Thursday, 16 January 2014

आदमी तो आदमी है, लेकिन उसको देखने का नजरिया समाज में सदियों से अलग रहा है। संसार के हर धर्म-दर्शन में आदमी को परमात्मा की प्रतिकृति माना गया है। इसका समर्थन संस्कृत की चर्चित सूक्ति भी करती है कि 'यथा पिण्डे तथा ब्रम्ह्मण्डे’ यानी जो मानव शरीर में है उसी का विस्तार समूचे ब्रह्मांड में है। लेकिन इस वृहद दर्शन के बावजूद मानवीय स्वभाव, समाज में स्वयं की श्रेष्ठता सिद्ध करने और अपना लोहा मनवाने का रहा है।

आदि मानव का जब से सामाजीकरण हुआ है, उसने अपने वर्चस्व के निमित्त संघर्ष शुरू कर रखे हैं। इतिहास साक्षी है कि दुनिया में विभिन्न संस्कृतियों और राष्ट्रों का उदय और पराभव इसी वर्चस्व की जद्दोजहद से हुआ है। कमोवेश आज भी यह संघर्ष विभिन्न स्वरूपों में जारी है। इसी का नतीजा है कि आदमी का विभाजन कई बार, कई रूपों हुआ है। पहले वह वर्ण-जाति के तौर विभाजित हुआ, फिर इन्ही में आदमी के बरक्स 'अमीर’ और 'गरीब’ दो वर्ग बने। कालांतर में इसके बीच का एक और 'मध्यम’ वर्ग का 'टर्म’ चल निकला। बाद में इस 'मिडिल’ के भी दो विभाजन हुए- 'लोअर मिडिल क्लास ’और 'अपर मिडिल क्लास’ जिसमें रखकर आदमी की हैसियत देखी जा रही है। आदमी के ऐसे 'क्लासिफिकेशन’ चिरंतन हैं। इतना ही नहीं इतिहास में झांके तो वहां भी बाकायदे 'दीवाने-ए-खास’ और 'दीवाने-ए-आम’ जैसी व्यवस्थाएं इस विभाजन को रेखांकित करती दिखाई देती हैं। लेकिन अब अरविद केजरीवाल ने आम आदमी को नए अर्थ देते हुए कहा है कि 'जो ईमानदारी के साथ हैं, वे सब आम आदमी हैं। चाहे वह झुग्गी में रहता हो या दिल्ली के पॉश इलाके ग्रेटर कैलाश में।’ यानी बात बड़ी साफ है कि यहां आदमी चाहे अमीर हो या गरीब गर वह ईमानदार है तो 'आम आदमी’ है, लेकिन जिस तरह से कथित लोग देश में अर्थिक दृष्टि से रातों-रात बड़े आदमी बने हैं, उनके लिए मानना पड़ता है कि यह रास्ता ईमानदारी की तंग गली से कम ही गुजरा है। फिर भी आज जिसे 'आम आदमी’ कहा जाता है वह सदियों से जूझता रहा है और जूझता रहेगा।

