Thursday, 18 October 2012

भारत के विकिलीक्स हैं केजरीवाल

केजरीवाल इनदिनों ऐसी फुटबाल खेल रहे हैं जिसमें कभी किक कांग्रेस के कारिंदों पर होती है तो कभी भाजपा के। देश के दोनों बड़े राजनैतिक दल सकते में हैं।
राजनैतिक गंदगी की सफाई की लड़ाई में बाबा, अन्ना जैसों के बैकफुट में आने के बाद, फ्रंटफुट में आये केजरीवाल एक-एक को देख लेने की कसम खा चुके हैं। वे चुन-चुन के बड़े दामाद टाइप जो बिना कुछ करे चमत्कारिक सत्ता की दम पर करोड़ों लील गए,दाद देनी होगी दामाद की कि बड़ी साफ गोई से मुकर गये घपले के पचड़े से। एक चमचे टाईप मंत्री जो असहाय विकलांगों के हिस्से की रकम पर कुदृष्टि लगा बैठे और कुछ अध्यक्ष टाईप लोग जो किसानों की जमीनें और सिंचाई के पानी से खुद को तर करने में लिप्त हैं। कहते हैं कि ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता’ पर केजरीवाल अकेले ही ऐसे चेहरों को बेनकाब करने में भिड़े हैं। वैसे यह सही समय है जो उन्होंने चुना है। दीपावली की पुताई में जहां घर-द्वार सफेदी से चमक रहे हैं वहांअकेजरीवाल इस सफेदी के पीछे छिपी कालिख को उजागर करने में जुटे हैं, ताकि देश भी जान समझ ले कैसे रातों रात 7 करोड़ से 54 करोड़ में बनाए जाते हैं। दामाद बनने के फायदे गिनाते हुए बड्डे बोले-बड़े भाई अफसोस है कि मैडम के एकई बिटिया थी, वरना हम भी अपने लड़के का प्रस्ताव प्रस्तावित तो कर ही देते। जब बर्तन का धंधा करने वाले का नम्बर लग सकता था तो अपना लड़का तो विदेश में साफ्टवेयर इंजीनियर है। वह इस रातो-रात मिलने वाली अकूत रकम को बड़े इत्मिनान से मैनेज कर लेता। कहीं चूं-चपड़ तक न होती और फिर कालाधन विदेश में ही महफूज रह सकता है। उधर काला धन का आंकड़ा देते, चीखते-चिल्लपों करते, बाबा, अन्ना जैसों के गले चोक हो चुके हैं। रहा सवाल केजरीवाल का तो उसको अपने चमचे टाईप मंत्री निपटा लेंगे। चमचे टाईप मंत्री फरुखाबाद आने की धमकी देकर खुले आम कह रहे हैं कि ‘रगों दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल, जो आंख से ही न टपका वो लहू क्या है।’ खून की बातें खुले आम संविधान में शांति और व्यवस्था की सपथ खाये मंत्री करने लगे हैं, तो अपराधियों का क्या कहना। लेकिन बड्डे बोले‘अ पना केजरीवाल तो इंडियन टाईप का विकीलीक्स निकला।’ ‘अ’ से असांजे और ‘अ’ से अरविंद यानी केजरीवाल भारत के अरविंद असांजे हैं। ऐसी-ऐसी खबरें निकाल रहा है कि जैसे एक-एक की ऐसी-तैसी करके ही दम लेगा। वहां से भी जहां कभी शक की कोई गुंजाईश न थी। हो न हो, बसपा, सपा, तृणमल, डीएमके, जैसों पर भी जांच की आंच आयेगी। खैर अब तो देखने वाली बात है कि विकीलीक्स का इंडियन संस्करण और क्या-क्या गुल खिलाता है.!!!

