Friday, 16 November 2012

कांग्रेस के कर्णधारों की धार

भाजपा का संकट और उसके खुशी के आलोक में दीवाली मना रहे कांग्रेसियों ने मौका ताक कर 2014 चुनाव की तैयारियों की तैनाती का ताड़पत्र जारी कर दिया है। सूची में राहुल बाबा का मासूम मुखड़ा सामने रख देने से संदेश साफ है कि पार्टी के भीतर कितनी भी गुटबाजी या जूतम पैजार हो, पर राहुल बाबा के सामने सब सावधान की मुद्रा में शटअप हो जाएंगे। क्योंकि राहुल का धवल कुर्ता जो भ्रष्टाचार के छींटों से मुक्त है और उनके चेहरे व चोले की सफेदी कॉमनवेल्थ से लेकर टू-जी, कोयला घोटाला तक सभी की कालिमा को कफन के कपड़े की तरह ढक लेगी। बड्डे बोले- बड़े भाई राहुल बाबा यूपी, बिहार और अन्य राज्यों के चुनावों अपने सरनेम ‘गांधी’ की गहराई नाप चुके हैं। पर फिर भी दिल है कि मानता नहीं। हमने कहा कांग्रेस का खूंटा है ‘गांधी’ नाम का मंत्र। क्योंकि इससे देश की आवाम में भी भ्रम बना रहता है कि जितने भी गांधी हैं सब के सब मोहनदास करमचंद गांधी के विरासतदार हैं और उनका आशीष केवल इसी परिवार के प्राप्त है।

बड्डे बोले जितने भी नाम चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए चुने गए हैं, उसमें अधिकतर वे नाम हैं जिन्होंने वर्षो से बैक डोर से राजनीति में दखल रखा है। अरे बड्डे ये तो पार्टी की परम्परा है कि बस एक बार नाम बना लो फिर जीवन भर देश और दल को दलते रहो। इस सूची में एक नाम तो ऐसा है जिन्हें न तो सड़कें, न बिजली और न ही नौकरियों में भर्ती पसंद हैं। वे मानते हैं कि चुनाव मुद्दों-वुद्दों से नहीं, मैनेजमैंट(प्रबंधन) से जीते जाते हैं।

यह बात दीगर है कि उनके इसी कौशल के चलते उनके ही राज्य में पार्टी की ऐसी वाट लगी आज तक दल सदमें में है। पर अब भी पार्टी में उनके प्रति मोह उनकी मैनेजमैंट कला का नतीजा है। बड्डे बोले- बड़े भाई जेई तो राजनीति है। उनमें प्रबंधन कला न होती तो दो- दो राज्यों में पार्टी को वेंटिलेटर पर लाने के बाद भी हाईकमान की निगाह में हैसियत नहीं घटी।
चुनावी मुहिम में जिन कर्णधारों की धार को आजमाया गया है उनमें कुछ ईमानदार टाईप के मंत्री- नेता नॉमिनेट किए गए हैं, तो कुछ इसलिए कि उनके बिना सूची सूनी रह जाती। दरअसल, केंद्र में कांग्रेसियों मौजूदा कार्यकाल कलंकित होने के बाद भी यदि वे सत्ता में वापसी का दिवा स्वप्न देख रहे हैं, तो इसमें उनकी योग्यता कम, विपक्ष की अयोग्यता ज्यादा है। उधर प्रधानमंत्री पद का मोह भाजपा में कलह की वजह बना है। हो न हो, यही कलह कांग्रेस के लिए ‘रिवाइटल’ की गोली साबित हो रही है कि ‘लूटो जी भर के’ क्योंकि उसके एक मंत्री ने पार्टी को यह मंत्र दिया कि कुछ भी करो जनता सब भूल जाती है।

Monday, 12 November 2012

जलाओ इतने दिए मगर ...

