बड्डे ने अर्ली मॉर्निग चुटकी ली कि अपने मौन मनमोहन जी, अब अपना मुख गाहे बगाहे खुद भी खोलने लगे हैं।मगर बड़े भाई उन्होंने मुखड़ा भी तब खोला जब पानी सर पर आ गया और देश पानी-पानी (बारिश से और साख से भी) हो रहा है। तिस पर घोषणा कि हमारे भरोसे न रहो देश कठिन आर्थिक स्थितियों में घिरा हुआ है। ई ससुरी इस सरकार ने दस बरस में देश को ऐसे हालातों में लाकर धर दिया कि आवाम की लानत मलानत हो रही है। लोग जी जी कर मर रहे हैं और मर मर कर जी रहे हैं। हालांकि अब पीएम की कुर्सी ही 'डेंजरजोन' में है। जब अर्थशात्री पीएम ही खतरा मान ले तो फिर पब्लिक कहां सर पटके, और राहत की उम्मीद बांधे। और फिर अब तो चला चली की बेला है, सो जनता से सच छुपाने का कोई औचित्य नहीं। यह तो 'कनफेशन' का टाईम है, क्योंकि अब चुनाव दूर नहीं। जो करना है सो जल्दी करना है। खाद्य सुरक्षा बिल को लाने की हड़बड़ी इसी का नतीजा है। रुपया चाहे गिरावट का शतक मार ले।मगर रुपइया, दो रुपइया में अन्न देकर सरकार गरीबों का रहनुमा क्यों न बन लें। क्योंकि अंत भला सो सब भला। पॉसिबल है कि 'पेट के बदले वोट' कार्ड चल निकले। राजनीति अपार संभावनाओं का मैदान है इसलिए इस नए खेल में अंतिम क्षणों में गुल खिल जाए तो क्या बुरा है? उधर कुछेक सव्रे के मुताबिक मनमोहन और राहुल की उम्र के लगभग औसत उम्र(80+44=62)वाले मोदी ने बिना प्रधानमंत्री बने जिस तरह से आभासी प्रधानमंत्रीय भूमिका निभाने का जज्बा दिखाया है। उससे गत दस बरस से पीएम की कुर्सी पर नियुक्त मनमोहनजी से, बिना पीएम बने लोकप्रियता की टीआरपी में आगे निकल गए। उधर इनके खजांची चिदम्बरमजी ने रुपए की रोज-रोज की गिरावट पर पहले तो फिल्मी 'स्टाइल' में तसल्ली दी कि 'डोन्ट वरी' सब दुरुस्त हो जाएगा, लेकिन फिर भी रुपया है कि मानता ही नहीं, निरंतर लुढ़क रहा है, सो कुढ़कर कह दिया कि 'रुपया के गिरने से मेरे जेब में रखे पांच सौ का नोट क्या 342 का हो गया?' मुसीबत में ज्ञान बिलबिला जाता है सो मंत्री जी ताव में भूल गए कि जब तेल आयात होगा तो डॉलर में होगा, तब जित्ता 500 रुपईया में तेल आता था अब उत्ता नहीं आयेगा। यानी धरे रहो अपना नोट जेब में मगर गाड़ी की टंकी में तेल तली में रह जाएगा, न कि छलकेगा। अरे बड्डे सरकार जानती है कि इस देश की में मिडल क्लास में बहुत रस है। वह इसी रस को निचोड़ना चाहती है। सो जितनी भी चिल्लपों है वह इसी क्लास में। इसीलिए मनमोहन जी ने 'मिडिल क्लास' के बरक्स कठिन स्थितियों का जिक्र किया है। क्योंकि गरीब का पेट सरकार भरेगी और अमीर खुद सक्षम है।
Saturday, 31 August 2013
Tuesday, 20 August 2013
समाज का दायरा
जीवन के विकास और विनाश का क्रम, चाहे वह साधनों के स्तर पर हो अथवा संरचना के, समय के साथ क्रमिक रूप से अप्रत्याशित तरीकों से होता रहता है। आज हमारा वर्तमान जितने साधनों, सुविधाओं से लबरेज है, वह किसी दौर में अकल्पनीय, असम्भव सा और मानव सोच से परे था। ज्यादा पहले नहीं महज चार सौ बरस पहले यदि अकबर के युग में कोई बादशाह से कहता कि हुजूर आगे ऐसा युग आयेगा जब मोबाइल जैसे बित्ते भर यंत्र से लोग-बाग दूर-दूर तक बात कर सकेंगे अथवा टेलीवीजन व इंटरनेट के माध्यम से सुदूर इलाकों की घटनाओं को न सिर्फ देख सकेंगे बल्कि सचित्र संवाद भी कर सकेंगे, तो शायद उस शख्स को बेबकूफ या विक्षिप्त मानकर कारागार में डाल दिया जाता। थोड़ा और पहले के इतिहास पर नजर करें तो यूरोप के खगोलविद कोपरनिकस के यह जब घोषित किया कि धरती और समस्त ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हुए अपनी धुरी पर गतिमान हैं। इस बात का बतंगड़ खड़ा हो गया लेकिन बाद वर्षों में इस खगोलीय प्रघटना की पुष्टि जब गैलिलिओ ने की तो उनकी आँख फोड़ दी गयी. लेकिन तब असम्भव सी लगने वाली बात बाद में सत्य साबित हुई। अज्ञानता