Thursday, 11 October 2012

चमचे का नमक, चेहरे की चमक

  बड्डे को हल्के मूड में देख हमें सुकून आया कि चलो आज तो कुछ अच्छी खबर है। हमें देखते ही बोल पड़े- बड़े भाई कल के चारण-भाट आज के चमचों के रूप में रूपांतरित हो गए हैं। पहले ये कविताओं, गीतों या किताबों में तारीफों के कशीदे पढ़करअपने स्वामियों का मन मोहने और इनाम हासिल करने की जुगत में बे-वजह खीस निपोरते पाए जाते थे और आज भी ये अपने-अपने आकाओं की ऐसी ऊर्जा बने हुए हैं, जिसके बिना बॉस का अस्तित्व ही खतरे में लगता है। चमचे सिर्फ राजनीति में ही नहीं, बल्कि हर जगह अपने विभिन्न रूपों में पाए जाते हैं। इनकी वैराइटी खाने के चम्मच(स्पून) की तरह छोटी-बड़ी, चमकीली अथवा कम या अधिक मूल्य (वैल्यू) की होती है। बहरहाल, चमचों की जितनी प्रजातियां भारत में पाई जाती हैं उतनी विश्व के किसी और मुल्क में मिलना मुश्किल है। जैसे खाने का चम्मच हमें सुविधा और सहायता देता है वैसे ही नेताओं, धमर्गुरुओं, अफसरों के चमचे,चेले उनकी खुशामदीद में व हर कही बात को सच साबित करने में सहयोग देते हैं।

चमचों की अखंड धारणा और एक सूत्री कार्यक्रम है कि अपना बॉस गलत न तो बोल, न कह सकता।

समर्पण और शरणागति ही चमचत्व का तत्व है। ईश्वर भी भक्तों से यही चाहता है कि तू मेरा बन, फिर कृपा ही कृपा है। बस यही तो चमचों का दायित्व है कि वे न सिर्फ अपने आका की बात का आंख मूंदकर समर्थन करें, जयकारे लगाएं बल्कि वे उनके प्रतिद्वन्दी पर हमला भी करें और इससे उत्पन्न सारा कसाय कल्मश अपने सीने पर ङोल लें। आंच तक न आने दें अपने भाग्यविधाता पर। चमचों का सौंदर्य ही इसमें है कि वे निरंतर चैतन्य अवस्था में एक्टिव बने रहें। यूपीए के एक मंत्री तो खुलेआम कह रहे हैं कि अपना तो काम ही यही है कि आका के परिवार पर कोई आंच आये तो सारा ताप वे अपने सीने में लेने को तत्पर हैं। यानी मंत्री वे बाद में पहले तो चमचे ही हैं। सारा देश गलती कर सकता है पर उनके आका गलतियों से सवर्था मुक्त हैं। जैसे ईश्वर गलतियों से परे है। तभी तो हम चमचे उन्हें(बॉस) देवता की तरह पूजते हैं। दरअसल चमचे अपने बॉस का नमक है। नमक से ही देह में चमक आती है। नमक का अनुपात बनाए रखना चमचों का अनिवार्य दायित्व है। इसलिए हर बॉस की शकल में मौजूद चमक को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि किसके पास कितने आयोडीनयुक्त नमकदार चमचे हैं। जो समय-समय पर नमक की आपूर्ति संतुलित रूप में करते रहते हैं। एक पूर्व बड़बोले सीएम इस नमक को संतुलित नहीं रख पाए तो दरबार से बाहर कर दिए गए। आखिर बड्डे बोले बड़े भाई चमचा वही जो नमकदार हो।
                                                                                     श्रीश पांडेय

