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Monday, 31 December 2012
मैं समय हूं, गतिमान हूं सदा
Friday, 21 December 2012
राजनीती के रीटेल मे मोदी ब्रांड
पिछले कुछ दिनों से अर्थव्यवस्था में एफडीआई में रीटेल की सुर्खियां अभी
खुर्द-बुर्द भी नहीं हुईं थी कि राजनीति के रीटेल में मोदी ब्रांड चल
निकला। खिसियाये लोग खंभा नोच कर स्टेटमेंट देते चैनलों के पर्दो पर भटक
रहे हैं कि मोदी पिछले चुनाव के मुकाबले दो सीटें कम हासिल कर पाए और वे दो
सीटें ज्यादा। रिजल्ट भले सत्ता को रीटेन करने का रहा हो, लेकिन विरोधी खम
ठोंक सकते हैं कि दो सीटों का ही सही पर मोदी का बाल बांका तो कर दिया ना।
यह कहते हैं कि खुश होने की वजह विरोधी नेता ढ़ूंढ निकालते हैं चाहे इसके
लिए कितना भी ठीठ बनना पड़े तो क्या है। अब आलम है कि चाहे उनके विरोधी हों
या उनके ही दल में रंजिश रखने वाले नेता, मोदी से जलें-भुने या
कोसें-कुढ़ें पर मोदी सबकी छाती पर मूंग दलते हुए आज की राजनीति की 'व्यक्ति पूजा' की नई टेक्नोलॉजी के नए सूरमा बनकर उभरे हैं। और
सट्टेबाजों की गणित सात हाथ नीचे गड़ गई।
बड्डे. पुराने जमाने के ज्योति बाबू को छोड़ दें तो मोदी ऐसे अकेले मुख्यमंत्री हैं जो अपने दम पर सत्ता की हैट्रिक लगाने में कामयाब रहे हैं। हो न हो, भारतीय राजनीति के छितिज पर सभी दलों के लिए मोदी का मुद्दा अनुसंधान का विषय बना होगा कि उन्होंने 'इंपासिबिल' को 'पॉसिबिल' कैसे बना दिया गया।
यहां तक कि भाजपा की केंद्रीय इकाई में वर्षो से तंबू गाड़े शीर्ष नेता मौका ताककर पीएम बन् का ख्वाब, उम्र दराज होने से पहले संजो हैं और ऐसा लाजिमी भी है और भय भ् क्योंकि पूरी जिंदगी खपाकर भाजपा को खड़ा करने वाले आडवाणी की आंख् का पानी, पीएम बनने की प्रतीक्षा में सू गया, 'पर' कट कर गिर गए और अंत उन्होंने दुखी मन से अपने अरमानों को आंसुओं में बह जाने देना ही मुनासिब समझ। लेकि संघ और भाजपा की छवि से परे मोदी राजनीति रीटेल में ऐसा ब्रांड बनकर उभरे हैं कि केंद्र की राजनीति में लिपे-पुते नेता सन्निपात के आघात को ङोल रहे हैं। क्योंकि बिना किसी की छत्र छाया और खाद पानी के मोदी की अमरबेल गुजरात को लप् लेने के बाद दिल्ली की ओर देख रही है। बड्डे बोले- 'बड़े भाई सो तो है।' इन फैक्ट मोदी की माया अब गुजरात से निक कर समूचे देश को मोह रही है तो उसकी वजह भी इसलिए 'नरेंद्र दामोदर दास मोदी' अब "नेशनल दमदार मोदी" की छवि के रूप में राजनीति की खरपतवार को सफा चट करके स्वयंभू बनने कगार पर हैं। सफल् से अहम और अहम से पतन की बड़ी वैज्ञानिक गणित है। इसलिए बड्डे बोले - बड़े भाई डेमोक्रेसी में अच्छे-अच्छों की ऐसी-तैसी होती भी खूब देखी गई है। वी सिंह की नजीर क्या कम है समझने-बूझने के लिए।