पाश्चात्य समाज मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो ने मानव की आवश्यकताओं के पांच सोपान बताए हैं। प्रथम- 'शारीरिक’ यानी भूख प्यास और जैविक जरूरतें। दूसरी- 'सुरक्षा’ यानी जो आज उपलब्ध है वह कल कैसे मिलेगा, की फिक्र। तीसरी- 'सामाजिक’ है, जो प्रथम दो आवश्यकताएं पूरी होने के बाद स्वत: रोशन हो आती है। इसके तहत रिश्ते-नाते, मित्र-यार और व्यक्ति का सामाजीकरण शामिल है। ये तीनों जरूरतें प्राय: हर शख्स अपने-अपने स्तर पर हासिल कर लेता है। लेकिन असल संघर्ष चौथी जरूरत के लिए शुरू होता है, वह है- 'पहचान’ यानी खुद की यश-कीर्ति अथवा लोहा मनवाने के लिए जद्दोजहद करना है। इसी की झगड़ा दुनियाभर में नजर आता है। पांचवीं जरूरत है- 'स्वसम्मान’ की। यह जरूरत सबसे जुदा है, क्योंकि इसमें व्यक्ति अपनी कार्य दक्षता में आडम्बर से परे लीन रहता है।
तो, इस चौथी जरूरत के बरक्स जब एक सामान्य व्यक्ति, आसामान्य या विशेष यानी 'आम से खास’ बनने की कोशिश करता है तब वह 'आम आदमी’ की पदवी से बेदखल हो जाता है। लेकिन हम यह भूलते हैं कि इनदिनों लोगबाग 'आप पार्टी’ ज्चाइन करने के लिए महज इसलिए उतावले नहीं है कि उनमें रातोंरात जनसेवा का गुबार उमड़ पड़ा है, बल्कि इसलिए कि इसके जरिए जो मानव आवश्यकताओं का चौथा पायदान 'पहचान’ है को हासिल करने का यह सुलभ मंच दिख रहा है। देश में कई राजनीतिक दल पहले से मौजूद हैं, सभी आम आदमी की चिता के लिए मोर्चा खोले बैठे हैं। लेकिन आज यही दल जनता को दलदल दिख रहे हैं, तो इनकी कारगुजारियों के चलते। 'दल’ एक अमूर्त संस्था है, जबकि इसको संचालित करने वाले मूर्त और चेतन नेता हैं। इसलिए 'आप-तुम-हम’ जैसी कितनी भी पार्टियां देश में बन जाएं, नीयत को दुरुस्त किए बगैर हालात बदलने वाले नहीं। लेकिन फौरी तौर पर बेशक 'आप’ ने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी है। ईमानदार होना और इसको सतत बनाए रखना किसी कठिन साधना से कम नहीं। राजनीति में मौजूद 'ग्लैमर’ से खुद को ओझल रख पाना आसान नहीं। गोस्वामी जी ने लिखा है कि- 'प्रभुता पाए काहि मद नाहि’। आचार्य चाणक्य ने कहा था कि 'सत्ता में अथवा राजकोष में बैठे व्यक्ति से यह उम्मीद करना कि वह उस धन का कुछ भाग निजी लाभ के लिए नहीं करेगा ठीक वैसा सोचना है जैसे जिह्वा में रखी शहद की बूंद का स्वाद न लेना।’
आप की सफलता से न सिर्फ दिल्ली में उम्मीदों का आसमान उजला हुआ है बल्कि देश भी इसी ओर देख रहा है। खासकर तब जब देश की आबादी का अधिकांश हिस्सा बेहद गरीब है, दबा है, मैला-कुचला है, शोषित-पीड़ित है। इसी अवधारणा के नेपथ्य में 'आम आदमी पार्टी’ का जन्म हुआ है। केजरीवाल ने फिलहाल अपने कार्यकलाप और सादा जीवन पद्धति के जरिए देश के तमाम पॉलिटीशियनों को संदेश दिया है कि आने वाले वक्त में राजनीति का परिदृश्य कैसा होने जा रहा है।
फिर भी, देश की मनोदशा बेहद भावुक है। कई ऐसे मौके आए हैं, जब एकाएक कोई देश की राजनीति में धूमकेतु की तरह उभरा, मगर समय के साथ यों लुप्त हुआ कि बाद में उसका कोई नामलेवा नहीं बचा। इस चर्चा में पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिह के जिक्र करने भर से बात समझी जा सकती है। तब उन्हें यह कह कर सर आंखों में बैठाया गया था कि- 'राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है।’ हालांकि आज केजरीवाल और वीपी सिह के दौर के हालातों में बड़ा फर्क है। देश भीतर ही भीतर कुव्यवस्थाओं के चलते सुलग रहा है। ऐसे में आम आदमी को केरीवाल एंड कम्पनी नई सोच, नया जोश, नई उड़ान के साथ नए अर्थ देने को आतुर हैं।

