Sunday, 10 February 2013

मोहब्बत है क्या चीज



हर साल की तरह कल भी यानी ‘वेलेन्टाईन डे’ को हम भारतीय ‘प्रेम दिवस’ के रूप में कहीं खुलेआम, तो कहीं चोरी छुपे मना लेने की तरकीबें तजबीजते पाए जाएंगे। ताकि जिनको इसमें रुचि है, वे यह महसूस कर सकें कि उन्होंने प्रेम को पा लिया। लेकिन यह कैसा भ्रम सा हमारे मन मतिष्क में पैठ गया है, कि प्रेम को भी किसी वस्तु की तरह हासिल किया जा सकता है। इस समूचे आयोजन के दरम्यिां कई सवाल भी उठते हैं कि क्या संत वेलेंटाइन के पहले प्रेम का विनिमय नहीं होता था? क्या प्रेम को भी किसी एक दिवस की सीमा में बांधा जा सकता है? क्या प्रेम संस्थागत है? क्या इसको भी किया या पाया जा सकता है? 
इन सवालों के झुरमुट में सत्य यह है कि प्रेम एक ऐसी अलौकिक अनुभूति है, जिसका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं। इसी सवाल को फिल्म ‘प्रेम रोग’ के गीत में इसके इतिहास को टटोलने की कोशिश हुई थी कि -‘मोहब्बत है क्या चीज हमें भी बताओ, ये किसने शुरू की हमें भी सुनाओ..’ इसलिए प्रेम की उत्पत्ति ऐतिहासिक संदर्भ में नहीं की जा सकती, क्योंकि यह कोई खोज का नहीं, अलबत्ता अनुभूति का विषय है,जो सदा से शाश्वत है। प्रेम ही ऐसा मूल्य है जो हमें, हमारे संबंधों को, घर, परिवार, समाज और यहां तक कि राष्टÑ से राष्टÑ को जोडेÞ रखता है। हमारे देश में प्रेम की इतनी जीवंत गाथाएं इतिहास के पन्नों पर अंकित हैं कि जिन्हें सप्रयास याद रखने की जरूरत नहीं है। अनायास ही ऐसी प्रेम कथाएं हमारे दैनिक जीवन संस्कृति से जुड़ी हैं, जो समूची मानव जाति के लिए प्रेरक रही हैं और रहेंगी। 
अलबत्ता संत वेलेन्टाइन का उत्सर्ग प्रेम के प्रश्रय और उसकी महत्ता के लिए याद किया जाता है। कबीरदास जी कहते हैं कि-  प्रेम न बाड़ी उपजी प्रेम न हाट बिकाय, राजा परजा जेहि रुचे सिर हैं सोई लै जाय!  यह तथ्य है कि ‘प्रेम’ एक मूल्य है, न कि कोई बाजारी वस्तु, जिसको हाथ से स्पर्श किया जा सके या देखा जा सके या मापा जा सके अथवा उसकी चर्चा आसानी से तर्क-वितर्क और ज्ञान के सहारे की जा सकती है।  तो जो स्वरूप में अदृश्य हो, सिर्फ अनुभूत हो, उसको समझना, उसे कहना या बता पाना उतना ही कठिन है। दरअसल प्रेम विशुद्ध दैवीय गुणों से युक्त होता है। क्योंकि जिस हृदय में प्रेम होगा वह क्रोध, लोभ, ईष्या, हिंसा के भावों से सर्वथा स्वतंत्र होगा। मगर हकीकत में ऐसा नहीं दिखता। समाज में लोग प्राय: दोहरे आवरण को ओढ़े अधिकांशत: प्रतिस्पर्धी, ईर्ष्यालु, स्वार्थी, कपटी, क्रोधी  बने रहते हैं। ऐसे में क्या निश्छल प्रेम को पहचाना जा सकता है और क्या उसके हकदार हम बन सकते हैं? इन सवालों के समझा जाना चाहिए कि प्रेम का केन्द्रीय तत्व है ‘समर्पण’ जो इसके लिए अनिवार्य है। जिसे मात्र तर्क रहित संबंधों की व्याख्या से आत्मसात किया जा सकता है।
इस प्रेम के सत्संग में एक और महीन बात स्वीकारते चलें कि - प्रेम करना या होना एक ‘प्रक्रिया’ है, यह ‘लक्ष्य’ कदापि नहीं। जब हम मनुष्यों के बीच प्रेम को पा लेने और फिर उस ओर से लापरवाह हो जाने के रास्ते पर कदम बढ़ाते हैं तो, उसी क्षण से प्रेम का क्षरण होने लगता है और प्रेम अपना सौंदर्य खोने लगता है। खासकर यह नौबत तब उत्पन्न होती है जब प्रेम केवल भौतिक स्वरूप तक जुड़ पाता है, जो कि इसका स्वभाव नहीं। प्रेम रचनात्मक और बौद्धिक व्यायामों से जुड़ा होता है। क्योंकि तभी यह एक प्रक्रिया के रूप में अनवरत प्रवाहमान रहता है।
सवाल बड़ा और बारीक है कि दुनिया कई वर्षों से प्रेम दिवस को जोश-ओ-खरोश से मनाती आ रही है, फिर भी प्रेम का समूचा सूचकांक निरंतर गिरता जा रहा है। संत वेलेन्टाईन तो प्रेम की महत्ता को स्मरण करने का जरिया बस हैं। क्योंकि प्रेम अलौकिक हैं, शाश्वत हैं। प्रेम किसी को भी हो सकता हैं। यह जाति, धर्म, सरहद, संस्कृति को नहीं मानता हैं। यह जल की भांति रंगहीन हैं तो इंद्रधनुष की तरह सतरंगी भी।  फिल्म रिफ्यूजी के गीत बरबरस याद आ जाता है कि -‘पंछी नदिया पवन के झोंके, कोई सरहद न इन्हें रोके..’  प्रेम अलौकिक हैं मगर यह तो इसी लोक में घटित होता हैं। सभी ने अपने-अपने ढंग से प्रेम की व्याख्या की है। प्रेम में लोग निहाल और बेहाल भी हो जाते हैं तो कुछ ऐसे हैं जो रोगी भी होते देखे गए हैं जैसे यह गीत कि - ‘मैं हूं प्रेम रोगी, मेरी दवा तो कराओ, जाओ जाओ जाओ किसी वैद्य को बुलाओ..’  ऐसा प्रेम पर बल पूर्वक अधिकार के अंधकार में जन्मता है। 
दरअसल, यह मौसम ही प्रकृति को प्रेममय बनाता है यह महज संयोग है कि इस बार 14 फरवरी को ‘प्रेम दिवस’ तो 15 को ‘बसंत पंचमी’ है। भारत में बंसत ऋतु देवताओं को प्रिय रही है। कृष्ण ने कहा भी है कि मैं ऋतृओं में बसंत हूं। मगर आज 14 फरवरी का अंदाजा महज इससे लगाया जा सकता है कि इस दिन बाजार में रौनक छा जाती है। लेकिन ‘वेलेन्टाइन डे’ भारतीय काव्यशास्त्र में बताए गए मदनोत्सव का यह पश्चिमी संस्करण बनता जा रहा है। इसलिए कहना पड़ता है कि प्रेम का बाजारीकरण अधिक हुआ बजाए इसके संस्कारीकरण के। शायद यही वजह है कि प्रेम मात्र बाह्य आकर्षण का विषय बनता जा रहा है और अब इसे उपहारों के चश्में से अधिक देखा जा रहा है। मगर हमें इस मंत्र को नहीं भूलना चाहिए कि - ‘मोहब्बत ऐसी धड़कन है जो समझाई नहीं जाती’

