Monday, 31 December 2012

मैं समय हूं, गतिमान हूं सदा



सा ल 2012 की शुरुआत जिस जोश-ओ-खरोश से हुई थी, उसका अंत उतना ही गमजदा और निराशाजनक रहा।
मनमोहन सिंह ने कहा था कि यह वर्ष 2012, लोकपाल के नाम होगा, रोजगार के अवसरों में वृद्धि और काले धन पर अंकुश व महंगाई पर नियंत्रण का होगा। लेकिन 2013 के मुहाने पर खड़े होकर देखें तो ऐसी खबरें या बातें कम ही नजर आती हैं जिसे हम, समाज या देश के स्तर पर इजाफे के तौर पर सहेज सकें या उन पर फख्र कर सकें।
कई तरह के विकास के दावों और वादों के बीच भ्रष्टाचार, महंगाई, धांधली की परम्परागत अंधेरगर्दी के बावजूद, दिसम्बर का आखिरी पखवाड़ा दामिनी के दंश से देश को झकझोर गया।
साल की शुरुआत में माया कलेंडर का डर भी दुनिया के विभिन्न हिस्सों में दिखा कि 21-12-12 को मानव का धरती से अंत हो जाएगा। इस अफवाह ने आम चर्चाओं व खबरों में सुर्खियां बटोरीं। मगर सकारात्मक सोच रखने वालों का मत था कि ऐसी बातें आधारहीन हैं और गलत साबित भी हुईं। समय चक्र है जो अपने नियम से सदा गतिमान रहता है और रहेगा। आपको याद होगी महाभारत धारावाहिक में हरीश भिमानी की आवाज-'मैं समय हूं..'समय' किसी का इंतजार नहीं करता..इतिहास के पन्नों पर अपनी छाप छोड़कर आगे बढ़ जाता है। 'समय' इतिहास के पन्नों पर ऐसे अध्याय लिख जाता है कि वे समाज में सदियों तक दोहरये जाते हैं। बालात्कार और स्त्री शीलहरण की न जाने कितनी घटनाएं मानव इतिहास में घटी होंगी और घट रही हैं, मगर हस्तिनापुर में दुस्साशन द्वारा द्रोपदी के चीरहरण की नजीर आज भी दी जाती है और अब दामिनी की घटना समाज पर ऐसा दाग है जो सदियों तक करुण याद के रूप में दर्ज रहेगी।
तारीख (31 दिसम्बर 2012) की गणना के हिसाब से, ऐसा ही दिन है आज, जो अच्छी-बुरी स्मृतियों को पीछे छोड़कर आगे की तारीख (1 जनवरी 2013) को उम्मीदों से देख रहा है। सच कहा जाए तो देखना भी चाहिए। हां मगर यह भी कि जो समाज अपने इतिहास से सबक नहीं लेता, उसकी उम्र ज्यादा नहीं होती।
इसलिए नव वर्ष सिर्फ तारीखों का बदल जाना नहीं है, यह इससे परे कई तरह की घटनाओं-गणनाओं के परिवर्तन से जुड़ा है। यह महज एक तारीख है जो पिछले वक्त का आंकलन और नए के लिए संकल्प का विकल्प लेकर आती है।
इस तारीख से किसी की बढ़ती उम्र के वर्ष गिने जाते हैं, तो किसी की नौकरी के वर्ष, लेकिन हर नया वर्ष गांव, नगर, शहर, देश-दुनिया की सभ्यता और प्राचीनता में हौले से एक वर्ष और दर्ज कर देता है। बहरहाल, इस समूची प्रक्रिया में बधाई, संदेशों का तांता और अधिकतम लोगों को याद कर लेने की चाह में ई-मेल, मोबाइल, फोन, फेसबुक, ट्विटर जैसे साधन अब संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बनकर उभरे हैं।
लेकिन यह कोरी प्रक्रिया है, जो परम्परा की लीक पीटने सिवा कुछ नहीं रह गई। इस तमाम उत्सवी कवायद के बीच, यदि आज के दिन, हम एक पल एकांत में बिता कर सोचें कि हमारा समाज, हमारी सभ्यता, यहां तक की हमारा समूचा विकास, मानव के हितार्थ कितना हुआ और विनाश के लिए कितना? तब सामान्य व्यक्ति भी बड़ी साफगोई से यह स्वीकारेगा कि हमने सुविधा के नाम पर अपने विनाश का सामान खुद-ब- खुद तैयार कर लिया है और जो रही-सही कसर है उसे दिन-ब-दिन पूरा करने पर आमदा हैं। तो जिन पर समाज, राष्ट्र और पूरी दुनिया का दरोमदार है, खासकर जो विशेष समझ और बुद्धि से युक्त हैं, उनकी निगाहें न सिर्फ उस विनाशकारी मंजर की तस्वीर को तजबीज पा रही होंगी बल्कि साफ-साफ देख भी रही होगी। क्योंकि आज हमारा जीवन ही पूरी तरह साधनों की गिरफ्त में है। विकास के इस सफर में हम सुख-साधनों के जितने करीब आये हैं, प्रकृति से उतने ही दूर हुए हैं। हमारा खान-पान जिस कदर प्रदूषण युक्त हुआ है, उससे सर्वथा नई तरह की लाइलाज बीमारियों का प्रादुर्भाव हुआ है। जीवन की गति बढ़ी है पर जिसके लिए जीवन है वही पीछे छूट रहा है। विडम्बना है कि इस गचर-पचर को हम महसूस भी करते हैं, पर कौन कदम उठाए, कैसे अमल करे, इसकी तरकीब नहीं सूझती।
लेकिन 'समय' है कि सब देखता रहा है और देख रहा है- मनुष्य का सामान्य स्वभाव है कि वह अपने लिए हर स्थिति में सुख की कल्पना और चाह करता है।
संसार में एक भी ऐसा प्राणी नहीं होगा जो अकारण सुख से वंचित रहने की सोचे भी। इसी फेर में साधनों का ध्रुवीकरण इतना बेतरतीव हुआ है कि भारत सहित दुनिया इसी मुद्दे पर दो स्पष्ट पाटों में बंट चुकी है। इस असमानता का अंतर कम कर पाए तो आगामी वर्ष जरूर शुभ हो सकता है। वरना, साल और भी आएंगे- जाएंगे मगर इतिहास के पन्ने पड़े निशान हमें झकझोरते रहेंगे। फिर भी उर्मिलेश दो पंक्तियों के सहारे आगे बढ़ते रहें कि - बेवजह दिल पे कोई बोझ न भारी रखिए, 
  जिंदगी जंग है इस जंग को जारी रखिए।

