Sunday, 5 July 2015

तहजीब बदन की






सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक निर्णय में महिलाओं की सुरक्षा और उनके प्रति हो रहे अपराध के विरुद्ध सर्वथा नया निर्णय सुनाया है कि- 'यदि कोई महिला जिसके साथ किसी भी तरह का दुष्कर्म किया जाता है, तो उसका निदान समझौते के आइने में नहीं देखा जाना चाहिए, न ही इसे उस महिला को दी जाने वाली प्रतिपूर्ति माना जा सकता है।’ इसके पीछे कोर्ट की दलील है कि मानसिक आघातों से उसका जीवन घुटन भरा हो जाता है और आजीवन वह इससे मुक्त नहीं हो पाती। निश्चित तौर पर किसी स्त्री का शील ही उसका सर्वोत्तम आभूषण है, उसकी मार्यादा की पराकाष्ठा है और इसको भंग करने के किसी भी प्रयास को कानून से कुचलने के कड़े प्रयास होने चाहिए। लेकिन बड़ा महीन सवाल है कि गर स्त्री का शरीर मंदिर है तो क्या पुरुष का शरीर कसाई घर है। पुरुष की देह देवालय क्यों नहीं हो सकती? माननीय न्यायधीश भी भौतिक जगत के कार्यकलापों को कानून की नजर में सही गलत ठहराने के हिसाब से ईश्वर कहे जाते हैं और वे न्याय के जिस भवन में विराजते हैं उन्हें न्याय का मंदिर कहा जाता है। लेकिन कितनी बार ये न्याय के मंदिर में बैठे हुए देवता अपमानित हुए और कठघरे में खड़े हुए कहने की जरूरत नहीं।
अपराध मनुष्य ही करता है, पशु नहीं। मनुष्य की संज्ञा में दोनों स्त्री-पुरुष समाहित हैं। इसीलिए जब कोई स्त्री किसी तरह का अपराध करती है तो क्या उसे में मंदिर में घटा हुआ अपराध माना जाएगा? तब हमें एक और विभाजन करना होगा कि जिस स्त्री का अपराध प्रमाणित हुआ उसका शरीर मंदिर की संज्ञा से बेदखल किया जाता है। दरअसल, जब हम कहते हैं कि आत्मा 'परमात्मा’ का अंश है और परमात्मा मंदिरों में विराजते हैं तो स्वयंमेव 'आत्मा’ भी उन मंदिरों की सांकेतिक प्रतिकृति बन जाते हैं। इस लिहाज शरीर चाहे किसी का हो वह होता मूलत: मंदिर ही है।
इसलिए जब तक जीवन के रसायन को उनके स्वाभाविक स्वरूप में समझा और व्यवहार में नहीं लाया जाएगा तब तक कानून कितने बन जाएं, निर्णय और व्याख्याएं कितनी क्यों न कर दी जाएं, मगर समाधान की बजाय उलझाव ही देखने को मिलेंगे और मिल रहे हैं। मानवीय रिश्तों को, उसकी भावनाओं, आवेगों, संवेगों का समाधान कानून में अलगाव और दंड के रूप में हो सकता है। जेल या फांसी अपराधी को समाज से मुक्त कर सकती है, लेकिन क्या गांरटी है कि फिर कोई नया अपराधी तैयार नहीं होगा? दुनिया भर की अदालतों में महिला विरुद्ध अपराधों को रोकने कानूनों का आम्बार लगा है, मगर समस्याएं और अपराध इन कानूनों का बौना साबित कर देते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि फिर क्या किया जाए ताकि स्त्री-पुरुष दोनों को ऐसे कंलकों से मुक्ति मिल सके।
मनुष्य के मन-मस्तिष्क के इस विज्ञान को समझने और इस पर अनुसंधान करने की जरूरत है कि इनको किसी बाहरी ताकत से अवरुद्ध नहीं किया जा सकता। ये मात्र स्वनियंत्रित हो सकते हैं। क्या दिमाग या मन में कोई ऐसा स्विच या बटन सम्भव है जिसे ऑन या ऑफ करने से वह विश्ोष मोड में आकर कार्य करने लगे, नहीं। मनुष्य के संवेग अच्छे या बुरे एक ही मस्तिष्क से संचालित हैं। यानि सत्कर्म और दुष्कर्म एक व्यक्ति की दो वैचारिक अवस्थाएं हैं। डाकू अंगुलिमाल से संत बाल्मीकी बनने की प्रक्रिया इसी परिवर्तन का श्रेष्ठ उदाहरण है। इसके लिए किसी कानून नहीं बल्कि उनकी पत्नी के वचनों ने ही उनमें व्यापक परिवर्तन ला दिया था।
व्यक्ति में आचरण का अवतरण परिवारिक वातावरण पर बहुत हद तक निर्भर है। मनुष्य एकाकी जीवन के लिए है नहीं, उसकी समाजिक जरूरतें हैं और उसी को प्रवाह में बनाए रखने के लिए वह है। इसी प्रवाह में जब-जब समाजिक संरचना टूटती है, उसकी पकड़ ढीली पड़ती है अपराधों का जन्म होता है। इसलिए कानून की भूमिका भयात्मक हो सकती है मगर नियंत्रक नहीं, क्योंकि शरीर की इंद्रियां कानून से नहीं उसके वैचारिक मनोदशा से संचालित होती हैं। फिर कानून मनुष्य ने बनाए हैं, कानून ने मनुष्यों को नहीं।
 शरीर का मंदिर इंद्रियों के स्तम्भों पर खड़ा है। जब तक इंद्रियां संयमित रहती हैं, मंदिर की मजबूती और मर्यादा बरकरार रहती है। इन्हें नियंत्रित करने के लिए जानवरों से जुदा विवेक हमें मिला है। फिर वह मनुष्य ही क्या जो इंद्रियों के वशीभूत शरीर में रचे बसे देवत्व की नींव हिला बैठे। यह तो कालिदास जैसी उस मूर्खता की द्योतक है जो जिस डाल पर बैठे उसी को काटने में जुट जाएं। अलबत्ता, भले यह कहावत है पर जर, जमीन, जोरू को लेकर विवाद सदियों से हैं और बने रहेंगे। इन पर अधिकार की वृत्ति मनुष्य की संरचना में है। चाहे रामायण हो या महाभारत इन्हीं तीनों को लेकर घटित हुए और आज भी इन्हीं पर अनैतिक अधिकार के बरक्स घट रहे हैं। विवाह संस्था में प्रवेश के बाद इन तीनों पर अधिकार का वार शुरु होता है, लेकिन स्त्री को लेकर अंतहीन हवस, किसी समझ से परे है। सुप्रीम कोर्ट ने महिला की देह को मंदिर बता कर कोई नयी व्याख्या नहीं की बल्कि इस परिभाषा से पुरुषों को बाहर रखकर इसे एकांगी कर दिया है। दुनिया की हर स्त्री को पुरुषों का साथ चाहिए और पुरुषों का स्त्रियों का। और जब तक दोनों की देह में मंदिर के तत्व हैं तब तक वे एक छत के नीचे रह सकते हैं। फिर स्त्री ही संसार की जननी है, इसलिए उसमे वात्सल्य है, वह कोमल है, भावुक है। लेकिन अपने ही जनक (स्त्री) के विरुद्ध मनुष्य का आचरण अक्षम्य है। हो सकता इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने स्त्री विरुद्ध हुए दैहिक अपराध को क्षतिपूर्ति से परे रखने की बात कही है। सुषमा स्वराज ने भी कहा था कि बलात्कार की पीड़िता जिदा लाश होती है?
आज जरूरत कानून की भाषा से इतर कथित पुरुषों को यह समझने की है कि जिसके साथ वे दुष्कर्म करने जा रहे हैं वह भी किसी न किसी की बहन, बेटी, पत्नि है। देह के मंदिर को इंद्रियों के क्षणिक आवेग में ध्वस्त करने पर सौ बार विचार करें वर्ना बकौल जांनिसार अख्तर-
" सोचो तो बड़ी चीज है तहजीब बदन की,
  वर्ना तो बदन आग बुझाने के लिए है।"