Monday, 30 December 2013

वक़्त के साथ

  समय का सांकेतिक अर्थ बदलाव भी है। समय एक बार फिर बदला है, क्योंकि आज हमने नए साल में कदम रख दिया है। बीते बरस हमने कम उपलब्धियां हासिल नहीं कीं, लेकिन महंगाई, घोटाले,भ्रष्टाचार, यौनाचार के कलंक के साथ-साथ संसदीय लोकतंत्र के मूल सरोकारों से खिलवाड़ की कालिख ने 2013 की तस्वीर को एक हद तक स्याह कर दिया था। सरकार और समाज दोनों के लिए गया साल कमोवेश ऐसा ही रहा है। जिसकी कुछ तस्वीरों को आप अपने अलबम में महफूज करना चाहेंगे तो, कई बातों को किसी दुस्वप्न की तरह भूलना पसंद करेंगे। इसलिए नव प्रभात के मुहाने पर खड़े होकर बीते वक्त को सोचना और आने वाले वक्त की ओर निहारना, दो ऐसे मिश्रित पल हैं, जो अकुलाहट और प्रसन्नता दोनों देते हैं। बीता वक्त जिसे आप ने जी भरकर जिया है, उस पर चिंतन-मनन के साथ भविष्य पर दृष्टि होना मानवीय स्वभाव है। ऐसे मौके पर गर आंखमूंद कर अंतरमन को टटोलें तो, जो बीता है, रीता है उसकी मीठी-नमकीन यादें, मन मस्तिष्क को उमड़-घुमड़ कर कोहरे की चादर की तरह ढंक लेती है। लेकिन दूसरी ओर दिन भर उत्साह से लबरेज शुभकामना भरे संदेशों की मोबाईल में  बजती ‘बीप-बीप’ की धुन जिन्दगी को आगे और आगे देखने को प्रेरित करती है।
दरअसल एक जनवरी ऐसी मनोवैज्ञानिक तारीख है जो समय के विभाजन को रेखांकित करती है। यह तिथि घरों के कैलेंडर बदल देती है, तो अखबारों की टाईम लाइन में नए वर्ष को दर्ज कर देती है। नए संकल्पों को जन्म देती है, तो बीते वर्ष को इतिहास के पन्नों में अंकित करके, नए इतिहास को गढ़ने के लिए आगे बढ़ जाती है। ‘वक्त’ की विवेचना को करते वक्त दो दशक पहले टेलीवीजन पर प्रसारित महाभारत धारावाहिक के उस घूमते चक्र के नेपथ्य से आती हरीश भिमानी की आवाज बरबस जेहन में रोशन हो उठती है कि- ‘मैं समय हूं..’ समय जो कभी ठहरता नहीं, बस साक्षी बनता है कई पलों का। आगे बढ़ते जाना उसका असल स्वभाव है। बीता वक्त गर अच्छा हो तो इसलिए सुहाना होता है कि उसको हम बार-बार कुरेद सकते हैं उसके बारे में खुद से और अपनों से बात कर सकते हैं। और गर बीता वक्त खराब रहा हो तो,  जो आज अच्छा है वह उसे और बेहतर अनुभूत करने का वह हमें मौका देता है। इसीलिए कहा जाता है कि समय के स्वभाव को जिसने वक्त रहते पहचाना और तालमेल बनाया, वह सफलता की सीढ़ियां चढ़ता गया। सफलता और असफलता  को लेकर ये जुमला भी बात-बात में वक्त के बरक्स बोला-कहा-सुना जाता है कि ‘सब वक्त-वक्त की बात है’। धनुर्धर अर्जुन की विवशता और भीलों द्वारा गोपियां लूटने की दुखांतिका के पीछे वक्त की ही बिसात है।  इस तरह दु:ख और सुख, समय और जीवन एक दूसरे के व्युत्क्रमानुपाती होते हैं। सच तो यह है कि हमारे जन्म लेते ही समय, जीवन की आयु कम करने लगता है। यानी सब कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाना ही समय की प्रकृति है। समय निष्ठुर है, निरपेक्ष है, वैज्ञानिक है। इसीलिए उसे घड़ी जैसी मशीन से नापा जाता है। क्योंकि मशीन संवदेना से मुक्त, निश्चित नियमों में कर्मरत होती है। संसार के समस्त नियम कायदे ‘समय’ के आगे बेबस हैं, उसके आधीन है। मानव ने दुनिया में कितनी भी ऊंचाईयां हासिल कर ली हों, लेकिन वह समय पर न तो नियंत्रण पा सका है और न पा सकता है। यह प्रक्रिया