हमारी ऐसी मान्यता और स्वीकार्यता है कि जहां ज्योर्तिमय प्रकाश है वहीं दिव्यता और देवता हैं। इसीलिए भारत को देवभूमि माना जाता है। यहां का समूचा दर्शन मानव कल्याण और उसके विकास से जुड़ा रहा है। सूर्य हमारी संस्कृति का प्रकाशपुंज है, जिसे हम नियमित अर्घ्य देकर पूजते हैं, पूर्णिमा का चन्द्रमा भी तिमिर से लड़ता है, लेकिन अमावस का चांद फिर प्रकाश का ग्रहण कर अंधेरा ला देता है। इस तरह प्रकाश और अंधकार का संघर्ष सनातन है और रहेगा। कार्तिक मास की अमावस अन्य सभी अमावसों में सबसे गहरी और काली होती है, ऐसे में दीपक का प्रकाश इस अंधेरे को चुनौती देता और संघर्ष करता दिखता है। इसीलिए आज के दिन घर आंगन तुलसी के चबूतरे और गावों, नगरों, शहरों, अमीर-गरीब, खेत खलिहान, मकान-दुकान से लेकर समस्त दिशाएं प्रकाश के उजास में तिमिर को चीरती जीवन में कर्मरत होने और संघर्षरत होने की प्रेरणा देती हैं। इसका दर्शन भी यही है कि कितना भी अंधेरा हो मगर मानवीय प्रयास उजाले के रंग भर ही देते हैं। जैसे एक वनवासी राम ने रीछ-बानरों की सेना बनाकर धरती के सर्वाधिक शक्तिशाली रावण को परास्त कर दिया था।
दीपावली या दिवाली अथवा प्रकाशपर्व के अवसर पर दीवारों पर लिखा शुभ-लाभ क्रमश: गणेश-लक्ष्मी के पूजन से जुड़ा है। लक्ष्मी सामाजिक समृद्धि का आधार है जिसकी चाह सभी करते हैं, लेकिन समृद्धि(धन) ही सब कुछ नहीं, इसके इस्तेमाल के लिए विवेक अनिवार्य है। इसीलिए लक्ष्मी के साथ गणेश की पूजा का क्रम निर्धारित किया गया है। क्योंकि बुद्धि के आभाव में धन का दुरुपयोग और नैतिक पतन तय है। इस पूजन का संदेश भी यही है कि हम विवेकवान और समृद्धवान बने। यह उत्सव घर की चहार दिवारी से बाहर एक समाज और एक राष्टÑ के रूप में चहुं ओर मनाया एवं आयोजित किया जाता है। खुशी, उल्लास और आनंद से सरोबार यह दिन यों तो राम के नगर प्रवेश और उनके स्वागत से सम्बद्ध है, पर आधुनिक संदर्भों में इसे इस भाव (अयोद्धा उत्सव) से कम बल्कि साफ सफाई, लक्ष्मी पूजन और वस्तुओं की खरीद फरोख्त के तौर पर मनाया जाने लगा है। मिट्टी के दीपकों का स्थान विद्युत के टिमटिमाती रंगीन रोशनियों ने लिया है, तो गोबर के गणेश और लक्ष्मी पूजा का सुंदर डिजायनर मूर्तियों ने, ऐसे ही गोबर और छुई से लिपे पुते इकोफ्रेंडली आंगन और दीवारों की जगह केमिकल रंगों की चमकदार पेंट्स ने ले ली है। आटे से बने चौक को पत्थरों के पाउडरों से बनी रंगोली ने विस्थपित कर दिया है। पहले उत्सवों की सूचना ऋतुएं देतीं थीं,अब इनकी खबरें अखबारी विज्ञापन देते हैं। समय के साथ स्थितियों में आये परिवर्तन से उत्सवों व आयोजनों का स्वरूप बदल जाना स्वभाविक है, इसी का नतीजा है कि सिर्फ दीपावली ही नहीं अन्य त्योहारों-उत्सवों के साथ ऐसी दशाएं बनती जा रही हैं। लब्बोलुआब यह कि अब वस्तुएं उत्सव का विकल्प बनती जा रही हैं, बाजार में वस्तुओं के क्रय की क्रांति है। इधर उत्सवी मानव हलाकान है, क्योंकि महंगाई आसमान पर है। यह ट्रेंड निराशाजनक है कि दीपावली में बाजारी खरीददारी स्टेटस सिंबल बन गई है, इस उत्सव-त्योहार में वस्तुओं का दखल बढ़ा है और भावों और मूल्यों का घटा है। आइए हम इस प्रकाश के मर्म का आत्मसात करते हुए व्रत लें कि यह उत्सव एक दिन का न रहकर हम सभी के जीवन में सतत बना रहे।
जलाओ इतने दिए मगर ये ख्याल रहे
अंधेरा किसी कोने में रह न जाए।
शुभकामना है कि दीपोत्सव का यह पर्व भारत सहित विश्व के जनसमुदाय को आलोकित करे और ‘तमसो मां ज्योर्तिगमय’ की भावना से जीवन में व्याप्त तमस रूपी अंधकार से प्रकाश की ओर उन्मुख करे।