Friday, 21 December 2012

राजनीती के रीटेल मे मोदी ब्रांड

पिछले कुछ दिनों से अर्थव्यवस्था में एफडीआई में रीटेल की सुर्खियां अभी खुर्द-बुर्द भी नहीं हुईं थी कि राजनीति के रीटेल में मोदी ब्रांड चल निकला। खिसियाये लोग खंभा नोच कर स्टेटमेंट देते चैनलों के पर्दो पर भटक रहे हैं कि मोदी पिछले चुनाव के मुकाबले दो सीटें कम हासिल कर पाए और वे दो सीटें ज्यादा। रिजल्ट भले सत्ता को रीटेन करने का रहा हो, लेकिन विरोधी खम ठोंक सकते हैं कि दो सीटों का ही सही पर मोदी का बाल बांका तो कर दिया ना। यह कहते हैं कि खुश होने की वजह विरोधी नेता ढ़ूंढ निकालते हैं चाहे इसके लिए कितना भी ठीठ बनना पड़े तो क्या है। अब आलम है कि चाहे उनके विरोधी हों या उनके ही दल में रंजिश रखने वाले नेता, मोदी से जलें-भुने या कोसें-कुढ़ें पर मोदी सबकी छाती पर मूंग दलते हुए आज की राजनीति की 'व्यक्ति पूजा' की नई टेक्नोलॉजी के नए सूरमा बनकर उभरे हैं। और सट्टेबाजों की गणित सात हाथ नीचे गड़ गई।
बड्डे. पुराने जमाने के ज्योति बाबू को छोड़ दें तो मोदी ऐसे अकेले मुख्यमंत्री हैं जो अपने दम पर सत्ता की हैट्रिक लगाने में कामयाब रहे हैं। हो न हो, भारतीय राजनीति के छितिज पर सभी दलों के लिए मोदी का मुद्दा अनुसंधान का विषय बना होगा कि उन्होंने 'इंपासिबिल' को 'पॉसिबिल' कैसे बना दिया गया।
यहां तक कि भाजपा की केंद्रीय इकाई में वर्षो से तंबू गाड़े शीर्ष नेता मौका ताककर पीएम बन् का ख्वाब, उम्र दराज होने से पहले संजो हैं और ऐसा लाजिमी भी है और भय भ् क्योंकि पूरी जिंदगी खपाकर भाजपा को खड़ा करने वाले आडवाणी की आंख् का पानी, पीएम बनने की प्रतीक्षा में सू गया, 'पर' कट कर गिर गए और अंत उन्होंने दुखी मन से अपने अरमानों को आंसुओं में बह जाने देना ही मुनासिब समझ। लेकि संघ और भाजपा की छवि से परे मोदी राजनीति रीटेल में ऐसा ब्रांड बनकर उभरे हैं कि केंद्र की राजनीति में लिपे-पुते नेता सन्निपात के आघात को ङोल रहे हैं। क्योंकि बिना किसी की छत्र छाया और खाद पानी के मोदी की अमरबेल गुजरात को लप् लेने के बाद दिल्ली की ओर देख रही है। बड्डे बोले- 'बड़े भाई सो तो है।' इन फैक्ट मोदी की माया अब गुजरात से निक कर समूचे देश को मोह रही है तो उसकी वजह भी इसलिए 'नरेंद्र दामोदर दास मोदी' अब "नेशनल दमदार मोदी" की छवि के रूप में राजनीति की खरपतवार को सफा चट करके स्वयंभू बनने कगार पर हैं। सफल् से अहम और अहम से पतन की बड़ी वैज्ञानिक गणित है। इसलिए बड्डे बोले - बड़े भाई डेमोक्रेसी में अच्छे-अच्छों की ऐसी-तैसी होती भी खूब देखी गई है। वी सिंह की नजीर क्या कम है समझने-बूझने के लिए।

