआद्यतन नहीं है। उन्हें अपनी शिक्षा को रोजगार में तब्दील करने के लिए आॅन लाइन परीक्षा से गुजरना होगा। इनके दुर्गति की हालत यह है कि ऐसे हजारों परीक्षार्थी हैं, जिन्हें अपना फार्म तक भरने के लिए इंटरनेट कैफै में मौजूद एक्सपर्ट की शरणागत होना पड़ता है तो, आॅन लाइन परीक्षा इनके लिए कितनी मुफीद होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। बावजूद इसके 25 फरवरी को आॅनलाइन फार्म भरने की आखिरी तारीख के बाद 25 मार्च से होने वाली आॅनलाइन परीक्षा व्यवस्था की कवायद शुरू हो गई है।
  विडम्बना है कि अभी तक आईआईटी, पीईटी, पीएमटी जैसी परीक्षाओं सहित यूपीएससी और राज्यों की लोकसेवा परीक्षाओं में इस तरह से परीक्षा लेने का चलन अस्तित्व में नहीं आया है। यानी जब राजस्व के उच्च पदों कलेक्टर और डिप्टी कलेक्टर के चयन के लिए इस तकनीकि का सहारा नहीं लिया गया, जिसमें स्नातक अथवा उच्च योग्यता के विद्यार्थी हिस्सा लेते हैं, तो सवाल है कि पटवारी जैसी परीक्षा के लिए उच्च तकनीकी से युक्त परीक्षा का निर्णय किस बुद्धिमत्ता के चलते मध्यप्रदेश शासन द्वारा ले लिया गया। ऐसा करते वक्त यह भी ख्याल नहीं रखा गया इस परीक्षा के लिए न्यूनतम योग्यता बारहवीं है और जिन छात्रों ने कभी आॅनलाइन परीक्षा अपने शैक्षणिक जीवन में एक बार भी न दी हो, अपने कॅरियर निर्माण के वक्त इसे कैसे साध पाएंगे! यहां तक कि जिस कम्यूटर की योग्यता का मापदण्ड (पीजीडीसीए या डीसीए) रखा गया है उसका इम्तिहान भी उन्होंने कभी आॅनलाइन नहीं दिया है और न ही इस तरह की सुविधा प्रदेश के किसी कॉलेज में उपलब्ध है। और फिर कुकुरमुत्तों की तरह गली-चौराहों में उगे आए कम्यूटर कालेजों में पढ़ाई की गुणवत्ता किससे छिपी है। ऐसे ये कथित  कॉलेज शिक्षा के कम, धन कमाने के कुटीर उद्योग अधिक साबित हुए हैं। प्राय: देखने में आया है कि विद्यार्थियों को तकनीकि परीक्षाओं (डीसीए व पीजीडीसीए) की थ्योरी रटा कर कैसे भी जुगाड़-तुगाड़ से कॉलेज प्रबंधन द्वारा उत्तीर्ण कराके, अपने धन कमाने के धंधे को अंजाम दिया जाता रहा है। फिर यह तथ्य है कि कम्यूटर में व्यवहारिक ज्ञान और कार्य की गुणवत्ता तो काम करके ही हासिल की जा सकती है। बावजूद इसके भी आॅनलाइन परीक्षा के लिए आतुर नीति निर्माताओं की अदूरदर्शिता इस कथित प्रयोगधर्मिता में परिलक्षित होती है।
    गौरतलब है कि पिछले दिनों संविदा शिक्षकों (वर्ग-3) की भर्ती में बुकलेट भरने का परीक्षा पूर्व से कोई दिशा निर्देश न तो ठेके पर लगाए गए पर्यवेक्षकों को ज्ञात थे, न ही विद्यार्थियों को होने की वजह से, परीक्षा कक्ष में गलत तरीकों से उत्तर भर देने के लाखों उदाहरण सामने आये थे। कमोबेश इन्हीं में से अधिकतर विद्यार्थी हैं, जो पटवारी की परीक्षा में सम्मिलित हो रहे हंै। ऐसे में पटवारी परीक्षा के आॅनलाइन होने से ऐसे परीक्षार्थियों का क्या हाल होगा, ठीक से समझा जा सकता है। यद्यपि इस तर्क से बचने के लिए के एमपीआॅनलाइन संस्था ने प्रैक्टिस के निमित्त एक प्रश्न पत्र अपनी वेब साइट में डाला है। जिसमें कई खामियां उजागर हुई हैं।  