Wednesday, 3 October 2012

औसत में जीत है

  टी-ट्वंटी वर्ल्ड कप क्रिकेट में आलम दर्जे की बल्लेबाजी के गुमान में जी रही टीम धोनी की लगातार तीसरी बार धुल जाने से बड्डे सर पर हाथ रखे कुछ यूं बैठे थे मानो अब देश का कोई भविष्य नहीं रहा, अब भारत कैसे जिएगा, क्योंकि उसका चिर प्रतिद्वन्दी, जिसको वह तीन दिन पहले 8 विकेट से कूट-पीट चुकी है वह अब भी चैंपियन बनने की दौड़ में शामिल है। हार के जीत और जीत के हार के रूल्स अब बड्डे को बिल्कुल रास नहीं आ रहे थे। पर सिवाय बड़बड़ाने के बड्डे और कुछ नहीं कर पाने की बेबसी से बेहाल बीयर की चुस्की के साथ बिस्तर डले गहरी चिंता में मशगूल थे। इतनी फिकर तो गैस, डीजल के महंगे होने, विदेशी कंपनियों की देश में घुसपैठ, और डायनासोर सरीके बडेÞ-बड़े घोटालों पर नहीं की। बड्डे बोले बड़े भाई अपन जीत के भी हार गए और दूसरे हार के भी जीत गए यह बात नहीं पच रही। गब्बर सिंह के अंदाज में बड्डे बोले कि ‘हमने कुल 6 में 5 मैच जीते और टूर्नामेंट से बेदखल, उधर वेस्टेंडीज कुल दो ठईया मैच जीत के अंदर, सरासर नइंसाफी है बड़े भाई।’     
   हमने समझाया अरे बड्डे! सब औसत का खेल है। उसी की जीत है, जिसका औसत ठीक है, वही  चैंपियन बन सकता है। औसत यानी बैलेन्स रहो। टीम धोनी के धुरंधर उत्साह में ज्यादा औसत में कमजोर साबित हुए, जबकि औसत का गणित पहले से इम्पारटेंट माना जा रहा था, चाहे वह खेल हो या चुनाव। गाड़ियों के बिकने में भी एवरेज का रोल है, जिसका ऐवरेज दुरुस्त नहीं समझो मार्केट से बाहर। एमबेस्डर, फिएट, बुलेट, राजदूत सब के सब इसी एवरेज के चलते ठिकाने लग गर्इं। परीक्षाओं में एवरेज मेन्टेन करना होता है, वरना ज्यादा में भी हार हो जाती है। फिर भी भारत के भाग्य विधाता बुद्धि में नहीं भावना में जीते हैं। सरकार कितना भी लूट-खसोट कर ले, महंगाई बढ़ा ले, तिस पर जनता कितना भी सरकार को कोस ले, कुढ़ ले, पर वह इन सबसे बेपरवाह औसत को महत्व देती है। उसे बखूबी पता है कि सब करो पर ऐन टाइम (चुनाव के वक्त) मिथ्या घोषणाएं और कुछ नकदी बांट-बंूट के नाराजगी का औसत मेन्टेन कर वह हार से बच जाएगी। पर अपनी टीम है कि कभी आठ विकेट से हारती तो कभी आठ विकेट से हराती। अब जरूरत है नेट प्रैक्टिस की बजाए औसत का गुरूमंत्र लेने की। इसके लिए टीम इंडिया को 10-रेसकोर्स की शरण में जाना होगा, जहां वह औसत को कैसे मेन्टेन किया जाए, के गुर सीखे।कांग्रेस, यूपीए सरकार को बरकरार रखने के लिए जज्बात नहीं हालात के तकाजे में देखती है। माया, ममता और मुलायम में औसतन जो फिट हो, बस उसी को भाव, बाकी से कन्नी काट लो। क्योंकि औसत में ही जीत है।

Thursday, 27 September 2012