श्रीश पांंडेय.

Saturday, 9 February 2013

कण-कण में हैं 'करप्शन देवतागण'




मध्य प्रदेश में पड़ रहे दनादन छापों से 'हैप्पी मूड' में बड्डे बोले- बड़े भाई केंद्र या राज्य से चलने वाले 100 रुपयों में 85 से 95 रुपया कहां चला जाता है, की गणित को अब समझना और पकड़ना पहले की बनिस्पत ज्यादा आसान हुआ है। हमने कहा- अरे बड्डे! करप्शन तो सड़कों पर सरेआम दशकों से बह रहा है, सबको दिख रहा है, जो कर रहे उनको और जो करवा रहे उनको भी, मगर जो इसके शिकार हैं 'ओनली' वे ही चिल्लपों करते रहे हैं। अब हो-हल्ला इसलिए ज्यादा है कि अब करोड़ों के कुबेर पकड़े जा रहे हैं। चाहे बाबू हो या साहब सब की एक ही जात है, एक ही कर्म और एक ही लक्ष्य है। वह है लूट के मार्फत कुबेर टाईप से समाज में इस्टेबलिश हो जाना। कुबेर भी ईश्वरीय सत्ता के अंश हैं। परन्तु अब करप्शन और अधिक व्यापक हो, कण-कण में अपनी मौजूदगी दर्ज करा, सर्वव्यापी ईश्वर को चुनौती दे रहा है। सो, बड्डे जो ज्यादा व्यपाक है, सर्वत्र व्याप्त है,वही आज का देवता है। याद करो वर्षो पहले दिलीप सिंह का कॅरिअर करप्शन के केश में कलंकित हो जाने के बाद कहे सद्वाक्य को कि- 'पैसा खुदा तो नहीं, पर खुदा की कसम खुदा से कम भी नहीं।' तब तो लाखों का मसला था और अब यही खुदा करोड़ों के देवता करप्शन के आसन पर विराजमान है। बड्डे अपने सीएम भी कहते फिरते हैं कि 'मध्यप्रदेश मेरा मंदिर है, जनता उस मंदिर की देवता और वे खुद उसके पुजारी हैं।' बड्डे बोले देखो अपने सीएम कितने 'इनोसेंट' हैं, कितना समर्पण है उनमें प्रदेश की जनता के लिए। हमने कहा- तुम बोका हो और प्रदेश की जनता भोली है। क्योंकि वह 'नेताओं की भावुक बातों में फंस जाती है, उनकी बातों के गूढ़ अर्थ नहीं बांच पाती।' 'नाऊ यू शुड थिंक एण्ड टेल मी बड्डे, कि- मंदिर में चढ़ा प्रसाद कौन खाता है.! बड्डे बोले- पुजारी। तो बात बड़ी 'क्लियर' है जनता भगवान बने प्रसाद मात्र ताक रही है, मगर उसका सेवन तो पुजारी किए जा रहा है।
बड्डे बोले- बड़े भाई आप पत्रकार लोग बड़े बारीक- बारीक भेद निकालते हो, बात में छिपी उनकी जन भावना को नहीं समझते। अब यकीन न हो तो उनके गणों को देख लो, जितने पकड़े जा रहे हैं सब के सब करोड़ों के देवता हैं। जनता इनको कुछ यूं पुकारती है कि बीके सिंह 65 करोड़ी, डॉ. विनोद लहरी 60 करोड़ी, अरविंद टीनू जोशी 43 करोड़ी, अजरुनदास लालवानी 40 करोड़ी, एसके पालाश 40 करोड़ी, एनकेव्यास 35 करोड़ी, उमेश गांधी 30 करोड़ी, रमेश द्विवेदी 25 करोड़ी, हुकुमचंद पाटीदार 20 करोड़ी,एएन मित्तल 20 करोड़ी, कैलाश सांगरे 10 करोड़ी।
आखिरकार बड्डे की खमोशी टूटी और बोले किअब तो वाकई कण-कण में करप्शन देवतागण मौजूद हैं।

