| कुछ रोज पहले बड्डे ने 'अर्ली मार्निग' खबर पढ़ी और कहा कि जैसा 'वुमेन सिक्यूरिटी बिल' मनचलों के दिल को तंज करने के लिए पारित किया गया है, उससे दामिनी की दुखद आत्मा को क्या मिला होगा! कहना 'टफ' है मगर इतना तो तय है कि अब मजनुओं, मनचलों, टपोरियों की 'वाट' कभी भी लग सकती है। क्योंकि बड़े भाई- दामिनी के दर्द की एंटीबायटिक दवा के रूप में एंटी रेप बिल देश की सर्वोच्च सभा में 'टशन' के बीच पास हो गया। सो बड्डे 'नाऊ थिंक ट्वाईस विफोर स्पीक, सी ऑर टच टू फीमेल्स।' अब तो स्त्री जाति से कोई भी व्यवहार चाहे वह सामान्य बातचीत का ही क्यों न हो, दो नहीं दस बार सोचकर करना होगा। बड्डे बोले- बड़े भाई यह बड़ा फसउव्वल सा एक्ट है। अब सोचो- समाज है, जीवन है, टीका टिप्पणी भी न चले तो फिर जीवन किसलिए। बड़े भाई इस 'एंटी रेप एक्ट' की टेंशन मर्दो को ही नहीं, स्त्रियों को भी है। साथ ही उनके लिए भी जो तमाम फैशन की वस्तुओं के निर्माता हैं। क्योंकि फैशन, फेशियल से लेकर फेयर करने वाली क्रीम तक का ब्यूटी निखारने का प्रयोग जिन पुरुषों के लिए था, वे अब राजी खुशी नहीं बल्कि मजबूरी में मौनी बाबा बनने जा रहे हैं। तो ऐसे में सारी सजावट, सौन्दर्य 'मीनिंगलेस' हो जाएगी। 'एक्चुअली' ऐसा नहीं है बड्डे। अब स्त्रियों से व्यवहार में शिष्टता, शालीनता के तत्व अनिवार्य होंगे। तो क्या अब पुरुषों को कहां, कब, क्या बोलना है उसके बाकायदे चार्ट चौराहों पर लगेंगे? बड्डे 'रिस्पेक्ट' अंदर का मामला है पर हैरत की बात है कि इसे कानून के जरिए इम्लीमेंट किया जा रहा है। गर ऐसा होता तो अपना देश कानून के ग्रंथों से पटा पड़ा है। पर अपराधों की धार हर कानून को हलाक कर देती है। विडम्बना है कि हमारे नेता- नपाड़ियों ने इस बिल की खिल्ली कुछ यूं उड़ाई कि- लड़की को घूरने और पीछा करने के प्रावधानों पर शरद यादव ने कहा कि अगर लड़के लड़कियों का पीछा नहीं करेंगे, तो प्यार होगा कैसे? लालू यादव ने भी बिल के बिंदुओं पर चुटकी ली कि वह तो अपनी पत्नी को देखने पर भी फंस जाएंगे। मुलायम सिंह यादव ने यह कह कर तो हद ही कर दी कि बिल के कड़े प्रावधानों से तो महिला कर्मचारियों का ट्रांसफर रुकवाने वालों को जेल जाना होगा। दरअसल मुलायम ट्रैफिकिंग को ट्रांसफर समझकर कन्फ्यूज थे। अलबत्ता देश में महिलाओं के विरुद्ध हो रहे अस्मिता संबंधी अपराधों के बरक्स यह बिल एंटी नहीं 'एंटीक' जान पड़ता है। इतने सख्त पहरे तो इतिहास के उस हिस्से में भी दर्ज नहीं हैं, जब समाज आर्थोडॉक्स था। अब तो विकास, खुलेपन का दौर है ऐसे में महज कानून क्या उखाड़ लेगा। फिर भी बिल के बिन्दु इतने सख्त है कि वे हर लिहाज से एंटीक हैं। |
Friday, 22 March 2013
एंटी या 'एंटीक' रेप बिल
Saturday, 16 March 2013
हार्ट में घबराहट देतीं दो डेटें