मुखिया ने दी ज्ञान की पुडिया

  बड्डे बड़े सबेरे चौगड्डे पर अखबार लिए एक जनसमूह से मुखातिब हो सरकार के मुखिया द्वारा दी हुई ज्ञान की पुड़िया लोगों को दे रहे थे कि उन्होंने मौन त्यागकर मुंह खोला है कि गैस और डीजल के बढ़े हुए दाम जनता को भले अभी जला रहें हों, पर बाद में यही जले पर मरहम सा सुकून देंगे। फिर सस्ते के लिए हम एफडीआई तो ला ही रहे हैं। विकास के बरक्स देश की इज्जत भी तभी होगी जब विदेशी दुकाने गली-गली में सजेंगी, चमकीले स्टोरों में जनता शॉपिंग करने जाएगी और इस ग्लैमराइज्ड माहौल में उनकी कटती जेबें कभी उफ्फ् तक न कर सकेंगी। मौनीबाबा ने ज्ञान की एक और पुड़िया दी है कि देश की अर्थ व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए कड़े आर्थिक कदम उठाना जरूरी हो गया है। इसलिए जनता पेट में पत्थर बांध के जीने की आदत डाल ले। उन्होंने अब तक का सबसे बड़ा खुलासा किया है कि ‘पैसे पेड़ पर नहीं उगते’ और जिन पेड़ों पर उगते भी हैं तो, वे वहां उगते हैं जहां जनता की औकात नहीं कि पहुंच सके।
  दाम बढ़ाने का जो संकट सम्मुख है, उसकी वजह अर्थव्यवस्था में ‘अव्यवस्था’ नहीं बल्कि व्यवस्था में ‘अव्यवस्था’ है। बड्डे बोले ‘बड़े भाई खुलकर बताओ।’ हमने कहा कि देख नहीं रहे पिछले दो बरस से सरकारी खजाने की कैसी लुटाई मची है, इत्ता तो मुगल और अंग्रेज मिलकर भी नहीं लूट पाए जित्ता इस पंचवर्षीय में आलरेडी हो चुकी है। अब जहां लूट है, लाजिमी है कि घाटा भी वहीं होगा। स्पेक्ट्रम, कोयले के पेड़ों से खजाने में आने वाला राजस्व स्विस बैंकों में चला गया। इसलिए खजाना खाली है। जिसकी भरपाई लुट चुके और स्विस के तहखानों में दफ्न हो चुके धन से तो होने से रही। क्योंकि अब वह लूट, लूटकारों की निजी एसेट बन चुकी है।  इस देश में जो लूटा गया उसे वापस लाना तो ब्रम्ह के बूते में नहीं। फिर भी कोशिश के तौर पर जनता, विपक्ष, मीडिया यहां तक कि कोर्ट भी डांट-डपट चुकी है। बाबा, अन्ना का गला चिल्ला-चोट करते चोक हो चुका है। मगर मजाल है कि एक पाई भी टस से मस हुई हो। उल्टे अब तो अन्ना-बाबा भी मौन की मुद्रा अख्तियार कर बैकफुट पर हैं। ऐसे में सरकार तृणमूल को किनारे लगा मुलायम को साथ ले, गुस्से में नथुने फुला, बांहें मोड़ रही है कि कौन है जो सरकार को गिरा सके। सरकार ने मौका ताककर तीसरा नेत्र क्या खोला कि बाबा रामदेव की दुकान झुलस उठी। उधर अन्ना को केजरीवाल खाए जा रहे हैं, चैक से रकम में हेरा-फेरी को लेकर थुक्का-फजीती के चलते वर्षों से बनाई इमेज का जनाजा निकल रहा है। आखिर बड्डे सोच में पड़ गए कि अचानक मौनीबाबा के पीछे इत्ती ऊर्जा किसकी आ गई...मैडम की या मुलायम की...!!