परीक्षार्थी को परीक्षा पूर्व जिस माध्यम(हिन्दी या अंग्रेजी) में परीक्षा देनी है उसका चयन करना होगा। और जो प्रश्न पत्र इंटरनेट पर उपलब्ध हैं उनका हिन्दी रूपांतरण कुछ इस तरह है कि ‘खुद पढ़ो, खुदा समझे’। दरअसल, नमूने के तौर पर तैयार प्रश्न पत्रों की हिन्दी भाषा ऐसी रखी गई है कि अच्छे-अच्छे व्याकरणविद का दिमाग चकरा जाए। ऐसा इसलिए है कि मूलत: प्रश्न पत्र अंग्रेजी में तैयार किए गये हैं और फिर उनका मानक हिन्दी भाषा में रूपांतरण कर दिया गया है। ऐसी क्लिस्ट हिन्दी न तो कहीं पढ़ने में आती है और न ही बोचचाल के व्यवहार में। तो फिर परीक्षा में यह प्रयोग क्यों? बात बड़ी साफ है कि यदि हिन्दी माध्यम को अपनाया गया तो निर्धारित समय प्रश्न की भाषा को समझने में बीत जाएगा, तब 90 मिनट में उत्तर देना दूर की कौड़ी हो सकती है।
 एक अन्य खामी यह कि - कहने को यह प्रतियोगी परीक्षा है पर हकीकत यह है कि इसमें आधे अंक 12वीं की अंकसूची के आधार पर दिए जाने तय किए गये हैं और आधे प्रतियोगी परीक्षा के प्राप्तांक के आधार पर। गौरतलब है कि 12वीं उत्तीर्ण करने के लिए प्रदेश में तीन तरह के बोर्ड मप्र शिक्षा मंडल, सीबीएससी और आईसीएससी संचालित हैं। जिनके सिलेबस और पढ़ाई के स्तर के साथ 12वीं में आने वाले प्रतिशतों में काफी भिन्नता रहती आई है। ऐसे में सभी के नंबर   एक ही तराजू पर रख कर मेरिट बनाने से प्रतियोगिता में विसंगति स्वभाविक रूप से उत्पन्न हो जाती है। यह भी देखने में आया है ओपन स्कूल या कभी नकल जोर-जुगत से भी 12वीं में अच्छे अंक हासिल कर लिए जाते हैं और फिर जब प्रतियोगी परीक्षा आयेजित की जा रही ऐसे में अंकसूची को आधार बनाने का औचित्य क्या है?
 एक अन्य विसंगति में डीसीए और पीजीडीसीए की मान्यता और स्वीकार्यता को लेकर सवाल हैं। आमतौर पर यूपीएससी और पीएसी की परीक्षाओं में स्नातक योग्यता है, जहां यदि परीक्षार्थी उस वर्ष स्नातक की फाइनल परीक्षा में बैठ रहा है तो उसे इन परीक्षाओं में बैठने की अनुमति होती है। पर पटवारी की परीक्षा जो कि मिड शेसन में आयेजित की जा रही है और जो बच्चे धन खर्च कर इस वर्ष इन तकनीकि परीक्षाओं में बैठ रहे हैं, जिनके कि परिणाम भी जून तक घोषित हो जाएंगे, को परीक्षा वंचित रखने के क्या औचित्य हो सकता है। जबकि यह प्रावधान रखा गया है कि परीक्षा के बनने वाली मेरिट आगामी तीन वर्षों तक वैध रहेगी। ये सभी गंभीर सवाल हंै कि सरकार किस बात की जल्दी में है की परीक्षाओं के सारे प्रयोग पटवारी चयन में ही करने को आतुर क्यों है? जिस पर नए सिरे से विचार होना ही चाहिए। ये सच है कि प्रतियोगिता से योग्यता का चुनाव होता है। जिसके लिए  परीक्षा का स्तर कुछ भी हो पर उसकी शर्तों और तरीकों के निर्धारण की तकनीकी खामियों से समय रहते तो बचा ही जा सकता है।
                                   श्रीश पाण्डेय
                                  

Monday, 13 February 2012

न उम्र की सीमा हो...