| चौदह मार्च की शाम अचानक आई आंधी-अंधड़ के बाद बड्डे को डॉक्टर के पास जाते देख हम पूछ बैठे कि क्या कोई चोट-ओट लगी है जो चिकित्सक की शरण में हो। वे बोले-'नहीं बड़े भाई इससे बड़े-भयानक तूफान अपने भीतर निरंतर बहते रहते हैं'..और फिर आगे कुछ कहने की बजाए इमोशनली होते हुए उन्होंने एक शेर जड़ दिया कि - 'ये माना कि दिन परेशां है रात भारी है, मगर फिर भी है कि जिन्दगी प्यारी है।' बड़े भाई इस देश में भगवान भरोसे रहने की कीमत और क्या-क्या देंगे हम। कल शाम इंटरनेट पर खबर आई कि सरकार डीजल के जरिए 50 पईसा का एक और जख्म देगी, तो पेट्रोल के रूप में दो रुपईया मरहम लगाएगी। पेट्रोल से पर्सनली आहत या राहत मिलती है, तो डीजल से महंगाई का बहुआयामी डंक डसता है। इस महंगाई के खेल हम बार-बार छले गए। बड्डे ने 'बाईहार्ट' सरकारों को कोसते-कुढ़ते हुए फिर एक और शेर कुछ यूं दागा कि- 'सरकार ने जनता के जख्म़ों का कुछ यूं किया इलाज, मरहम ही गर लगाया, तो कांटे की नोक से।' बस बड़े भाई समझो जब से सरकार ने महीने में दो बार तेल के दाम 'रिव्यू' करने का खेल शुरू किया है, तब से हर महीने में 15 और 30 की डेटें 'हार्ट' में घबराहट पैदा करने लगती है, सो भाई बीपी नपवाने जा रहे हैं। इधर सरकारों का नया रिसर्च सूत्र वाक्य है कि- 'अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता' इसीलिए सरकारें खुद शुतुरमुर्गी मुद्रा अख्तियार किए हैं और धूर्त आवाम् को मानती हैं। सो 'वे इस हाथ दे, उस हाथ् ले' की (कु)नीति के जरिए इस मुगालत् में खिंच रही हैं। उसे यकीन है कि वह अपनी करतूतों पर 'कभी खुशी, कभी गम' जैसा 'कनफ्यूजन क्रिएट' कर अपना काम (आमचुनाव) निकाल लेगी। हिस्टोरिकल महंगाई के लिए इतिहास मे दर्ज हो चुकी केंद्र सरकार के लिए आज् आवाम यह गीत गाहे-ब-गाहे गुनगुनाती होगी कि 'अगर वेवफा तुङो पहचान जाते तो, खुदा की कसम तुमको न वोटिंग करते' पर बड्डे सरकारें बड़ी सयानी हैं चुनाव के ऐन वक्त ऐसा 'चुग्गा' डालेंगी कि हम् उसके ऊपर पड़ा 'फसउव्वल जाल' 'विजिबल' ही नहीं होगा। पर हम बचपन में पढ़ी कहानी- 'शिकारी आता है, जाल फैलाता है, हमें जाल में नहीं फंसना चाहिए' को गाते दोहराते हुए उसी जाल में उलझ जाएंगे। क्योंकि जाल में उलझने के बाद की कहानी की नैतिक शिक्षा- 'एक साथ जाल समेत उड़ जाने और जाल को कुतरकर आजाद हो जाने' को बिसर गये हैं। हां हमारे एक बार पंख उगे थे, हम फड़फड़ाये थे, जब् अन्ना, बाबा, केजरी टाईप के लोगों ने हमारे अंदर दम् भरा था। मगर हमने आपस में बंटकर अपने ही पंख काट डाले। खैर आखिर में बड्डे ने गहरी सांस ली कि 15 की डेट बीत गई वो भी बिना किसी महंगाई के इंक्रीमेंट के, मगर किसानों को तो सदमा दे ही गया शाम का पानी। हाय.'पानी रे पानी तेरा रंग कैसा!' |
Monday, 11 March 2013
ब्याह एक बिआधि है..
