| कल के अखबारों में गृहमंत्री शिंदे और दिग्विजय सिंह के छपे कथित बयानों के बरक्स 'अमीर मिनाई' की गजल, जिसे जगजीत सिंह ने सुर दिया था; शहीदों के लिए रोशन हो आई कि "वो बेदर्दी से सर काटे हैं अमीर और हम कहे हैं कि हुजूर आहिस्ता- आहिस्ता, जनाब आहिस्ता-आहिस्ता"। सैनिकों का सर कलम होने के बाद भी सरकार, पाकिस्तान से शांति-अमन के जाप की शास्त्रीय शैली में पहले "जनाब" की धमकी, फिर "हुजूर" की मुद्रा अख्तियार किए हैं। आईएसआई द्वारा सी€धे तौर पर चलाए गए खूनी आतंकवादी हमलेआज भी जारी हैं। हमने तो संसद पर हमले और मुम्बई पर 26/11 के हमले के बावजूद न तो पाकिस्तान से राजनयिक संबंध न छोड़े और न ही उसको सबक सिखाने की भाषा बोली। शांति के पाखंड में हमारी सत्ता इतनी गिरी कि संसद पर हुए हमले के शहीदों के परिवारजनों ने गुस्से में वीरता के अलंकरण लौटा दिए तो भी हम चुप रहे और हमने अमन की राह पर चलने के लिए संसद पर हमले के गुनाहगार देश द्रोहियों को छुड़ाने की मुहिम चलाई और जिसे उच्चतम न्यायालय ने फांसी की सजा दी, उसे भी बचाने का बंदोबस्त करने लगे। इस दौरान कारगिल भी हुआ, बस लेकर हम लाहौर भी गये और कारगिल के कसाई को लाल कालीन बिछाकर आगरा में न्यौता भी। इन सबका नतीजा यह मिला है कि पाकिस्तान हमारे फौजियों के सर काट ले जा रहा है। ऐसे संवेदनशील हालातों के बावजूद दुनिया में आतंक का खौफ फैलाने वाले ओसामा को "ओसामा जी" और अब देश के सैनिकों के सर काटने की साजिश में शामिल हाफिज सईद को "साहब" का सम्मानीय सम्बोधन, न केवल उन सभी शहीदों का अपमान है, जो राष्ट्र सुरक्षा के लिए प्राणाहुति देते आ रहे हैं, बल्कि हर सच्चे भारतीय के लिए शर्मिदगी की बात है कि कैसे हैं, उनके लोकतंत्र के रहनुमा। यह भी लज्जा की बात है कि देश के गृहमंत्री ने स्वीकारा है कि "लाइन ऑफ कंट्रोल" पर हाफिज सईद जैसे आंतकी के आने और उकसाने के बाद दो भारतीय सैनिकों की बर्बर हत्या हुई है। लेकिन मंत्री जी को सीमा पार के नहीं, उल्टे देश के किसी दल या संगठन में ही आतंकियों की संभावनाएं दिख रही हैं। सम्भवत: देश के इतिहास में यह पहला मौका होगा जबकि किसी आतंकी ने देश के गृहमंत्री के सुर में सुर मिलाया हो और हिमाकत की हो कि भारत को आतंकी राष्ट्र घोषित किया जाए। कम से कम राष्ट्रीय मुद्दे पर तो राजनीतिक एकता दिखनी चाहिए थी। पर यह दुर्भाग्यपूर्ण है। दरअसल, ध्यान भटकाने वाले कथित बयान एक सोची समङी सियासत का हिस्सा है। मिशन लोकसभा 2014 के आम चुनाव के निमित्त जयपुर की चिंतन बैठक में क्या-क्या चिंतन हुए इसका खुलासा एक-एक करके सामने आने लगा है। चिंतन का समापन पहले से तय मानी जा रही राहुल की ताजपोशी के साथ हुआ। उनकी टीम के स्तंभकारों को जिन दायित्वों को सौंपा गया है उसका आगाज ताबड़तोड़ पहले गृहमंत्री शिंदे ने और फिर आंतकियों को सम्मान से देखने वाले दिग्विजय सिंह ने कर दिया है। सोनिया गांधी ने राहुल से रोते हुआ कहा था कि सियासत जहर के समान है। मगर अब जान पड़ता है कि यही जहर वह अपने सिपहसालारों से उगलवाने जा रही हैं। दरअसल, राजनीति