श्रीश ......

Thursday, 8 November 2012

अपने-अपने ‘आईक्यू’

  गडकरी द्वारा विवेकानंद और दाऊद के ‘आईक्यू ’की तुलना किए जाने पर बड्डे फोन पर ही पूङ बैठे कि बड़े भाई ये ‘आई क्यू, वाईक्यू’ क्या है? यों तो ‘आईक्यू’यानी इंटेलीजेंट कोशियंट (बुद्धिलब्धि) पर हमने सरल भाषा में कुछ  यूं समझया कि ‘दोनों में कौन कितना सयाना है, यही इसके नाप-जोख का पैमाना है’ विवेकानंद ने दुनिया को  आध्यात्म की पहचान दी और उसके मानव कल्याण में इस्तेमाल का पाठ पढाया, इसीलिए उनकी और भारत की यश कीर्ति विश्व भर में फैली। जबकि दाऊद की पहचान अपराध जगत सहित गैर सामाजिक कृत्यों में है और वह भी भारत का उत्पाद है। इस लिहाज से भारत का अपयश और बेज्जती दुनिया भर में चर्चित हुई। दोनों शख्सियतों में तत्व ‘चर्चित’होने का समान है, बस मुकाम जुदा हैं। इस तुलनात्मक विश्लेषण में उलझकर गडकरी कुङ ऐसा उगल गए कि बखेड़ा खड़ा हो गया। बहरहाल विवेकानंद और दाऊद के ‘आईक्यू’ की तुलना से इतना तो साबित हो गया कि गडकरी का ‘आईक्यू’ कमतर है। वर्ना न तो वे ऐसी तुलना करते और न ही अपनी कंपनी ‘पूर्ति’ में ड्राईवर, चपरासियों के नाम बोर्ड आॅफ डायरेक्टर में न रखते। संघ के दुलारे गडकरी अब उन्हीं के आंख की किरकिरी बने हैं। उधर देश के नेताओं के अपने-अपने ‘आईक्यू’हैं। एक नेता का ‘आईक्यू’कहता है कि जनता भ्रष्टाचार व महंगाई को वक्त के साथ भूल जाती है, तो दूसरे का ‘आईक्यू’है कि 71 लाख का घपला भ्रष्टाचार के दायरे में नहीं आती। एक मंत्री  तो भ्रष्टाचार में लिप्त अपनी पत्नी और शाही दामाद की रक्षा में ही उनका ‘आईक्यू’ दिखता है। तो कुङ धर्मनिरपेक्ष छवि  गढ़ने की आड़ में ‘ओसामाजी’ जैसे सम्बोधनों से मानवीयता का ‘आईक्यू’ जताने से गुरेज नहीं करते। अमेरिका में चुनाव में हार के बाद रोमनी ने अपने ‘आईक्यू’ से कहा कि हम सरकार के साथ हैं, लेकिन बड्डे अपने यहां है कि कैसे जोड़-तोड़, खींचतान से कैंडीडेट को यहां मिला लो, वहां से खरीद लो। इसके लिए बाकायदा हर दल में विशेष ‘आईक्यू' से युक्त व्यक्ति तैनात हैं।