Friday, 26 June 2015

कमल में कीचड

कहते हैं कि 'इरादा(वादा)करो तो पूरा करो, कोई काम न अधूरा करो’, लेकिन लोकतंत्र में 'उसी से ठंडा, उसी गरम’ जैसी भ्रमपूर्ण बातें और व्यवहार पग-पग पर नमूदार होेतीं हैं। इस तंत्र में बात-व्यवहार में सतयुग जैसी व्यवस्था न कभी रही है और न रह सकती है। केजरीवाल जो सतयुग (सच)की राजनीति के प्रण्ोता बनकर उभरे थ्ो उनके कानून मंत्री ही गैर-कानूनी काम करके सत्ता में उनके साथी बन बैठे थ्ो। राजनीति की तासीर ही ऐसी है जिसमें दोगलापन न हो वह 'सरवाइव’ नहीं कर सकती। इसलिए राजनीति की इस मजबूरी को उसके दोगलेपन के साथ या तो हम स्वीकार कर लें अथवा उससे दो-दो हाथ आजीवन करते-करते एक दिन मर खप जाएं। लेकिन इसका बाल बांका न कर पाएंगे। लोकतंत्र का बीता इतिहास इसी बात का साक्षी है और जो जनमानस इतिहास में दर्ज हजारों नजीरों से कुछ नहीं सीखता उसका कुछ हो नहीं सकता। आजादी के बाद से आज तक सक्रिय राजनीति में एक नाम ढूंढ़े नहीं मिलेगा जिस पर तोहमतें न लगीं हों, जिसकी लोक निदा न हुई हो। जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेन्द्र दामोदर दास मोदी तक कुछेक अपवादों(लाल बहादुर शास्त्री, अटल बिहारी और निजी तौर पर मनमोहन सिह)को छोड़ दें तो सबके दामन दागदार हुए हैं। 
बहरहाल, मोदी सरकार की पहली वर्षगांठ ठीक-ठाक बीती, लेकिन उसके बाद तो मानों मोदी के सिपहसालार कीचड़ में एक के बाद एक धंसते जा रहे हैं, ऊपर से मोदी का मौन तो मानो मनमोहन सिह रिकार्ड तोड़ने पर आतुर हो। मनमोहन सिह पर सोनिया का रिमोट होने का ठप्पा था, लेकिन मोदी तो अपने बूते प्रधानमंत्री हैं। आम बोल-चाल में, यहां तक की लिखने-पढ़ने में भी प्राय: 'मोदी सरकार’ कहने का रिवाज है, उन्होंने जो चाहा सो किया। अपनी पार्टी के बड़े-बड़े दिग्गजों को उम्र का वास्ता देकर इतने प्यार से किनारे लगाया. लेकिन अब उनके उस दंभ पर सवाल उठने लगे हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि 'न खाउंगा, न खाने दूंगा’। इस सद्वाक्य के दूसरे हिस्से (न खाने दूंगा)को मानो लकवा मार गया हो। वे मौन हैं या ध्रतराष्ट्र बने रहना चाहते हैं अथवा शुतुर्गमुगã की भंति आफत आने पर अपना सर रेत में गड़ा लेने को विवश हैं। सुषमा, वसुंधरा और अब पंकजा जैसी तीन देवियों के अलावा अब चौथी देवी और उनकी चहेती शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी भी फर्जी डिग्री की होल्डर हैं? पर बवाल कट रहा है और आगे कौन-कौन होगा देखने वाली बात होगी।
इनदिनों तो सरकार की दो कैबिनेट मंत्री सुषमा स्वराज और स्मृति ईरानी, एक मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे एवं महाराष्ट्र सरकार में पार्टी की एक मंत्री पंकजा मुंडे पर कीचड़ उछला है। यह बात सच है कि 'कीचड़ में कमल’ खिलता है, पर जब 'कमल में कीचड़’ पड़ने लगे तो बात घृणास्पद हो जाती है। यही मौका है जब प्रधानमंत्री कड़े कदम उठाकर अपनी छवि को और चमका सकते हैं। साथ ही संदेश दे सकते हैं कि 'जो जैसा करेगा, सो वैसा भरेगा’। लेकिन पद पर चिपके रहने से 'चोर की दाढ़ी में तिनका’ और 'दाल में काला’ जैसी कहावतें जन की जबान पर चढ़कर सरकार की छीछालेदर करती नजर आती हैं। ऊपर से मोदी जी का मौन मानों इस उक्ति की गवाही हो कि 'मौनम स्वीकृतम लक्षणं।’ प्रधानमंत्री जिस कमल को अपने कोट में लगाकर 'सेल्फी’ खींचते नजर आते थ्ो, उसमें वे गर गौर से देख्ों तो अब चार देवियों के कीचड़ के छींटे नजर आएंगे। हालांकि सरकार ने ऐसे कई काम काज और योजनाएं अपने हाथ में ले रखी हैं जो गर बेहतरी से लागू हुईं तो इनके सकारात्मक परिणाम दिखाई देंगे। बहरहाल, चारों देवियों के कारनामे मोदी सरकार के लिए प्रारम्भिक चेतावनी हैं, क्योंकि बीते एक साल में सिर्फ बातें हुई हैं, योजनाएं बनी हैं, अब कामकाज को अमलीजामा पहनाने की बारी है। यही वह वक्त जब धांधली के हजार रास्ते खुलते हैं। इसलिए अभी ये कीचड़ के छींटे तो मात्र प्री मानसूनी चेतावनी हैं यही हाल रहा तो कहीं पूरा कमल ही कीचड़ की बारिश में न ढंक जाए। 
आखिर में प्रसंगवश एक रोचक तथ्य यह कि नरेन्द्र मोदी ने विवाह किया और पत्नी का त्याग किया। भारतीय संस्कृति में पत्नी का दर्जा लक्ष्मी का है और लक्ष्मी कमल में विराजती है। कहीं मोदी को त्याज्य पत्नी(लक्ष्मी)का अभिशाप इन चार देवियों के कीचड़ के रूप में तो उन्हें नहीं झेलना पड़ रहा है!