इतने आहिस्ते से घटती है कि कब हम बच्चे से बड़े और फिर बूढेÞ हो गए यकबयक महसूस नहीं होता। लेकिन हर दिन बीत रहे जीवन के बीच में ही संसार है। समय हर चीज का पैमाना है। वक्त, व्यक्ति ही नहीं वस्तुओं की आयु भी तय करता है। यानी चाहे निर्जीव हो या सजीव दोनों का सृजन और समापन उसके मातहत है। कहने को वक्त बड़ा निरंकुश है... लेकिन चाहे वह दवाओं की ‘एक्सपायरी’ तारीख को निश्चित करता हो या राजनीतिक सत्ता के निश्चित कार्यकाल को। समय की इस निरपेक्ष गति को देखकर कहना पड़ता है कि-
‘अब यही मुनासिब है आदमी के लिए
  वह वक्त के साथ-साथ  चलता रहे..’ 
बहरहाल नववर्ष हमें अतीत से सबक लेने और आसन्न चुनौतियों से निपटने का अवसर दे रहा है। पहले तो यही उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार और संसद में, संवाद और विश्वास की बाहाली हो। क्योंकि बिना संवाद के न तो हम अपने भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं, न ही किसी नीति या निर्णय को तार्किक ठहरा सकते हैं।अलबत्ता यह बात सरकार और विपक्ष दोनों को याद रखनी होगी कि किसी मुद्दे पर एक सहमति का वातावरण विकसित हो। मात्र छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति से बचना होगा, विरोध के लिए विरोध जैसी मानसिकता से बाहर निकलने का समय है। दुष्यंत कुमार की दो पंक्तियां रोशन हो आती है कि-
‘मत कहो आकाश में कोहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है’ 
नए साल का सूरज यदि इस उम्मीद से चमके कि शब्दों का संसार शालीन और मर्यादित बना रहेगा तो, यह एक सूकूनदेह अहसास होगा। वर्ष 2013 में वैश्विक मंदी के दबाव में अर्थव्यवस्था की जो चाल सुस्त पड़ गई थी, वह 2014 में फिर मजबूत होगी। नया वर्ष इस लिहाज से ऐतिहासिक हो सकता है कि हम प्रकृति और पर्यावरण के साथ दोस्ताना रिश्ते की अनिवार्य जरूरत को न सिर्फ समझें बल्कि इस बाबत सक्रिय बने। क्योंकि गर हम अब भी नहीं चेते तो सचमुच देर हो जाएगी। सदी के महान वैज्ञानिक स्टीफन हांकिन्स की कुछ   वर्षों पहले की गई टिप्पणी क्या काफी नहीं कि- ‘मानवजाति ने धरा के संसाधनों का पिछले 1000 वर्षों का दोहन, महज100 वर्षों में कर डाला है, अब दोहन की यही गति प्रति 10 वर्ष हो गई है और यह हाल रहा तो यह 1000 वर्षों का दोहन प्रति 1 वर्ष होने के करीब है। इस लिहाज से यदि मानव का अस्तित्व बरकरार रखना है तो आने वाले 200 वर्षों के बाद कोई दूसरा ग्रह रहने के लिए तलाश करना ही होगा।’
तो आज पूरी दुनिया में उत्सव का स्वरूप ले चुकी अंग्रेजी कलेंडर की तारीख ‘एक जनवरी’ दुनिया के सभी मुल्कों में तो नहीं पर कई देशों में नए वर्ष की तिथि घोषित है। कई सवाल भी खड़े किए जाते हैं कि इस मनोवैज्ञनिक तिथि से लोगों के दैनिक जीवन के रसायन में, उसके कार्यकलाप में क्या फर्क आता है। वही चंदा, वही सूरज, वही तारे और वही नजारे। फिर भी यह समय का मनोविज्ञान ही तो है जो जीवन प्रवाह में एक नया अध्याय जोड़ता चलता है। बहरहाल, शुभकामना की भारतीय परम्परा ‘स्व’ के बजाय ‘सर्व’ कल्याण की कामना करती है। लिहाजा हम उम्मीद करते हैं कि न सिर्फ व्यक्ति, परिवार, मित्र-यार, देश-प्रदेश बल्कि समस्त संसार की सम्पूर्ण मानवजाति के लिए वर्ष 2014 सुखद, शांतिमय और उन्नतिदायी-फलदायी हो। 