का चाल, चरित्र व चेहरा कितना विकृत और विचित्र हो चुका है इसका अनुभव उन्हें जरूर होगा, जिन्होंने कांग्रेस पार्टी को सर्वहारावर्ग की राजनीति करते देखा सुना था। मगर मात्र दो दशकों में यह नौबत क्यों आ गई, इस पर चिंतन के बजाय वह सत्ता पर लगाम रखने के कठोर व निरंकुश उपायों के अमल पर उतारू है। हो न हो, इसी चलते उसकी यह दशा हुई है कि वह अपने ही घर माने जाने वाले उत्तरप्रदेश, बिहार जैसे दो बड़े राज्यों से बेदखल हो चुकी है। जयपुर चिंतन के बाद यह बात सुनिश्चित जान पड़ती है कि कांग्रेस वोट कबाड़ने की कवायद में किसी हद तक जाने को तैयार है। मुसलमान वोटों पर काला जादू चलाने जिम्मा निश्चित तौर पर दिग्गी को सौंपा गया है। दिग्विजय उप्र के प्रभारी रहे हैं और उन्हें पता है कि वहां 4 करोड़ से अधिक निर्णायक मुसलिम मतदाता हैं, जिन पर मुलायम का कब्जा है। सामान्य पूर्वाग्रह है कि मुसलमान भाजपा को वोट नहीं करते, जिसको पुख्ता करने के लिए दिग्विजय और गृहमंत्री के बयान पर्याप्त हैं। दरअसल कांग्रेस, सपा के वोट में सेंध लगाने के लिए शुरू से मुसलिम आरक्षण जैसे कथित मुद्दों पर जोरआजमाईश करती रही है। और अब वह हिन्दू आतंकवाद का शिगूफा छोड़कर, एक तीर से महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे कई निशाने साधने जा रही है। क्योंकि उनके मंत्री बेनीप्रसाद पहले ही कह चुके हैं कि जनता पिछली खामियों को भूल जाती है और यही बात चिंतन बैठक में कही गई कि जो हुआ सो हुआ अब हमें आगे की ओर देखना है। |
Tuesday, 22 January 2013
वो बेदर्दी से सर काटे हैं और हम.
Thursday, 17 January 2013
फिर चेतावनी है तुम्हें प्रिय पाकिस्तान
| एक बार फिर देर सबेर देश के कथित नेताओं व सजग सेना के मुखियाओं ने मूंछे ऐंठी, ताल ठोंकी और खांस- खखार कर गुर्रराये हैं या मान लो ऐसा कहलवाया गया कि 'चेतावनी! चेतावनी! और चेतावनी..है! तुम्हें प्रिय पाकिस्तान, वरना तीस मिनिट में तुम्हें कर देंगे मैदान!' प्रिय इसलिए कि वह हमारी ही संतान है, हमारे रक्त से जुड़ा है, हमारा ही भाग रहा है, उसके कुछ बीज यहां भी हैं। रक्त, रक्त को खींचता है। इसीलिए दोनों एक दूसरे के रक्त के प्यासे हैं। बड्डे बोले- बड़े भाई ये सिलसिला कब थमेगा, हमने कहा कभी नहीं.! बड्डे बोले क्यों? हमने कहा- न तो दूसरी दुर्गा (इंदिरा)पैदा होनी है और न ही देश की सत्ता के रक्त में उबाल आना है। बड्डे बोले- पहले भी तो हमने निपटाया है पाकिस्तान को। ओह!! बड्डे भूल जाओ 1965, 1971 का युद्ध, क्योंकि तब तो हम भूख, अकाल और गरीबी से ग्रस्त थे, पस्त थे। हम नंगे थे। सो नंगा नहाए क्या, निचोड़े क्या? इसलिए युद्ध तब जायज था। भूख से मरने से बेहतर था कि युद्ध में मर कर शहीद होने का तमगा मिल जाए। उधर देश का बोझ कम होगा और इधर सरकार का काम भी कुछ हल्का होता। लेकिन तब की बात और थी, आज की और है। बड्डे बोले कैसे? अरे तुम ठहरे पूरे बोका के बोका, तभी देश में ऐसे नेताओं की चांदी कट रही है। 