Tuesday, 2 June 2015

गाँव में बदलाव

उत्तर भारत में साधारणतया गर्मियों का मौसम उनपयन, विवाह आदि संस्कारों के लिए जाना जाता रहा है, क्योंकि इस समय विद्यालयों में छुटियाँ होती हैं, कृषि कार्य समाप्त  हो जाते और खाली समय पर्याप्त  होता था। इन्हीं महीनों में बेटियों के मायके आने से घर गुलजार रहते थे। लेकिन अब समय चक्र बदला है और दिनोंदिन तेजी से बदलता जा रहा है। मनुष्य उसके प्रवाह में चाहते हुए और न चाहते हुए भी बह रहा है। गांव सिमट गए और शहरों का क्षेत्रफल बढ़ गया है, मगर दिलों का दायरा सिकुड़ गये हैं। इस पलायन की प्रमुख वजह गांवों की अपेक्षाकृत शहरों में अधिक सुख सुविधाएं का होना है। संसार भोगमय है, यह तथ्य शास्त्रोक्त है, लेकिन इनदिनों जिस तरह के भोग का बोध हो चला है वह मनुष्य की गरिमा के विरुद्ध और मशीन के करीब है। मजा मारने के लिए आतुर समाज कुछ भी करने को तैयार है, जो सुविधा भोगी हैं वे हर कुछ अतिक्रमित करने को आतुर हैं। संवेदना, सहृदयता जैसे मूल मानवीय गुण लुप्त  होने के कगार पर हैं। यह पश्चिम का अंधानुकरण है अथवा संस्कारों का पतन है जिसमें मनुष्य अपने गुणों के विपरीत आचरण करने लगा है। चमड़ी के सुख प्रधान हो चुके हैं और इससे बाहर झांकने का दायरा अपने जन्मे बच्चों से आगे नहीं बढ़ पाता। क्या पहले लोग अपने परिवार से मोह नहीं रखते थे? या अब ज्यादा समझदार हो गए हैं? या इसके बरक्स अति करने लगे हैं? खैर इस पर तर्क और बहस को लेकर ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। लेकिन समाज से अर्जित(कानूनी और गैर-कानूनी) सम्पदा का दुरुपयोग यह मानकर करना कि वह उसका नैतिक हकदार है, गलत है। दरअसल, आज इस कथित नैतिकता ने अपने पांव तेजी से पसारे हैं। तो इन्हीं फुरसत के क्षणों में एक शादी समारोह में सतना नगर के पड़ोस के गांव कंचनपुर जाना हुआ। वहां एक पट्टीदार परिवार में बिटिया की शादी में जो प्रबंध किए गए थे, उसका स्तर किसी शहर में किए समारोह से कमतर नहीं था, बल्कि कहें तो कुछ मामले में शहरी संस्कृति से बेहतर और अत्याधुनिक था, जिसे देख कर मन चकित था। खूबसूरत मंच के बगल में सुसज्जित ऑर्केस्ट्रा और उसके सामने वर वधु के लिए दस फुट ऊंचा रिवालविंग मंच जिसमें एक पाइप के द्बारा पुष्प वर्षा के लिए मशीनीकृत प्रबंध था। यानि आशीर्वाद देने के लिए अब संबंधियों/शुभचिंतकों की जगह डीजल चलित एक पम्प ने ले रखी थी। खाने के टेबल पर पाउडर, लिपिस्टिक में लिपी-पुती लड़कियों, को देखकर एक बारगी लगा कि यह किसी मैं किसी गांव में नहीं अत्याधुनिक शहरी विवाह कार्यक्रम के दर्मिया खड़ा हूं। लेकिन स्वरूप में यह विवाह संस्कार न होकर साज-सज्जा इसमें किए किए गए खर्चा की चर्चा में लिप्त  था। हालांकि शहरों में भी विवाह कार्यक्रम पूरी नाटकीय हो चुके हैं। जहां मेहमान और मेजबान दोनों हद दर्जे की औपचारिकता को पार कर चुके हैं। परन्तु गांवों में ऐसा नजारा जरा यकीन करना मुश्किल था। टेलीवीजन की संस्कृति ने जिस गहराई से अपनी पैठ गांव में बनाई है वह शहरों को कहीं अधिक पीछे छोड़ती दिखती है। परन्तु साधनों और धन के एवज में संस्कार और सलीका तो खरीदा नहीं जा सकता इसलिए खाने के आहाते में जूूठी डिस्पोजेबल प्लेटों का बिखराव कुछ यों था जैसे पतझड़ के मौसम में पत्ते आस-पास की धरती को ढंक लेते हैं और उन पर चलने से कर्र-कुर्र, चर्र-मर्र की आवाज आती है। फिर बच्चे बूढ़े स्त्री पुरुष यहां तक गांव के लगुआ भी चाउमिन चाट के लिए जूझते दिखे। पाउच को मुट्ठी में लिए पानी चूसते देखकर सहसा याद हो जब गांव में बारातियों का स्वागत किस्म-किस्म के आम चूसने से होता था। अब सब ध्वस्त है न आम बचे और न सरल स्वभाव के आम लोग। यह सब देखकर लगता है कि शहरी संस्कृति की बराबरी और आधुनिकता की अंधी दौड़ में गांव अपनी तासीर गंवा के कहीं के नहीं रहे। न तो वे शहर बन सके और न ही गांव बने रह सके। चाहे अधूरा ज्ञान हो अथवा अधकचरा कल्चर, से समाज विशेष को कुछ हासिल नहीं होता। मौलिकता में संसार का सबसे अप्रतिम सौंदर्य है. मौलिकता, सरलता से बड़ा मनुष्य का आभूषण और कुछ नहीं हो सकता, लेकिन दिनोंदिन वस्तुपरक, प्रदर्शनपरक हो रहे समाज में मनुष्य कहां शेष है यह गम्भीरता से चिंतन का विषय है। क्योंकि मनुष्य न तो मशीन और न हो सकता है, लेकिन ऐसा बनने को वह चतुर्दिक लालायित दिखता है। शहर तो वैसे भी संबंधों की मिठास से रीते हुए हैं, लेकिन गांव को भी इसकी जद में आते देखकर पीड़ा होती है। लेकिन यह संक्रमण किसी बीमारी के संक्रमण तीव्र व तीक्ष्ण है। गाँव आये इस बेतरतीव बदलाव हमें कहाँ ले जायंगे और हमारी संस्क्रती थाती किस गर्त में गाड़ देंगे यही सोचते हुए पंडाल से बहार आया. 