  आज ‘वेलेंटाइन डे’ पर बरबरस जगजीत सिंह की आवाज में गाई गई इस गजल को स्मरण हो आया कि...                
        न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन 
ओठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो...
शायद ही कोई होगा जिसने सुना और गुनगुनाया  न हो। इस गीत का दर्शन हर उम्र में अलग-अलग तरीकों देखा, सुना और समझा गया और यही क्रम आज भी जारी है। फिल्म ‘प्रेमगीत’ में फिल्माये गये इस गीत में गीतकार और फिल्मकार ने यह संदेश देने की कोशिश की थी कि किसी कार्य की कोई उम्र नहीं होती, बस क्षमता और लगन होनी चाहिए। लेकिन मैं प्रेम के अलावा इस गीत में निहित उम्र के एक और दर्शन को बांचने और समाज में दशकों से प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध मौजूद विसंगति को लेकर चिंतित हंू। मन और तन से मजबूत व्यक्ति किसी भी उम्र में स्वस्थ्य रहते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकता है। जैसे 78 वर्ष में भी मनमोहन सिंह देश का नेतृत्व करने में सक्षम हैं और प्रधानमंत्री ही क्या देश के ज्यादातर नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री, की उम्र 60 से ऊपर ही ज्यादा सक्रिय हैं। इन्हीं नेताओं की जमात जो देश की नीति नियंता भी हैं,ने जनसामान्य के लिए शासकीय सेवा में आने और सेवा निवृत्ति की आयु सीमा तय कर रखी हैं।
   पर सवाल है कि उम्र का ताल्लुक व्यक्ति की कार्य क्षमता से है न कि उसके पद से। एक विभाग का छोटा या बड़ा कर्मचारी 60-62 की उम्र में सेवानिवृत्त इसलिए कर दिया जाता है कि वह कार्य करने की दृष्टि से शारीरिक और मानसिक रूप से सक्षम नहीं रहा, तो फिर 75 और 85 वर्ष की उम्र में देश की बागडोर सम्भालने वाले नेताओं ने भला कौन सी घुट्टी पी रखी है, जो इन्हें कब्र में पैर लटकाये रखने की नौबत तक, देश के राष्टÑीय और अर्न्तराष्टÑीय दायित्वों के निर्वहन की ताकत व ऊर्जा देती रहती है। इस पर विचार करने का समय आ गया है।
     पिछले दिनों मप्र के पुलिस विभाग में हुई पुलिस उपनिरीक्षकों की भर्ती में अधिकतम आयु सीमा (सामान्य) 28 वर्ष रखी गई थी वहीं डीएसपी की 25 वर्ष।  पटवारी के इम्तिहान के लिए 33 वर्ष। यानी इससे अधिक उम्र का युवा शारीरिक, मानसिक रूप से सक्षम होने के बावजूद इस सेवा के लिए अयोग्य करार दिया जाता है। इसी तरह की अनेक सेवाओं में उम्र के बंधन रखे गए हैं। गौरतलब है कि देश की जीवन प्रत्याशा 52 से बढ़कर 62 वर्ष हो चुकी है, तो फिर सेवाओं में प्रवेश की आयुसीमा को क्यों नहीं बढ़ाया जा सकता? यदि उम्र को शारीरिक दक्षता अथवा मानसिक योग्यता में कमी का आधार बनाया गया है। तो क्या शासन में 40 से 50 वर्ष के अफसर इस सेवा में नहीं होते? और क्या उनकी शारीरिक क्षमता नहीं घटती? क्या पद पर आसीन होने के बाद उनकी इन कथित क्षमताओं में वृद्धि हो जाती है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका कोई ठोस उत्तर नहीं दिया जा सका है, सिवाय इसके कि हर कर्मचारी पर ट्रेनिंग का खर्च आता है इसलिए कार्मिकों का अधिकतम उपयोग किया जा सके, इसलिए उम्र सीमा के बंधन रखे गए हैं।