'यू नो ऑल लीडर्स एण्ड ऑफीसर्स आर टू रिच', इसलिए युद्ध होने से उन्हें जान और माल दोनों की चिंता है। माल भले स्विस बैंकों में 'सेफ' है, पर धन तभी 'मीनिंगफुल' है जब तक इनके अनाम, बेनाम खातेदार जिंदा हैं। लूट की कमाई, पीढ़ियों के लिए संचित विरासत है। इसका भोग कौन करेगा? इसकी टेंशन ऐसों ज्यादा है। आम जनता का क्या वह तो वैसे भी महंगाई की मार से मरने की कगार पर है। इसीलिए युद्ध-युद्ध का राष्ट्रगान गा रही है। अब देश की आजादी के संघर्ष को ही ले लो, जो जोश में, देश के सम्मान में मात्र इसलिए मर मिटे कि वतन महफूज रहे, सम्मान बना रहे। जिन्होंने देश भक्ति के गीतों को लपेटा, ओढ़ा, बिछाया और शहादत दी, लेकिन उनकी शहादत और सुरक्षा का एंज्वाय कौन कर रहा है? शहीदों की 'फैमिली' तो भूखे रहकर बेहाल है कि सरकार के नुमाईंदें उनकी सुने। लेकिन ऐसी विचारधारा मानती है कि सेना होती ही मरने कटने के लिए। बड्डे गुस्से में बोले- बंधु यह सैनिक का नहीं, देश का सिर कटा है। सुषमा ने गरम लोहे पर हथौड़ा मारा कि एक बदले दस सिर लाओ। देश का भौगोलिक सिर पहले ही कलम हो चुका है, जिसे हम पाक अधिकृत कश्मीर कहते हैं। चीन ने हमारी उत्तर-पूर्व की बांह काट ली है और हम अहिंसा का जाप कर रहे हैं, क्योंकि हम 'नेचुरल कूल' हैं। सो 'मैटर' सर कटने का नहीं, उसे वापस लाने का है, सम्मान का है और समझने का भी है कि अब और नहीं..चेतो प्रिय पाकिस्तान, बात समझो क्योंकि हम युद्ध नहीं चाहते। |
Saturday, 5 January 2013
बड़े नहीं, बड़े वाले लोकतंत्र हैं हम
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Monday, 31 December 2012
मैं समय हूं, गतिमान हूं सदा
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Friday, 21 December 2012
राजनीती के रीटेल मे मोदी ब्रांड
पिछले कुछ दिनों से अर्थव्यवस्था में एफडीआई में रीटेल की सुर्खियां अभी
खुर्द-बुर्द भी नहीं हुईं थी कि राजनीति के रीटेल में मोदी ब्रांड चल
निकला। खिसियाये लोग खंभा नोच कर स्टेटमेंट देते चैनलों के पर्दो पर भटक
रहे हैं कि मोदी पिछले चुनाव के मुकाबले दो सीटें कम हासिल कर पाए और वे दो
सीटें ज्यादा। रिजल्ट भले सत्ता को रीटेन करने का रहा हो, लेकिन विरोधी खम
ठोंक सकते हैं कि दो सीटों का ही सही पर मोदी का बाल बांका तो कर दिया ना।
यह कहते हैं कि खुश होने की वजह विरोधी नेता ढ़ूंढ निकालते हैं चाहे इसके
लिए कितना भी ठीठ बनना पड़े तो क्या है। अब आलम है कि चाहे उनके विरोधी हों
या उनके ही दल में रंजिश रखने वाले नेता, मोदी से जलें-भुने या
कोसें-कुढ़ें पर मोदी सबकी छाती पर मूंग दलते हुए आज की राजनीति की 'व्यक्ति पूजा' की नई टेक्नोलॉजी के नए सूरमा बनकर उभरे हैं। और
सट्टेबाजों की गणित सात हाथ नीचे गड़ गई।
बड्डे. पुराने जमाने के ज्योति बाबू को छोड़ दें तो मोदी ऐसे अकेले मुख्यमंत्री हैं जो अपने दम पर सत्ता की हैट्रिक लगाने में कामयाब रहे हैं। हो न हो, भारतीय राजनीति के छितिज पर सभी दलों के लिए मोदी का मुद्दा अनुसंधान का विषय बना होगा कि उन्होंने 'इंपासिबिल' को 'पॉसिबिल' कैसे बना दिया गया।