 

Wednesday, 19 September 2012

डार्विन की डगर पर सरकार



  सबेरे-सबेरे लकड़ी बेचने वाली महिलाओं के पास बड्डे को गचर-पचर करते देख हम पूछ बैठे कि आज जलाऊ लकड़ी पर मोल भाव... इन्हें कहां जलाओगे, ढ़ाबा खोलोगे या गांव में जा बसोगे। बस फिर क्या था गैस की बढ़ी कीमतों पर  मन में जो गुस्सा मनमोहन सरकार पर था, वह लकड़ी वाली बाई से होता हुआ हम पर बरस पड़ा... बोले समझ लो मरने और खुद जलाने के लिए चिता की लकड़ियन का इंतजाम कर रहे हैं। राशन के रॉ मटेरियल को खरीदते-जुगाड़ते जिंदगी बिखरी जा रही है और अब उसे पकाने के लिए गैस सिलेंडर 800 रुपइया में मिलेगा। बड़े भाई कहां जाएगी यह सरकार इतने पाप करके। कहीं ठौर नहीं मिलेगी इस नासपीटी,करमजली को और न जाने कितने विशेषण अपने मुखाग्र से निकाले कि जो लिखे भी न जा सके। सरकार आम आदमी  को सीधे-सीधे मरने को क्यों नहीं कह देती। हमने कहा बड्डे आखिर लोकतंत्र है उसका भी कुछ लिहाज-लिहाफ होता है। सरकार तो बस इशारों में समझा रही है कि डार्विन की थ्योरी ‘सरवाईवल आॅफ द फिटेस्ट’ के मर्म को समझो कि जो आज की महंगाई में जो फिट है वही हिट है और उसी को जीने का अधिकार है। जंगल की भी यही स्थिति है ‘सिंह’ जो चाहे करे, खुद को जो बचा सके वही सरवाईव करे। इसलिए हाथी जैसे बेपरवाह बनो क्योंकि शेर उस हमला नहीं करता। हिरण, नीलगाय (आम जनता) बने तो कैसे सरवाईव करोगे। ऐसे में सरकार भी जंगली बन जाए तो गलत कहां है बड्डे। वह नेचर के नियम को फालोअप  ही तो कर रही है। अब देखो जो हाथी की स्थिति में हैं जैसे नेता से लेकर अफसर तक, चोर से लेकर डाकू तक, कालाबाजारियों से मुनाफाखोरों तक सब के सब सरवाईव करने के लिए कितने फिट हैं। महंगाई डायन उन्हीं के लिए जो आम हैं। खास के लिए तो विकास की सूचना। बच्चों को अच्छी ऐजुकेशन देना है तो पब्लिक स्कूल में अपनी जेब कटाओ, नहीं तो ‘मिड डे मील’ में पहले खिलाओ-पढ़ाओ और फिर ‘मनरेगा’ में खाओ-कमाओ। गैस  महंगी है तो कच्चा खाओ, बीमार हो जाओ तो सरकारी अस्पतालों में सड़ो, महंगाई है तो भूखे प्राण त्याग दो। और बड्डे तुम हो कि लोककल्याण के नाम पर सरकारी दामाद बनने की तमन्ना कर बैठे हो। पांच बरस में एक मुफ़त का वोट वो भी सरकारी स्टेशनरी पर और नेताओं की गाड़ी में बैठ कर क्या डाल दिया तो मुगालता पाल बैठे कि तुमने सरकार खरीद ली। सरकार बखूबी समझती-बूझती है वह जनता को इतने हिस्सों में बांट चुकी है  कि कि देश में उनका विरोध ज्वाइंट तौर कोई ‘माई का लाल’ नहीं कर सकता। इसलिए सरवाईव करने के डार्विन के मंत्र को समझो क्योंकि अब वही सरवाईव करेंगे जो डार्विन की डगर चलेंगे।    
         