| बड्डे बोले बड़े भाई देश में दस ऐसे हॉट बैचलर्स (अविवाहित) नौजवान हैं, जिनकी डिमांड भारतीय दूल्हे के रूप में सर्वाधिक हो सकती है। वे हैंराहु ल गांधी, सलमान खान, शाहिद कपूर, सिद्धार्थ माल्या, विराट कोहली, युवराज सिंह, कुणाल कपूर, नेस वाडिया और नील नितिन मुकेश। मगर, बड्डे जो ताजा खबर है, उससे चिंता 'ओनली' उन सुंदरियों के लिए ही नहीं, बल्कि उनके लिए भी है, जो या तो विवाहित हैं या होने के जुगाड़ में हैं। क्योंकि बड्डे कांग्रेस के युवा आईकॉन राहुल ने छल्ला छोड़ा है कि मैं शादी करूंगा तो फंस जाऊंगा। तो क्या विवाह यानी फंस जाना है? हो न हो, राहुल ने वैराग्य के इस मंत्र का कवि रहीम की दोहावली से दोहन किया है क्योंकि बहुत पहले रहीमदासजी ने युवाओं को सावधान करते हुए विवाह के बरक्स दो पंक्तियां लिखी थीं कि- 'रहिमन ब्याह बिआधि है जाहु सको बचाय। पायन बेड़ी पड़त है ढोल बजाय-बजाय।।' इसलिए राहुल बाबा अब अपने युवाओं से यह कहते फिर रहे हैं कि- 'ब्याह एक बिआधि है' और अगर मेरा विवाह हुआ, बच्चे हुए तब मैं संसारी हो जाऊंगा और चाहूंगा कि मेरे बच्चे मेरी जगह लें। तो क्या राहुल- अटल, कलाम, मोदी, माया, ममता और जयललिता से 'इम्प्रेसड' हैं? 'आगे नाथ न पीछे पगहा' की तर्ज पर राजनीति की वैतरणी पार करना चाहते हैं। ऐसे में वे बेचारे युवा कांग्रेसी किसको अपना आदर्श मानेगें जो विवाहित हैं या जो लालायित हैं? या फिर वे युवाओं की ऐसी फौज खड़ी करेंगे जो ब्याह की बिआधि से मुक्त हो। एक युवा कांग्रेसी ने यहां-वहां ताक कर हौले से मुंह खोला कि- हमारे लीडर में 'मैरिज के पांईट ऑफ व्यू' से किसी किस्म की कोई कमी नहीं है। वे तो देश की 125 करोड़ की आबादी को देख चिंता में हैं कि इतने दबाव को देश और कैसे बर्दाश्त करेगा। इस पर अंकुश लगे इसके बरक्स उन्होंने इसकी शुरूआती घोषणा की है। बड्डे 'एक्चुअली' ऐसा हुआ तो, देश में कांग्रेस के हर जिले में वे ही युवा पदाधिकारीआसीन पाए जाएंगे, जो 'ब्याह की बिआधि' से मुक्त हैं। और फिर बड्डे अविवाहित रहने के अनेकानेक फायदे हैं। इससे एक तो जीवन भर क्रेज बना रहता है, दूसरा समय ही समय है और तीसरे व्यक्ति शारीरिक रूप से न भी सही, पर मानसिक तौर से ऑल लाईफ देवानंद टाईप युवा बना रहता या इस मुगालते में तो जीवन काट ही सकता है। बॉलीवुड में कई कथित चालीस को पार कर भी अपनी देह की दुकान इसलिए चला रहे हैं कि वे अब भी युवा हैं। बड्डे बोले- बड़े भाई देश का आम नागरिक इस मुगालते में न पड़े बल्कि समय रहते ब्याह करे और बुढ़ापे में आने वाली ब्याधि की लाठी तैयार करे। |
Saturday, 2 March 2013
बजट की ओट में साइलेंट चोट