Sunday, 1 December 2013

साख का संकट

  इनदिनों टीवी में एक विज्ञापन प्रसारित हो रहा है कि ‘इज्जत (साख)बड़ी मेहनत और मुश्किल से आती है और एक बार चली गई तो फिर लौट के नहीं आती। यानी साख को बनाना जितना कठिन है उससे मुश्किल है उसको बरकरार रखना। अत: इनदिनों देश-दुनिया में महंगाई, असुरक्षा के साथ जो सबसे बड़ा संकट है वह है किसी व्यक्ति या संस्था की साख का संकट, जो चतुर्दिक दिखाई देता है। क्रेडिबिलटी यानी साख किसी के बारे में वह अवधारणा है जो उसके भरोसे को कायम रखता है। बाजार में व्यक्ति की साख अच्छी हो तो उसे धन लेने और देने में कोई महाजन/व्यापारी संकोच या डर का अनुभव नहीं करता। यह साख कई तरह की हो सकती है। जैसे बैंकों की साख, हुंडी की साख, मीडिया की साख, व्यक्ति स्तर पर समाज सेवियों, नेताओं और धर्म गुरुओं की साख आदि।
सभी स्तर पर साख का बना रहना हर लिहाज से व्यक्ति, किसी संस्था, देश-दुनिया के लिए बेहतर अवस्था है। लेकिन दुर्भाग्यवश सबसे अधिक क्षरण इसी प्रवृत्ति में देखने में आया है। इसका सबसे बड़ा नुक्सान जो उठाना पड़ रहा है वह यह कि सोसायटी में मानवीय स्वभाव के प्रतिकूल बेहद अविश्वास और निराशा का वातावरण निर्मित होने लगा है। यदि कहें दे कि ऐसा हो चुका है तो कदाचित किसी को कोईआपत्ति न हो। जो कि हमारे विकास का लक्ष्य कतई नहीं है। लेकिन विकास की इस यात्रा में जिस बात की सर्वाधिक बलि दी गई है वह मात्र ‘साख’ यानी विश्वास की है।
अभी बहुत दिन नहीं हुए जब माने-जाने बुजुर्ग संत आसाराम को छल से धर्म की आड़ में यौन शोषण और विश्वासघात करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। वर्षों की कमाई इज्जत और धर्म गुरू की उनकी साख को एक छुद्र हरकत ने उन्हें सलाखों के पीछे न सिर्फ ढकेल दिया बल्कि इतने सालों में जो नाम, इज्जत, शोहरत बटोरी थी, वह पल झपकते ही बर्बाद हो गई। अपनी यादाश्त को थोड़ा फ्लैश बैक करें तो नब्बे के दशक में उत्तरप्रदेश के एक मंत्री अमरमणि ने कवियत्री मधुमिता शुक्ल के मोह में सब गवां दिया था। हरियाणा के बहुचर्चित मंत्री कांडा जो जूता बेचने के व्यापार से लेकर सरकार के कारोबार में शामिल हो, समाज में एक बड़ा मुकाम हासिल किया था। वे एयर होस्टेज गीतिका के फेर में ऐसे उलझे कि सब कुछ मुट्ठी में बंधी रेत की तरह फिसल गया। एनडी तिवारी का डीएनए टेस्ट और उससे हुई बदनामी ने उनसे क्या कुछ नहीं छीन लिया है। इतना ही नहीं ऐसी घटनाओं को मसाला की तरह परोसने वाला जनप्रिय मीडिया हाऊस ‘तहलका’ के एक चर्चित स्तंभ तरुण तेजपाल अपने ही एक कमसिन मुलाजिम के जाल में ऐसे उलझे कि उनके प्रोडक्शन हाऊस ‘तहलका’ में वाकई तहलका मच गया। आपको याद होगा कि नब्बे के दशक में तरुण तेजपाल ने ‘तहलका’ के जरिए देश भर में जिस धमक के साथ अपनी धाक बनाई थी, उनकी साख भी यौन शोषण के एक प्रकरण के कारण तार-तार हो गई।
ये सही है कि स्त्री शोषण की प्रवृत्ति सदा से समाज में विद्यमान रही है और इतिहास देखकर यह लगने लगता है कि अनेक कानूनी उपायों के बावजूद यह कम ज्यादा तौर पर बनी रहेगी। दरअसल, इसे कानून और बंधन के बाहरी दबाबों से निषिद्ध नहीं किया जा सकता। यह सारा मसला नैतिकता का है जो स्वनियंत्रण के जरिए ही नियंत्रित हो सकता है। क्योंकि गर कानून से इसे रोका जा सकता होता तो ईरान जैसे देशों में जहां इस अपराध की बेहद कठोर और अमानवीय सजाएं मुकर्रर हैं वहां ऐसे क्राईम कदापि न होते पर ऐसा नहीं है। बावजूद  इस बहाने से कानून को लचर नहीं छोड़ा जा सकता। नि:संदेह कठोर कानून भय का वातावरण बनाता है, जिससे अपराधियों में डर और अपराधों में अपेक्षाकृत कमी देखने में आती है। एक अहम सवाल इन घटनाओं के नेपथ्य में है, जो अक्सर या तो उठाया नहीं जाता अथवा जब उठाया जाता है तो उसे स्त्री स्वंतत्रता के पर कतरने की नकारात्मक पोंगापंथी विचारधारा के तौर पर देखा जाता है। हमारा मानना है कि कई मामलों में गर स्त्री तय कर ले कि उसे ऐसे बहकावों में आना ही नहीं है, जो उसके शोषण का कारण बन सकते हैं, तो यकीन मानिये की समस्या का अस्सी फीसदी हल तो इसी संकल्प से निकल सकता है। लेकिन समस्या के मूल में निहारने की बजाए उसकी शाखाओं में लग रहे रोगों पर कानून और पहरों की तलवार चलाई जाती है। लेकिन इस छंटाई के बाद हर बार उस ग्रंथि का प्रस्फुटन हो आता है।
स्त्री-पुरुष संबंधों में आज जो अविश्वास यानी साख का संकट है वह कोई नवीन परिघटना नहीं है। हां अब इनके तरीकों में विश्वासघात और निरंकुशता का पुट अधिक दिखता है। स्वभाव या वृत्ति ऐसी अवस्था है जो सहज नहीं बदल सकती। और फिर अब न तो गरिमामय, नैतिकता पूर्ण नेतृत्व है, न ही ऐसा  न ही ऐसा समाज।