सरकारी स्कूलों का सच



शिक्षा किसी भी सामाजिक व्यवस्था का मुख्य आधार है। इसलिए वही देश दुनिया में आगे हैं, जिन्होंने अपनी शिक्षा- व्यवस्था का वर्तमान जरूरतों के मुताबिक मजबूत ढांचा खड़ा कर रखा है। शिक्षा को गुणवत्तायुक्त व रोजगारपरक होने के साथ राष्ट्रवाद की भावना से ओतप्रोत होना चाहिए। लेकिन देश सहित मध्य प्रदेश में शिक्षा महकमा का क्वांटिटी में विस्तारित होता रहा, मगर क्वालिटी में फिसड्डी रह गया है। क्योंकि भीषण महंगाई में मजूदरी से भी कम वेतन पर कार्यरत शिक्षकों से गुणवत्ता युक्त शिक्षा की उम्मीद बेमानी है। फिर भी सरकार गर मानती है कि उसके स्कूलों की व्यवस्था दुरुस्त है, चौकस है, तो इस बात का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है कि सरकार सच्चाई से कितने परे जा चुकी है।आये दिन अखबारों में छपता हैं कि इतने प्राइमरी पाठशाला या माध्यमिक विद्यालय खोले गए हैं अथवा इतनों का उन्नयन करके उन्हें हाई स्कूल या हायर सेकेंड्री में तब्दील कर दिया गया है। लेकिन इसका खुलासा कभी नहीं किया जाता कि सरकार किन कामलाऊ तरीकों से प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था को घसीट रही है।
गौरतलब है शिक्षकों की अंतिम नियमित नियुक्ति 1993 में हुई थी। उसके बाद दिग्विजय शासन काल में शिक्षकों की शिक्षाकर्मी के रूप में भर्ती का काला अध्याय शुरू हुआ, जिसमें योग्यता अंकसूची में हासिल नंम्बरों को आधार मानकर भर्तियां की गई थीं। लेकिन तब नकल जुगाड़ से हासिल किये गये नम्बरों की बिना पर कुछ ऐसे शिक्षकों की भर्ती हो गई थी जो अपेक्षाकृत काबिल नहीं थे। भाजपा शासनकाल में भर्ती प्रकिया को एक प्रतियोगी परीक्षा के जरिए आयोजित किया गया ताकि संविदा पर ही सही मगर योग्य शिक्षकों की भर्ती की जा सके। मगर अब लगता है कि सरकार और कम वेतन में 'अतिथि शिक्षकों' के जरिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण महकमें को हांकना चाहती है। सड़कों, नहरों और खनन में लूट और खराब गुणवत्तापूर्ण कार्यो में, सरकार पानी की तरह धन बहा रही है, पर जिस विधा से देश का भविष्य बनता-बिगड़ता है, उसकी घोर उपेक्षा करने पर आमदा है। शुतुरमुर्ग की तरह आंखें मूंदे सरकार इस मुगालते में है कि चंद रुपए वेतन वृद्धि कर उसने अपने दायित्वों की इति कर दी है।
ध्यान देने की बात है कि प्रदेश में शिक्षा विभाग शिक्षा प्रदाय के साथ-साथ रोजगार देने वाला सबसे बड़ा विभाग है। कुछ अरसे पहले प्रदेश सरकार ने संविदा शाला शिक्षकों की वर्ग-एक, दो और तीन में भर्ती के निमित्त वर्ष 2011- 12 में प्रतियोगी परीक्षा का आयोजन किया था जिसमें लगभग 15 लाख परीक्षार्थियों में भाग लिया। इस परीक्षा के लिए शुल्क के रूप में प्रति प्रतियोगी वर्ग-एक, दो, तीन के लिए क्रमश: 500, 400, 300 रुपए परीक्षा शुल्क यानी करोड़ों वसूला गया। अब जबकि परीक्षा परिणाम को आये पूरा सत्र बीतने को है, लेकिन सरकार की चुप्पी और 'अतिथि शिक्षकों' के जरिए कम वेतन पर काम चलाऊ तरीके स्कूलों का संचालन, उसकी नीयत पर सवाल खड़े करती है। एक ओर प्रशिक्षत शिक्षकों की नियुक्ति की नीति को अनिवार्य शर्त माना गया है, वहीं अतिथि शिक्षक जिनमें अधिकांश अप्रशिक्षित हैं, के दम पर पूरा सत्र व्यतीत कर दिया गया है। जबकि शिक्षा का अधिकार कानून 1 अप्रैल 2010 से लागू हो चुका है, जिसके तहत प्रावधान है कि 31 मार्च 2013 तक प्रदेश के विद्यालयों में प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति होनी चाहिए। जिसके बरअक्स सुप्रीम कोर्ट भी स्पष्ट निर्देश जारी कर चुका है। यहां तक कि पड़ोसी राज्य उत्तरप्रदेश में शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। ऐसा समझ आता है कि मध्यप्रदेश सरकार को न तो उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का ख्याल है, न बेरोजगारों की तकलीफों और न ही बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता का। शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थियों की उपेक्षा न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि चिंता का सबब भी।
मुम्बई प्रवास के दौरान मैंने होटल में लिखा एक वाक्य पढ़ा था कि 'होटल का मालिक भी खाना यहीं खाता है' यानी ग्राहक यहां खाने की गुणवत्ता के प्रति निश्चिंत होकर भोजन कर सकता है। मगर सरकारी स्कूलों का सबसे बड़ा सच यह है कि यहां न तो किसी कर्मचारी-अधिकारी के बच्चे, न ही इन स्कूलों की नीति निर्माण करने वाले ब्यूरोक्रेटस, नेता, विधायकों के बच्चे और यहां तक कि स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों के बच्चे भी नहीं पढ़ते हैं। क्या अपने बच्चों को यहां पढ़ाने का दावा शिक्षक, कर्मचारी-अधिकारी और विधायिका के लोग कर सकते हैं? यह तय मानिये जिस दिन इनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने लगेंगे, स्कूलों और शिक्षकों का भविष्य स्वमेव दुरुस्त हो जाएगा। क्या मुख्यमंत्री यह भरोसा प्रदेश की आम जनता को दिला पाएंगे? या नेता प्रतिपक्ष सत्ता में आने की स्थिति में यह कदम उठायेगी। अथवा सरकारी स्कूल सिर्फ कागज पर गणना और साक्षरता के आंकड़े दर्शाने के उपकरण बने रहेंगे।
 सम्पर्क- 09424733818.