ब जट बजट..जपते पूरा महीना इसी शोर में निपट गया मगर जब आया तो वह हमें निपटा गया। बड्डे पूछ बैठे कि- बड़े भाई बजट का गणित आप कुछ समझे? हमने कहा- बड्डे बजट का मायाजाल तो अच्छे-अच्छे खां नहीं बूझ पाते तो फिर हम किस खेत की मूली हैं। अरे बड़े भाई अब मूली भी मामूली नहीं रही, गाजर से महंगी है इसलिए इस कहावत को वक्त के साथ कुछ यूं बदल डालो कि "तुम, हम या वो किस खेत की गाजर-मटर हैं।" खैर बड्डे दुनिया में हर रोग की दवा है। जिसकी नहीं है उसके भी टीके ईजाद किए जा रहे हैं। मगर नासपिटी महंगाई का नहीं जो अखंड ला-इलाज बनी है, थी और रहेगी। इसके टीके खोजने के फेर में, 65 बरस से देश वे लोग जो नेता टाईप के थे, इससे मुक्त हो गए और "साइलेंटली" इसी के झोल-झंसे में कुछ "रिच टाईप" के नेता बन चुके हैं, तो कुछ बनने की प्रक्रिया में हैं। ऐसों के लिए बजट एक उत्सव है- टिप्पणी देने और फोटू छपवाने का। दरअसल, बड्डे बजट बड़ा अबूझ है।125 करोड़ में से 124 करोड़ से अधिक लोगों के लिए बजट में "यूज" की जाने वाली शब्दावली "काला अक्षर भैंस बराबर है।" जनता क्या "नाइंटी परसेंट" नेता-नपाड़ियों से पूछ लो कि जीडीपी, एनएनपी, जीएनपी, मुद्रास्फीती, बजट घाटा, राजस्व घाटा, भुगतान संतुलन जैसे "टर्म" के अर्थ क्या हैं, तो एसी चेम्बर में पसीना छूट जाएगा। यकीन न हो तो इसे पढ़ने के बाद अपने आस-पड़ोस में आजमाएं क्योंकि "हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या?"वो तो भला हो कुछ चिदम्बरम, मनमोहन सिंह टाईप के "अपाईंटेड" नेताओं का, जो हावर्ड सरीखी यूनिवर्सिटीज से उपजे लीडर्स हैं। वे इस टर्मिनॉलाजी को बेहतर समझते-बूझते हैं। इसलिए देश में बजट जैसी उठापटक साल में एक बार हो ही जाती है। बड्डे बोले बड़े भाई-इस बार जो बजट है उसमें ऐसी कारीगरी की गई है कि गरीबों को राहत और अमीरों को आफत नजर आती है। पर. "बड़े धोके हैं इस राह में..."सारा खेल तो पहले ही डीजल की ओट में सरकार खेल चुकी है और हर माह यह खेल 'कॉनटीन्यू' रहेगा। जिसका "डाइरेक्ट इफेक्ट" महंगाई पर "ग्यारंटीड" है। क्योंकि तकनीकी युग में तेल महंगाई की जड़ है। जिसे सरकार ने डीजल से सींच-सींच कर दुरुस्त कर दिया है। सरकार की दलील है कि "महंगाई कौन कमबख्त चाहता है, वो तो इसलिए बढ़ाते हैं कि देश चल सके।" पर जब से हम "थिंक ग्लोबल एट लोकल" की थीम पर बढ़े हैं, तब से बजट साइलेंट किलर बनते जा रहे हैं। सरकार के कारिंदे पीठ पीछे वार करने का चोर रास्ता हर माह की शक्ल में ईजाद चुके हैं। बड्डे बोल पड़े हां भाईअब तो सरकार की सारी मार साईलेंट है।
Friday, 22 February 2013
विस्फोटों की टेस्ट भूमि है भारत !