Saturday, 23 November 2013

'वोट ऑन सेल' आफर चालू है

बड्डे ने बनबारी से कहा कि आज शाम से खुलेआम चुनाव की चर्चा, काना-फूसी, तीर-तुक्का, जिताने-हराने के निवेदन, विश्लेषण सब 'साईलेंट' हो जाएंगे। और फिर शुरू होगा अंदरखाने में अल्टी-पल्टी का दौर। लक्ष्मीदेवी दीपावली में भले उतनी चंचल नजर न आईं हों, जितनी आगामी दो दिनों में होने जा रही हैं। बड्डे बोले- अरे बनबारी! इस दफा चुनाव आयोग के डंडे का डर चौतरफा पसरा है।पोस्टर, बैनर, मोटर-गाड़ी सब 'काउंट' में और 'लिमिट' में हैं। चुनाव आयोग की गोपनीय निगाहें, 'बिग बॉस शो' की 'थर्ड आई' की तरह एक-एक गतिविधि को 'वॉच' कर रही हैं। तभी तपाक से बनबारी ने कहा- नेता-जनता दोनों 'वेलनोन' हैं कि हाथ जोड़ने, मिन्नते करने, 'डोर टू डोर' खाली पर्चा लिए खीस निपोरने से कुछ हाथ नहीं आने वाला। आगामी पंचवर्षीय मलाई पेलने के पहले, पब्लिक को 'माल' की आयुव्रेदिक 'पुड़िया' दबे छुपे दिये बिना 'गेम' नहीं बनने वाला। क्योंकि इस पुड़िया में वो ताकत है जो प्रतिद्वन्द्वी के 'सॉलिड से सॉलिड' वोटों को गच्चा देकर अपने पाले में ला सकती है। इसलिए अभी असल काम बाकी है। कहते हैं न कि 'रात बाकी, बात बाकी।' खबर है कि फलां, ढिकां के समर्थन की मोटी मलाई लील रहा है। जनता का एक बड़ा वर्ग है जो दो दिन की मलाई के लिए पांच साल तक अपना तेल निकलवाने के लिए तैयार हो जाता है। बड्डे खीङो- यार बनवारी तुम्हारी सोच बौनी है, नकारात्मक है। जनता अब 'सेंसिबल' है और सब जानती है कि कौन फोकटिया, कौन काम का और कौन नक्शेबाज है और कौन सहज सुलभ? और फिर यह कोई पार्षद, मेयर या पंचायत का चुनाव नहीं जिसे व्यक्ति विशेष हांकेगा। यह तो प्रदेश की सरकार बनने िबगड़ने का मामला है, एक विचारधारा को बरकरार रखने या बदलने का मामला है। अपना प्रदेश कहां था, कहां आ गया है, इस मसले पर जनता को फुसलाया नहीं जा सकता। जो कथित नेता-नपाड़ी 'माल' के बदले 'वोट ऑन सेल' का अभियान छेडें़ हैं न बनबारी, उनकी दाल नहीं गलने वाली। बनबारी ने बड्डे को प्यार से समझया कि तुम 'थ्योरिटिकली' सही हो मगर 'प्रैक्टिकली' गलत। क्योंकि विकास या विनाश का सच या तो स्वीकार होता नहीं या होने नहीं दिया जाता। जनता जाति के नशे में बौराई सी बाग रही है। क्योंकि आलाकमानों ने टिकिटों की ऐसी गोटी फिट की है कि 'सेम कास्ट को सेम कास्ट' से लड़ाओ है। ताकि एक 'ग्रेट कनफ्यूजन क्रियेट' किया जा सके।इसलिए वोट का मूल्य काम-धाम से नहीं 'माल' से तौला जा रहा है। सो मौका है बड्डे भूत की लंगोटी ही ले लो वर्ना अगले पांच बरस सिर्फ चिल्लपों होगी..!