Sunday, 27 January 2013

आस्था के मौन स्नान


कुंभ नहान की परिपाटी कब से शुरू हुई इसका कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है। बस जो भी ज्ञात है, सो वह मान्यता और पौराणिक कथाओं के मुताबिक। इसी लीक को पीटते हुए लोगों का हुजूम रातोदिन प्रयाग में पुण्य पाने की गफलत में डूब-उतरा रहा है। लेकिन अब तक पुण्य लेने या पाने की गणितीय गणना की पद्धति नहीं खोजी जा सकी है। न ही इसका कोई उपलब्ध विज्ञान है। इसकी दलील यह है कि आध्यात्मिक लाभ नियम से नहीं संयोग से मिलते हैं, भले सारी सृष्टि निश्चित नियमों से गतिमान हो। अलबत्ता यहां (प्रयाग)आकर आपका सारा ज्ञान व तर्क बिलबिला सा जाता है, यदि आप तर्क का सहारा लेकर मेला को देखेंगे, सुनेंगे, समझेंगे तो ठीक वरना यह तय है कि शीघ्र ही आपके ही तर्क, आपको चिढ़ाते नजर आयेंगे। क्योंकि भीड़! कैसी भी हो, बड़ी से बड़ी तार्किक मान्यताओं को ध्वस्त करके अपने बेढ़ंगेपन को स्थापित व प्रमाणित कर देती है। इसके लिए कुंभ से बड़ी नजीर और क्या हो सकता है।
कुंभ यानी मटका या घड़ा जिसका मुंह तो खुला होता पर अन्य रास्तों से किंचित हवा भी प्रवेश नहीं कर सकती। सो यहां आने और जाने का एक ही रास्ता है, जैसे घड़े में पानी डालने और निकालने का एक ही मुख होता है। वैसे ही यहां इसी मुंह से प्रवेश करिए और उसी से प्रस्थान। यानी यहां भ्रमण की पहली और अनिवार्य शर्त है ‘श्रृद्धायुक्त भ्रमण’। विवेक का इस्तेमाल अपने घर द्वार में जाकर करना। क्योंकि यहां अच्छे-अच्छों का विवेक काम नहीं करता। इसलिए इस कुंभ(घड़े) के भीतर यदि कोई नाटकीय ढ़ंग से, कोई अजूबा कर रहा हो अथवा अचम्भित करने वाले कर्त्तव्य दिखा रहा हो तो, उसी रंग-ढंग में रंगिए, मजा लीजिए और आगे बढ़ते जाइए पर श्रृद्धा और (अंध)विश्वास का साथ घड़े के मुख से बाहर निकलने तक कतई न छोड़िए। मुनासिब यही है कि मेला क्षेत्र में कबीर की तरह तार्किक होने की बजाए मीरा की तरह भक्तिवान बने रहिए। क्योंकि कबीर तर्क देते हैं- ‘पाथर पूजे हरि मिलें तो मैं पूजूं पहार। या से तो चक्की भली पीस खाए संसार।।’  पत्थर में चक्की और ईश्वर के भिन्न रूप की कल्पना करिए। पत्थर जो चक्की में जुता है वह कदापि ईश्वर नहीं हो सकता, पर मंदिर में है तो समूची आस्था का केंद्र बन जाता है। कबीर जीवन भर एकतारे पर गाते रहे कि हर कार्य की सिद्धता इस संसार में मेहनत और श्रम पर आधारित है। वासुदेव कृष्ण ने भी कर्म करने की सीख आजीवन दी और यही गीता में लिपिबद्ध करा गए। लेकिन कुंभ के बरक्स समाजशास्त्री कहते हैं कि ‘भीड़ के न आंखें होती हैं न कान’ और दोनों के आभाव में ‘तर्क या बुद्धि’ स्वमेव विलोपित हो जाती है। ऐसे में चेतन मस्तिष्क में एक सवाल खलबली मचाता है कि कुंभ में एक डुबकी लगा लेने मात्र से कितने लोगों का जीवन, पुण्य और सुख से लबरेज हो गया होगा?