हैदराबाद मे विस्फोट के जरिए दो दजर्न नागरिकों की हत्या से छुब्ध बड्डे बोले- बड़े भाई फिर ये विस्फोट, फिर इत्ते 'इनोसेंट' लोग असमय काल के गाल में, इससे कमीनी हरकत क्या हो सकती है। तो क्या अल्लाह ऐसे जेहादियों को भी जन्नत देगा जो उसके बन्दों को मात्र मजे के लिए मार कर सड़कों को कसाई घर बनाने से गुरेज नहीं करते।हमने बड्डे की भावना को समझ और फिर हिन्दी में समझने की कोशिश की, कि देखो बड्डे कोई भी निर्माण हो उसका परीक्षण जरूरी है। बिना टेस्ट के सब 'मीनिंगलेस' है। इसलिए ऐसे विस्फोटकों का निर्माण फिर उसका परीक्षण पड़ोसी मुल्क में करना ही निर्माण का लक्ष्य होता है। 'फॉर दिस' भारत की भूमि पाकिस्तान को सहज और सुविधाजनक लगती है, क्योंकि यहां पकड़-धकड़ के 'चांस' कम है और फिर ओसाम टाईप से बदला लेने की औकात भी भारत में नहीं है। हालांकि 'सिंस लास्ट फ्यू ईयर' से अफगान के तालिबानी भी विस्फोटों के प्रयोग पाकिस्तान में करने लगे है। हमारे देश की सरकार ऐसे विस्फोटों को रोकने में खुद को असहाय मानती रही हैं। उनके युवा चहेते और प्रधानमंत्री के दावेदार ने तो पिछले मुम्बई विस्फोटों के बाद कहा था कि देश बड़ा है, इनको रोकना संभव नहीं है। सिर्फ नियंत्रण के उपाय किये जा सकते हैं। जैसे हमने अपने लिए उपाए कर रखें हैं, वैसे जनता भी अलर्ट रहे। सरकार का बस इत्ता काम थोड़े ही है। सच है बड्डे मरना-जीना तो लगा रहता है। कोई आज, तो कोई कल। फिर उनका आशय भी यही था कि देश में विस्फोट होने का भी समय और मुहूर्त है। कोई भी बड़ा त्योहार हो, पंद्रह अगस्त हो, छब्बीस जनवरी हो, किसी आंतकी को फांसी दी गई हो, देश में कोई टीम मैच खेलने आई हो.बगैरा-बगैरा। और विस्फोट का पहला निशाना चेन्नई में शुरू हो रहे टेस्ट मैच में कंगारुओं को डराना था सो सध गया। टीम ने भी लगे हाथ कह दिया कि वह हैदराबाद में मैच नहीं खेलेगी। उधर धमाकों के बाद अपने मौनी बाबा की चुप्पी टूटी है और उन्होंने एक तैयार स्क्रिप्ट को बांच दिया कि-दोषी बख्शे नहीं जाएंगे..देश की आवाम मेरी तरह शांति बनाए रखे! हिन्दू आंतक का 'परफ्यूम' लगाने वाले गृहमंत्री शिंदे ने गर्व से घोषणा की है कि सुरक्षा एजेंसियों के अलावा आईबी, रॉ की टीमों को नींद से जगा कर काम पर लगा दिया गया है और मुआवजे की पंजीरी देने की तैयारी भी। खैर बड़े भाई लकीर पीटने में तो हम उस्ताद रहे हैं। 'बट' अब तो 'डाउट' यह भी है कि कहीं एक दिन इन विस्फोटों आड़ में पाकिस्तान परमाणु बम का भी टेस्ट भारत की भूमि पर न कर ले, क्योंकि निर्माण का लक्ष्य तो उसके परीक्षण में है और भारत से बेहतर भूमि उसे कहां मिलेगी।
Monday, 18 February 2013
महंगाई किश्तों में
गत सप्ताहांत एक बार फिर पेट्रोलियम पदार्थों में इजाफा हुआ मगर
शांतिपूर्वक। न कहीं कोई विरोध के स्वर गंूजे, न ही सरकार में शामिल घटक
दलों ने चूं चपड़ की। उल्टे ममता बनर्जी के अड़ंगे से आजाद कांग्रेस की
कप्तानी में यूपीए सरकार अब बिना ब्रेक के दौडऩे लगी है। पहले रेल किरायों
में बढ़ोतरी फिर डीजल सुधारों के नाम पर तेल का काला खेल चल पड़ा है।
पेट्रोल के दामों के करीब डीजल के दामों को लाने की कवायद में अब हर महीने
डीजल के दाम 50 पैसे बढ़ाने का निर्णय (साजिशन) लिया गया है, उससे आवाम को
महंगाई की कीमत अब थोक में नहीं किश्तों में चुकानी होगी।
दरअसल, डीजल
पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी अब आये दिन की खबर बन चुकी है और जब कोई बात
आम हो जाती है तो उसका असर भी कमजोर पड़ जाता है। सरकार ने इसका बड़ा ही
सटीक और चोर रास्ता ईजाद कर लिया है कि कीमतें तो बढ़ें, मगर
आहिस्ता-आहिस्ता। दर्द बढ़े मगर मजे-मजे। यकायक कीमतों में इजाफा, सरकार के