बड्डे. पुराने जमाने के ज्योति बाबू को छोड़ दें तो मोदी ऐसे अकेले मुख्यमंत्री हैं जो अपने दम पर सत्ता की हैट्रिक लगाने में कामयाब रहे हैं। हो न हो, भारतीय राजनीति के छितिज पर सभी दलों के लिए मोदी का मुद्दा अनुसंधान का विषय बना होगा कि उन्होंने 'इंपासिबिल' को 'पॉसिबिल' कैसे बना दिया गया।
यहां तक कि भाजपा की केंद्रीय इकाई में वर्षो से तंबू गाड़े शीर्ष नेता मौका ताककर पीएम बन् का ख्वाब, उम्र दराज होने से पहले संजो हैं और ऐसा लाजिमी भी है और भय भ् क्योंकि पूरी जिंदगी खपाकर भाजपा को खड़ा करने वाले आडवाणी की आंख् का पानी, पीएम बनने की प्रतीक्षा में सू गया, 'पर' कट कर गिर गए और अंत उन्होंने दुखी मन से अपने अरमानों को आंसुओं में बह जाने देना ही मुनासिब समझ। लेकि संघ और भाजपा की छवि से परे मोदी राजनीति रीटेल में ऐसा ब्रांड बनकर उभरे हैं कि केंद्र की राजनीति में लिपे-पुते नेता सन्निपात के आघात को ङोल रहे हैं। क्योंकि बिना किसी की छत्र छाया और खाद पानी के मोदी की अमरबेल गुजरात को लप् लेने के बाद दिल्ली की ओर देख रही है। बड्डे बोले- 'बड़े भाई सो तो है।' इन फैक्ट मोदी की माया अब गुजरात से निक कर समूचे देश को मोह रही है तो उसकी वजह भी इसलिए 'नरेंद्र दामोदर दास मोदी' अब "नेशनल दमदार मोदी" की छवि के रूप में राजनीति की खरपतवार को सफा चट करके स्वयंभू बनने कगार पर हैं। सफल् से अहम और अहम से पतन की बड़ी वैज्ञानिक गणित है। इसलिए बड्डे बोले - बड़े भाई डेमोक्रेसी में अच्छे-अच्छों की ऐसी-तैसी होती भी खूब देखी गई है। वी सिंह की नजीर क्या कम है समझने-बूझने के लिए।
Thursday, 13 December 2012
विकास का बाईप्रोडक्ट ' बेईमानी'
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Friday, 7 December 2012
उसी से ठंडा उसी से गरम
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Thursday, 29 November 2012
हमीं ने दर्द दिया है हमीं दवा देंगे
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Friday, 23 November 2012
फांसी के फंदे अभी और हैं.
चार साल तक कसाब के रख रखाव में करोड़ों फूंकने और कसाब का हिसाब लेने के बाद बड्डे बोले- देखो बड़े भाई मरे मराये को मार के देश के कर्णधार कुर्ता मोड़-मोड़ के ऐसे अकड़ रहे हैं जैसे की आतंक सहित पाकिस्तान को ही पटखनी दे दी हो। यह मैटर दीगर है कि अजमल का "मल" साफ हो गया मगर, एक दशक से अफजल का "जल" अभी भी छलक रहा है। जब क्लियरकट अपराधी को इतने वर्षो तक देश महफूज रखा जा सकता है, तब जिन पर संदेह है उनका तो बाल बांका भी देश का कानून नहीं कर सकता। एक आतंकी को सजा देने में सरकार इतनी क्यों सहमी है? इसके पीछे अफवाहों और आरोपों का बाजार सुर्ख है। लेकिन हमारी सरकार से उदार इस धरती दूसरी हरगिज नहीं हो सकती। मानव को कीड़े मकोड़ों की तरह मसलने वालों के प्रति हमारी मानवीयता अखिल ब्रम्हांड में अद्वितीय है।