Thursday, 16 January 2014

आदमी तो आदमी है, लेकिन उसको देखने का नजरिया समाज में सदियों से अलग रहा है। संसार के हर धर्म-दर्शन में आदमी को परमात्मा की प्रतिकृति माना गया है। इसका समर्थन संस्कृत की चर्चित सूक्ति भी करती है कि 'यथा पिण्डे तथा ब्रम्ह्मण्डे’ यानी जो मानव शरीर में है उसी का विस्तार समूचे ब्रह्मांड में है। लेकिन इस वृहद दर्शन के बावजूद मानवीय स्वभाव, समाज में स्वयं की श्रेष्ठता सिद्ध करने और अपना लोहा मनवाने का रहा है।

आदि मानव का जब से सामाजीकरण हुआ है, उसने अपने वर्चस्व के निमित्त संघर्ष शुरू कर रखे हैं। इतिहास साक्षी है कि दुनिया में विभिन्न संस्कृतियों और राष्ट्रों का उदय और पराभव इसी वर्चस्व की जद्दोजहद से हुआ है। कमोवेश आज भी यह संघर्ष विभिन्न स्वरूपों में जारी है। इसी का नतीजा है कि आदमी का विभाजन कई बार, कई रूपों हुआ है। पहले वह वर्ण-जाति के तौर विभाजित हुआ, फिर इन्ही में आदमी के बरक्स 'अमीर’ और 'गरीब’ दो वर्ग बने। कालांतर में इसके बीच का एक और 'मध्यम’ वर्ग का 'टर्म’ चल निकला। बाद में इस 'मिडिल’ के भी दो विभाजन हुए- 'लोअर मिडिल क्लास ’और 'अपर मिडिल क्लास’ जिसमें रखकर आदमी की हैसियत देखी जा रही है। आदमी के ऐसे 'क्लासिफिकेशन’ चिरंतन हैं। इतना ही नहीं इतिहास में झांके तो वहां भी बाकायदे 'दीवाने-ए-खास’ और 'दीवाने-ए-आम’ जैसी व्यवस्थाएं इस विभाजन को रेखांकित करती दिखाई देती हैं। लेकिन अब अरविद केजरीवाल ने आम आदमी को नए अर्थ देते हुए कहा है कि 'जो ईमानदारी के साथ हैं, वे सब आम आदमी हैं। चाहे वह झुग्गी में रहता हो या दिल्ली के पॉश इलाके ग्रेटर कैलाश में।’ यानी बात बड़ी साफ है कि यहां आदमी चाहे अमीर हो या गरीब गर वह ईमानदार है तो 'आम आदमी’ है, लेकिन जिस तरह से कथित लोग देश में अर्थिक दृष्टि से रातों-रात बड़े आदमी बने हैं, उनके लिए मानना पड़ता है कि यह रास्ता ईमानदारी की तंग गली से कम ही गुजरा है। फिर भी आज जिसे 'आम आदमी’ कहा जाता है वह सदियों से जूझता रहा है और जूझता रहेगा।