Thursday, 13 December 2012

विकास का बाईप्रोडक्ट ' बेईमानी'

बड्डे ने सबेरे-सबेरे अपना सुर अलापा कि बड़े भाई देश अराजक होने कगार पर है। हमने पूछा- देश या जनता या फिर नेता। बोले कोई भी हो बात 'सेम' है। नेता पक्ष का हो या विपक्ष का अथवा उभय पक्ष का, तीनों की पैदाइश देश में 'म्यूचुअल' है। यानी तीनों जनता से जन्मते हैं और जनता में विलीन हो जाते हैं। लेकिन जब तक नेता अपने सफेद चोले में रहता है, तब तक वह अपने जन्मदाता से विशिष्ट बना रहता हैं। क्योंकि जिसके पास सत्ता का पत्ता है वह किसी की सुनता नहीं और जो इससे मरहूम है वह किसी को सुनने देना नहीं चाहता।
अलबत्ता, चिंता की बात यह नहीं कि कौन किसको गाजर-मूली समझ रहा, क्योंकि इस नूराकुश्ती का कल्चर देश की राजनीति में ओल्ड है।
फिर भी जो दिखता है वही बिकता है। यानी माहौल में बमचक है। बेईमानी की तू-तू, मैं-मैं की मचमच के बीच अब सवाल लूट का नहीं बल्कि तुलना का है।
जब विकास की तुलना दो भिन्न सरकारों के बीच करके, उनके अलम्बरदारों मूंछ ऐंठ और सीना ठोंक सकते हैं, तो इस दौरान लूटी गई राशि और स्विस खातों में जमा रकम की तुलनात्मक विवेचना किये बिना भी यह तय करना सम्भव नहीं कि कौन छोटा और कौन बड़ा बेईमान था। कई बार यह दबी जुबां से कानाफूसी में माना और स्वीकारा गया कि विकास और बेईमानी अनुपातिक हैं, पूरक हैं।
इसलिए विकास को देखकर बेईमानी या भ्रष्टाचार का 'पर्सन्टेज' निकालना बेहद आसान है। देश के नेताओं की नई पौध को इसका विश्लेषण पढ़ाने और समझने के लिए, आजादी से लेकर अब तक के आंकड़े पाठ्यक्रमों में शामिल किए जाने चाहिए, ताकि हमारी पीढ़ी अपने करियर का चुनाव करते समय कोई चूक न कर बैठे कि बेहतर कैरियर का मार्ग कौन सा था?सेवा चाहे सरकारी हो या जनता की, दोनों में 'लाभ का तत्व' 'इक्वल' है।
इस 'तत्व' का बोध नेताओं की जमात ने बेहतर समझ और अपने वारिसों को समय आने पर सौंपा है।
दरअसल, इस करियर में आजीवन यूनीफार्म एक सी यानी 'फक्क सफेद' जिसमें काला धन छिपाना 'कम्फरटेबल' होता है। मुद्दे भी रटे रटाये जो सालों से जनता को 'फूल' बना रहे हैं। ऑल पार्टी के लीडर वर्षो से, बेशर्मी से, किसान, गरीब, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के तवे में अपना पराठा सेंकते रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, गरीबी के चिरंजीवी मुद्दे थे और बने रहेंगे। क्योंकि इन्हीं में विकास और बेईमानी का राज 'इनक्लूड' है। करना बस इतना है कि विकास की लीपापोती दिखे और बेईमानी 'लीक' न हो, वो भी चुनाव के ऐन वक्त पर। क्योंकि पहले के विकास और घपले-घोटालों को जनता भूल जाती है।