विरुद्ध बदनामी का माहौल निॢमत कर देता है। इसलिए सरकार की किचन कैबिनेट
में यह तय हुआ है कि अब डीजल पेट्रोल के दामों में कसाई की तरह नहीं, प्यार
से बढ़ोतरी करेगी। सरकार का भी यह मानना है कि डीजल कीमतों में इजाफे की
यह छोटी-छोटी खुराक जनता आसानी से सहन कर सकती है और कंपनियों की आर्थिक
सेहत भी दुरुस्त हो सकती है। सरकार भी बखूबी समझने लगी है कि बढ़ती कीमतों
से देश में सिवा विरोध के और क्या होता आया है। इससे विपक्ष और मीडिया को
भी कुछ कहने सुनने और लिखने का मौका मिल जाता है, तो जनता की भड़ास भी
कुड़कुड़ा कर निकल लेती है।
हर बार तेल कंपनियां बाजार भाव की बनिस्पत हो रहे नुक्सान की भरपाई का राग अलापती हैं और इसी ओट में पेट्रोलियम पदार्थों पर चोट करती हैं। ऊपर से रोना रोया जाता है कि अभी कंपनियों को घाटा सहना पड़ रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि कंपनियों का यह घाटे का गणित महज एक छलावा है। यह दुष्प्रचारित किया जाता है कि तेल सब्सिडी समूची अर्थ व्यवस्था को अस्थिर कर देगी। लेकिन कडुआ सच यह है कि भारत के उपभोक्ता दुनिया में तेल की ऊंची कीमत चुका रहे हैं। मसलन पेट्रोल की कीमत पिछले एक बरस से 70 रुपए लीटर से अधिक रही है। वहीं पाकिस्तान में 53 रुपए लीटर। जबकि भारत की भांति पाकिस्तान भी पूरी तरह तेल के आयात पर निर्भर है। अमेरिका में कोई सब्सिडी नहीं है फिर भी वहां पेट्रोल 50 रुपए प्रति लीटर ही है। अन्य एशियाई देश भी भारत से कम दामों पर तेल बेच रहे हैं। तो फिर सवाल है कि दुनिया में भारतीय ही सबसे अधिक दाम क्यों चुकाएं? घाटे के नाम पर सिर पीटने वाली तीनों तेल कंपनियों ने वर्ष 2010-11 में सरकार को 3,287 करोड़ रुपए का लाभांश दिया है। आलम है कि यह मुनाफा वर्ष-दर-वर्ष बढ़ता जा रहा है। अक्सर आवाजें उठती हैं कि तेल क्षेत्र में सुधार होना चाहिए, जिसके बरक्स समाधान देने के नाम पर सुंदरराजन, रंगराजन, किरीट पारिख, चतुर्वेदी और विजयकेलकर समितियां गठित हो चुकीं हैं। पर लगता है कि जो कुछ भी सुधार के नाम पर हुआ है वह बस कंपनियों का लाभांश कैसे बढ़ाया जाय न कि अवाम को राहत कैसे मिले?
तेल के इस नए खेल सारा मजमा डीजल को लेकर है, क्योंकि जहां पेट्रोल व्यक्तिगत अर्थव्यवस्था को डगमगाता है, तो डीजल समूची व्यवस्था को। सर्वविदित है कि डीजल परिवहन का प्रमुख साधन है यह चाहे व्यक्तियों का हो अथवा वस्तुओं का। डीजल की हर बढ़ोतरी पर माल भाड़ा बढ़ता है जिसका बोझ उत्पादक वस्तुओं के दाम बढ़ाकर पूरा कर लेता है और घूम फिरकर सारा बोझा उपभोक्ता के सिर पर लद जाता है। इसलिए आने वाले दिनों वस्तुओं के दाम जिस तेजी से बढेंगे कि अवाम देखकर अवाक रह जाएगी। एेसा नहीं कि सरकार या कंपनियां इस सच्चाई से वाकिफ नहीं पर सरकारों का रवैया शुतुरमुर्गी होता जा रहा है। जो भी हो, इतना तो तय है कि तेल के जरिए महंगाई को किश्तों में परोसने का नया फॉर्मूला जनता का तेल निकाल कर ही दम लेगा। पहले ही गैस सिलेंडरों से सब्सिडी हटने की तलवार सर पर लटक रही थी अब डीजल की माह-दर-माह बढ़ोतरी रही सही कसर को पूरा कर देगी। हो न हो यह बात सरकार के संज्ञान में है कि अभी चुनाव में वर्ष से अधिक का समय शेष है और यदि वह समय रहते अधिक राजस्व जुटा लेगी तो अपने कैश ट्रांसफर स्कीम में उतनी ही कारगर रहेगी। साथ ही लोकलुभावन घोषणाएं कर पाने में खुद को सहज पाएगी। लेकिन बस,रेल, खाद्य वस्तुओं सहित चौतरफा महंगाई को आक्रमण हो चुका है। कहना पड़ता है कि यह यूपीए सरकार का द्वितीय संस्करण देश को बहुत महंगा पड़ा। क्या एेसे में अवाम सरकार के झांसे में आकर उसके तृतीय संस्करण को भी देखना चाहेगी!