और वक्त के गर्भ में छिपे रहस्यों पर जब तक ज्ञान का प्रकाश नहीं पड़ता वे अविश्वसनीय होते हैं। एक और वाकया मुझे बचपन का स्मरण हो आता है। करीब 30-32 साल पहले का जब मैं अपने गांव के बड़े से आंगन में दादी के साथ चारपाई पर खुले आसमां तले लेटे-लेटे किस्से कहानियां सुन रहा था। वह स्वच्छ धवल आकाश वाली काली रात थी। आसमान ऐसे लग रहा था मानो तारों की बारात सजी हो। ऐसे दृश्य शहरी जीवन में बहुमंजिला इमारतों में कहीं नहीं हैं। अलबत्ता कुछ लोग बाजार से खरीदे रेडियम के सितारे अपने बेड रूम की छत में चिपका कर प्रकृति के नजारे को कृत्रिम रूप से देखने और अपने बच्चों को दिखाने की कोशिश जरूर करते हैं। ...हां तो कहानी सुनते वक्त मेरे कान तो दादी की आवाज पर थे, मगर निगाहें उन बेहद चमकीले तारों पर और बादलों में छिपते निकलते चन्द्रमा की चंचलता पर। तभी मैंने और दादी ने एक साथ एक तारा आसमान से टूटते हुए देखा, जो धरती की ओर आते हुए बुझ सा गया। दादी ने कहानी को बीच में रोककर इस प्रघटना पर शोक नुमा आवाज में राम-राम कहकर एक अल्पविराम के बाद कहानी को आगे बढ़ाना शुरू ही किया था। मैंने कौतूहलवश दादी से सवाल किया कि ये क्या था? तो उन्होंने कहा कि बेटा यह तो ईश्वरीय लीला है। किसी तारा का टूटना जीवधारी के धरती से स्वर्गवास होने का संकेत है। तब मेरे मन में दादी की बात किसी सत्य तथ्य की भांति पैठ गई थी और तब तक बैठी रही जब तक भूगोल की पुस्तकों में खगोलीय घटनाओं के बारे में पढ़ समझ नहीं लिया कि यह किसी उल्कापिंड का धरती की ओर गिरने के दौरान उसके वायुमंडल में आते ही जल उठने की चमक है, न कि तारे का टूटना। इस तरह ऐसे अनेक मिथक हमारे जीवन का हिस्सा सदियों तक बने रहे हैं, जब तक उनका उदघाटन नहीं हो गया।
जब से मनुष्य ने समुदाय में रहना शुरू किया तब से लेकर कोई सौ साल पहले तक उसके जीवन और समाज का दायरा बहुत अधिक नहीं था। शादी-संबंध आस-पास के गांवों में होते थे और सारा जीवन एक निश्चित दायरे में समाप्त हो जाता था। लेकिन आजादी के बाद के वर्षों में यह सामाजिक वृत्त बढ़ा है, तो इसके नेपथ्य में काफी हद तक इस दौर का तकनीकि विकास है। इस बड़े वृत्त का क्षेत्रफल तो अधिक हुआ मगर इसकी मिठास घटती गई है। फिर शुरू हुआ नए तकनीकि संसाधनों पर आधारित समाज को दौर। आज से तीन दशक पहले सोशल मीडिया के अंतर्गत फेसबुक और टिवटर जैसे अभिव्यक्ति के प्लेटफार्म की किसी ने कल्पना भी न की होगी। लेकिन आज ये जिन्दगी के ऐसे अंग बनते जा रहे हैं कि अब इनके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। अभी तक समाज में हमारे विस्तार का तरीका पास-पड़ोस, रिश्ते-नाते और स्कूल-कॉलेज या दफ्तरों में सहपाठी और सहयोगियों के बीच पनपता और विकसित होता रहा है। ऐसे समाज में हमारी अंतरक्रिया प्रत्यक्ष और वास्तविक होती है। लेकिन विकास के इस क्रम में ज्यों-ज्यों साधनों और सुविधाओं का प्रादुर्भाव हुआ त्यों-त्यों प्रत्यक्ष सामाजीकरण का दायरा भी सिकुड़ता हुआ घर की चहादीवारी से कमरे तक सीमित होता गया। इसकी वजह पहले टेलीवीजन था अब इंटरनेट है। इंटरनेट के विस्तार ने एक वर्चुअल समाज की अवधारणा हमारे सामने ला दी है। जिसका रास्ता वास्तविक समाज से ऐसे काल्पनिक समाज की ओर जाता है, जो हो के भी नहीं है, मगर विचारों, भावनाओं, चिंतन में नित्य, सतत विद्यमान है। यह ऐसा विस्तार है जिसका आधार एक छाया चित्र और शब्दों के संवाद के सिवा और क्या है? लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता यह कब हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन जाता है अनुभव कर पाना कठिन है, लेकिन एक बार यह आकार ले ले तो फिर इसके बिना रहना भी कठिन है। गर इस व्यवस्था के मनोविज्ञान पर गौर करें तो ऐसा समाज हमारी गैर-जिम्मेवारी की बढ़ती