Friday, 7 December 2012

उसी से ठंडा उसी से गरम

जनतंत्र में "तंत्र" "जन" को कैसे बुद्धू बनाता है, इसका इग्जाम्पल संसद में एफडीआई की बहस के बहाने देश और दुनिया ने खुले आम देखा सुना। सपा और बसपा के दोहरे आचरण की सबने खबर ली। क्योंकि हमारे यहां "बहती गंगा में हाथ धोने" की प्रवृत्ति एक संस्कार के रूप में प्रतिष्ठित है। बावजूद इसके सपा, बसपा के चरित्र चिंतन को कोसने वाले लोग "फुलिश" हैं। क्योंकि इन दलों का बर्थ ही विशेष वर्ग को लेकर, विशेष तरह की राजनीति के लिए हुआ है और इसीलिए सत्ता का पत्ता उनके हाथ में ऑलवेज बना रहता है। अवसरवाद एक बड़ा राजनैतिक गुण है।
जिसकी भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक पहचान अब जाकर दर्ज हो रही है। पर बड्डे तुम हो कि इसे दुर्गुण मानते हो और चाहते हो कि नेता अपने धवल वस्त्रों की तरह अपनी करतूतों में भी दिखें। दरअसल, देश पिछले 60 वर्षो से इसी मुगालते में रहा है कि हमें छोड़कर सभी लोग बेहद ईमानदार, स्वच्छ छवि के हों। बस यही चूक चिल्लपों की वजह बनती रही है।
बड्डे बड़बड़ाये बोले- आप भी पत्रकार होकर बेहूदा बात करते हो, कांग्रेस का समर्थन करने और न- नुकुर करने में विशेष वर्ग की बात कहां से आ गई। यह तो देश में एफडीआई को लेकर विरोध और समर्थन से उत्पन्न चिकचिक और किचकिच का मसला है। और फिर ये नेचुरल है कि जब दो या अधिक दल एक साथ रहेंगे तो दलदल होगा ही। यानी "तुम्ही से मोहब्बत तुम्ही से बेवफाई" जैसे हालात लाजिमी है। उधर सर्वविदित है कि सपा और बसपा दो धुरंधर पैदाईशी प्रतिद्वन्दी हैं। पर लोभ वश छत्तीस का आंकड़ा रखने के बावजूद दोनों कांग्रेस को साईकिल और हाथी पर बैठाने के लिए 24 घंटे तत्पर हैं। दोनों एक साथ सरकार का साथ नहीं छोड़ सकते, इसका इल्म सरकार को बाकायदा है और उसका यही कॉनफिडेंस एफडीआई को लाने के पीछे है। बड्डे बोले- बड़े भाई पर संसदीय भाषण में सरकार को गाली और वोटिंग में पप्पी। ये सब किसलिए। जब मुलायम सख्त होते हैं तो माया पिघल जाती हैं और जब माया सख्त तो फिर उनका नाम ही मुलायम है। बड्डे मैसेज बड़ा क्लियर है, जिसके दस पंद्रह सांसद होंगे वे ही सरकार की कार ड्राईव करेंगे। केजरीवाल ने इस सीक्रेट को समय रहते
समझ बूझ के अन्ना से पल्ला झड़ लिया। क्योंकि "कुर्सी की गर्मी" ये अंदर की बात है बड्डे। अरविंद ने अपने सरकारी पद का बलिदान जनता के लिए दिया था, तो अब जनता की रिस्पॉसिबिलिटी है कि वह उन्हें सरकारी पद के बदले, सरकार में पदासीन करे। केंद्र की सरकार, सपा और बसपा कार में "एसी" सिस्टम की तरह हैं। जब ठंडा हो तो ब्लोअर चलाओ और गरम हो तो कूलिंग यानी "उसी से ठंडा उसी से गरम"