पाश्चात्य समाज मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो ने मानव की आवश्यकताओं के पांच सोपान बताए हैं। प्रथम- 'शारीरिक’ यानी भूख प्यास और जैविक जरूरतें। दूसरी- 'सुरक्षा’ यानी जो आज उपलब्ध है वह कल कैसे मिलेगा, की फिक्र। तीसरी- 'सामाजिक’ है, जो प्रथम दो आवश्यकताएं पूरी होने के बाद स्वत: रोशन हो आती है। इसके तहत रिश्ते-नाते, मित्र-यार और व्यक्ति का सामाजीकरण शामिल है। ये तीनों जरूरतें प्राय: हर शख्स अपने-अपने स्तर पर हासिल कर लेता है। लेकिन असल संघर्ष चौथी जरूरत के लिए शुरू होता है, वह है- 'पहचान’ यानी खुद की यश-कीर्ति अथवा लोहा मनवाने के लिए जद्दोजहद करना है। इसी की झगड़ा दुनियाभर में नजर आता है। पांचवीं जरूरत है- 'स्वसम्मान’ की। यह जरूरत सबसे जुदा है, क्योंकि इसमें व्यक्ति अपनी कार्य दक्षता में आडम्बर से परे लीन रहता है।
तो, इस चौथी जरूरत के बरक्स जब एक सामान्य व्यक्ति, आसामान्य या विशेष यानी 'आम से खास’ बनने की कोशिश करता है तब वह 'आम आदमी’ की पदवी से बेदखल हो जाता है। लेकिन हम यह भूलते हैं कि इनदिनों लोगबाग 'आप पार्टी’ ज्चाइन करने के लिए महज इसलिए उतावले नहीं है कि उनमें रातोंरात जनसेवा का गुबार उमड़ पड़ा है, बल्कि इसलिए कि इसके जरिए जो मानव आवश्यकताओं का चौथा पायदान 'पहचान’ है को हासिल करने का यह सुलभ मंच दिख रहा है। देश में कई राजनीतिक दल पहले से मौजूद हैं, सभी आम आदमी की चिता के लिए मोर्चा खोले बैठे हैं। लेकिन आज यही दल जनता को दलदल दिख रहे हैं, तो इनकी कारगुजारियों के चलते। 'दल’ एक अमूर्त संस्था है, जबकि इसको संचालित करने वाले मूर्त और चेतन नेता हैं। इसलिए 'आप-तुम-हम’ जैसी कितनी भी पार्टियां देश में बन जाएं, नीयत को दुरुस्त किए बगैर हालात बदलने वाले नहीं। लेकिन फौरी तौर पर बेशक 'आप’ ने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी है। ईमानदार होना और इसको सतत बनाए रखना किसी कठिन साधना से कम नहीं। राजनीति में मौजूद 'ग्लैमर’ से खुद को ओझल रख पाना आसान नहीं। गोस्वामी जी ने लिखा है कि- 'प्रभुता पाए काहि मद नाहि’। आचार्य चाणक्य ने कहा था कि 'सत्ता में अथवा राजकोष में बैठे व्यक्ति से यह उम्मीद करना कि वह उस धन का कुछ भाग निजी लाभ के लिए नहीं करेगा ठीक वैसा सोचना है जैसे जिह्वा में रखी शहद की बूंद का स्वाद न लेना।’
आप की सफलता से न सिर्फ दिल्ली में उम्मीदों का आसमान उजला हुआ है बल्कि देश भी इसी ओर देख रहा है। खासकर तब जब देश की आबादी का अधिकांश हिस्सा बेहद गरीब है, दबा है, मैला-कुचला है, शोषित-पीड़ित है। इसी अवधारणा के नेपथ्य में 'आम आदमी पार्टी’ का जन्म हुआ है। केजरीवाल ने फिलहाल अपने कार्यकलाप और सादा जीवन पद्धति के जरिए देश के तमाम पॉलिटीशियनों को संदेश दिया है कि आने वाले वक्त में राजनीति का परिदृश्य कैसा होने जा रहा है।
फिर भी, देश की मनोदशा बेहद भावुक है। कई ऐसे मौके आए हैं, जब एकाएक कोई देश की राजनीति में धूमकेतु की तरह उभरा, मगर समय के साथ यों लुप्त हुआ कि बाद में उसका कोई नामलेवा नहीं बचा। इस चर्चा में पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिह के जिक्र करने भर से बात समझी जा सकती है। तब उन्हें यह कह कर सर आंखों में बैठाया गया था कि- 'राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है।’ हालांकि आज केजरीवाल और वीपी सिह के दौर के हालातों में बड़ा फर्क है। देश भीतर ही भीतर कुव्यवस्थाओं के चलते सुलग रहा है। ऐसे में आम आदमी को केरीवाल एंड कम्पनी नई सोच, नया जोश, नई उड़ान के साथ नए अर्थ देने को आतुर हैं।