स्वच्छंद प्रवृत्ति का प्रतीक है। आधुनिक दौर में मनुष्य वही चाहता है जो पुराने समय में, क्योंकि उसकी इंद्रिया आज भी उतनी ही हैं जितनी सदा से थीं। बस फर्क है तो जिम्मेदारियों से बचने का गणित। इसकी एक बड़ी वजह है इंटरनेट पर वर्चुअल दुनिया का तेजी से उदय और विस्तार। लेकिन आज जब हम ज्ञात या परिचित के साथ यदि समायोजित होने में असहज महसूस करने लगे हैं। तब यह मानना पड़ता है कि देह के स्तर पर भले हम परिवर्तित न हुए हों, मगर मानसिक, महत्वाकांक्षाओं या लालच के स्तर पर हममें बड़ी तब्दीली आ चुकी है। छद्म आवरण, बनावटी बातें, दिखावे का प्रदर्शन हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं। इसलिए टिवटर और फेसबुक की जमीन पर कुकरमुत्तों की तरह उदय और अस्त होते रिश्तों का आधार मात्र यह बनता जा रहा कि कौन किसकी कही बात पसंद करता, टिप्पणी करता या ऐसा नहीं करता है। यहां भी एक प्रतियोगिता है कि किसके कितने मित्र हैं जिसका फेसबुकिया स्टेटस इस पैमाने पर उच्च या निम्न श्रेणी में देखा जाता है कि उसके स्टेटस पर कितने लाईक और टिप्पणी आर्इं। ख्याली पुलाव की तरह इन दोस्तों से लोग रू-ब-रू होते हैं। यह बात दीगर है कि रोज रोज के सत्संग से कुछ लोग वाकई अजीज और घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं। यह प्रयोग नया है इसलिए आकर्षक है। मगर यह भूलना बड़ी भूल होगी कि स्वाचालित खिलौने या तकनीकि संसाधन वास्तविक मानवीय संगत का विकल्प हो सकते।
जब से मनुष्य ने समुदाय में रहना शुरू किया तब से लेकर कोई सौ साल पहले तक उसके जीवन और समाज का दायरा बहुत अधिक नहीं था। शादी-संबंध आस-पास के गांवों में होते थे और सारा जीवन एक निश्चित दायरे में समाप्त हो जाता था। लेकिन आजादी के बाद के वर्षों में यह सामाजिक वृत्त बढ़ा है, तो इसके नेपथ्य में काफी हद तक इस दौर का तकनीकि विकास है। इस बड़े वृत्त का क्षेत्रफल तो अधिक हुआ मगर इसकी मिठास घटती गई है। फिर शुरू हुआ नए तकनीकि संसाधनों पर आधारित समाज को दौर। आज से तीन दशक पहले सोशल मीडिया के अंतर्गत फेसबुक और टिवटर जैसे अभिव्यक्ति के प्लेटफार्म की किसी ने कल्पना भी न की होगी। लेकिन आज ये जिन्दगी के ऐसे अंग बनते जा रहे हैं कि अब इनके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। अभी तक समाज में हमारे विस्तार का तरीका पास-पड़ोस, रिश्ते-नाते और स्कूल-कॉलेज या दफ्तरों में सहपाठी और सहयोगियों के बीच पनपता और विकसित होता रहा है। ऐसे समाज में हमारी अंतरक्रिया प्रत्यक्ष और वास्तविक होती है। लेकिन विकास के इस क्रम में ज्यों-ज्यों साधनों और सुविधाओं का प्रादुर्भाव हुआ त्यों-त्यों प्रत्यक्ष सामाजीकरण का दायरा भी सिकुड़ता हुआ घर की चहादीवारी से कमरे तक सीमित होता गया। इसकी वजह पहले टेलीवीजन था अब इंटरनेट है। इंटरनेट के विस्तार ने एक वर्चुअल समाज की अवधारणा हमारे सामने ला दी है। जिसका रास्ता वास्तविक समाज से ऐसे काल्पनिक समाज की ओर जाता है, जो हो के भी नहीं है, मगर विचारों, भावनाओं, चिंतन में नित्य, सतत विद्यमान है। यह ऐसा विस्तार है जिसका आधार एक छाया चित्र और शब्दों के संवाद के सिवा और क्या है? लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता यह कब हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन जाता है अनुभव कर पाना कठिन है, लेकिन एक बार यह आकार ले ले तो फिर इसके बिना रहना भी कठिन है। गर इस व्यवस्था के मनोविज्ञान पर गौर करें तो ऐसा समाज हमारी गैर-जिम्मेवारी की बढ़ती स्वच्छंद प्रवृत्ति का प्रतीक है। आधुनिक दौर में मनुष्य वही चाहता है जो पुराने समय में, क्योंकि उसकी इंद्रिया आज भी उतनी ही हैं जितनी सदा से थीं। बस फर्क है तो जिम्मेदारियों से बचने का गणित। इसकी एक बड़ी वजह है इंटरनेट पर वर्चुअल दुनिया का तेजी से