Thursday, 29 November 2012

हमीं ने दर्द दिया है हमीं दवा देंगे



बड्डे बोले- जैसई-जैसई चुनाव का चुनचुना नेताओं खासकर यूपीए को काटने लगा है, उसकी घोषणाएं चुनावी राजनीतिक धर्म के माफिक होती जा रही हैं। हमने कहा बड्डे तुम बोका हो !
क्यों न हों जब मौका भी है, दस्तूर भी और जरूरत भी है, तो इसे कैश क्यों न किया जाय। जब निकटतम प्रतिद्वन्दी भाजपा गृह कलह के भंवर में डूब उतरा रही हो, तब इसका बेनीफिट क्यों न उठाया जाए। मौके की नब्ज और नजाकत को रीड करने में कांग्रेस से कुशल कारीगर और कौन हो सकता है। तभी तो भीषण टाइप के घपलों के बाद भी वह सत्ता में वर्षो से जमी रही है। इसीलिए उसका कॉनफिडेंस भी है कि वह पुन: वापसी कर लेगी। क्योंकि वह कोई भी काम गैर-योजनागत नहीं करती। सब कुछ योजनबद्ध है, फिट है और टिच्च है। चुनाव तैनाती की कड़ी में टीम को टाईट कर दिया गया है। पहला मरहम जनता के किचन में यह कहकर लगाया जा सकता है कि "हमीं ने दर्द दिया है हमीं दवा देंगे"। गैस सिलेंडर की सब्सिडी का गेम अब खुलकर आने लगा है। मींटिगों, प्रस्तावों के जरिए पसीना बहा- बहा के यह जताने कि कोशिशें तेज हो चुकीं हैं कि सरकार को इसके लिए 18 हजार करोड़ का बोझ ङोलना होगा, तो वह ङोलेगी। तेल कंपनियों के ठेकेदारों को समझ-बुझ के राइट कर दिया गया है कि चुनाव होने तक घाटे की बड़बड़ नहीं, क्योंकि अब जनता चुनाव तक "बोझ" नहीं जरूरी ऑक्सीजन है, जान है, जाने जहान है।
एक खुशी सारे गमों का गलत कर देती है।
इसलिए अब एक-एक करके खुशियों कई लच्छे फेंके जा रहे हैं। मसलन मनरेगा से मनमानी हटेगी, आम आदमी का पैसा उनकी जेब में सीधे डाला जाएगा ताकि वह तरंग में रहे और अपना वोट भी कैश की तरह सीधे यूपीए के नाम डाल दे। गेम सीधा है। यानी "राहत" है ऑल क्लियर बाकी सब बकवास। आम आदमी और सरकार कमिंग डेज में खुलेआम इस लेन-देन में इनवाल्व होती दिखेगी।
उधर केजरीवाल की" आम आदमी की पार्टी" कांग्रेस के लिए मल्टीविटामिन की गोली साबित हो रही है। क्योंकि कुछ अक्खड़ टाइप के लोग जो "राहत" के जाल में नहीं फंसते वे अपनी लोकतंत्रीय ताकत "वोट"को अलग-अलग दलों में ठप्पा लगाने के तुर्रा  में ठिकाने लग जाएंगे। यानी उसके खिलाफ गुस्सा फुस्स होकर बिखर कर जाएगा। इसलिए यूपीए जनता के समस्त संतापों को हर कर यह अहसास कराने में जुट चुकी है कि गर इस देश में कोई माई-बाप था, है और रहेगा, तो वह कांग्रेस और उसके कारिंदे हैं। "अंत भला तो सब भला" जैसी कहावतें गर बनी हैं तो ऐसे मौकों की तलाश में गढ़ी गई होगी। तो बड्डे कांग्रेस को वोट देने के कैश फायदे ही कई दर्दो की दवा है।
 श्रीश पांडेय