 यदि हम बारीकी से दुनिया की गति और दिशा धारा को देखें तो यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि यह आयोजन वर्तमान आवश्यकताओं के प्रतिकूल यह मेला कई हजार करोड़ रुपए की आहूति व्यवस्था के नाम पर ले लेता है। जैसे इस बार केवल व्यवस्था के नाम पर बारह हजार करोड़ रुपए खर्च किए गये हैं। लोग यहां आने-जाने में जो खर्च करेंगे उसका अनुमान लगा लें तो  यह बजट पच्चीस हजार करोड़ के करीब बैठता है। जिसका ध्येय मात्र लोगों को पुण्य का प्रसाद दिलाना है। गम्भीरता से विचार करें कि यदि यही रुपया जो हर चार वर्ष में क्रमश: चार महाकुंभों - प्रयाग, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन में स्वाहा हो जाता है, गर उसका इस्तेमाल अत्यंत कमजोर तबकों पर श्रृद्धा और सच्चे भाव से किया जाए तो.. भले ज्ञात न हो, पर दिल-आत्मा गवाही देती है कि कुंभ का असल पुण्य जरूर सहयोगियों को मिल सकता है। मगर अज्ञात कल्पनीय अभौतिक लाभ के लिए , इस वैज्ञानिक युग में श्रृद्धा के नाम पर आंखों में पट्टी बांधे रहना दर्शाता है कि देश की जनता जर्नादन दो और दो चार की गणित जानने के बाद भी, दो और दो पांच होने मुगालते में जीना ज्यादा सुखद मानती है। इसी फेर में ऐसे आभाषी सुखों और पुण्यों के न जाने कितने कल्पना लोक हमने आदि समय से आज तक गढ़ और सहेज रखें हैं।
इसका चिंतन ‘प्रयाग कुंभ’ यानी मटके से बाहर निकलने के बाद जरूर किया जाना चाहिए। हमारे घरों में कथा, पूजन, हवन भी प्राय: होते रहते हैं, जिसमें एक कलश में जल रखकर, मंत्राहुति के जरिए उसमें विद्यमान जल को अमृततुल्य मानकर उसके  छिड़काव में भी पुण्य लाभ जैसी धारणा है। एक कुंभ हम सबके भीतर है। वह है विवेक का कुंभ, जागृति का, चेतना का,नैतिक आचरणों का... जिसमें हम चाहें तो सतत डुबकी लगा सकते हैं। पर अब उत्सव अंदर नहीं बाहर है, अपने लिए नहीं दूसरों के लिए है। शायद यही वजह है कि भेड़ की तरह गंगा में डुबकी को कुंभ का असल पुण्य मानते चले आ रहे हैं।
एक और सवाल सभी को कुरेदता होगा कि जब बाबा बैरागियों ने संन्यास ले लिया है और वे संसार के राग-विराग से विरक्त हो चुके हैं तो, फिर उनमें यह अखाड़ों का अहम कहां से आयात होता है अथवा क्या वैराग्य का वीरानापन ही उन्हें संसार की ओर पुन: धकेलता है? और क्या कुंभ इसके प्रर्दशन का एक बड़ा मौका है?
तो जाइए,नहाईए कुंभ में मगर अपने-अपने विवेक के साथ कि   कितना जीवन अमृत ‘संगम’ से ले के आये और कितना विष दे केआये। बौद्धिक मनीषियों को चाहे वे धार्मिक प्रवचन की दुकानों से जुड़े हों अथवा सामाजिक रूप से, सभी को यह भी बताना होगा कि क्या आज भी ऐसे आयोजन का औचित्य, वैसा ही जैसा कभी हुआ करता था,जब नगरीय सभ्यता नहीं थी, आवागमन के साधन सीमित थे। या वे भी इस अस्था की भीड़ का रस लेने में ही अपनी बौद्धिकता की सफलता देखते हैं।                                                      