उदय और विस्तार। लेकिन आज जब हम ज्ञात या परिचित के साथ यदि समायोजित होने में असहज महसूस करने लगे हैं। तब यह मानना पड़ता है कि देह के स्तर पर भले हम परिवर्तित न हुए हों, मगर मानसिक, महत्वाकांक्षाओं या लालच के स्तर पर हममें बड़ी तब्दीली आ चुकी है। छद्म आवरण, बनावटी बातें, दिखावे का प्रदर्शन हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं। इसलिए टिवटर और फेसबुक की जमीन पर कुकरमुत्तों की तरह उदय और अस्त होते रिश्तों का आधार मात्र यह बनता जा रहा कि कौन किसकी कही बात पसंद करता, टिप्पणी करता या ऐसा नहीं करता है। यहां भी एक प्रतियोगिता है कि किसके कितने मित्र हैं जिसका फेसबुकिया स्टेटस इस पैमाने पर उच्च या निम्न श्रेणी में देखा जाता है कि उसके स्टेटस पर कितने लाईक और टिप्पणी आर्इं। ख्याली पुलाव की तरह इन दोस्तों से लोग रू-ब-रू होते हैं। यह बात दीगर है कि रोज रोज के सत्संग से कुछ लोग वाकई अजीज और घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं। यह प्रयोग नया है इसलिए आकर्षक है। मगर यह भूलना बड़ी भूल होगी कि स्वाचालित खिलौने या तकनीकि संसाधन वास्तविक मानवीय संगत का विकल्प हो सकते।
Saturday, 6 July 2013
न गरीब रहेगा, न ही गरीबी
बड्डे खाद्य सुरक्षा की सरकारी पहल से भौंचक्के हो बड़बड़ाये कि- 'बड़े भाई पहले दुत्कार और फिर प्यार। जा तो कछु ऐसई है जैसे 'तनक धमक दई, फिर पुटया लऔ!' सरकारें बड़ी सयानी हैं बड्डे। चुनाव आये नहीं कि उसे कभी गरीबी रास आती है तो कभी यह सताने लगती है। खाद्य सुरक्षा के 'इमोशनल' उपाए (एक-दो रुपइया किलो में अनाज) यानी तकरीबन फोकट में पेट भरने का सिस्टम सरकार को तभी सूझ जब उसके 'एग्जाम' (चुनाव) सर पर आ चुके है। अरे तो क्या हुआ! तुम भी तो पढ़ाई तभी करते थे जब तलक परीक्षा का 'टाईम टेबल' वॉल पर चस्पा न हो जाए। मगर बड्डे तुम हो कि जब देखो सरकारों की करतूतों पर छाती पीटते, उसमें नुक्ताचीनी करते हो। 'यू नेवर अंडरस्टैंड' कि सरकार किसी 'होम्योपैथी मेडिसिन' की 'इस्टाइल'(पहले मर्ज का बढ़ना फिर घटना) में अपने काम-काज को बिना साइड इफेक्ट के निपटाती है। पहले वह मजर्(महंगाई, गरीबी, मौंते, मुसीबतें) को बढ़ाती हैं, फिर जब तुम आहत हुए तो, राहत का मरहम लगाती हैं। इस पर उदास बड्डे ने आह भरते हुए एक शेर दाग दिया कि 'उस ने हमारे जख्म का कुछ यूं किया इलाज, मरहम ही गर लगाया तो कांटे की नोक से' बावजूद इसके राजनैतिक थुक्काफजीती का आलम यह है कि विपक्ष समेत जो दल सरकार के साथ दलदल में धंसे हैं उनकी भी आपत्ति इस बात को लेकर है कि उनसे बगैर पूछे, बिना अहमियत दिए एकतरफा सारी क्रेडिट सरकार कैसे हजम कर सकती है। गरीब केवल सरकार के कैसे हो सकते हैं।'गरीब और उसकी लुगाई तो सबकी भौजाई होती है।'तो कांग्रेस का गरीबों पर 'सिंगल' दावा कैसे मंजूर हो सकता है। लेकिन बड्डे जब सरकार संसद में बहस कराना चाहती थी, विरोधियों को मना रही थी तो ये बर्हिगमन कर कैंटीन में चाय की चुस्कियां ले रहे थे। और अब सरकार 'रैम्बो' टाईप से कानून की बना रही तो चिल्लपों मची है। लेकिन बड्डे अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कहीं गैस सिलेंडरों(9)की शुरुआती सुझव की तर्ज पर कानून में यह सुराग न बना दिया जाए कि जहां कांग्रेसी सरकारें हैं केवल वहां के गरीब इस खाद्य सुरक्षा का सुख ले सकेंगे। अलबत्ता बड्डे सरकार इस अध्यादेश के जरिए एक तीर से दो शिकार करने जा रही है। अभी 26 और रुपए 32 रुपईया कमाने वाले गरीब नहीं थे। अब यही लोग गांव के सामंत कहलाएंगे और उनके अन्नागार एफसीआई के गोदामों से ज्यादा सम्पन्न होंगे। सरकार यह दावा कर लोकल से ग्लोबल तक के मंचों में अपनी पीठ ठोक-ठुकवा सकेगी कि अब इंडिया विपन्न नहीं सम्पन्न कंट्री है। यहां 'न गरीब रहेगा, न ही गरीबी'..समङो बड्डे!