बड्डे हमारे यहां तो ‘आईक्यूष्ठ' लगा कर महंगाई तक बढ़ाई-घटाई जाती है। चुनाव हों तो ‘आईक्यू‘लगाओ और दाम को बांधे रखो और जैसे ही चुनाव निपटे अंतरराष्ट्रीय दामों में इजाफे वाला ‘आईक्यू‘लगाओ और ‘दाम‘बढ़ा के ‘दम‘ले लो उसी जनता का, जिसने उन्हें वोट दिया है। खैर क्या बयान देना है और क्या नहीं, इसके लिए निश्चित ‘आईक्यू‘और निश्चित व्यक्ति होता है। पर गडकरी कैसे चूक गए? यह बात उनके वरदहस्त संघ की समझ से परे है। हो न हो अब ‘आईक्यू' प्रकोष्ठ बनेगा जिसमें सार्वजनिक मंचों पर कुछ  कहने से पहले मौके के मुताबिक ‘आईक्यू‘लेना होगा।

- लेखक स्टार समाचार के सबएडीटर हैं।

ब्लॉगबाजी श्रीश पांडेय

Thursday, 1 November 2012

जब जेबों की होगी सीबीआई जांच

बड्डे बड़े भौंचक से केजरीवाल के खुलासों को कई दिनों से अखबार में लाइन-दर-लाइन बांचते कर कह रहे हैं कि बड़े भाई देश में कम से कम एक तो मर्द है जो बिना किसी सत्ता के सत्ताधीशों की पोल खोल.उनकी चूलें हिला रहा है।
और अब तो उसने ऐसी बात कह दी कि मुकेश अंबानी 'कांग्रेस' और 'भाजपा' को जेब में लिए घूमते हैं। हो न हो, दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों का भेजा तो फ्राई हो ही गया होगा। अरे! बड्डे पहले भी धीरूभाई के ऊपर ऐसे संदेह उपजे थे। बेटा बाप से नहीं सीखेगा तो क्या.हमसे-तुमसे ज्ञान लेगा।
तभी तो देश में कभी वर्षो से अमीरी के पर्याय रहे टाटा िबड़ला आज अंबानी समूह से फिसड्डी रह गए।
टाटा-बिड़ला भी सोच में होंगे कि उनसे कैसे चूक हो गई कि वे सरकारों को 'जेब में रखने'. के मंत्र का जप नहीं पाये। बड्डे... इस देश का अदना सा आदमी न जाने क्या-क्या जेब में ले के घूमता है- बम,कट्टा, गांजा- भांग,चरस और.! दरअसल, बात-बात पर यह संवाद कि ' तुमाय जैसे छत्तीस ठो जेब में पड़े रहते हैं'  कहने वाले की ताकत को बयां करते हैं। 'जेब में रखने' का दर्शन भी यही है कि जिसको जेब में रखा जाए उस पर पूरी तरह नियंत्रण हो। प्रशासनिक हलकों में गौर करें तो यह डॉयलाग अक्सर सुनने में आता है कि फलां पटवारी... तहसीलदार, एसडीएम, कलेक्टर को जेब में लेकर घूमता है, तो छुट भईया नेता भी. मंत्री क्या, मुख्यमंत्री तक को खीसे में रखने की कुव्वत रखता और मूंछ ऐठता है। बड्डे बोले बड़े भाई यहां तक तो ठीक है मगर एक आदमी सरकारें जेब में लिए घूमता हो, ये तो हद हो गई। अमेरिका में तो और बड़े वाले आसामी हैं, लेकिन वहां कभी यह राज नहीं खुला कि 'डेमोक्रेट' या 'रिपब्लिकन' की सरकारें किसी बिल गेट्स जैसे की जेब में कैद रही हैं। खैर अभी तो मात्र दो दलों का एक व्यक्ति की जेब में कैद होने का राजफाश हुआ है। सपा, बसपा, माकपा,जदयू जैसे दल भी किसी न किसी के जेब में कैद हो सकते हैं, जिसका राज अब केजरीवाल की जेब में जरूर होगा।
बड्डे बोले सो तो है बड़े भाई. ये अपना केजरीवाल विकीलीक्स की तर्ज पर केजरीलीक्स साबित हो रहा है। बड़ा सयाना है अपना केजरीवा.अल्टी-पल्टी करके कांग्रेस और भाजपा पर निशाना साध रहा है। खासकर जब से अन्ना की जेब से बाहर आये हैं, तब से अपनी जेब से वह सब निकालने को आतुर हैं जो उन्होंने वर्षो की मेहनत से जोड़-जुगाड़ से संचित किया था। हो न हो, अब इतना तो तय है कि केजरीवाल की जेब की सीबीआई जांच के आदेश दिए जाएंगे, ताकि उस स्रोत  का पता लगाया जा सके जहां से केजरी की जेब में सरकार के राज इम्पोर्ट हो रहे हैं। हो सकता कई और खेमका इसके स्रोत  हों।