Saturday, 8 September 2012

हिंदी की दशा


 भाषा कोई भी हो, वह उसे जानने वालों के मध्य संचार का अचूक माध्यम होने के साथ ही वह सभ्यता व संस्कृति के विकास का वाहक भी होती है। इतिहास  साक्षी है कि दुनिया के अलग-अलग भू-भागों में अनेक भाषाओं और बोलियों ने मानव की नैसर्गिक प्रतिभा को पल्लवति, पोषित किया है। आदि मानव में बर्बरता इसीलिए थी, क्योंकि उसकी कोई बोली या भाषा नहीं थी। बस थी तो- भूख, प्यास, नींद और मौजूद थे कहने, सुनने व समझने के लिए कुछ अस्पष्ट स्वर व संकेत। समय के साथ भाषा का निर्माण बड़े जतन से अक्षरों, शब्दों के गढ़ने के बाद हुआ।
    आज भारत में लगभग 1618 भाषा एवं बोलियां है और दुनिया में लगभग 6912 भाषाएं एवं बोलियां हैं। जिनके माध्यम से कई मानवपयोगी अनुसंधान व अविष्कार हुए हैं, लेकिन आज इनमें से अधिकांश लुप्त हो चुकी हैं और न जाने कितनी ही इसके कगार पर हैं। जैसे बड़ी मछली छोटी को निगल जाती है ठीक वैसे ही बड़ी भाषाएं छोटी भाषा और बोली को लीलती जा रही हैं और भाषा के साथ नष्ट होती है, वहां की मौलिकता, सभ्यता और संस्कृति के साथ एक समूची व्यवस्था, जिसे सदियों से हमारे पूर्वज सहेजते और विकसित करते आ रहे हैं।                                                                                                                                                                            कैसे एक विदेशी भाषा हमारी मौलिकता को नष्ट करती जा रही है, उसका एक सूक्ष्म एहसास मुझे अपने चार वर्षीय बेटे मानस श्री को उसके स्कूल में मिले गृहकार्य (होमवर्क) की एक अंगे्रजी कविता पढ़ाते वक्त हुआ। कविता थी ‘ओल्ड मेक्डोनॉल्ड हैड अ फॉर्म ईया ईया ओ... विथ सम डॉगस, बाऊ-बाऊ हेयर एण्ड बाऊ- बाऊ देयर’ और इसी प्रकार ‘विथ सम कॉऊ,.. मूं-मूं हेयर एण्ड मूं-मूं देयर’ इस कविता में कुत्ते के भौंकने (भों-भों) को बाऊ-बाऊ और गाय के रम्भानें (म्हां-म्हां) को मूं-मूं कहकर बच्चों से रट्टा लगवाया जा रहा है। धर्म क्षेत्र में देखें तो, बच्चे अब देवताओं के नाम गणेश नहीं ‘गणेशा’, राम-कृ ष्ण नहीं ‘रामा-कृ ष्णा’ जैसे सम्बोधन के आदी होते जा रहे हैं। कैसे बचपन से ही मूल स्वरों व आवाजों से इनकी महक  छिनती  जा रही है। इन्हीं एक-एक शब्दों के जरिए हमारी आने वाली पीढ़ी अपनी भाषा और संस्कृति से परे होती जा रही है। कार्ययालयों, रोजमर्रा के मेल मुलाकातों के सम्बोधनों  गुडमॉर्निंग, गुडईवनिंग, गुडनाईट ने हमारे नमस्कार, प्रणाम, शुभरात्रि जैसे शब्दों को विस्थापित कर दिया है और  जो भी बचा है वह बिना प्रभावित हुए नहीं रहने वाला। आचार-विचार और सोच में यह तब्दीली तथाकथित अंग्रेजी दा सोसायटी में तो पूरी तरह उतर ही चुकी है और अब इसका अवतरण कस्बाई इलाकों में हो रहा है।
    सृजन किसी  भी  तरह  का  हो  वह  मौलिक बोली या भाषा में ही उत्कृष्ट और पूर्ण  हो सकता  है . बात गौर करने लायक है कि मौलिकता ही रचनात्मकता की जनक है और यह अपनी मातृ भाषा में ही सम्भव है। तभी तो टैगोर द्वारा बांग्ला में लिखी ‘गीतांजलि’ भारत में एकमात्र नोबल पुरस्कार पाने वाली पुस्तक बन कर रह गई। पर राष्टÑ भाषा हिन्दी को लेकर जिस तरह से दोयम दर्जे का रुख भारत में अख्तियार किया गया है, वैसा दुनिया के किसी और मुल्क में हरगिज नहीं होगा।
     इतिहास साक्छी है कि दुनिया के अधिकांश अविष्कार मौलिक भाषा में हुए हैं। यथा आज भी चीन में मंदारिन, फ्रांस में फ्रेंच, रुस में रशियन, जापान में जैपनीज भाषा में ही समस्त कार्य जारी हैं। यहां तक कि उनके राजनयिक अपनी देश-विदेश की यात्राओं में अपने यहां राष्टÑभाषा बोलने में नहीं हिचकते। लेकिन भारत में ऐसी स्थितियों में नेता अंग्रेजी के पक्ष में रहते हैं, न कि राष्टÑभाषा के। भारत में स्थितियां दिनोंदिन विपरीत होती जा रही हैं।