Friday, 21 June 2013
केदारनाथ के दरबार में हाहाकार
बड्डे बाढ़ की विभीषिका से भौंचक्के हो बोले- बड़े भाई केदारनाथ जो सारे संसार के नाथ हैं, लेकिन एक रात में हजारों को अनाथ कर गए। जिते देखो उते भक्तन की कब्रगाह बनी है। समूचा परिसर शमशान में तब्दील हो चुका है। अरे बड्डे! भोले तो ठहरे अघोरी। वे शमशान के राजा हैं। उन्हें ऐसे ही स्थान रास आते हैं।इसलिए वर्षो से आदमियों और वहां के पंडों ने कब्जा कर सराय, होटल बना धंधा शुरू कर, गंदगी का साम्राज्य फैला रखा था। जिससे देव भूमि में मच्छर और वायरसों का प्रकोप पसर रहा था। ऐसे में वे किस सरकार से कहते कि मेरे इलाके का अतिक्रमण हटाओ। सो कैलाश में उन्होंने निगाह टेढ़ी की और इन्द्रदेव को इशारा किया और एक झटके में मामला साफ हो गया। और तो और आदिगुरू शंकराचार्य जिन्होंने आठवीं सदी में मंदिर की नींव रखी थी और जिनकी समाधि मंदिर के ठीक पीछे है उनको भी नहीं बख्शा। अब वहां सफाचट मैदान है। अब है कि आस्तिक बनाम नास्तिक की जुबानी जंग चल पड़ी है।
मिस्टर नास्तिक ने स्टेटमेंट दिया कि- ईश्वर होता तो उसकी पूजा उपासना के लिए दूर-दूर से आये यात्रियों को भोले बाबा बचा न लेते 'दिस वाज द अपॉरच्यिुनटी टू प्रूव दैट ही इज सम व्हेयर'। लेकिन सिर्फ अपना ही ख्याल रखा। खुद तो खम्बा गाड़ के जहां के तहां अड़े हैं। लेकिन जिन्होंने उस खम्बे को पकड़कर शरण लेने की कोशिश की उन्हें भी नहीं बख्शा। तुम कहते हो कि स्वर्ग से गंगा का अवतरण हुआ जिसे पाताल में जाने से रोकने के लिए भोले बाबा ने अपनी जटाओंे में रोक लिया तो फिर यह कैसा गंगा में उबाल आ गया। कि उनके भक्तों को लील गया। सो कहीं ईश्वर नहीं है। सब मन का भ्रम है, पाले रहो, देश सदियों इसी के सहारे रहा।पहले कई टुकड़ों में बंट चुका और दुनिया में सबसे पिछड़ गया। अड़ोसी-पड़ोसी(चीन-पाक) सब आखें तरेर रहे हैं। हम भगवान भरोसे यथास्थिति में पड़े हैं।
तभी मिस्टर आस्तिक बोले- तुम नास्तिक लोग 'आलवेज निगेटिव' सोच रखते हो। प्राकृतिक आपदा सदा से आती रही हैं। वे लोग किस्मत वाले हैं जिन्हें भगवान के स्थान से मुक्ति मिल गई। ठीक केदारनाथ मंदिर के पीछे वाले पहाड़ से स्वर्गारोहणी का रास्ता है। जो भक्त असमय कालकलवित हो गए, वे सांसारिक दृष्टि से भले परिवारजनों के लिए पीड़ा का सबब हैं। अरे बड्डे! यह देह ही नश्वर है, लेकिन देव स्थान में जाए तो किस्मत की बात है। पहले भी तीर्थ जाने वालों को फूल-माला पहना कर विदा किया जाता था कि अगर लौटे नहीं तो समझो भगवान ने स्वर्ग बुला लिया। मैं तो कहता हूं कि यह बहस बकवास है।सब प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा है। इसलिये अब तो चेतो और पीड़ितों के लिए राहत की सोचो!!