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हर बार तेल कंपनियां बाजार भाव की बनिस्पत हो रहे नुक्सान की भरपाई का राग अलापती हैं और इसी ओट में पेट्रोलियम पदार्थों पर चोट करती हैं। ऊपर से रोना रोया जाता है कि अभी कंपनियों को घाटा सहना पड़ रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि कंपनियों का यह घाटे का गणित महज एक छलावा है। यह दुष्प्रचारित किया जाता है कि तेल सब्सिडी समूची अर्थ व्यवस्था को अस्थिर कर देगी। लेकिन कडुआ सच यह है कि भारत के उपभोक्ता दुनिया में तेल की ऊंची कीमत चुका रहे हैं। मसलन पेट्रोल की कीमत पिछले एक बरस से 70 रुपए लीटर से अधिक रही है। वहीं पाकिस्तान में 53 रुपए लीटर। जबकि भारत की भांति पाकिस्तान भी पूरी तरह तेल के आयात पर निर्भर है। अमेरिका में कोई सब्सिडी नहीं है फिर भी वहां पेट्रोल 50 रुपए प्रति लीटर ही है। अन्य एशियाई देश भी भारत से कम दामों पर तेल बेच रहे हैं। तो फिर सवाल है कि दुनिया में भारतीय ही सबसे अधिक दाम क्यों चुकाएं? घाटे के नाम पर सिर पीटने वाली तीनों तेल कंपनियों ने वर्ष 2010-11 में सरकार को 3,287 करोड़ रुपए का लाभांश दिया है। आलम है कि यह मुनाफा वर्ष-दर-वर्ष बढ़ता जा रहा है। अक्सर आवाजें उठती हैं कि तेल क्षेत्र में सुधार होना चाहिए, जिसके बरक्स समाधान देने के नाम पर सुंदरराजन, रंगराजन, किरीट पारिख, चतुर्वेदी और विजयकेलकर समितियां गठित हो चुकीं हैं। पर लगता है कि जो कुछ भी सुधार के नाम पर हुआ है वह बस कंपनियों का लाभांश कैसे बढ़ाया जाय न कि अवाम को राहत कैसे मिले?
तेल के इस नए खेल सारा मजमा डीजल को लेकर है, क्योंकि जहां पेट्रोल व्यक्तिगत अर्थव्यवस्था को डगमगाता है, तो डीजल समूची व्यवस्था को। सर्वविदित है कि डीजल परिवहन का प्रमुख साधन है यह चाहे व्यक्तियों का हो अथवा वस्तुओं का। डीजल की हर बढ़ोतरी पर माल भाड़ा बढ़ता है जिसका बोझ उत्पादक वस्तुओं के दाम बढ़ाकर पूरा कर लेता है और घूम फिरकर सारा बोझा उपभोक्ता के सिर पर लद जाता है। इसलिए आने वाले दिनों वस्तुओं के दाम जिस तेजी से बढेंगे कि अवाम देखकर अवाक रह जाएगी। एेसा नहीं कि सरकार या कंपनियां इस सच्चाई से वाकिफ नहीं पर सरकारों का रवैया शुतुरमुर्गी होता जा रहा है। जो भी हो, इतना तो तय है कि तेल के जरिए महंगाई को किश्तों में परोसने का नया फॉर्मूला जनता का तेल निकाल कर ही दम लेगा। पहले ही गैस सिलेंडरों से सब्सिडी हटने की तलवार सर पर लटक रही थी अब डीजल की माह-दर-माह बढ़ोतरी रही सही कसर को पूरा कर देगी। हो न हो यह बात सरकार के संज्ञान में है कि अभी चुनाव में वर्ष से अधिक का समय शेष है और यदि वह समय रहते अधिक राजस्व जुटा लेगी तो अपने कैश ट्रांसफर स्कीम में उतनी ही कारगर रहेगी। साथ ही लोकलुभावन घोषणाएं कर पाने में खुद को सहज पाएगी। लेकिन बस,रेल, खाद्य वस्तुओं सहित चौतरफा महंगाई को आक्रमण हो चुका है। कहना पड़ता है कि यह यूपीए सरकार का द्वितीय संस्करण देश को बहुत महंगा पड़ा। क्या एेसे में अवाम सरकार के झांसे में आकर उसके तृतीय संस्करण को भी देखना चाहेगी!