     तो फिर क्या यह सवाल नहीं होना चाहिए कि हर पांच साल में चुने जाने वाले जनप्रतिनिधियों पर अरबों के खर्च का आधार क्या हो सकता है? अत: इस पाखंडयुक्त मापदंड के विरुद्ध आवाज बुलंद करने का वक्त आ गया है कि युवा बेरोजगारों के लिए कदम-कदम पर उम्र के बंधन लगाने का घृणित कार्य करने वाले शासन-सत्ता विराजे लोगों की मानसिक और शारीरिक क्षमताओं को लेकर सवाल क्यों नहीं उठते? जो व्यवहार उन्हें खुद के लिए पसंद नहीं, उसे वे युवाओं के लिए किस आधार पर प्रवृत्त कर सकते हैं। हो न हो, इस देश में अब तक सबसे बड़ा घोटाला और भ्रष्टाचार उम्र के भेदभाव को लेकर हुआ है। जिसमें करोड़ों प्रतिभाएं उम्र के बंधन में दम तोड़ चुकी हैं और न जाने कितनों की बलि होने वाली है। पर आज तक नेताओं ने इसके खिलाफ अपनी आस्तीने नहीं चढ़ार्इं, न ही कभी इस देश के 70 करोड़ युवाओं से जुड़े इस मुद्दे पर अनशन किए गए। जबकि उनकी ही बिरादरी अंतिम सांस तक सत्ता के निमित्त अपनी जीभ लपलपाती रहती है।
 यह दशा सिर्फ नौकरी की लाइन में लगे युवाओं की नहीं है बल्कि इसका खामियाजा विभिन्न राजनीतिक दलों में तैयार हो रही नई पौध को भोगना पड़ रहा है। आज हम अपने आस-पास देखें तो यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि हर दल में युवा नेता, कथित 60 के ऊपर के नेताओं के लिए नारे लगाने, स्टेशन में फूल-माला लेकर आवभगत करने और पैर छूने जैसे कार्यों में लगे-लगे उम्रदराज हो जाते हैं। केवल उन युवाओं को छोड़ दें, जिन्हें विरासत में राजनीति की चांदी का चम्मच मुंह में मिला है। त्रासदी है कि हरेक दल युवाओं की, उनकी शक्ति की बातें तो करता है, पर यह मात्र पायलटिंग करने, नारों का उद्घोष करने और चुुनाव के समय पर्ची काटने के लिए है, न की प्रत्याशी बनाने और प्रमोट करने के लिए। देश के लिए यह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि करोड़ों युवाओं को हताश करने वाली बात है कि जिस युवाशक्ति को राष्टÑ का भविष्य कहा जा रहा है,वही पग-पग पर उपेक्षित है और छला जा रहा है। कितनी बड़ी विडम्बना है कि जिस देश की 70 फीसदी आबादी युवाशक्ति से लबरेज हो, वहां का 80 फीसदी नेतृत्व बुजुर्गों के हाथ में आजादी के बाद से बरकरार है।
  अब समय है जबकि इसका हिसाब-किताब होना चाहिए कि नेताओं को जनता से मिले शासन के   अधिकारों का प्रयोग इस रूप में भी हो कि, जैसे सरकारी सेवाओं में प्रवेश के लिए ज्ञान और उम्र के कड़े मानदंड हंै, कमोवेश ऐसे ही प्रक्रिया वे स्वयं अपने लिए भी बनाएं। उनकी भी निश्चित योग्यता का परीक्षण हो और एक तय उम्र सीमा हो अथवा उम्र के बंधन किसी क्षेत्र में न चाहे वह राजनीति हो अथवा शासकीय सेवा में हो। दक्षता एवं क्षमता ही मात्र आधार हो। क्योंकि जब एक विभाग का अदना सा मुलाजिम बनने के लिए एक व्यक्ति को अपने ज्ञान और क्षमता का टेस्ट गलाकाट प्रतियोगिता के बीच तय आयु में देना होता है, तो देश सेवा की आड़ मेवा खाने वाले नेताओं के कबीले सिर्फ इसलिए इस स्वछंदता का आनंद ले कि वह नीति नियंता है। यह लोकतंत्र का लक्षण हरगिज नहीं हो सकता।
     गौरतलब है कि प्रतियोगी परीक्षाएं, किसी नौकरी के लिए हो रही स्पर्धा में बैठने का एक अवसर हैं, न कि सेवा में नियोजित होने की ग्यारंटी। तो फिर कथित नियमों की आड़ में इस तरह बंधन क्यों? सवाल यह भी कि जब हर परीक्षा के लिए ज्ञान और शारीरिक दक्षता के लिए एक टेस्ट की व्यवस्था है तो जिसमें क्षमता है उसे लिया जाए, इसमें उम्र के बंधन का क्या औचित्य रह जाता है? यह नैसर्गिक न्याय के विरुद्ध है।
                                   - श्रीश पाण्डेय 
                                    सम्पर्क - 09424733818.