   पर  देश में अंग्रेजी को रोजगार से जोड़ देने की साजिश चल पड़ी है। अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई कर रहे बच्चों को एक अलग समूह के रूप में देखा जाने लगा है, जैसा पहले कभी ब्रितानी हुकूमत के दौर में था। आज भारत की शिक्षा प्रणाली में अंग्रेजी की अनिवार्यता बना दी गई है। पिछले दो वर्षों में  इसे पढ़ने का एक नया चोर रास्ता गढ़ दिया गया। पहले देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा ‘संघलोकसेवा’ की मुख्य परीक्षा में अंग्रेजी का ऐच्छिक प्रश्न-पत्र था, जिसमें  मात्र उत्तीर्ण होना अनिवार्य था, यह तब भी  हिन्दी माध्यम में पढ़कर आये विद्यार्थियों के लिए एक बड़ी बाधा थी, पर तब कैसे भी रट कर काम चल जाता था। लेकिन,अब तो प्रारम्भिक परीक्षा में ही ‘सी-सेट’ टेस्ट के नाम पर अंग्रेजी की अनिवार्यता, पास होने के स्थान पर चयन का कारक बना दी गई है। क्या इसके मायने यह नहीं कि जो बच्चे कस्बाई या ग्रामीण क्षेत्रों में हिन्दी माध्यम के सरकारी स्कूलों में मध्यान भोजन की सुविधा के मध्य अध्ययन कर रहे हैं, वे लोकसेवाओं की परीक्षा के लिए अयोग्य हैं? उनके नसीब में अभी मुफ्त का मध्यान भोजन है, बाद में मनरेगा की मजदूरी का होगा। सवाल बड़ा है पर उठाया नहीं जाता कि ऐसे स्कूलों से निकले प्रतिभाशाली बच्चों के लिए अंगे्रजी का अतिरिक्त अतिरिक्त बोझ क्यों? जब अंग्रेजी देश की सर्वोच्च सेवाओं में चयन का माध्यम बन जाय तो एक राष्टÑभाषा में दीक्षित देखने में आया है कि कई बार उसका अंग्रेजी  ज्ञान दुरुस्त न हो पाने की वजह से, प्रतिभा होने के बावजूद उक्त सेवाओं से वंचित रह जाना पड़ता है।
   देश में इससे बड़ा भाषाई भ्रष्टाचार और क्या हो सकता है? जो तथाकथित अंग्रेजीदां नीति नियंताओं द्वारा फैलाया गया है। आर्थिक भ्रष्टाचार से तो मात्र भौतिक स्तर पर देश को नुक्सान पहुंचाता है, जिस पर कठोर कानूनी उपायों और भ्रष्ट व्यक्तियों   के सामाजिक तिरिष्कार द्वारा नियंत्रण पाया जा सकता है, लेकिन भाषा को लेकर हो रहा भेदभाव समाज की रचनाशक्ति, उसकी प्रतिभा यहां तक की सभ्यता के लिए धीमा जहर साबित हो रहा है। मुझे एक पत्रकार मित्र ने बताया है कि आज बड़े हिन्दी दैनिकों में छपने वाले आलेख कई बार अंग्रेजी भाषा के लेखकों के होते हैं, जिनके निमित्त दफ्तरों में बाकायदा हिन्दी अनुवादकों को रखा जाता है। मित्र यह कहने से नहीं चूके कि यदि हिन्दी अखबार में बने रहना (सरवाइव करना) है, सो अंग्रेजी में पढ़ना-लिखना सीखिए वरना...! उनकी यह चेतावनी हिन्दी भाषा से विरक्ति को लेकर नहीं थी, बल्कि रोजगार को बरकरार रखने को लेकर थी। मेरे रिश्ते में पितृवत भाई स्वर्गीय डा. रामजी पांडेय जो आजीवन इलाहाबाद में महादेवी वर्मा के साथ पुत्रवत स्नेह पाते रहे, उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी लेखन जगत में अंग्रेजी की अनिवार्यता का जिक्र मुझसे नहीं किया था। पर आज जो वातावरण देश के भाषायी पर्यावरण में फैलता जा रहा है, उससे यह आशंका जरूर पैदा होती है कि यही हाल रहा तो आने वाले 20-25 सालों में राष्टÑभाषा हिन्दी जरूर हाशिए पर होगी।
  इसी वर्ष जनवरी माह के पहले सप्ताह में प्रधानमंत्री ने दिल्ली में आयोजित विश्व संस्कृत सम्मेलन में संस्कृत भाषा के धार्मिक कार्यों तक सीमित हो जाने पर क्षोभ प्रकट किया था। हो सकता है कि भविष्य में कोई दूसरा प्रधानमंत्री यही क्षोभ हिन्दी भाषा को लेकर भी प्रकट करे। कितना बड़ा पाखंड और षड्यंत्र देश में राष्टÑभाषा को लेकर चल रहा है। पर क्या कभी इस दिशा में नीति नियंताओं ने खम ठोंका है? जैसे पिछले महीनो में  उजागर ‘कुपोषण’ के  काले  सच को राष्टÑीय शर्म बताया गया, उसी तरह ‘राष्टÑभाषा हिन्दी’ की उपेक्षा भी राष्टÑीय शर्म होनी चाहिए। पर अब तो बस एक तिथि है 14 सितम्बर यानी ‘हिन्दी दिवस’ जिसकी रस्म मना कर राष्टÑ भाषा को श्रद्धांजलिनुमा याद कर लिया जाता। शायद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की दी गई सीख हमने विस्मृत कर दी है कि -
 निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल।।