Thursday, 18 October 2012

भारत के विकिलीक्स हैं केजरीवाल

केजरीवाल इनदिनों ऐसी फुटबाल खेल रहे हैं जिसमें कभी किक कांग्रेस के कारिंदों पर होती है तो कभी भाजपा के। देश के दोनों बड़े राजनैतिक दल सकते में हैं।
राजनैतिक गंदगी की सफाई की लड़ाई में बाबा, अन्ना जैसों के बैकफुट में आने के बाद, फ्रंटफुट में आये केजरीवाल एक-एक को देख लेने की कसम खा चुके हैं। वे चुन-चुन के बड़े दामाद टाइप जो बिना कुछ करे चमत्कारिक सत्ता की दम पर करोड़ों लील गए,दाद देनी होगी दामाद की कि बड़ी साफ गोई से मुकर गये घपले के पचड़े से। एक चमचे टाईप मंत्री जो असहाय विकलांगों के हिस्से की रकम पर कुदृष्टि लगा बैठे और कुछ अध्यक्ष टाईप लोग जो किसानों की जमीनें और सिंचाई के पानी से खुद को तर करने में लिप्त हैं। कहते हैं कि ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता’ पर केजरीवाल अकेले ही ऐसे चेहरों को बेनकाब करने में भिड़े हैं। वैसे यह सही समय है जो उन्होंने चुना है। दीपावली की पुताई में जहां घर-द्वार सफेदी से चमक रहे हैं वहांअकेजरीवाल इस सफेदी के पीछे छिपी कालिख को उजागर करने में जुटे हैं, ताकि देश भी जान समझ ले कैसे रातों रात 7 करोड़ से 54 करोड़ में बनाए जाते हैं। दामाद बनने के फायदे गिनाते हुए बड्डे बोले-बड़े भाई अफसोस है कि मैडम के एकई बिटिया थी, वरना हम भी अपने लड़के का प्रस्ताव प्रस्तावित तो कर ही देते। जब बर्तन का धंधा करने वाले का नम्बर लग सकता था तो अपना लड़का तो विदेश में साफ्टवेयर इंजीनियर है। वह इस रातो-रात मिलने वाली अकूत रकम को बड़े इत्मिनान से मैनेज कर लेता। कहीं चूं-चपड़ तक न होती और फिर कालाधन विदेश में ही महफूज रह सकता है। उधर काला धन का आंकड़ा देते, चीखते-चिल्लपों करते, बाबा, अन्ना जैसों के गले चोक हो चुके हैं। रहा सवाल केजरीवाल का तो उसको अपने चमचे टाईप मंत्री निपटा लेंगे। चमचे टाईप मंत्री फरुखाबाद आने की धमकी देकर खुले आम कह रहे हैं कि ‘रगों दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल, जो आंख से ही न टपका वो लहू क्या है।’ खून की बातें खुले आम संविधान में शांति और व्यवस्था की सपथ खाये मंत्री करने लगे हैं, तो अपराधियों का क्या कहना। लेकिन बड्डे बोले‘अ पना केजरीवाल तो इंडियन टाईप का विकीलीक्स निकला।’ ‘अ’ से असांजे और ‘अ’ से अरविंद यानी केजरीवाल भारत के अरविंद असांजे हैं। ऐसी-ऐसी खबरें निकाल रहा है कि जैसे एक-एक की ऐसी-तैसी करके ही दम लेगा। वहां से भी जहां कभी शक की कोई गुंजाईश न थी। हो न हो, बसपा, सपा, तृणमल, डीएमके, जैसों पर भी जांच की आंच आयेगी। खैर अब तो देखने वाली बात है कि विकीलीक्स का इंडियन संस्करण और क्या-क्या गुल खिलाता है.!!!