         श्रीश पांडेय

Tuesday, 22 January 2013

वो बेदर्दी से सर काटे हैं और हम.


कल के अखबारों में गृहमंत्री शिंदे और दिग्विजय सिंह के छपे कथित बयानों के बरक्स 'अमीर मिनाई' की गजल, जिसे जगजीत सिंह ने सुर दिया था; शहीदों के लिए रोशन हो आई कि "वो बेदर्दी से सर काटे हैं अमीर और हम कहे हैं कि हुजूर आहिस्ता- आहिस्ता, जनाब आहिस्ता-आहिस्ता"। सैनिकों का सर कलम होने के बाद भी सरकार, पाकिस्तान से शांति-अमन के जाप की शास्त्रीय शैली में पहले "जनाब" की धमकी, फिर "हुजूर" की मुद्रा अख्तियार किए हैं। आईएसआई द्वारा सी€धे तौर पर चलाए गए खूनी आतंकवादी हमलेआज भी जारी हैं। हमने तो संसद पर हमले और मुम्बई पर 26/11 के हमले के बावजूद न तो पाकिस्तान से राजनयिक संबंध न छोड़े और न ही उसको सबक सिखाने की भाषा बोली। शांति के पाखंड में हमारी सत्ता इतनी गिरी कि संसद पर हुए हमले के शहीदों के परिवारजनों ने गुस्से में वीरता के अलंकरण लौटा दिए तो भी हम चुप रहे और हमने अमन की राह पर चलने के लिए संसद पर हमले के गुनाहगार देश द्रोहियों को छुड़ाने की मुहिम चलाई और जिसे उच्चतम न्यायालय ने फांसी की सजा दी, उसे भी बचाने का बंदोबस्त करने लगे। इस दौरान कारगिल भी हुआ, बस लेकर हम लाहौर भी गये और कारगिल के कसाई को लाल कालीन बिछाकर आगरा में न्यौता भी। इन सबका नतीजा यह मिला है कि पाकिस्तान हमारे फौजियों के सर काट ले जा रहा है।
ऐसे संवेदनशील हालातों के बावजूद दुनिया में आतंक का खौफ फैलाने वाले ओसामा को "ओसामा जी" और अब देश के सैनिकों के सर काटने की साजिश में शामिल हाफिज सईद को "साहब" का सम्मानीय सम्बोधन, न केवल उन सभी शहीदों का अपमान है, जो राष्ट्र सुरक्षा के लिए प्राणाहुति देते आ रहे हैं, बल्कि हर सच्चे भारतीय के लिए शर्मिदगी की बात है कि कैसे हैं, उनके लोकतंत्र के रहनुमा।
यह भी लज्जा की बात है कि देश के गृहमंत्री ने स्वीकारा है कि "लाइन ऑफ कंट्रोल" पर हाफिज सईद जैसे आंतकी के आने और उकसाने के बाद दो भारतीय सैनिकों की बर्बर हत्या हुई है। लेकिन मंत्री जी को सीमा पार के नहीं, उल्टे देश के किसी दल या संगठन में ही आतंकियों की संभावनाएं दिख रही हैं।
सम्भवत: देश के इतिहास में यह पहला मौका होगा जबकि किसी आतंकी ने देश के गृहमंत्री के सुर में सुर मिलाया हो और हिमाकत की हो कि भारत को आतंकी राष्ट्र घोषित किया जाए। कम से कम राष्ट्रीय मुद्दे पर तो राजनीतिक एकता दिखनी चाहिए थी। पर यह दुर्भाग्यपूर्ण है। दरअसल, ध्यान भटकाने वाले कथित बयान एक सोची समङी सियासत का हिस्सा है। मिशन लोकसभा 2014 के आम चुनाव के निमित्त जयपुर की चिंतन बैठक में क्या-क्या चिंतन हुए इसका खुलासा एक-एक करके सामने आने लगा है। चिंतन का समापन पहले से तय मानी जा रही राहुल की ताजपोशी के साथ हुआ। उनकी टीम के स्तंभकारों को जिन दायित्वों को सौंपा गया है उसका आगाज ताबड़तोड़ पहले गृहमंत्री शिंदे ने और फिर आंतकियों को सम्मान से देखने वाले दिग्विजय सिंह ने कर दिया है। सोनिया गांधी ने राहुल से रोते हुआ कहा था कि सियासत जहर के समान है। मगर अब जान पड़ता है कि यही जहर वह अपने सिपहसालारों से उगलवाने जा रही हैं।
दरअसल, राजनीति का चाल, चरित्र व चेहरा कितना विकृत और विचित्र हो चुका है इसका अनुभव उन्हें जरूर होगा, जिन्होंने कांग्रेस पार्टी को सर्वहारावर्ग की राजनीति करते देखा सुना था। मगर मात्र दो दशकों में यह नौबत क्यों आ गई, इस पर चिंतन के बजाय वह सत्ता पर लगाम रखने के कठोर व निरंकुश उपायों के अमल पर उतारू है। हो न हो, इसी चलते उसकी यह दशा हुई है कि वह अपने ही घर माने जाने वाले उत्तरप्रदेश, बिहार जैसे दो बड़े राज्यों से बेदखल हो चुकी है। जयपुर चिंतन के बाद यह बात सुनिश्चित जान पड़ती है कि कांग्रेस वोट कबाड़ने की कवायद में किसी हद तक जाने को तैयार है। मुसलमान वोटों पर काला जादू चलाने जिम्मा निश्चित तौर पर दिग्गी को सौंपा गया है। दिग्विजय उप्र के प्रभारी रहे हैं और उन्हें पता है कि वहां 4 करोड़ से अधिक निर्णायक मुसलिम मतदाता हैं, जिन पर मुलायम का कब्जा है। सामान्य पूर्वाग्रह है कि मुसलमान भाजपा को वोट नहीं करते, जिसको पुख्ता करने के लिए दिग्विजय और गृहमंत्री के बयान पर्याप्त हैं। दरअसल कांग्रेस, सपा के वोट में सेंध लगाने के लिए शुरू से मुसलिम आरक्षण जैसे कथित मुद्दों पर जोरआजमाईश करती रही है। और अब वह हिन्दू आतंकवाद का शिगूफा छोड़कर, एक तीर से महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे कई निशाने साधने जा रही है। क्योंकि उनके मंत्री बेनीप्रसाद पहले ही कह चुके हैं कि जनता पिछली खामियों को भूल जाती है और यही बात चिंतन बैठक में कही गई कि जो हुआ सो हुआ अब हमें आगे की ओर देखना है।