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Friday, 15 February 2013
हम थे जिनके सहारे..
बड्डे बोले- बड़े भाई खबर है कि अबकी सरकार ने नहीं बल्कि जिस कंपनी ने जनता की 'वाट' लगा दी है, उसका नाम 'सहारा' है। ऐसा नाम जिसको सुनकर ही 'जी' में भरोसा पैदा होता है। यह बड़ा मनोवैज्ञानिक नाम है। किसी भी शख्स की संवेदना हासिल करनी हो या उससे कुछ काम निकालना हो तो, उसकी मदद कर दो, मुसीबत में उसका सहारा बनो। लेकिन जब सहारा देने वाले का मकसद सध जाता है जो वह अपनी 'जात' दिखाने से बाज नहीं आता। यही नियम है, यही चलन है और युगधर्म भी।क्योंकि विकास भावनाओं के व्युतक्रमानुपाती होता है। इसलिए चाहे किसी कंपनी को, व्यक्ति को या सरकार को अथवा नेताओं को हित साधना हो, तो पहले 'तेल लगाओ' फिर 'तेल निकाल' लो का सूत्र रास आता रहा है। बड्डे बोले सुना भाई है कि सहारा कंपनी की शुरूआत मात्र दो हजार रुपए से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुई थी, जिसमें तब दो लोग काम करते थे। और निवेश के गोरख धंधे की गणित सेआज भी 'एक्चुअल' में यह केवल दो लोगों सुब्रत राय सहारा और जयब्रत राय सहारा की कंपनी बन कर रह गयी है। कहने को तो कंपनी रियल एस्टेस से लेकर, मीडिया, वित्त, सूचना प्रौद्योगिकी, निर्माण, खुदरा व्यापार में मौजूद है। यह आईपीएल में पुणो वारियर्स भी प्रायोजक है। साथ ही भारतीय हॉकी टीम और महिला क्रिकेट टीम की भी प्रायोजक सहारा ही है। हालांकि पहले उसके पास एक विमान कंपनी भी होती थी जिसे बाद में बेचना पड़ा। जो सहारा की पोल पट्टी खोलने का एक 'एग्जाम्पल' था। मगर देश के लोग गर मिसालों से सीखे होते तो बार-बार ठगी का शिकार क्यों बनते? अब बड़े भाई देखो विश्वास का भी कुछ आधार होता है। इतना नाम तामझम बनाने के बाद कौन होगा जो ऐसों पर दांव न खेले। लाभ के लिए लालच में बिना श्रम के पका पकाया पा लेने की हसरत किसमें नहीं है और फिर भारत तो दांव लगाने वालों का देश है। यहां चुनाव, मौसम, खेल,संभावनाओं सब पर सट्टा लगता है। लाईफ का रोमांच भी 'सडनली' कुछ मिल जाने में जो 'एनज्वाय' है, वह पसीना बहा के कहां।
फिर चाहे इसका ताल्लुक भौतिक लाभ से हो अथवा आध्यात्मिक। 'सहारा' मीडिया में भी है पर मजाल है कि अपने खिलाफ एक 'रुक्का' भी छापा हो। बड्डे ऐसी ही सोच रखने वालों की गिरफ्त में देश का अधिकतर मीडिया है। बहरहाल सतना सहित देश भर वे जन जिन्होंने सहारा के झांसे में अपनी गाढ़ी या काली कमाई लगा दी और अब खुद को बेसहारा पाकर गम में गा रहे होंगे होंगे कि- 'हम थे जिनके सहारे वे हुए न हमारे..डूबे जब रुपईया हमारे, तब हम थे बे-सहारे..'
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