यहां तक कि भाजपा की केंद्रीय इकाई में वर्षो से तंबू गाड़े शीर्ष नेता मौका ताककर पीएम बन् का ख्वाब, उम्र दराज होने से पहले संजो हैं और ऐसा लाजिमी भी है और भय भ् क्योंकि पूरी जिंदगी खपाकर भाजपा को खड़ा करने वाले आडवाणी की आंख् का पानी, पीएम बनने की प्रतीक्षा में सू गया, 'पर' कट कर गिर गए और अंत उन्होंने दुखी मन से अपने अरमानों को आंसुओं में बह जाने देना ही मुनासिब समझ। लेकि संघ और भाजपा की छवि से परे मोदी राजनीति रीटेल में ऐसा ब्रांड बनकर उभरे हैं कि केंद्र की राजनीति में लिपे-पुते नेता सन्निपात के आघात को ङोल रहे हैं। क्योंकि बिना किसी की छत्र छाया और खाद पानी के मोदी की अमरबेल गुजरात को लप् लेने के बाद दिल्ली की ओर देख रही है। बड्डे बोले- 'बड़े भाई सो तो है।' इन फैक्ट मोदी की माया अब गुजरात से निक कर समूचे देश को मोह रही है तो उसकी वजह भी इसलिए 'नरेंद्र दामोदर दास मोदी' अब "नेशनल दमदार मोदी" की छवि के रूप में राजनीति की खरपतवार को सफा चट करके स्वयंभू बनने कगार पर हैं। सफल् से अहम और अहम से पतन की बड़ी वैज्ञानिक गणित है। इसलिए बड्डे बोले - बड़े भाई डेमोक्रेसी में अच्छे-अच्छों की ऐसी-तैसी होती भी खूब देखी गई है। वी सिंह की नजीर क्या कम है समझने-बूझने के लिए।
बड्डे. पुराने जमाने के ज्योति बाबू को छोड़ दें तो मोदी ऐसे अकेले मुख्यमंत्री हैं जो अपने दम पर सत्ता की हैट्रिक लगाने में कामयाब रहे हैं। हो न हो, भारतीय राजनीति के छितिज पर सभी दलों के लिए मोदी का मुद्दा अनुसंधान का विषय बना होगा कि उन्होंने 'इंपासिबिल' को 'पॉसिबिल' कैसे बना दिया गया।
यहां तक कि भाजपा की केंद्रीय इकाई में वर्षो से तंबू गाड़े शीर्ष नेता मौका ताककर पीएम बन् का ख्वाब, उम्र दराज होने से पहले संजो हैं और ऐसा लाजिमी भी है और भय भ् क्योंकि पूरी जिंदगी खपाकर भाजपा को खड़ा करने वाले आडवाणी की आंख् का पानी, पीएम बनने की प्रतीक्षा में सू गया, 'पर' कट कर गिर गए और अंत उन्होंने दुखी मन से अपने अरमानों को आंसुओं में बह जाने देना ही मुनासिब समझ। लेकि संघ और भाजपा की छवि से परे मोदी राजनीति रीटेल में ऐसा ब्रांड बनकर उभरे हैं कि केंद्र की राजनीति में लिपे-पुते नेता सन्निपात के आघात को ङोल रहे हैं। क्योंकि बिना किसी की छत्र छाया और खाद पानी के मोदी की अमरबेल गुजरात को लप् लेने के बाद दिल्ली की ओर देख रही है। बड्डे बोले- 'बड़े भाई सो तो है।' इन फैक्ट मोदी की माया अब गुजरात से निक कर समूचे देश को मोह रही है तो उसकी वजह भी इसलिए 'नरेंद्र दामोदर दास मोदी' अब "नेशनल दमदार मोदी" की छवि के रूप में राजनीति की खरपतवार को सफा चट करके स्वयंभू बनने कगार पर हैं। सफल् से अहम और अहम से पतन की बड़ी वैज्ञानिक गणित है। इसलिए बड्डे बोले - बड़े भाई डेमोक्रेसी में अच्छे-अच्छों की ऐसी-तैसी होती भी खूब देखी गई है। वी सिंह की नजीर क्या कम है समझने-बूझने के लिए।
Thursday, 13 December 2012
विकास का बाईप्रोडक्ट ' बेईमानी'
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Friday, 7 December 2012
उसी से ठंडा उसी से गरम
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