Sunday, 12 February 2012

ईश्वर का प्रतिनिधि ‘मन’


जिन्दगी में प्राय: किसी को सहायता या सहयोग के लिए हम ‘तन, मन, धन’ से करने का वचन  देते रहते हैं। इन तीनों में ‘तन’ और ‘धन’ भौतिक हैं, जिसका हम स्पर्श कर सकते हैं, पर ‘मन’ का नहीं। शरीर के संचालक अंगों के लिहाज से इसके के दो मुख्य भागों में- एक ‘तन’ है, तो दूसरा है ‘मन’। एक भौतिक है तो दूसरा पूरी तरह अभौतिक। ‘मन’ और ‘तन’ अथवा ‘देह’ जितना आपस में गुम्फित हैं, उतना और किसी की कल्पना करना मुश्किल है। ऐसा इसलिये भी की दोनों की अवस्था एक ही संरचना के भीतर है। फिर भी इनकी संरचना, इनकी अवस्था में जो फर्क है, उसे भौतिक और आध्यात्मिक अथवा दार्शनिक दृष्टियों से  बेहतर ढंग से देखा और समझा जा सकता है।  ‘मन’, ‘तन’ का संचालनकर्ता तो है, पर ‘तन’, ‘मन’ का नहीं। क्योंकि तन ‘जड़’ है, तो मन ‘चेतन’। हालांकि मन का आधार भी एक हद तक तन ही है।
   दरअसल ‘मन’ है क्या? यह प्रश्न सदियों से बहस और शोध का विषय रहा है और रहेगा। क्योंकि जिसका कोई भौतिक अस्तित्व न हो, उसके रंग, रूप और प्रकृति की कल्पना कैसे की जा सकती है। तभी तो मन के स्वरूप, आकार और कार्यशैली पर किये गये अध्ययनों के परिणाम, आज भी वैज्ञानिक दृष्टि से सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत नहीं हो पाये हैं। हां मनोवैज्ञानिकों ने कई निष्कर्ष अनुभवजन्य अध्ययन के आधार पर निकालकर मनोविज्ञान के ग्रंथ तो रच डाले हैं, पर शरीर की भांति मन के अध्ययन पर वैज्ञानिक दृष्टि आभाव है। इसलिए आज भी मानव मन की अवस्था, उसके चित्त, उसकी कार्यशैली पर शोध जारी हैं और अनंत काल तक जारी रहेंगे। यही मन का रहस्य है, जैसे ईश्वर के अस्तित्व की संकल्पना के सैकड़ों आयाम हम विभिन्न धर्मों में पाते हैं। पर जब हम धर्म विहीन होकर उसकी कल्पना एक मनुष्य के रूप में करते हैं, तो उसकी एक अस्पष्ट तस्वीर उभरती है। कभी-कभी तो यह भी सवाल उपजता है कि ईश्वर है भी, कि नहीं। कहीं यह हमारे ‘मन’ की एक कल्पना मात्र तो नहीं।
    वर्ष 2003 की बात है, ऋषिकेश के गीताआश्रम में ईश्वर की स्थिति को लेकर एक वयोवृद्ध द्वारा पूछे गए सवाल कि- ‘स्वामी जी ईश्वर की पूजा, उपासना, आराधना करते-करते जीवनसंध्या निकट आ पहुंची है, पर मन में उसके अस्तित्व को लेकर संशय बना हुआ है।’जबाव में स्वामी रामसुखदासजी कह रहे थे कि ईश्वर जानने की नहीं मानने की बात है। यानी ‘मानो तो गंगा मां हूं न मानो तो बहता पानी’। उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व को एक उदाहरण से कुछ यूं समझाया कि एक बच्चा यदि जन्म के तुरन्त बाद बिछड़ गया और उसका पालन पोषण किसी भिन्न वतावरण, संस्कृति में हुआ और  बड़े होने पर उसके माता पिता के बारे में किसी को कुछ भी ज्ञात न हो तो, क्या यह माना जा सकता है कि बच्चा आसमान से टपका होगा! नि:संदेह न तो विज्ञान और न ही आध्यात्म आसमान से टपकने की बात को स्वीकार सकता है। भले ही हम उसके जन्मदाता को न जानते हों, फिर भी मानना पड़ता है कि वह है तो मां-बाप