Friday, 31 May 2013
लोक से परलोक तक सब फिक्स है
| बड्डे बोले- बड़े भाई देश में इनदिनों बयार चल पड़ी है कि क्रिकेट से लेकर राजनीति, हिंसा/ हत्या, महंगाई, घपले- घोटाले जैसी हर गतिविधि फिक्स है और यह फिक्सिंग आज के दौर की नहीं, सनातन है। पुराणों में कथाएं आती हैं कि देवताओं ने राक्षसों को 'अमरत्व के आशीर्वाद' के साथ उनको निपटाने के तौर-तरीके भी फिक्स कर दिए थे। भोले बाबा ने रावण की भक्ति पर प्रसन्न हो अजर-अमर रहने का आशीर्वाद दे ही दिया था लेकिन ब्रम्ह जी ने बीच में भांजी मारते हुए कहा कि मृत्युलोक में मृत्यु शाश्वत है और ऐसा आशीर्वाद संविधान विरुद्ध है। रावण ने सोचा कि मनुष्य और वानर तो मेरे आहार हैं सो मांगा कि इन्हें छोड़ मुङो कोई न मार सके। और फिर तो तुम्हें पता है ही बड्डे कि कैसे सारे देवताओं ने मनुष्य और वानर के रूप में अवतरित हो रावण को निपटाया था। कृष्ण ने भी बार-बार कहा तुम सिर्फ कर्म करो बाकी सब फिक्स है। उन्होंने जयद्रथ को दिन में अंधेरा कर 'फूल' बनाया और फिर पहले से फिक्स तरीके से निपटवा दिया। यों तो बड्डे जन्मजात हम इस 'फैक्ट' से रू-ब-रू रहते हैं कि जन्म के साथ हमारी मौत की तिथि भी यमलोक के कैलेन्डर में फिक्स है। लेकिन कलयुग में मौंतें अब यमलोक की फिक्स तारीखों को मात दे रही हैं। बड्डे अब धरती पर कुछ खास लोग अच्छे-अच्छों की मौत फिक्स कर रहे हैं। हालिया नक्सल हमले को लेकर फुसफुसाहट है कि कांग्रेसियों में आस्तीन के सांपों ने परिवर्तन यात्रा का 'रूट' ऐसा परिवर्तित कराया किकारवां गुजर गया और वे गुबार देखते रहे। कुछ भी हो लेकिन, ऐसी आसमयिक हत्याओं से यमलोक में 'कनफ्यूजन क्रियेट' हो रहा है कि मृत्युलोक के लोग यमलोक की व्यवस्था का अतिक्रमण कर रहे हैं, यानी जिनका समय ऊपर से फिक्स है, उसे नीचे के लोग पहले ही निपटाये दे रहे हैं। हमारी जेलों की तरह यमलोक भी 'ओवर क्राउडेड' है। यमराज ने बम्ह जी से जांच आयोग बैठाने का निवेदन किया होगा। जांच आयोग तो मृत्युलोक में भी बैठते हैं और बैठेंगे लेकिन सब फिक्स हैं। जैसे सरकारों में नौकरशाहों की ट्रांसफर, पोस्टिंग, नियुक्तियों में लोगों के नाम ऑलमोस्ट फिक्स रहते हैं। चाहे अफसर ने बेहतर काम किया हो, मगर नेताओं की लल्लो-चप्पो न की हो, तो लूप लाईन फिक्स है। इंटरव्यू और कॉम्पटीशन एग्जामों में प्रतियोगी पढ़-पढ़ कर आंखें फोड़े डाल रहे हैं, मगर चयन सूची जुगाड़ टेक्नॉलाजी के जरिए फिक्स रहती है। खेलों में टीमें पहले से फिक्स रहती हैं। और तो और जिस मीडिया पर हम यकीन कर जो देखते-पढ़ते, समझते-बूझते हैं, वे खबरें भी फिक्स हो जाती हैं। तो बड्डे कहां तक इस फिक्सिंग पर चिल्लपों करोगे। |
Sunday, 26 May 2013
फोर्ब्स की लिस्ट भी फिक्स है.!!