Monday, 7 October 2013

जेल से शुरू जेल में ख़तम

बड्डे और बनवारी लालू की सजा पर समोसा खाते हुए 'गॉसिप' में मशगूल थे कि 'जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू' का नारा अब इतिहास बन गया। सोचो बड्डे बिना आलू के समोसा कैसा होगा! और बिना लालू के बिहार! वो भी तकरीबन 11 बरस तक। बड्डे बोले अरे! बनबारी, याद करो जेपी आंदोलन में हीरो बनकर उभरे लालू का सियासी सफर जेल से शुरू हुआ था और अब जेल में ही समाप्त हो जाए तो क्या अफसोस! जहां की मिट्टी वहीं इस्तेमाल हो गई। और फिर लालू तो लालू है वे कहीं रहें, चाहे जेल में या रेल में उनकी सुर्खियां कम होने वाली नहीं। राजनीति में हास्य या हास्य की राजनीति करने वाले लालू अब जेल में यही 'रोल' निभायेंगे। उनके कैद में आने से कैदियों का मनोबल बढ़ेगा। एक कैदी दूसरे कैदी से फुसफुसाया कि 'जब ई ससुरा लालुआ का जेलिया होइ गवा है ता हम कउने बड़ा अपराध किए हैं।' दूसरा बोला "बाबू साहब ई ललुआ बहुतै करामाती है। कबहुं अपने पैतृक गंउआ 'फूलबगिया' में भैंस चरावैली, ओकरे सवारी गांठत-गांठते पटना मा सीएम की कुर्सी पर सवार हो गइल।" लेकिन कहते हैं न कि 'चोर चोरी से जाए हेरा फेरी से न जाए।' सो आदतें हैं बड्डे पड़ जाएं तो फिर उम्र भर साथ नहीं छोड़तीं। कभी भैंस को चारा चराते. चुराते उसका चारा चुग्गा ही लील गए। महोदय ने जिसकी पीठ पर बैठकर बचपन् बिताया उसी भैंस को बे-चारा कर दिया था। लेकिन सीबीआई ने लैंस लगा-लगा कर जांच की और नतीजा है कि जिनके पास चारा ही चारा था अब वही बे-चारा हैं, बे-सहारा हैं। नोट कबाड़ने के राजनीति में अनेक मार्ग हैं। जिसको देखो वही माल बनाकर लाल हो रहा है किसन् यह लाभ नहीं लूटा। मगर निरीह पशुओं का निवाला छीनने पर लगी हाय ने लालू को उनके झुंड के साथ् जेल में पेल दिया गया। बनबारी बोले- नहीं बड्डे यहां तो जो पकड़ा गया उसके बरक्स चोर-चोर का शोर है जो नहीं पकड़ा गया वह अब भी सवा शेर है। बहरहाल, राहुल गांधी ने जो गुल खिलाया है उससे कईयों की बत्ती गुल है। कई तो ऐसे हैं जिन्हें जेल की सलाखें सपने में डराने लगी हैं। चुनाव आसन्न हैं और बहुतों के सामने टिकिट का संकट खड़ा है। राहुल बाबा ने अध्यादेश को क्या फाड़ा अच्छे अच्छे फटेहाल, बेहाल, लहुलुहान होकर विक्षिप्त से 'विहेब' करने लगे हैं। उधर खबर है कि अपने जुर्माने  की रकम (25 लाख)को भरने के लिए लालू जेल में क्लास लेंगे और 25 रुपईया रोज कमाएंगे। उनकी पार्टी 'कॉनफिडेंस' में है कि लालू जेल से पार्टी को हांकेंगे और अपने बछुआ तेजस्वी को ताज तक पहुंचाने की आखिरी सांस तक जद्दोजहद करेंगे।

Sunday, 29 September 2013

राजनीति में नेता तीन तरह के

पिछले दिनों मध्य प्रदेश की दो बड़ी चुनावी सभाओं को बारीकी से तजबीजने और मथापच्ची करने के बाद बड्डे ने विश्लेषण दिया कि- देश की राजनीति में तीन तरह के नेता हैं। पहले वे जो पार्टी में वर्षो से जमे हैं, साठ के ऊपर हैं(कुछ खानदानी अपवादों को छोड़कर) आज भी पूजे जा रहे हैं,जो खांटी के हैं, जिनका एक गुट और आभामंडल है। ये वे नेता है जो पार्टी में परमानेंट हैं, जिनमें टिकट पाने, विधायक या मंत्री बनने की ललक नहीं, क्योंकि यह तो उनका, उनकी पार्टी में मौलिक अधिकार है। अब तो जो कुल कवायद है, वह केवल मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनने की लालच में निहित है। क्योंकि देश प्रदेश में राजनीतिक मोक्ष के दो ही साधन(पद) हैं- प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री। इसी मोक्ष के निमित्त वे हैलीकॉप्टर से इधर-उधर उड़ते, निरीह जनता को वादों के उपहार बांटते, वर्तमान सरकारों की धज्जियां उड़ाते, बखिया उधेड़ते नजर आते हैं। इनका काम इतना है कि वे शहर-शहर जाएं, फिल्मी हीरो के माफिक उड़नखटोले से वहां अवतरित हों, जहां पब्लिक उनके दर्शनों को उमड़े और वे मंच से हाथ हिलाएं, दिल मिले न मिले, लेकिन अपने साथियों के हाथ से हाथ जोड़कर, उन्हें हवा में लहराकर बनावटी यूनिटी का उद्घोष करें। ताकि संदेश दिया जा सके कि पार्टी के सिपहसालारों अब सत्ता हासिल करने के मिशन में पिल पड़ो, क्योंकि अब गुटबाजी का नहीं गांठ जोड़कर, हरकत करने का टाईम है। दूसरे वे नेता हैं जो 'लोकल' और 'वोकल' (बतोलेबाज) हैं। जिन पर इन बड़ी सभाओं में अपने-अपने दल बल के साथ 'पार्टीशिपेट' करने की जिम्मेदारी होती है। क्योंकि यही वह मौका और मंच हैं, अपने आकाओं के सम्मुख अपनी ताकत दिखाने का, कि वे टिकिट के असल दावेदार क्यों हैं? दरअसल, इनमें भी मंचासीन 'परमानेंट' नेताओं के 'सेप्परेट' समर्थक होते हैं, जिसके संकेत पोस्टरों, विज्ञापनों और सभा स्थल पर लगे नारों और पिटवाई गई तालियों से मिलते हैं। इनका 'ओनली टारगेट टिकट' होती है। तीसरे वे नेता हैं जो नई पौध कहलाती है। भले ये औसतन चालीस के आस-पास हैं, पर ऊर्जावान हैं। इनमें भी विधयक बनने की ललक है, मगर अनुशासन के नाम पर इनका शोषण पहले और दूसरे टाईप के नेता आजीवन करते हैं। इनका काम स्टेशनों में, हैलीपैड पर, सड़कों के किनारे, वंदन द्वार लगाकर, फूल-माला लिए, गगनचुम्बी नारों का उद्घोष मात्र है। इनके साथ फोकटिए टाईप के कुछ लड़कों की फौज फौरी तौर पर इकट्ठी होती और विलीन हो जाती है। आखिर बड्डे के इस विश्लेषण को गौर से सुनकर हमें तसल्ली हुई कि अब नेताओं की असलियत किसी से छिपी नहीं।