Thursday, 17 January 2013

फिर चेतावनी है तुम्हें प्रिय पाकिस्तान


एक बार फिर देर सबेर देश के कथित नेताओं व सजग सेना के मुखियाओं ने मूंछे ऐंठी, ताल ठोंकी और खांस- खखार कर गुर्रराये हैं या मान लो ऐसा कहलवाया गया कि 'चेतावनी! चेतावनी!
और चेतावनी..है! तुम्हें प्रिय पाकिस्तान, वरना तीस मिनिट में तुम्हें कर देंगे मैदान!' प्रिय इसलिए कि वह हमारी ही संतान है, हमारे रक्त से जुड़ा है, हमारा ही भाग रहा है, उसके कुछ बीज यहां भी हैं। रक्त, रक्त को खींचता है। इसीलिए दोनों एक दूसरे के रक्त के प्यासे हैं। बड्डे बोले- बड़े भाई ये सिलसिला कब थमेगा, हमने कहा कभी नहीं.!
बड्डे बोले क्यों? हमने कहा- न तो दूसरी दुर्गा (इंदिरा)पैदा होनी है और न ही देश की सत्ता के रक्त में उबाल आना है। बड्डे बोले- पहले भी तो हमने निपटाया है पाकिस्तान को। ओह!! बड्डे भूल जाओ 1965, 1971 का युद्ध, क्योंकि तब तो हम भूख, अकाल और गरीबी से ग्रस्त थे, पस्त थे। हम नंगे थे।
सो नंगा नहाए क्या, निचोड़े क्या? इसलिए युद्ध तब जायज था। भूख से मरने से बेहतर था कि युद्ध में मर कर शहीद होने का तमगा मिल जाए। उधर देश का बोझ कम होगा और इधर सरकार का काम भी कुछ हल्का होता। लेकिन तब की बात और थी, आज की और है। बड्डे बोले कैसे? अरे तुम ठहरे पूरे बोका के बोका, तभी देश में ऐसे नेताओं की चांदी कट रही है।
'यू नो ऑल लीडर्स एण्ड ऑफीसर्स आर टू रिच', इसलिए युद्ध होने से उन्हें जान और माल दोनों की चिंता है। माल भले स्विस बैंकों में 'सेफ' है, पर धन तभी 'मीनिंगफुल' है जब तक इनके अनाम, बेनाम खातेदार जिंदा हैं।
लूट की कमाई, पीढ़ियों के लिए संचित विरासत है। इसका भोग कौन करेगा? इसकी टेंशन ऐसों ज्यादा है। आम जनता का क्या वह तो वैसे भी महंगाई की मार से मरने की कगार पर है।
इसीलिए युद्ध-युद्ध का राष्ट्रगान गा रही है। अब देश की आजादी के संघर्ष को ही ले लो, जो जोश में, देश के सम्मान में मात्र इसलिए मर मिटे कि वतन महफूज रहे, सम्मान बना रहे। जिन्होंने देश भक्ति के गीतों को लपेटा, ओढ़ा, बिछाया और शहादत दी, लेकिन उनकी शहादत और सुरक्षा का एंज्वाय कौन कर रहा है? शहीदों की 'फैमिली' तो भूखे रहकर बेहाल है कि सरकार के नुमाईंदें उनकी सुने। लेकिन ऐसी विचारधारा मानती है कि सेना होती ही मरने कटने के लिए। बड्डे गुस्से में बोले- बंधु यह सैनिक का नहीं, देश का सिर कटा है। सुषमा ने गरम लोहे पर हथौड़ा मारा कि एक बदले दस सिर लाओ। देश का भौगोलिक सिर पहले ही कलम हो चुका है, जिसे हम पाक अधिकृत कश्मीर कहते हैं। चीन ने हमारी उत्तर-पूर्व की बांह काट ली है और हम अहिंसा का जाप कर रहे हैं, क्योंकि हम 'नेचुरल कूल' हैं। सो 'मैटर' सर कटने का नहीं, उसे वापस लाने का है, सम्मान का है और समझने का भी है कि अब और नहीं..चेतो प्रिय पाकिस्तान, बात समझो क्योंकि हम युद्ध नहीं चाहते।