Monday, 30 December 2013

वक़्त के साथ

  समय का सांकेतिक अर्थ बदलाव भी है। समय एक बार फिर बदला है, क्योंकि आज हमने नए साल में कदम रख दिया है। बीते बरस हमने कम उपलब्धियां हासिल नहीं कीं, लेकिन महंगाई, घोटाले,भ्रष्टाचार, यौनाचार के कलंक के साथ-साथ संसदीय लोकतंत्र के मूल सरोकारों से खिलवाड़ की कालिख ने 2013 की तस्वीर को एक हद तक स्याह कर दिया था। सरकार और समाज दोनों के लिए गया साल कमोवेश ऐसा ही रहा है। जिसकी कुछ तस्वीरों को आप अपने अलबम में महफूज करना चाहेंगे तो, कई बातों को किसी दुस्वप्न की तरह भूलना पसंद करेंगे। इसलिए नव प्रभात के मुहाने पर खड़े होकर बीते वक्त को सोचना और आने वाले वक्त की ओर निहारना, दो ऐसे मिश्रित पल हैं, जो अकुलाहट और प्रसन्नता दोनों देते हैं। बीता वक्त जिसे आप ने जी भरकर जिया है, उस पर चिंतन-मनन के साथ भविष्य पर दृष्टि होना मानवीय स्वभाव है। ऐसे मौके पर गर आंखमूंद कर अंतरमन को टटोलें तो, जो बीता है, रीता है उसकी मीठी-नमकीन यादें, मन मस्तिष्क को उमड़-घुमड़ कर कोहरे की चादर की तरह ढंक लेती है। लेकिन दूसरी ओर दिन भर उत्साह से लबरेज शुभकामना भरे संदेशों की मोबाईल में  बजती ‘बीप-बीप’ की धुन जिन्दगी को आगे और आगे देखने को प्रेरित करती है।
दरअसल एक जनवरी ऐसी मनोवैज्ञानिक तारीख है जो समय के विभाजन को रेखांकित करती है। यह तिथि घरों के कैलेंडर बदल देती है, तो अखबारों की टाईम लाइन में नए वर्ष को दर्ज कर देती है। नए संकल्पों को जन्म देती है, तो बीते वर्ष को इतिहास के पन्नों में अंकित करके, नए इतिहास को गढ़ने के लिए आगे बढ़ जाती है। ‘वक्त’ की विवेचना को करते वक्त दो दशक पहले टेलीवीजन पर प्रसारित महाभारत धारावाहिक के उस घूमते चक्र के नेपथ्य से आती हरीश भिमानी की आवाज बरबस जेहन में रोशन हो उठती है कि- ‘मैं समय हूं..’ समय जो कभी ठहरता नहीं, बस साक्षी बनता है कई पलों का। आगे बढ़ते जाना उसका असल स्वभाव है। बीता वक्त गर अच्छा हो तो इसलिए सुहाना होता है कि उसको हम बार-बार कुरेद सकते हैं उसके बारे में खुद से और अपनों से बात कर सकते हैं। और गर बीता वक्त खराब रहा हो तो,  जो आज अच्छा है वह उसे और बेहतर अनुभूत करने का वह हमें मौका देता है। इसीलिए कहा जाता है कि समय के स्वभाव को जिसने वक्त रहते पहचाना और तालमेल बनाया, वह सफलता की सीढ़ियां चढ़ता गया। सफलता और असफलता  को लेकर ये जुमला भी बात-बात में वक्त के बरक्स बोला-कहा-सुना जाता है कि ‘सब वक्त-वक्त की बात है’। धनुर्धर अर्जुन की विवशता और भीलों द्वारा गोपियां लूटने की दुखांतिका के पीछे वक्त की ही बिसात है।  इस तरह दु:ख और सुख, समय और जीवन एक दूसरे के व्युत्क्रमानुपाती होते हैं। सच तो यह है कि हमारे जन्म लेते ही समय, जीवन की आयु कम करने लगता है। यानी सब कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाना ही समय की प्रकृति है। समय निष्ठुर है, निरपेक्ष है, वैज्ञानिक है। इसीलिए उसे घड़ी जैसी मशीन से नापा जाता है। क्योंकि मशीन संवदेना से मुक्त, निश्चित नियमों में कर्मरत होती है। संसार के समस्त नियम कायदे ‘समय’ के आगे बेबस हैं, उसके आधीन है। मानव ने दुनिया में कितनी भी ऊंचाईयां हासिल कर ली हों, लेकिन वह समय पर न तो नियंत्रण पा सका है और न पा सकता है। यह प्रक्रिया इतने आहिस्ते से घटती है कि कब हम बच्चे से बड़े और फिर बूढेÞ हो गए यकबयक महसूस नहीं होता। लेकिन हर दिन बीत रहे जीवन के बीच में ही संसार है। समय हर चीज का पैमाना है। वक्त, व्यक्ति ही नहीं वस्तुओं की आयु भी तय करता है। यानी चाहे निर्जीव हो या सजीव दोनों का सृजन और समापन उसके मातहत है। कहने को वक्त बड़ा निरंकुश है... लेकिन चाहे वह दवाओं की ‘एक्सपायरी’ तारीख को निश्चित करता हो या राजनीतिक सत्ता के निश्चित कार्यकाल को। समय की इस निरपेक्ष गति को देखकर कहना पड़ता है कि-
‘अब यही मुनासिब है आदमी के लिए
  वह वक्त के साथ-साथ  चलता रहे..’ 
बहरहाल नववर्ष हमें अतीत से सबक लेने और आसन्न चुनौतियों से निपटने का अवसर दे रहा है। पहले तो यही उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार और संसद में, संवाद और विश्वास की बाहाली हो। क्योंकि बिना संवाद के न तो हम अपने भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं, न ही किसी नीति या निर्णय को तार्किक ठहरा सकते हैं।अलबत्ता यह बात सरकार और विपक्ष दोनों को याद रखनी होगी कि किसी मुद्दे पर एक सहमति का वातावरण विकसित हो। मात्र छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति से बचना होगा, विरोध के लिए विरोध जैसी मानसिकता से बाहर निकलने का समय है। दुष्यंत कुमार की दो पंक्तियां रोशन हो आती है कि-
‘मत कहो आकाश में कोहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है’ 
नए साल का सूरज यदि इस उम्मीद से चमके कि शब्दों का संसार शालीन और मर्यादित बना रहेगा तो, यह एक सूकूनदेह अहसास होगा। वर्ष 2013 में वैश्विक मंदी के दबाव में अर्थव्यवस्था की जो चाल सुस्त पड़ गई थी, वह 2014 में फिर मजबूत होगी। नया वर्ष इस लिहाज से ऐतिहासिक हो सकता है कि हम प्रकृति और पर्यावरण के साथ दोस्ताना रिश्ते की अनिवार्य जरूरत को न सिर्फ समझें बल्कि इस बाबत सक्रिय बने। क्योंकि गर हम अब भी नहीं चेते तो सचमुच देर हो जाएगी। सदी के महान वैज्ञानिक स्टीफन हांकिन्स की कुछ   वर्षों पहले की गई टिप्पणी क्या काफी नहीं कि- ‘मानवजाति ने धरा के संसाधनों का पिछले 1000 वर्षों का दोहन, महज100 वर्षों में कर डाला है, अब दोहन की यही गति प्रति 10 वर्ष हो गई है और यह हाल रहा तो यह 1000 वर्षों का दोहन प्रति 1 वर्ष होने के करीब है। इस लिहाज से यदि मानव का अस्तित्व बरकरार रखना है तो आने वाले 200 वर्षों के बाद कोई दूसरा ग्रह रहने के लिए तलाश करना ही होगा।’
तो आज पूरी दुनिया में उत्सव का स्वरूप ले चुकी अंग्रेजी कलेंडर की तारीख ‘एक जनवरी’ दुनिया के सभी मुल्कों में तो नहीं पर कई देशों में नए वर्ष की तिथि घोषित है। कई सवाल भी खड़े किए जाते हैं कि इस मनोवैज्ञनिक तिथि से लोगों के दैनिक जीवन के रसायन में, उसके कार्यकलाप में क्या फर्क आता है। वही चंदा, वही सूरज, वही तारे और वही नजारे। फिर भी यह समय का मनोविज्ञान ही तो है जो जीवन प्रवाह में एक नया अध्याय जोड़ता चलता है। बहरहाल, शुभकामना की भारतीय परम्परा ‘स्व’ के बजाय ‘सर्व’ कल्याण की कामना करती है। लिहाजा हम उम्मीद करते हैं कि न सिर्फ व्यक्ति, परिवार, मित्र-यार, देश-प्रदेश बल्कि समस्त संसार की सम्पूर्ण मानवजाति के लिए वर्ष 2014 सुखद, शांतिमय और उन्नतिदायी-फलदायी हो। 