Thursday, 11 October 2012

चमचे का नमक, चेहरे की चमक

  बड्डे को हल्के मूड में देख हमें सुकून आया कि चलो आज तो कुछ अच्छी खबर है। हमें देखते ही बोल पड़े- बड़े भाई कल के चारण-भाट आज के चमचों के रूप में रूपांतरित हो गए हैं। पहले ये कविताओं, गीतों या किताबों में तारीफों के कशीदे पढ़करअपने स्वामियों का मन मोहने और इनाम हासिल करने की जुगत में बे-वजह खीस निपोरते पाए जाते थे और आज भी ये अपने-अपने आकाओं की ऐसी ऊर्जा बने हुए हैं, जिसके बिना बॉस का अस्तित्व ही खतरे में लगता है। चमचे सिर्फ राजनीति में ही नहीं, बल्कि हर जगह अपने विभिन्न रूपों में पाए जाते हैं। इनकी वैराइटी खाने के चम्मच(स्पून) की तरह छोटी-बड़ी, चमकीली अथवा कम या अधिक मूल्य (वैल्यू) की होती है। बहरहाल, चमचों की जितनी प्रजातियां भारत में पाई जाती हैं उतनी विश्व के किसी और मुल्क में मिलना मुश्किल है। जैसे खाने का चम्मच हमें सुविधा और सहायता देता है वैसे ही नेताओं, धमर्गुरुओं, अफसरों के चमचे,चेले उनकी खुशामदीद में व हर कही बात को सच साबित करने में सहयोग देते हैं।

चमचों की अखंड धारणा और एक सूत्री कार्यक्रम है कि अपना बॉस गलत न तो बोल, न कह सकता।

समर्पण और शरणागति ही चमचत्व का तत्व है। ईश्वर भी भक्तों से यही चाहता है कि तू मेरा बन, फिर कृपा ही कृपा है। बस यही तो चमचों का दायित्व है कि वे न सिर्फ अपने आका की बात का आंख मूंदकर समर्थन करें, जयकारे लगाएं बल्कि वे उनके प्रतिद्वन्दी पर हमला भी करें और इससे उत्पन्न सारा कसाय कल्मश अपने सीने पर ङोल लें। आंच तक न आने दें अपने भाग्यविधाता पर। चमचों का सौंदर्य ही इसमें है कि वे निरंतर चैतन्य अवस्था में एक्टिव बने रहें। यूपीए के एक मंत्री तो खुलेआम कह रहे हैं कि अपना तो काम ही यही है कि आका के परिवार पर कोई आंच आये तो सारा ताप वे अपने सीने में लेने को तत्पर हैं। यानी मंत्री वे बाद में पहले तो चमचे ही हैं। सारा देश गलती कर सकता है पर उनके आका गलतियों से सवर्था मुक्त हैं। जैसे ईश्वर गलतियों से परे है। तभी तो हम चमचे उन्हें(बॉस) देवता की तरह पूजते हैं। दरअसल चमचे अपने बॉस का नमक है। नमक से ही देह में चमक आती है। नमक का अनुपात बनाए रखना चमचों का अनिवार्य दायित्व है। इसलिए हर बॉस की शकल में मौजूद चमक को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि किसके पास कितने आयोडीनयुक्त नमकदार चमचे हैं। जो समय-समय पर नमक की आपूर्ति संतुलित रूप में करते रहते हैं। एक पूर्व बड़बोले सीएम इस नमक को संतुलित नहीं रख पाए तो दरबार से बाहर कर दिए गए। आखिर बड्डे बोले बड़े भाई चमचा वही जो नमकदार हो।
                                                                                     श्रीश पांडेय