Friday, 23 November 2012

फांसी के फंदे अभी और हैं.


चार साल तक कसाब के रख रखाव में करोड़ों फूंकने और कसाब का हिसाब लेने के बाद बड्डे बोले- देखो बड़े भाई मरे मराये को मार के देश के कर्णधार कुर्ता मोड़-मोड़ के ऐसे अकड़ रहे हैं जैसे की आतंक सहित पाकिस्तान को ही पटखनी दे दी हो। यह मैटर दीगर है कि अजमल का "मल" साफ हो गया मगर, एक दशक से अफजल का "जल" अभी भी छलक रहा है। जब क्लियरकट अपराधी को इतने वर्षो तक देश महफूज रखा जा सकता है, तब जिन पर संदेह है उनका तो बाल बांका भी देश का कानून नहीं कर सकता। एक आतंकी को सजा देने में सरकार इतनी क्यों सहमी है? इसके पीछे अफवाहों और आरोपों का बाजार सुर्ख है। लेकिन हमारी सरकार से उदार इस धरती दूसरी हरगिज नहीं हो सकती। मानव को कीड़े मकोड़ों की तरह मसलने वालों के प्रति हमारी मानवीयता अखिल ब्रम्हांड में अद्वितीय है।
अमेरिकी मुखिया ओबामा ने कहा था कि हमें गर्व है कि हम इस धरती के सर्वश्रेष्ठ देश हैं, क्योंकि वे अपने दुश्मन आतंकी ओसामा को पाकिस्तान में घुसकर निपटा सकते हैं। हमने कहा बड्डे- गर उन्हें गर्व है तो हमें भी फख्र होना चाहिए। आखिर ये देश बुद्ध, महावीर और गांधी का है। जब अहिंसा से बापू ने अंग्रेज भगा दिये तो एक दिन आंतकी भी हमारे शांतिप्रिय व्यवहार से शांत हो जाएंगें। पर कसाब एडं कम्पनी ने जितने मारे उससे कई गुना तो देश में अपने ही अपनों को निपटा रहे हैं।
अब अफजल पर देश जल्दी में है। क्या सरकार, क्या विपक्ष और क्या छुटभइया नेता सब के सब ताल ठोंक रहे हैं कि इसे भी लटकाओ। यों तो सरकार मामले लटकाने में माहिर है। न जाने कितने बिल लटके हुए हैं। कुछ प्रकरण इसलिए पैंडिंग हैं कि उनकी जांचें अखण्ड रामायण की तरह बांची जा रही है। महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सुलग रहे जनमानस को लोकपाल, अविश्वास प्रस्ताव, सरकार में फेरबदल, एफडीआई जैसे मामले ठंडा करने का काम करते रहे हैं।
जब आतंकी देश में घुसकर खुले आम आदमी को भूंज सकते हैं, संसद में सांसदों को निपटा सकते थे।
वो तो भला हो कुछ सैनिकों की शहादत और कुछ ने उन्हें मार दिया उस दिन वरना उस दिन देश अपने नाथों से अनाथ हो जाता। बहरहाल संसद में गतिरोध जारी है देश चल रहा है। आतंकियों की फांसी और एफडीआई में फंसी सरकार की कार है कि पंचर होती नहीं दिखती। ममता के बाद मुलायम और यदि जरूरत हुई तो उनके बाद माया सरकार को फांसी घर से बाहर ले आने के लिए आतुर और कृतज्ञ भाव से नतमस्तक हैं। फिर भी जिस तरह से एफडीआई पर विरोध उभरा है वह सरकार के लिए फांसी का फंदा न साबित हो।