Sunday, 1 December 2013

साख का संकट

  इनदिनों टीवी में एक विज्ञापन प्रसारित हो रहा है कि ‘इज्जत (साख)बड़ी मेहनत और मुश्किल से आती है और एक बार चली गई तो फिर लौट के नहीं आती। यानी साख को बनाना जितना कठिन है उससे मुश्किल है उसको बरकरार रखना। अत: इनदिनों देश-दुनिया में महंगाई, असुरक्षा के साथ जो सबसे बड़ा संकट है वह है किसी व्यक्ति या संस्था की साख का संकट, जो चतुर्दिक दिखाई देता है। क्रेडिबिलटी यानी साख किसी के बारे में वह अवधारणा है जो उसके भरोसे को कायम रखता है। बाजार में व्यक्ति की साख अच्छी हो तो उसे धन लेने और देने में कोई महाजन/व्यापारी संकोच या डर का अनुभव नहीं करता। यह साख कई तरह की हो सकती है। जैसे बैंकों की साख, हुंडी की साख, मीडिया की साख, व्यक्ति स्तर पर समाज सेवियों, नेताओं और धर्म गुरुओं की साख आदि।
सभी स्तर पर साख का बना रहना हर लिहाज से व्यक्ति, किसी संस्था, देश-दुनिया के लिए बेहतर अवस्था है। लेकिन दुर्भाग्यवश सबसे अधिक क्षरण इसी प्रवृत्ति में देखने में आया है। इसका सबसे बड़ा नुक्सान जो उठाना पड़ रहा है वह यह कि सोसायटी में मानवीय स्वभाव के प्रतिकूल बेहद अविश्वास और निराशा का वातावरण निर्मित होने लगा है। यदि कहें दे कि ऐसा हो चुका है तो कदाचित किसी को कोईआपत्ति न हो। जो कि हमारे विकास का लक्ष्य कतई नहीं है। लेकिन विकास की इस यात्रा में जिस बात की सर्वाधिक बलि दी गई है वह मात्र ‘साख’ यानी विश्वास की है।
अभी बहुत दिन नहीं हुए जब माने-जाने बुजुर्ग संत आसाराम को छल से धर्म की आड़ में यौन शोषण और विश्वासघात करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। वर्षों की कमाई इज्जत और धर्म गुरू की उनकी साख को एक छुद्र हरकत ने उन्हें सलाखों के पीछे न सिर्फ ढकेल दिया बल्कि इतने सालों में जो नाम, इज्जत, शोहरत बटोरी थी, वह पल झपकते ही बर्बाद हो गई। अपनी यादाश्त को थोड़ा फ्लैश बैक करें तो नब्बे के दशक में उत्तरप्रदेश के एक मंत्री अमरमणि ने कवियत्री मधुमिता शुक्ल के मोह में सब गवां दिया था। हरियाणा के बहुचर्चित मंत्री कांडा जो जूता बेचने के व्यापार से लेकर सरकार के कारोबार में शामिल हो, समाज में एक बड़ा मुकाम हासिल किया था। वे एयर होस्टेज गीतिका के फेर में ऐसे उलझे कि सब कुछ मुट्ठी में बंधी रेत की तरह फिसल गया। एनडी तिवारी का डीएनए टेस्ट और उससे हुई बदनामी ने उनसे क्या कुछ नहीं छीन लिया है। इतना ही नहीं ऐसी घटनाओं को मसाला की तरह परोसने वाला जनप्रिय मीडिया हाऊस ‘तहलका’ के एक चर्चित स्तंभ तरुण तेजपाल अपने ही एक कमसिन मुलाजिम के जाल में ऐसे उलझे कि उनके प्रोडक्शन हाऊस ‘तहलका’ में वाकई तहलका मच गया। आपको याद होगा कि नब्बे के दशक में तरुण तेजपाल ने ‘तहलका’ के जरिए देश भर में जिस धमक के साथ अपनी धाक बनाई थी, उनकी साख भी यौन शोषण के एक प्रकरण के कारण तार-तार हो गई।
ये सही है कि स्त्री शोषण की प्रवृत्ति सदा से समाज में विद्यमान रही है और इतिहास देखकर यह लगने लगता है कि अनेक कानूनी उपायों के बावजूद यह कम ज्यादा तौर पर बनी रहेगी। दरअसल, इसे कानून और बंधन के बाहरी दबाबों से निषिद्ध नहीं किया जा सकता। यह सारा मसला नैतिकता का है जो स्वनियंत्रण के जरिए ही नियंत्रित हो सकता है। क्योंकि गर कानून से इसे रोका जा सकता होता तो ईरान जैसे देशों में जहां इस अपराध की बेहद कठोर और अमानवीय सजाएं मुकर्रर हैं वहां ऐसे क्राईम कदापि न होते पर ऐसा नहीं है। बावजूद  इस बहाने से कानून को लचर नहीं छोड़ा जा सकता। नि:संदेह कठोर कानून भय का वातावरण बनाता है, जिससे अपराधियों में डर और अपराधों में अपेक्षाकृत कमी देखने में आती है। एक अहम सवाल इन घटनाओं के नेपथ्य में है, जो अक्सर या तो उठाया नहीं जाता अथवा जब उठाया जाता है तो उसे स्त्री स्वंतत्रता के पर कतरने की नकारात्मक पोंगापंथी विचारधारा के तौर पर देखा जाता है। हमारा मानना है कि कई मामलों में गर स्त्री तय कर ले कि उसे ऐसे बहकावों में आना ही नहीं है, जो उसके शोषण का कारण बन सकते हैं, तो यकीन मानिये की समस्या का अस्सी फीसदी हल तो इसी संकल्प से निकल सकता है। लेकिन समस्या के मूल में निहारने की बजाए उसकी शाखाओं में लग रहे रोगों पर कानून और पहरों की तलवार चलाई जाती है। लेकिन इस छंटाई के बाद हर बार उस ग्रंथि का प्रस्फुटन हो आता है।
स्त्री-पुरुष संबंधों में आज जो अविश्वास यानी साख का संकट है वह कोई नवीन परिघटना नहीं है। हां अब इनके तरीकों में विश्वासघात और निरंकुशता का पुट अधिक दिखता है। स्वभाव या वृत्ति ऐसी अवस्था है जो सहज नहीं बदल सकती। और फिर अब न तो गरिमामय, नैतिकता पूर्ण नेतृत्व है, न ही ऐसा  न ही ऐसा समाज।