श्रीश पांडेय

Friday, 7 September 2012

बोल्ड़ बने, वर्ल्ड रखें मुट्ठी में

इं टरनेट पर बड्डे को सर्फिंग करते देख हम पूछ बैठे कि बड़ी-बड़ी आंखें गाड़कर क्या देख रहे हो.. वे बोले बड़े भाई कुछ नहीं बस फिकर में  हूं कि अपने देश में आधुनिकता (नंगापन) का दायरा अब इस कदर पसर चुका है कि पूरब और पश्चिम की संस्कृति में साम्यता नजर आने लगी है। अब तो देश में ही यूरोप, अमेरिका में होने का अहसास होता है। ऐसे में पश्चिम जाने की जरूरतई का है। सब कुछ दस बाई बारह की स्क्रीन में उपलब्ध है। एफएम की तरह जब चाहे, जहां चाहो खोलो और डूब जाओ, देखो दिखाओ, लाइफ बनाओ...।
    याद आती है सत्तर के दशक की कथित हॉट फिल्म ‘बॉबी’ जिसमें डिंपल के एक्सपोजर पर.. संंस्कार और संस्कृति के पोषकों ने ऐसे मुंह बिचकाया था कि मानो अब देश और देशवासियों का नैतिक पराभव शुरू हो गया। कभी पूरब और पश्चिम की नारी की तुलना का ख्याल भी हमें गर्व से भर देता था कि हमारी स्त्रियां कितनी मर्यादित और संस्कारित हैं रहन-सहन से लेकर तौर तरीकों में। पर अब जिस तरह का भौंडापन ड्रेसिंग सेंस को लेकर देश में पांव पसार रहा है। उससे भोतई प्रॉब्लम होने वाली है।
हमने कहा अरे बड्डे किस-किस को रोकोगे-टोकोगे ये देश ‘गरीब की लुगाई’ बन चुका है। जिसको जो मर्जी आये करे। कोई कोयला लूट रहा है, तो कोई स्पेक्ट्रम और जो लूट नहीं पा रहा वह खुद को लुटाकर जिस्म की कीमत पर जो बन पड़े बटोरने पर आमादा है। अब देखो शर्लिन चोपड़ा को ‘प्लेबॉय’ पत्रिका में अपनी न्यूड तस्वीर देर से देने का अफसोस है और उसकी यह स्वीकारोक्ति कि ‘मैंने पैसे के बदले सेक्स किया’ को कुछ यूं रेखांकित किया कि उसने वेश्यावृत्ति नहीं, की यह तो बोल्डनेस है। दूसरी ओर पूनम कह रही कि तू डाल-डाल, तो मैं पात-पात...मीडिया इन घटनाओं में मसाला मार के कुछ यूं पेश कर रहा है..मानो दोनों में एक स्वस्थ प्रतियोगिता चल रही है और देश की आवाम को इस बात की जानकारी होना जरूरी है कि कौन कितने कपडेÞ उतारेगा, कितना बोल्ड बन सकता है।
   बड्डे बोले कपडेÞ उतारने में बोल्ड होने जैसी क्या बात है? हमने कहा जो जितने कम कपड़े पहने और उसके बारे में जितनी ज्यादा बातें बेशर्मी से कर सके उतना बड़ा बोल्ड...। समय के साथ बहुत कुछ बदल जाता है, तब परिभाषाएं क्यों नहीं? कुछ समाचारों की साइटें तो ऐसी हैं जिसमें घपले-घोटाले,लूट, मानवीय संवेदनाओं की खबरों से ज्यादा अहमियत सेक्स और सनसनी से भरी खबरों को दी जा रही है। इसके पीछे तर्क मार्केट के टेंÑड का है, धंधा जैसे  चले, चलाना मजबूरी ही नहीं, जरूरी भी है।
दुनिया की बड़ी-बड़ी मैग्जीनों का धंधा इसी बोल्डता के आवरण में चमक और चल रहा है। टीवी के शो चाहे हास्य-व्यंग्य के क्यों न हों पर बिना बोल्ड हुए न तो चलते हैं न बिकते हैं। नए शोध के मुताबिक अब स्त्रियों को ‘आईक्यू’ पुरुषों की बनिस्बत बढ़ा है। अब उन्हें बेहतर मालूम है कि उनकी कथित बोल्डता का बिजनेस कितना बड़ा हो चुका है। जिन्हें बोल्ड बनना नहीं आता वे जीवन भर संघर्ष करती रहती हैं, शादी करके बच्चे पालती, उसी में दमती, रमती दुनिया से पलायन कर जाती हैं। पर जिसने यह सूत्र जान लिया, उनका पल भर में दुनिया की नजरों में मशहूर होना तय है। इस निमित्त शर्लिन, पूनम जैसी स्त्रियां रोल मॉडल हैं। जापान और कोरिया में तो बाकायदा बोल्ड बनने के प्रशिक्षण शिविर शुरू किए गये हैं। इसलिए बड़्डे आज की नारी का नया सूत्र है -‘बोल्ड बनिए, वर्ल्ड को मुठ्ठी में रखिए’।
आखिर बड्डे बडेÞ उदास हो के बोले बड़े भाई किसी किसी शायर ने ठीक ही कहा है कि-  
    ‘शोहरतें इस तरह भी मिलतीं हैं कि तुमने अच्छा किया बुरा करके’।