Wednesday, 3 October 2012

औसत में जीत है

  टी-ट्वंटी वर्ल्ड कप क्रिकेट में आलम दर्जे की बल्लेबाजी के गुमान में जी रही टीम धोनी की लगातार तीसरी बार धुल जाने से बड्डे सर पर हाथ रखे कुछ यूं बैठे थे मानो अब देश का कोई भविष्य नहीं रहा, अब भारत कैसे जिएगा, क्योंकि उसका चिर प्रतिद्वन्दी, जिसको वह तीन दिन पहले 8 विकेट से कूट-पीट चुकी है वह अब भी चैंपियन बनने की दौड़ में शामिल है। हार के जीत और जीत के हार के रूल्स अब बड्डे को बिल्कुल रास नहीं आ रहे थे। पर सिवाय बड़बड़ाने के बड्डे और कुछ नहीं कर पाने की बेबसी से बेहाल बीयर की चुस्की के साथ बिस्तर डले गहरी चिंता में मशगूल थे। इतनी फिकर तो गैस, डीजल के महंगे होने, विदेशी कंपनियों की देश में घुसपैठ, और डायनासोर सरीके बडेÞ-बड़े घोटालों पर नहीं की। बड्डे बोले बड़े भाई अपन जीत के भी हार गए और दूसरे हार के भी जीत गए यह बात नहीं पच रही। गब्बर सिंह के अंदाज में बड्डे बोले कि ‘हमने कुल 6 में 5 मैच जीते और टूर्नामेंट से बेदखल, उधर वेस्टेंडीज कुल दो ठईया मैच जीत के अंदर, सरासर नइंसाफी है बड़े भाई।’     
   हमने समझाया अरे बड्डे! सब औसत का खेल है। उसी की जीत है, जिसका औसत ठीक है, वही  चैंपियन बन सकता है। औसत यानी बैलेन्स रहो। टीम धोनी के धुरंधर उत्साह में ज्यादा औसत में कमजोर साबित हुए, जबकि औसत का गणित पहले से इम्पारटेंट माना जा रहा था, चाहे वह खेल हो या चुनाव। गाड़ियों के बिकने में भी एवरेज का रोल है, जिसका ऐवरेज दुरुस्त नहीं समझो मार्केट से बाहर। एमबेस्डर, फिएट, बुलेट, राजदूत सब के सब इसी एवरेज के चलते ठिकाने लग गर्इं। परीक्षाओं में एवरेज मेन्टेन करना होता है, वरना ज्यादा में भी हार हो जाती है। फिर भी भारत के भाग्य विधाता बुद्धि में नहीं भावना में जीते हैं। सरकार कितना भी लूट-खसोट कर ले, महंगाई बढ़ा ले, तिस पर जनता कितना भी सरकार को कोस ले, कुढ़ ले, पर वह इन सबसे बेपरवाह औसत को महत्व देती है। उसे बखूबी पता है कि सब करो पर ऐन टाइम (चुनाव के वक्त) मिथ्या घोषणाएं और कुछ नकदी बांट-बंूट के नाराजगी का औसत मेन्टेन कर वह हार से बच जाएगी। पर अपनी टीम है कि कभी आठ विकेट से हारती तो कभी आठ विकेट से हराती। अब जरूरत है नेट प्रैक्टिस की बजाए औसत का गुरूमंत्र लेने की। इसके लिए टीम इंडिया को 10-रेसकोर्स की शरण में जाना होगा, जहां वह औसत को कैसे मेन्टेन किया जाए, के गुर सीखे।कांग्रेस, यूपीए सरकार को बरकरार रखने के लिए जज्बात नहीं हालात के तकाजे में देखती है। माया, ममता और मुलायम में औसतन जो फिट हो, बस उसी को भाव, बाकी से कन्नी काट लो। क्योंकि औसत में ही जीत है।