Saturday, 23 November 2013

'वोट ऑन सेल' आफर चालू है

बड्डे ने बनबारी से कहा कि आज शाम से खुलेआम चुनाव की चर्चा, काना-फूसी, तीर-तुक्का, जिताने-हराने के निवेदन, विश्लेषण सब 'साईलेंट' हो जाएंगे। और फिर शुरू होगा अंदरखाने में अल्टी-पल्टी का दौर। लक्ष्मीदेवी दीपावली में भले उतनी चंचल नजर न आईं हों, जितनी आगामी दो दिनों में होने जा रही हैं। बड्डे बोले- अरे बनबारी! इस दफा चुनाव आयोग के डंडे का डर चौतरफा पसरा है।पोस्टर, बैनर, मोटर-गाड़ी सब 'काउंट' में और 'लिमिट' में हैं। चुनाव आयोग की गोपनीय निगाहें, 'बिग बॉस शो' की 'थर्ड आई' की तरह एक-एक गतिविधि को 'वॉच' कर रही हैं। तभी तपाक से बनबारी ने कहा- नेता-जनता दोनों 'वेलनोन' हैं कि हाथ जोड़ने, मिन्नते करने, 'डोर टू डोर' खाली पर्चा लिए खीस निपोरने से कुछ हाथ नहीं आने वाला। आगामी पंचवर्षीय मलाई पेलने के पहले, पब्लिक को 'माल' की आयुव्रेदिक 'पुड़िया' दबे छुपे दिये बिना 'गेम' नहीं बनने वाला। क्योंकि इस पुड़िया में वो ताकत है जो प्रतिद्वन्द्वी के 'सॉलिड से सॉलिड' वोटों को गच्चा देकर अपने पाले में ला सकती है। इसलिए अभी असल काम बाकी है। कहते हैं न कि 'रात बाकी, बात बाकी।' खबर है कि फलां, ढिकां के समर्थन की मोटी मलाई लील रहा है। जनता का एक बड़ा वर्ग है जो दो दिन की मलाई के लिए पांच साल तक अपना तेल निकलवाने के लिए तैयार हो जाता है। बड्डे खीङो- यार बनवारी तुम्हारी सोच बौनी है, नकारात्मक है। जनता अब 'सेंसिबल' है और सब जानती है कि कौन फोकटिया, कौन काम का और कौन नक्शेबाज है और कौन सहज सुलभ? और फिर यह कोई पार्षद, मेयर या पंचायत का चुनाव नहीं जिसे व्यक्ति विशेष हांकेगा। यह तो प्रदेश की सरकार बनने िबगड़ने का मामला है, एक विचारधारा को बरकरार रखने या बदलने का मामला है। अपना प्रदेश कहां था, कहां आ गया है, इस मसले पर जनता को फुसलाया नहीं जा सकता। जो कथित नेता-नपाड़ी 'माल' के बदले 'वोट ऑन सेल' का अभियान छेडें़ हैं न बनबारी, उनकी दाल नहीं गलने वाली। बनबारी ने बड्डे को प्यार से समझया कि तुम 'थ्योरिटिकली' सही हो मगर 'प्रैक्टिकली' गलत। क्योंकि विकास या विनाश का सच या तो स्वीकार होता नहीं या होने नहीं दिया जाता। जनता जाति के नशे में बौराई सी बाग रही है। क्योंकि आलाकमानों ने टिकिटों की ऐसी गोटी फिट की है कि 'सेम कास्ट को सेम कास्ट' से लड़ाओ है। ताकि एक 'ग्रेट कनफ्यूजन क्रियेट' किया जा सके।इसलिए वोट का मूल्य काम-धाम से नहीं 'माल' से तौला जा रहा है। सो मौका है बड्डे भूत की लंगोटी ही ले लो वर्ना अगले पांच बरस सिर्फ चिल्लपों होगी..!