अमेरिकी मुखिया ओबामा ने कहा था कि हमें गर्व है कि हम इस धरती के सर्वश्रेष्ठ देश हैं, क्योंकि वे अपने दुश्मन आतंकी ओसामा को पाकिस्तान में घुसकर निपटा सकते हैं। हमने कहा बड्डे- गर उन्हें गर्व है तो हमें भी फख्र होना चाहिए। आखिर ये देश बुद्ध, महावीर और गांधी का है। जब अहिंसा से बापू ने अंग्रेज भगा दिये तो एक दिन आंतकी भी हमारे शांतिप्रिय व्यवहार से शांत हो जाएंगें। पर कसाब एडं कम्पनी ने जितने मारे उससे कई गुना तो देश में अपने ही अपनों को निपटा रहे हैं।
अब अफजल पर देश जल्दी में है। क्या सरकार, क्या विपक्ष और क्या छुटभइया नेता सब के सब ताल ठोंक रहे हैं कि इसे भी लटकाओ। यों तो सरकार मामले लटकाने में माहिर है। न जाने कितने बिल लटके हुए हैं। कुछ प्रकरण इसलिए पैंडिंग हैं कि उनकी जांचें अखण्ड रामायण की तरह बांची जा रही है। महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सुलग रहे जनमानस को लोकपाल, अविश्वास प्रस्ताव, सरकार में फेरबदल, एफडीआई जैसे मामले ठंडा करने का काम करते रहे हैं।
जब आतंकी देश में घुसकर खुले आम आदमी को भूंज सकते हैं, संसद में सांसदों को निपटा सकते थे।
वो तो भला हो कुछ सैनिकों की शहादत और कुछ ने उन्हें मार दिया उस दिन वरना उस दिन देश अपने नाथों से अनाथ हो जाता। बहरहाल संसद में गतिरोध जारी है देश चल रहा है। आतंकियों की फांसी और एफडीआई में फंसी सरकार की कार है कि पंचर होती नहीं दिखती। ममता के बाद मुलायम और यदि जरूरत हुई तो उनके बाद माया सरकार को फांसी घर से बाहर ले आने के लिए आतुर और कृतज्ञ भाव से नतमस्तक हैं। फिर भी जिस तरह से एफडीआई पर विरोध उभरा है वह सरकार के लिए फांसी का फंदा न साबित हो।
Friday, 16 November 2012
कांग्रेस के कर्णधारों की धार
भाजपा का संकट और उसके खुशी के आलोक में दीवाली मना रहे कांग्रेसियों ने मौका ताक कर 2014 चुनाव की तैयारियों की तैनाती का ताड़पत्र जारी कर दिया है। सूची में राहुल बाबा का मासूम मुखड़ा सामने रख देने से संदेश साफ है कि पार्टी के भीतर कितनी भी गुटबाजी या जूतम पैजार हो, पर राहुल बाबा के सामने सब सावधान की मुद्रा में शटअप हो जाएंगे। क्योंकि राहुल का धवल कुर्ता जो भ्रष्टाचार के छींटों से मुक्त है और उनके चेहरे व चोले की सफेदी कॉमनवेल्थ से लेकर टू-जी, कोयला घोटाला तक सभी की कालिमा को कफन के कपड़े की तरह ढक लेगी। बड्डे बोले- बड़े भाई राहुल बाबा यूपी, बिहार और अन्य राज्यों के चुनावों अपने सरनेम ‘गांधी’ की गहराई नाप चुके हैं। पर फिर भी दिल है कि मानता नहीं। हमने कहा कांग्रेस का खूंटा है ‘गांधी’ नाम का मंत्र। क्योंकि इससे देश की आवाम में भी भ्रम बना रहता है कि जितने भी गांधी हैं सब के सब मोहनदास करमचंद गांधी के विरासतदार हैं और उनका आशीष केवल इसी परिवार के प्राप्त है।
बड्डे बोले जितने भी नाम चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए चुने गए हैं, उसमें अधिकतर वे नाम हैं जिन्होंने वर्षो से बैक डोर से राजनीति में दखल रखा है। अरे बड्डे ये तो पार्टी की परम्परा है कि बस एक बार नाम बना लो फिर जीवन भर देश और दल को दलते रहो। इस सूची में एक नाम तो ऐसा है जिन्हें न तो सड़कें, न बिजली और न ही नौकरियों में भर्ती पसंद हैं। वे मानते हैं कि चुनाव मुद्दों-वुद्दों से नहीं, मैनेजमैंट(प्रबंधन) से जीते जाते हैं।