Friday, 20 September 2013

मोदी रे..अब देश हुआ बेगाना.


देश में मोदी विरोध के नए-नए तरीकों का इजाद हो रहा है। बड्डे बोले- सो तो है बड़े भाई। लोकतंत्र में सबको 'इक्वल राइट' है, 'इलेक्शन फाइट' करने का। 'इवन' उन्हें भी जो जेल में हैं।
आज की डेट में तो संसद में सौ से ऊपर की संख्या ऐसी है जिन पर किसी न किसी तरह के आरोप लगे हैं। मोदी पर भी गुजरात दंगों में राजधर्म न निभाने का आरोप है। तो क्या इसका अर्थ है कि वे चुनाव न लड़ें? 1984 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व में तो पूरे देश में दंगे हुए।
सरदारोंको ढ़ूंढ-ढ़ूंढ कर निपटाया और लूटा गया।
तब भी राजधर्म निभाया नहीं गया। लेकिन किसी ने चूं तक न की। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने यह कहकर चुप्प्प्प्प्पी साध ली थी कि जब बड़ा पेड़(इंदिरा की हत्या) गिरता है तो धरती हिलती है। लेकिन सब भुला दिया गया। तब से तीन सरकारें कांग्रेस की बनी। किसी ने देश नहीं छोड़ा। असम जहां की सीट से मनमोहन सिंह पीएम पद पर एपांइट हुए हैं, वहां दंगे हुए, समुदाय विशेष के लोग कत्लेआम किए गये, लेकिन खामोशी छाई रही। किसी ने देश नहीं छोड़ा, न ही राजधर्म न निबाहने की बात हुई। अब मुजफ्फरनगर के दंगों में कौन-कौन देश छोड़ता है देखना होगा। लेकिन मोदी को लेकर लोगों की निष्ठा हिल गई, उन्हें अछूत मानकर कथित दलों, जिन्होंने भाजपा के साथ सत्ता सुख भोगा, उन्हें वही दल अब रावण दिख रहा है, वह भी दस नहीं सौ सिरों वाला। अभी तो मोदी केंद्र में जीते नहीं, मात्र अभियान पर हैं तो कथितों का हाजमा खराब होने लगा है। गर जीत गए तो क्या लोग बाग देश छोड़ देंगे, क्योंकि मोदी तानाशाह हैं, मोदी निरंकुश हैं,मोदी जीत गए तो देश के नियम कायदे कानून उनके चरणों की दासी हो जाएंगे।
क्या मोदी संविधान को रौंद डालेंगे? सोचो बड्डे कितनी कमजोर आस्था के लोग इस देश में रह रहे हैं। गुजरात में तीन बार से लगातार जनता उन्हें चुन रही है तो वहां के किसी नागरिक ने देश नहीं छोड़ा, उल्टे सव्रे कहते हैं कि गुजरात का कुछेक कमियों के बावजूद विकास ही हुआ। यहां तक कि योजना आयोग ने मोदी के विकास कार्यो को 'एप्रिशिएट' किया है। फिर भी 'सरप्राईजिंगली' कन्नड़ साहित्यकार डॉ यू आर अनंतमूर्ति टाईप के लोग किस बात पर मोदी के नाम से देश छोड़ने चले हैं। हां उनको जरूर देश छोड़ना पड़ सकता जिनका माल विदेशों में जमा है। अलबत्ता मोदी की आड़ में समुदाय विशेष में भय उत्पन्न कर, उनका भयादोहन वोट की गोटी फिट करने के लिए हो रहा है। चुनाव में दांव सबको आजमाने का अवसर है। सबका फैसला जनता की उंगलियों में है। इसलिए उंगली करनी है तो वोटिंग पैड पर करें, देश के प्रति निष्ठा पर नहीं। जिसको देश ने सब दिया उनके द्वारा देश का तिरष्कार शर्मसार करता है।