जिसकी आपूर्ति उनके दल के कारिंदे अंधभक्ति से भरपूर करते रहते हैं। वे तो बेचारे गडकरी थे, जो अपने साथियों से असहयोग की 'आपूर्ति' में निपट गए।
लेकिन भाजपाई इस मेरिट लिस्ट को लेकर शंका आशंका व्यक्त कर रहे हैं कि क्रिकेट की तरह यह लिस्ट भी फिक्स है। वरना वर्मा की आंग सान सू की जिन्होंने अपना जीवन देश में डेमोक्रेसी के बरक्स होम कर दिया वे टॉप टेन से नदारत हैं। अपनी सुषमा स्वराज क्या कम कमजोर महिला हैं, जो उन्हें एकतरफा दरकिनार कर दिया गया। मायावती दलितों की उद्धारक बनकर निर्वाचित तरीके से तीन-तीन बार मुख्यमंत्री रहीं हैं। एक भाजपाई ने तो डाउट व्यक्त किया कि हो ना हो सोनिया पिछले वर्ष कई बार रहस्यमय अंदाज में, इलाज के आड़ में अमेरिका गईं जहां से फोर्ब्स पत्रिका भी प्रकाशित होती है और फिर पेड न्यूज से कोई भी मीडिया अछूता नहीं बड्डे।
बहरहाल, कुछ भी हो बड्डे पर अब कांग्रेस, भाजपा को दम दे सकती है कि हमारा नेता 'इंटरनेशनल टाईप' का है और तुम्हारा एक 'स्टेट टाईप' का।
दरअसल 'इनटरनली कांग्रेस इज वेरी डिसीप्लेन पार्टी एंड बीजेपी इज ओनली एक्सटरनली डिसीप्लेन पार्टी।' इसलिए भाजपा की कोई नेत्री फोर्ब्स जैसी पत्रिका में अंडर टेन में दखल नहीं दे पायी। 'एक्चुअली' बड्डे विदेशी जुबां और मीडिया जो कह दे वह देश-दुनिया के लिए किसी देववाणी से कमतर नहीं। फोर्ब्स पत्रिका की लिस्ट में दो महिलाएं मिशेल ओबामा और सोनिया गांधी इसलिए शामिल हैं कि एक राष्ट्रपति की पत्नी हैं तो दूसरी इसलिए कि वे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बनाने का माद्दा रखती हैं। विदेशी मीडिया ने अपने प्रधानमंत्री को सोनिया का गुड्डा तक कह दिया था, लेकिन मनमोहन की किंचित मानहानि नहीं हुई, उल्टे उनका मौन इस सूत्र वाक्य को पुष्ट करता रहा कि 'मौनं स्वीकृतम लक्षणं'। अरे बड्डे ये मानहानि नहीं यह तो मेरिट है कि जो जितना बड़ा गुड्डा साबित होगा वह उतनी लम्बी पारी प्रधान पद की खेल सकेगा। मगर देश के सांसद लोकतंत्र के इस मंत्र को भांप न पाये कि चुप्प्प्प्प्पी के साथ निष्ठा और बेशर्मी का 'कॉम्बीनेशन' हर 'एम्बीशन' को मुकम्मल कर सकता है। इसलिए इस सूची में संशोधन कर उन्हें टॉप पर रखना चाहिए था, क्योंकि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को अपाईंट करा देने का माद्दा सोनिया के सिवा दुनिया में किसी महिला में नहीं। मगर बीजेपी के कुनबे में फुस्फुसाहट है कि फोर्ब्स की लिस्ट भी फिक्स है।
Thursday, 4 April 2013
विन्ध्य में 'सीमेंट व एग्रीमेंट' के धंधे
इनदिनों
विन्ध्य की धरा के बरक्स यह खबर सुर्ख है कि जमीनों के दाम बेतहाशा बढ़े
हैं, तो उनका रजिस्ट्री शुल्क दो गुना के करीब हो गया है, बहती गंगा में
नगर निगम ने भी सम्पत्ति कर लगभग दो गुना कर दिया। आलम यह है कि भोपाल और
इंदौर के जमीन के दामों की तुलना सतना और रीवा से की जाने लगी है। अचानक
ऐसा क्या इस इलाके में शुमार हो जो एक दशक में दाम आसमान छूने लगे? विन्ध्य
की धरती और इस इलाके की महत्ता के बारे में कवि रहीम ने कहा था कि-
'चित्रकूट में रमि रहे रहिमन अवध नरेश, जा पर विपदा पड़त है सो आवत यह
देश।' चित्रकूट के संदर्भ में यह बात सम्पूर्ण क्षेत्र विन्ध्य यानी सतना,
पन्ना और रीवा के इलाके को लेकर कही गई होगी। उक्त दोहे का ताल्लुक केवल
इसलिए नहीं है कि आपदकाल में आगरा से आकर अकबर के नौ-र8ों में से एक
अब्दुर्र रहीम खानखाना और अवध के नरेश प्रभु श्रीराम ने इस अंचल में शरण ली
और निवास किया था। बल्कि इसलिए कि यहां सुरम्य वन, नदियां और जगह
शान्तिपूर्ण थी। यह बात दीगर है कि कवि रहीम और अवध नरेश के संज्ञान में न