हैं और मां-बाप हैं, तो उनके भी मां-बाप होंगे ही। स्वामी जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि ठीक यही अवस्था ईश्वर की है, हम हैं तो वह भी है। जैसे उक्त बच्चे के मां-बाप का पता ज्ञात करने के निमित्त दुनियां के अरबों मां-बाप के डीएनए टेस्ट की दुरूह प्रक्रिया से गुजरना होगा, ठीक इसी तरह ईश्वर को भी जानने की प्रक्रिया उतनी ही दुरूह है। मन की भी ऐसी ही अवस्था है। वह भी अज्ञात है बस उसके जितने भाग से हम परिचित है उसी को पूरी जानकारी मानकर खुद को भरमाये रखते हैं। मन जिसे हम ईश्वर का पीआरओ भी कह सकते हैं। मन की अवस्थाओं को लेकर साहित्य और आध्यात्म जगत में बहुत कुछ कहा गया है। मूल रूप से मन ही हमारे जड़ शरीर का संचालक है यानी ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा।’
  इस विमर्श का लब्बोलुआब यह है कि दुनिया में बेहतर जीवन बसर करने का मूलमंत्र है, अपने ‘मन’ को नियंत्रित रखना।  इस संसार में जितना भी सुख-दुख, हर्ष-विषाद, अच्छाई-बुराई, प्यार-दुतकार  विद्यमान है वह सब ‘मन’ की प्रकृति पर निर्भर है। वरना क्या वजह है कि तमाम जड़ साधनों (धन सम्पदा)से सम्पन्न व्यक्ति के दुखी रहने और विपन्न व्यक्ति के सुखी रहने की नजीरें हमें जगत में दिखाई देतीं। इसलिए हम जितनी भी साधना, उपासना विभिन्न धर्मों के माध्यम से करते आये हैं, उसमें ‘मन’ को साधने की साधना सबसे अपरिहार्य है। जिसका ‘मन’ नियंत्रित है वह ईश्वर के और ईश्वर उसके करीब है और वही मानवीय है।
यहां यह प्रश्न जनसाधारण के मन-मतिष्क में उपजना लाजिमी है कि मन, बुद्धि और आत्मा में फर्क कैसे किया जाए। इसे कुछ इस तरह से समझा जाए तो बेहतर होगा कि- जब कोई विचार यकायक मतिष्क में आये तो इसे मन का विचार माना जा सकता है जैसे मुझे आज फलां जगह घूमने जाना है। पर जब वहां जाने के तरीके या साधन,समय आदि पर विचार किया जाए तो वहां बुद्धि की उपस्थिति मानी जानी चाहिए। लेकिन किसी काम के करने की अथवा उसके सही गलत होने का निर्धारण जिस भाग द्वारा किया जाए उसे आत्मा माना जा सकता है। यानी मन हमारी समस्त गतिविधियों का कारक है। यही हमें लोक-परलोक से जोड़ता है। मन के विचार पर ही व्यक्ति की बुद्धि और आत्मा क्रियाशील होती है। यद्यपि यह कोई अंतिम दर्शन नहीं फिर भी इस लिहाज से मन को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जा सकता है।
   आज दुनिया में जितनी भी लालच,   लिप्सा और लड़ाई है वह हमारे ‘मन’ के अनियंत्रित होने का कारक है। इसलिए यह बात अब समझी जानी चाहिए कि ‘जड़’ चाहे वह शरीर हो अथवा साधन, चेतन ‘मन’ के द्वारा संचालित हैं। इसीलिए यह कहा गया है कि ‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत’क्योंकि ‘मन’ के स्वस्थ होने का सीधा ताल्लुक ‘तन’ से है और जब दोनों स्वस्थ हैं तो ‘धन’ भी अर्जित किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि हमारा ‘मन’ स्वस्थ, सधा हुआ और नियंत्रित हो और तभी हम किसी अपने की ‘तन, मन और धन’ से सहायता कर सकते हैं।