Friday, 16 November 2012

कांग्रेस के कर्णधारों की धार

भाजपा का संकट और उसके खुशी के आलोक में दीवाली मना रहे कांग्रेसियों ने मौका ताक कर 2014 चुनाव की तैयारियों की तैनाती का ताड़पत्र जारी कर दिया है। सूची में राहुल बाबा का मासूम मुखड़ा सामने रख देने से संदेश साफ है कि पार्टी के भीतर कितनी भी गुटबाजी या जूतम पैजार हो, पर राहुल बाबा के सामने सब सावधान की मुद्रा में शटअप हो जाएंगे। क्योंकि राहुल का धवल कुर्ता जो भ्रष्टाचार के छींटों से मुक्त है और उनके चेहरे व चोले की सफेदी कॉमनवेल्थ से लेकर टू-जी, कोयला घोटाला तक सभी की कालिमा को कफन के कपड़े की तरह ढक लेगी। बड्डे बोले- बड़े भाई राहुल बाबा यूपी, बिहार और अन्य राज्यों के चुनावों अपने सरनेम ‘गांधी’ की गहराई नाप चुके हैं। पर फिर भी दिल है कि मानता नहीं। हमने कहा कांग्रेस का खूंटा है ‘गांधी’ नाम का मंत्र। क्योंकि इससे देश की आवाम में भी भ्रम बना रहता है कि जितने भी गांधी हैं सब के सब मोहनदास करमचंद गांधी के विरासतदार हैं और उनका आशीष केवल इसी परिवार के प्राप्त है।

बड्डे बोले जितने भी नाम चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए चुने गए हैं, उसमें अधिकतर वे नाम हैं जिन्होंने वर्षो से बैक डोर से राजनीति में दखल रखा है। अरे बड्डे ये तो पार्टी की परम्परा है कि बस एक बार नाम बना लो फिर जीवन भर देश और दल को दलते रहो। इस सूची में एक नाम तो ऐसा है जिन्हें न तो सड़कें, न बिजली और न ही नौकरियों में भर्ती पसंद हैं। वे मानते हैं कि चुनाव मुद्दों-वुद्दों से नहीं, मैनेजमैंट(प्रबंधन) से जीते जाते हैं।

यह बात दीगर है कि उनके इसी कौशल के चलते उनके ही राज्य में पार्टी की ऐसी वाट लगी आज तक दल सदमें में है। पर अब भी पार्टी में उनके प्रति मोह उनकी मैनेजमैंट कला का नतीजा है। बड्डे बोले- बड़े भाई जेई तो राजनीति है। उनमें प्रबंधन कला न होती तो दो- दो राज्यों में पार्टी को वेंटिलेटर पर लाने के बाद भी हाईकमान की निगाह में हैसियत नहीं घटी।
चुनावी मुहिम में जिन कर्णधारों की धार को आजमाया गया है उनमें कुछ ईमानदार टाईप के मंत्री- नेता नॉमिनेट किए गए हैं, तो कुछ इसलिए कि उनके बिना सूची सूनी रह जाती। दरअसल, केंद्र में कांग्रेसियों मौजूदा कार्यकाल कलंकित होने के बाद भी यदि वे सत्ता में वापसी का दिवा स्वप्न देख रहे हैं, तो इसमें उनकी योग्यता कम, विपक्ष की अयोग्यता ज्यादा है। उधर प्रधानमंत्री पद का मोह भाजपा में कलह की वजह बना है। हो न हो, यही कलह कांग्रेस के लिए ‘रिवाइटल’ की गोली साबित हो रही है कि ‘लूटो जी भर के’ क्योंकि उसके एक मंत्री ने पार्टी को यह मंत्र दिया कि कुछ भी करो जनता सब भूल जाती है।