यह बात दीगर है कि उनके इसी कौशल के चलते उनके ही राज्य में पार्टी की ऐसी वाट लगी आज तक दल सदमें में है। पर अब भी पार्टी में उनके प्रति मोह उनकी मैनेजमैंट कला का नतीजा है। बड्डे बोले- बड़े भाई जेई तो राजनीति है। उनमें प्रबंधन कला न होती तो दो- दो राज्यों में पार्टी को वेंटिलेटर पर लाने के बाद भी हाईकमान की निगाह में हैसियत नहीं घटी।
चुनावी मुहिम में जिन कर्णधारों की धार को आजमाया गया है उनमें कुछ ईमानदार टाईप के मंत्री- नेता नॉमिनेट किए गए हैं, तो कुछ इसलिए कि उनके बिना सूची सूनी रह जाती। दरअसल, केंद्र में कांग्रेसियों मौजूदा कार्यकाल कलंकित होने के बाद भी यदि वे सत्ता में वापसी का दिवा स्वप्न देख रहे हैं, तो इसमें उनकी योग्यता कम, विपक्ष की अयोग्यता ज्यादा है। उधर प्रधानमंत्री पद का मोह भाजपा में कलह की वजह बना है। हो न हो, यही कलह कांग्रेस के लिए ‘रिवाइटल’ की गोली साबित हो रही है कि ‘लूटो जी भर के’ क्योंकि उसके एक मंत्री ने पार्टी को यह मंत्र दिया कि कुछ भी करो जनता सब भूल जाती है।
बड्डे बोले जितने भी नाम चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए चुने गए हैं, उसमें अधिकतर वे नाम हैं जिन्होंने वर्षो से बैक डोर से राजनीति में दखल रखा है। अरे बड्डे ये तो पार्टी की परम्परा है कि बस एक बार नाम बना लो फिर जीवन भर देश और दल को दलते रहो। इस सूची में एक नाम तो ऐसा है जिन्हें न तो सड़कें, न बिजली और न ही नौकरियों में भर्ती पसंद हैं। वे मानते हैं कि चुनाव मुद्दों-वुद्दों से नहीं, मैनेजमैंट(प्रबंधन) से जीते जाते हैं।
यह बात दीगर है कि उनके इसी कौशल के चलते उनके ही राज्य में पार्टी की ऐसी वाट लगी आज तक दल सदमें में है। पर अब भी पार्टी में उनके प्रति मोह उनकी मैनेजमैंट कला का नतीजा है। बड्डे बोले- बड़े भाई जेई तो राजनीति है। उनमें प्रबंधन कला न होती तो दो- दो राज्यों में पार्टी को वेंटिलेटर पर लाने के बाद भी हाईकमान की निगाह में हैसियत नहीं घटी।
चुनावी मुहिम में जिन कर्णधारों की धार को आजमाया गया है उनमें कुछ ईमानदार टाईप के मंत्री- नेता नॉमिनेट किए गए हैं, तो कुछ इसलिए कि उनके बिना सूची सूनी रह जाती। दरअसल, केंद्र में कांग्रेसियों मौजूदा कार्यकाल कलंकित होने के बाद भी यदि वे सत्ता में वापसी का दिवा स्वप्न देख रहे हैं, तो इसमें उनकी योग्यता कम, विपक्ष की अयोग्यता ज्यादा है। उधर प्रधानमंत्री पद का मोह भाजपा में कलह की वजह बना है। हो न हो, यही कलह कांग्रेस के लिए ‘रिवाइटल’ की गोली साबित हो रही है कि ‘लूटो जी भर के’ क्योंकि उसके एक मंत्री ने पार्टी को यह मंत्र दिया कि कुछ भी करो जनता सब भूल जाती है।
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