Saturday, 5 January 2013

बड़े नहीं, बड़े वाले लोकतंत्र हैं हम



बड्डे ने कड़कती सर्दी में करारा सवाल दागा कि हम सबसे बड़े लोकतंत्र हैं या बड़े वाले लोकतंत्र? हमने कहा दोनों हैं। वे बोले कैसे? बड़े तो वोटरों की संख्या से है और बड़े वाले अपने लिबरल होने के तरीके से। वो भी इस कदर हैं कि इस मुद्दे पर रामायण और महाभारत से भी बड़े ग्रन्थ लिखे जा सकें, फिर भी हमारी लिबर्टी की गाथाएं कलमबद्ध होना सम्भव नहीं। अपने देश की डेमोक्रेसी ही ऐसी है कि चाहे जो- कानून, नेता या जनता की ऐसी-तैसी करता रहे, पर हम शांति और सहनशीलता की दुहाई में सीना फुलाए नहीं अघाते। कुछ रोज पहले कसाब को बड़ी मश्क्कत व जिल्लत ङोलने और करोड़ों की कबाब, बिरयानी की जिबाने के बाद उसे लटका पाए, वो भी चोरी छिपे। 'क्लियर कट' देश के दुश्मन को टांगने में इतनी लिबरर्टी इंडिया में ही सम्भव है।
इसीलिए अफजल अभी तक एक दशक से 'लिबर्टी' को 'इंज्वाय' रहा है। वो तो देश की नासपिटी जनता है जो बीच-बीच में आवाज उठा देती है कि, टांगों इन कमबख्तों को, वरना अब तक वह आरोपों से भी रिहा हो गया होता। आखिर दुनिया के सबसे हम बड़े वाले लिबरल लोकतंत्र जो हैं।
आतंकवाद का लोकतांत्रिक चेहरा है 'अलगाववाद' और उसके नेता गिलानी देश के दिल, दिल्ली में आकर, अलग राष्ट्र, अलग करेंसी की डिमांड करके व चैलेंज देकर चला जाता है। सरकार, लोकतंत्र (वोटतंत्र) के नाम पर सब सुन लेती है। सहनशीलता और आजादी की बेमिशाल नजीर है यह देश। और अब तो हिट हो गई बड्डे क्योंकि,आंध्र के एक विधायक अकबरुद्दीन ओबैसी जिसने खुल्लम खुल्ला ताल ठोंकी है कि भारत सरकार में दम है तो पंद्रह मिनट के लिए पुलिस हटा ले तो हम 25 करोड़, 100 करोड़ भारतीयों का क्या हाल करते हैं। ऐसे कथित एमएलए हमारी व्यवस्थापिका के अंग हैं जो कालिदास के आचरण की भांति व्यवस्था में बैठे व्यवस्था को चैलेंज कर रहे हैं। इनके लिए हमारी सरकारें लिबर्टी के नाम पर शुतुरमुर्ग टाइप आंखें मूदें खामोश है! आखिर क्यों? दामिनी की चिता तो तुरत-फुरत जला दी, वो भी माता-पिता की मर्जी के खिलाफ, लेकिन इनके गलीज बयानों का भी असर नहीं होता सरकारों पर!
लिबर्टी की हद तो यह है कि भारत में मुम्बई के नाला सोपारा में लक्ष्मीनगर का नाम बदलकर 'छोटा पाकिस्तान' और 'लादेन नगर' जैसी बस्तियां भी अस्तित्व में हैं। हाईट तो यह है कि इन इलाकों के बिजली बिल भी इसी नाम आते हैं। देश व सरकार की नाक खुले आम कट रही और वह बेखबर है, लिबरल है। बड्डे यह सब इसलिए पॉसिबल है कि हम दुनिया के सबसे 'बड़े' नहीं, बल्कि 'बड़े वाले लिबरल लोकतंत्र' है।