रहा हो कि यहां की धरा के गर्भ में मौजूद लाइम स्टोन वैश्विक दज्रे का है,
जिससे झोपड़ी नहीं बल्कि बड़े-बड़े कल कारखाने और अट्टालिकाएं तैयार की जा
सकेंगी। मगर इसकी पहचान दूरदृष्टि रखने वाले धनपतिओं को जरूर थी और इसीलिए
रहीम के दोहे के भावार्थ की विवेचना और जांच बाहर के उद्योगपतियों ने बेहतर
ढ़ंग से इस सत्य के आलोक में की, कि उद्योग हवा में नहीं जमीन में खोले और
लगाए जाते हैं। इस संभावना को बांचने वाले भू-माफियाओं और इसके दलालों ने
उद्योगपतियों की तरह समय रहते अवसर पहचाना और भूमिपुत्रों को फुसलाकर कर
सदियों से अन्न उत्पन्न कर रही धरा को धर दबोचा। इसलिए उद्योग धन्धों के
लिहाज से विन्ध्य के दो प्रमुख जिले सतना और रीवा में आज की तारीख में जो
दो धंधे प्रमुखता से चलन में हैं और रहेंगे वे हैं- 'सीमेंट' और
'एग्रीमेंट'। जिनका सरोकार विशुद्ध मुनाफा कमाना है। सीमेंट कारखानों से
निकलते धूल और धुएं से इलाके की जमीन बंजर हो रही है, तो शहर सहित आसपास के
गांव ऐसे गंम्भीर प्रदूषण की चपेट में आ रहे हैं, जिससे यह इलाका कई तरह
के रोगों की शरण स्थली बनता जा रहा है। बिरला सीमेंट से शुरू हुए इस
कारोबार ने जेपी, प्रिज्म को न सिर्फ यहां की धरा में मौजूद लाईम स्टोन ने
ललचाया बल्कि तकरीबन एक दजर्न कारखानों के अन्य उद्योगपतियों को यहां धरा
को खोद-खन डालने, माल कमाने और लाखों एकड़ भूमि को बंजर कर देने के लिए
न्योता है। इस इलाके दो बड़े शहर सतना- रीवा को सीमेंट की सड़कों से पाट
दिया गया है। यदि दोनों शहरों की सेटेलाईट से तस्वीर ली जाए तो कुछ यूं
प्रतीत होगा जैसे पत्थर के पहाड़ को काटकर दोनों शहर बसा दिए गए हैं।
गुणवत्ता का आलम यह है कि बनने के 6 से 12 माह में ही सड़कें दम तोड़ देती
हैं। ऐसी सड़कों पर सामान्य रूप चलने-फिरने में गिर पड़ने और गिरने पर
जानलेवा चोट से दो-चार होना आम है, क्योंकि इन सड़कों पर गिरना पत्थर पर
गिरने जैसा है। आप माने या न माने लेकिन गिरते भू-जल स्तर की प्रमुख वजह ये
सीमेंट उद्योग और सीमेंट से शहर को पाट दी गई सड़कें हैं। वह दिन दूर नहीं
जब आपको आश्चर्य न होगा कि यह इलाका 'डेड जोन' में शुमार हो जाए। यह बात
समझ से परे है कि प्राकृतिक सौन्दर्य और पर्यावरण से सम्पन्न यह इलाका खुद
को काल के गाल में झोंकने पर क्यों उतारू है? यह शर्मनाक है कि नेताओं की
समूची विरादरी भी मौन होकर इस बेतरतीव विकास पर अपनी स्वीकृति देती आई है।
उधर जमीनों में एग्रीमेंट के षड्यंत्र से किसान धन की लालच में अपनी पुरखों
की जमीन-जायजाद से कट रहे हैं तो, चंद रुपए लगाकर शातिर धंधेबाज चांदी काट
रहे हैं। दरअसल, एग्रीमेंट लूट का एक ऐसा जुगाड़ है जो बिना पूरी रकम लगाए
बीच में ही माल बनाने का हवाई उद्योग साबित हुआ है, तो दूसरी ओर राजस्व की
क्षति का काला दस्तावेज। कथित लोगों की चौकड़ी थोड़ा धन लगाकर जमीनों का
एग्रीमेंट निर्धारित अवधि के लिए करा लेती है और फिर प्लॉटिंग के नाम पर
इसकी अल्टी-पल्टी का खेल शुरू हो जाता है। बेचारा उपभोक्ता इस खेल का आखिरी
शिकार होता है और उसे 200 रुपए वर्ग फिट की जमीन 700 से 1000 देकर हाथ आती
है। इस कुटीर उद्योग में नेता से व्यापारी तक, डॉक्टर से मास्टर तक, यहां
तक कि गांव, शहर, नगर का हर शख्स इसी हवाई व्यापार में मशगूल है।
सवाल
बड़ा और बारीक है कि इस इलाके में ऐसा क्या हो गया कि जमीनों के दाम आग
उगल रहे हैं। सिवा दो धंधों- सीमेंट और एग्रीमेंट के शहर में और क्या है और
रहेगा? इस पर भी चितंन-मनन करना होगा। वरना पूरा पर्यावारण नष्ट कर देने
और लकीर पीटने के सिवा और कुछ हाथ आने वाला नहीं है।
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